मारवाड़ का राठौड़ राजवंश: रणमल्ल से गांगा (भाग 2) एवं राव मालदेव — शौर्य युग – Rajasthan History Chapter 21

राव सूजा, गांगा और मालदेव का शौर्य युग, गिरी-सुमेल की हार तथा चन्द्रसेन व मोटा राजा उदयसिंह।

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In this chapter (12 sections)
  1. राव सूजा (1492–1515)
  2. राव गांगा (1515–32)
  3. राव मालदेव — शौर्य युग
  4. उपाधियाँ और गद्दी
  5. विजय-अभियान
  6. रानियाँ, पुत्र, पुत्रियाँ
  7. गिरी-सुमेल का युद्ध (1544)
  8. हरमाड़ा से मृत्यु तक
  9. मुग़ल युग (1562–1724)
  10. राव चन्द्रसेन (1562–81)
  11. मोटा राजा उदयसिंह (1583–95)
  12. रैपिड फायर तथ्य

मालदेव का काल मारवाड़ का «शौर्य युग» कहलाता है, पर यही वह दौर भी है जब शेरशाह की एक चाल ने गिरी-सुमेल में पासा पलट दिया। उससे पहले सूजा और गांगा राज्य को सँभाल चुके थे, और बाद में चन्द्रसेन व मोटा राजा उदयसिंह मुग़लों के सामने अलग-अलग रास्तों पर चले। इस भाग में सूजा, गांगा, मालदेव की उपाधियाँ, विजयें, रानियाँ, गिरी-सुमेल, हरमाड़ा और मुग़ल युग के आरम्भिक शासक दिए गए हैं।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — मारवाड़ का राठौड़ राजवंश, 7 चॉक-बोर्ड चित्र, 4 चार्ट, 31 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. राव सूजा (1492–1515)

  • सूजा सातल का भाई था। उसने बाड़मेर और जैतारण जीतकर राज्य में मिलाए।
  • इसके राज में सामन्त इतने सबल हो गए कि केन्द्रीय सत्ता को ललकारने लगे; मेड़ता में राव वीरम ने अपना स्वतंत्र राज्य खड़ा कर लिया।
  • गद्दी मिलते ही सूजा से राव बीका ने पिता जोधा की इच्छा बताते हुए राजचिह्न (छत्र, चँवर आदि) माँगे। इनकार पर बीका फ़ौज लेकर जोधपुर आ धमका। बीच में पड़कर सूजा की माँ हाड़ी जसमादे ने राजचिह्न बीका को दिलवा दिए और टकराव टल गया।

याद रखें: सूजा के समय का सबसे बड़ा ख़तरा = सामन्तों की बढ़ती ताक़त; मेड़ता में वीरम स्वतंत्र हुआ।

2. राव गांगा (1515–32)

गांगा सूजा के पौत्र थे। 1515 में जब उन्होंने गद्दी सँभाली, मारवाड़ के नाम पर बस जोधपुर, फलौदी, पोकरण, सोजत और जैतारण के परगने थे।

घटनावर्षविवरण
खानवा1527राणा सांगा को सहायता — पुत्र मालदेव को 4,000 सैनिक देकर भेजा
जालौर पर चढ़ाई—जालौर मारवाड़ में मुस्लिम सत्ता का पहला गढ़ था; वहाँ सिकन्दर खाँ और गजनी खाँ में गद्दी की खींचतान चल रही थी। गांगा के चढ़ आने पर सिकन्दर खाँ ने फ़ौजी ख़र्च चुकाकर राजपूतों को लौटा दिया
सेवकी का युद्ध1529नागौर मुस्लिम सत्ता का दूसरा गढ़ था; वहाँ के शासक दौलत खाँ ने राव शेखा (गांगा के चाचा) को अपनी ओर करके जोधपुर पर हमला बोला। गांगा ने बीकानेर के राव जैतसी की फ़ौज साथ लेकर सामना किया और शेखा मारा गया
  • राज्य के भीतर कारगर प्रबन्ध करके और आस-पास के सामन्तों पर लगाम कसकर गांगा ने मारवाड़ को मज़बूत किया।
  • 9 मई 1532 को गांगा की मृत्यु हुई। ऐसा कहा जाता है कि महल की खिड़की पर बैठे गांगा को पुत्र मालदेव ने धक्का दे दिया — इसीलिए मालदेव “मारवाड़ का पितृहन्ता” कहलाया।

ट्रिक: पितृहन्ता क्रम: मालदेव (पहला) → बख्तसिंह (दूसरा)।

3. राव मालदेव — शौर्य युग

  • शासन ➜ 1532–1562
  • राज्याभिषेक ➜ सोजत, 5 जून 1532
  • युद्ध ➜ 52

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

याद रखें: मालदेव का काल = “मारवाड़ का शौर्य युग”।

4. उपाधियाँ और गद्दी

किसने कहाक्या कहा
अबुल फ़ज़ल, निज़ामुद्दीन, बदायूँनीहिन्दुस्तान का “हशमत वाला शासक”
बदायूँनीभारत का “महान पुरुषार्थी राजकुमार”
फ़रिश्ताहिन्दुस्तान का “सबसे शक्तिशाली राजा”

… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

  • पिता की हत्या का आरोप शान्त हो जाने पर मालदेव का राज्याभिषेक सोजत में 1532 में हुआ (दिन 5 जून)।
  • अपने पिता गांगा का हत्यारा माने जाने के कारण वह मारवाड़ का पितृहन्ता कहलाता है।

5. विजय-अभियान

काल / क्रमघटनाविवरण
1532भाद्राजूणशासक वीरा मारा गया; किला पुत्र रतनसिंह को दिया
1533हीराबाड़ी (नागौर)दौलत खाँ हारा; नागौर पर अधिकार; वीरमदेव मांगलियोत सूबेदार
1535मेड़ता व अजमेरवीरमदेव (मेड़ता) अजमेर पर क़ाबिज़ हुआ और मालदेव की माँग ठुकराई; युद्ध में हारा
1538सिवाणाठाकुर डूंगरजी सहायता को नहीं आए; मालदेव का हमला, डूंगरजी भाग गए

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

विजयसामनेकारण / परिणाम
भाद्राजूण (1532)वीरापहली चढ़ाई; पुत्र रतनसिंह को दिया
नागौर (1533)दौलत खाँवह मेड़ता लेने बढ़ा था; हीराबाड़ी में हार
मेड़ता-अजमेर (1535)वीरमदेवअजमेर लौटाने से इंकार
सिवाणा (1538)डूंगरजीनागौर के झगड़े में मदद न की

ट्रिक: क्रम याद करें: भाद्राजूण → नागौर → मेड़ता-अजमेर → सिवाणा → जालौर → बीकानेर।

6. रानियाँ, पुत्र, पुत्रियाँ

रूठी रानी उमादे

जैसलमेर के रावल लूणकरण की बेटी उमादे का विवाह 1536 में मालदेव से हुआ। विवाह की पहली रात ही रूठना-मनाना बिगड़ गया, तो मालदेव ने उन्हें तारागढ़ (अजमेर) भिजवा दिया। इसी कारण वे “रूठी रानी” कहलाईं। 1562 में मालदेव के निधन पर वे उनकी पगड़ी के साथ सती हुईं।

स्वरूपदे और कुम्भलगढ़

  • मेवाड़ के झाला सज्जा के बेटे जैतसिंह ने उदयपुर की जागीर त्यागकर मालदेव के यहाँ आश्रय लिया; बदले में उन्हें खैरवा की जागीर मिली।
  • जैतसिंह ने बड़ी पुत्री स्वरूपदे का विवाह मालदेव से किया। मालदेव छोटी पुत्री से भी विवाह चाहता था; जैतसिंह ने उसे महाराणा उदयसिंह से ब्याह दिया।
  • इससे नाराज़ होकर मालदेव ने कुम्भलगढ़ पर आक्रमण किया, पर असफल रहा।
पुत्रमाताक्या हुआ
रामकछवाही रानी लाछलदे (ज्येष्ठ पुत्र)स्वरूपदे के कहने पर राज्य से निकाला गया; माता कैद में; राम मेवाड़ के केलवा (राजसमन्द) में रहा
उदयसिंहझाली रानी स्वरूपदे (बड़ा पुत्र)स्वरूपदे की नाराज़गी से उत्तराधिकार से वंचित; फलौदी की जागीर
चन्द्रसेनझाली रानी स्वरूपदे (दूसरा पुत्र)स्वरूपदे के कहने पर उत्तराधिकारी बनाया गया
  • कनकबाई (मालदेव की बेटी) गुजरात के सुल्तान महमूद की बेगम बनीं।
  • पुत्री लालबाई का विवाह शेरशाह के पुत्र इस्लामशाह सूर से हुआ।

7. गिरी-सुमेल का युद्ध (1544)

युद्ध का क्रम

  1. शेरशाह दिल्ली से चला
  2. वीरमदेव व कल्याणमल रास्ते में मिले
  3. गिरी में मालदेव, सुमेल में शेरशाह
  • शेरशाह आगरा, नारनौल, फतेहपुर, डीडवाना होते मारवाड़ पहुँचा। मेड़ता के पूर्व शासक वीरमदेव और बीकानेर के राव कल्याणमल अपनी सेना सहित उसके साथ आ मिले।
  • ब्यावर क्षेत्र के गिरी गाँव में मालदेव की फ़ौज टिकी और पास के सुमेल में शेरशाह की।
  • मालदेव के सेनापति थे जैता और कूँपा। शेरशाह ने चालाकी से मालदेव के मन में उन पर शक भर दिया और मालदेव मुख्य सेना सहित रात में जोधपुर लौट गया।

युद्ध के बाद

  • शेरशाह ने जोधपुर दुर्ग लिया; दुर्ग में शेरशाह सूरी मस्जिद बनवाई; मेहरानगढ़ का प्रबन्ध खवास खाँ को सौंपा।
  • मालदेव बचकर सिवाणा दुर्ग चला गया — जिसे मारवाड़ के राजाओं की शरणस्थली कहा जाता है।
  • शेरशाह ने फलौदी, पोकरण, सोजत, पाली, जालौर और नागौर में थाने बिठाए; वीरमदेव को मेड़ता और कल्याणमल को बीकानेर सौंपा।

8. हरमाड़ा से मृत्यु तक

हरमाड़ा का युद्ध (1557)

  • महाराणा उदयसिंह और अजमेर के सूबेदार हाजी खाँ में रंगराय नामक वेश्या को लेकर मतभेद हुआ; उदयसिंह ने अजमेर पर चढ़ाई की।
  • हाजी खाँ और मालदेव की संयुक्त सेना ने 1557 में हरमाड़ा (जयपुर) में उदयसिंह और मेड़ता शासक जयमल की संयुक्त सेना को हराया — मेवाड़ की हार हुई।

अन्तिम वर्ष

  • दिल्ली में मुग़ल शासन जमने पर अकबर ने साम्राज्यवादी नीति से मारवाड़ पर दबाव बढ़ाया; मालदेव के अन्तिम वर्षों में मेड़ता मुग़लों के हाथ चला गया।
  • मालदेव का निधन 7 नवम्बर 1562 को हुआ।

उसके समय के ग्रन्थ

रचनाकार / रचनाविधा
ईसरदास के सोरठेडिंगल सोरठे
आसिया के दोहेदोहे
आसा बारहठ के गीतगीत

9. मुग़ल युग (1562–1724)

काल / क्रमघटनाविवरण
1562चन्द्रसेन गद्दी पर31 दिसम्बर
1564जोधपुर पर मुग़ल कब्ज़ाहुसैन कुली खाँ
1570नागौर दरबारअकबर के सामने कई राजाओं की अधीनता
1581–83मारवाड़ खालसासीधे मुग़लों के अधीन

10. राव चन्द्रसेन (1562–81)

काल / क्रमघटनाविवरण
31.12.1562गद्दीमालदेव की मृत्यु के बाद; दोनों बड़े भाई राम व उदयसिंह नाराज़
1564राम की अकबर से मददहुसैन कुली खाँ की सेना ने मई 1564 में जोधपुर दुर्ग लिया; चन्द्रसेन भाद्राजूण (जालौर) चला गया
—लोहावट (फलौदी)भाई उदयसिंह से भिड़न्त; उदयसिंह घायल होकर भागा
नवम्बर 1570अकबर का नागौर दरबारआमेर के भारमल की मदद से; कल्याणमल (बीकानेर), हरराय भाटी (जैसलमेर), सुर्जन हाड़ा (रणथम्भौर) ने अधीनता मानी; चन्द्रसेन भाइयों की ओर अकबर का झुकाव देखकर दरबार छोड़ गया
  • भाद्राजूण-सिवाणा को अड्डा बनाकर वह मुग़लों से भिड़ता रहा। एक बार वह सोजत में भतीजे कल्ला (राम के बेटे) के यहाँ पहुँचा; मुग़ल दस्ते पीछे लगे तो सिवाणा लौट गया। साथी थे रावल सुखराज, सुरजा, देवीदास।
  • सिवाणा में मुग़ल दबाव बढ़ने पर वह रामपुरा के पहाड़ों में, फिर पीपलूद और काणूजा की पहाड़ियों में गया और आसपास लूट-पाट करने लगा; इससे मारवाड़ की प्रजा नाख़ुश हुई और उसे सिरोही, फिर डूँगरपुर व बाँसवाड़ा में शरण लेनी पड़ी।
  • चन्द्रसेन और महाराणा प्रताप की तुलना रेऊ ने की है — दोनों जंगल-पहाड़ों में भटके, पर मुग़ल अधीनता नहीं कबूली।

चन्द्रसेन की मृत्यु (1581) के बाद 1583 तक मारवाड़ पर सीधा मुग़ल प्रबन्ध रहा — इसे खालसा कहते हैं।

11. मोटा राजा उदयसिंह (1583–95)

  • 1583 में अकबर ने उदयसिंह को मुग़ल अधीनता में मारवाड़ का शासक बनाया — वह मुग़ल अधीनता मानने वाला मारवाड़ का पहला शासक था।
  • 1587 में उसकी बेटी जोधाबाई (जगत गुसाई) शहज़ादे सलीम (जहाँगीर) को ब्याही गई; 1592 में उनकी कोख से खुर्रम (शाहजहाँ) पैदा हुए।
  • मुग़लों से वैवाहिक सम्बन्ध जोड़ने वाला भी वह मारवाड़ का पहला शासक था; उसे 1,000 की मनसबदारी मिली।

किशनगढ़ शाखा

उदयसिंह के पुत्र किशन सिंह ने 1609 में जोधपुर के राठौड़ों से अलग होकर किशनगढ़ राज्य बनाया — जोधपुर और बीकानेर के बाद राठौड़ों का तीसरा केन्द्र।

12. रैपिड फायर तथ्य

  • मालदेव का राज्याभिषेक ➜ सोजत, 5 जून 1532
  • पितृहन्ता ➜ मालदेव (पहला), बख्तसिंह (दूसरा)
  • खानवा (1527) ➜ गांगा ने मालदेव को 4,000 सैनिक देकर राणा सांगा की मदद को भेजा
  • मालदेव की विजयों का क्रम ➜ भाद्राजूण → नागौर → मेड़ता-अजमेर → सिवाणा → जालौर → बीकानेर
  • गिरी-सुमेल (1544) ➜ गिरी में मालदेव, सुमेल में शेरशाह; जैता-कूँपा पर शक भरने से मालदेव रात में लौट गया
  • रूठी रानी ➜ उमादे, जैसलमेर के लूणकरण की बेटी; विवाह 1536, मालदेव के निधन पर सती
  • हरमाड़ा (1557) ➜ हाजी ख़ाँ व मालदेव की संयुक्त सेना ने उदयसिंह और जयमल को हराया
  • मुग़ल अधीनता मानने वाला पहला शासक ➜ मोटा राजा उदयसिंह (1583); 1587 में बेटी जोधाबाई का विवाह सलीम से
  • किशनगढ़ शाखा ➜ 1609, किशन सिंह ने अलग राज्य बनाया

अगले भाग में सूरसिंह व गजसिंह, अमरसिंह राठौड़, जसवंत सिंह प्रथम, दुर्गादास और गोरा धाय, तथा अजीतसिंह का काल — औरंगज़ेब के विरुद्ध लड़ाई तक।

पिछला भाग: मारवाड़ का राठौड़ राजवंश: सीहा से चूण्डा एवं रणमल्ल से गांगा (भाग 1)

अगला भाग: मारवाड़ का राठौड़ राजवंश: मुग़ल युग (1562–1724) (भाग 2)

इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान के दुर्ग · बीकानेर का राठौड़ राजवंश

पूरी श्रृंखला: राजस्थान का इतिहास — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

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