आन्दोलनों की जड़ समझनी हो तो देखिए कि बोझ किस-किस तरफ़ से बढ़ा — शासक, जागीरदार, महाजन और ऊपर से अंग्रेज़ी दख़ल। इसी दबाव से जनजाति और किसान, दोनों धाराएँ फूटीं। इस भाग में पृष्ठभूमि, कालक्रम और दोनों तालिकाओं के बाद मेर आन्दोलन, पहला भील विद्रोह, दमन के लिए बने सैन्य दल, जहाजपुर का मीणा विद्रोह तथा भोमट, बाँसवाड़ा व बारापाल के विद्रोह क्रम से दिए गए हैं।
माइंड मैप खोलें ➜
1. एक नज़र में
अंग्रेज़ों के आने से पहले भी जनता पर बोझ था, पर अब शासक, जागीरदार और साहूकार तीनों मिलकर निचोड़ने लगे और ऊपर से अंग्रेज़ी दख़ल जुड़ गया। इसी से राजस्थान में दो धाराएँ फूटीं — जनजाति आन्दोलन (मेर, भील, मीणा) और किसान आन्दोलन।
जनजाति आन्दोलन — क्यों
- भील, मीणा, सहरिया और गरासिया मुख्यतः राज्य के दक्षिण व दक्षिण-पूर्व में बसे हैं — मेवाड़, बागड़, हाड़ौती और ढूँढाड़ में।
- शासकों, जागीरदारों और महाजनों ने इनका शोषण किया; अंग्रेज़ों ने उनके परम्परागत अधिकार और जीवन-शैली में हाथ डाला।
- फलस्वरूप 1818 से देश की आज़ादी तक मेर, भील और मीणा बार-बार उठे।
किसान पर बोझ कैसे चढ़ता गया
- अंग्रेज़ों की छत्रछाया में शासक बाहरी हमलों से निश्चिन्त
- शासक पर तय रकम (खिराज) अंग्रेज़ों को देने का भार
- जागीरदारों से तय कर “छटूँद”
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
- जागीरी इलाक़ों में शासक शायद ही दखल देता था; जागीरदार जब चाहे लगान बढ़ा देता था — इसलिए जागीरी क्षेत्र के किसान सबसे ज़्यादा लुटे।
- बेगार, लाग-बाग (अनेक अनौपचारिक कर), ऊँची लगान-दर और महाजन का कर्ज़ — चारों साथ चलते थे।
याद रखें: सारांश: राजस्थान के अधिकतर किसान आन्दोलनों की कमान बाहर से आए नेताओं ने सँभाली। बिजौलिया, बेगूँ और बूँदी में अजमेर के राजस्थान सेवा संघ की बड़ी भूमिका रही; शेखावाटी-सीकर में रामनारायण चौधरी, ठाकुर देशराज और अखिल भारतीय जाट महासभा के नेताओं का हाथ रहा।
2. कालक्रम
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1818 | मेर आन्दोलन आरम्भ · पहला भील विद्रोह | झाक समझौता (विल्डर); मेवाड़ की सहायक संधि 13 जनवरी |
| 1822 | मेरवाड़ा रेजीमेंट | मुख्यालय ब्यावर |
| 1841 | मेवाड़ भील कोर | खैरवाड़ा |
| 1851–60 | जहाजपुर का मीणा विद्रोह | जनवरी 1855 आत्मसमर्पण · 1860 में अन्तिम दमन |
… शेष 12 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
3. जनजाति आन्दोलन — तालिका
| आन्दोलन | वर्ष | क्षेत्र | नेता | कारण | परिणाम |
|---|---|---|---|---|---|
| मेर | 1818–21 | मेरवाड़ा | मेर मुखिया | अंग्रेज़ों का पूर्ण नियन्त्रण थोपने का प्रयास | जनवरी 1821 में संयुक्त सेना ने दबाया; 1822 में मेरवाड़ा रेजीमेंट |
| पहला भील विद्रोह | 1818–28 | भोमट (उदयपुर) | दौलतसिंह, गोविन्दा | सहायक संधि, कर, रखवाली-बोलाई छिनना | 1823 में दमन; 1826 में बोलाई का अधिकार; 1828 में दौलतसिंह का आत्मसमर्पण |
| लिम्बाराबारू | 1825 | डूँगरपुर | भील मुखिया | भोमट की देखा-देखी | 12 मई 1825 की संधि — कई कर लगे |
| भोमट | 1839–42 | भोमट | भील सरदार | महाराणा सरदारसिंह की लगान-वसूली | मेवाड़ भील कोर से दमन |
… शेष 6 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
4. किसान आन्दोलन — तालिका
| आन्दोलन | वर्ष | स्थान | नेता | कारण | परिणाम |
|---|---|---|---|---|---|
| बिजौलिया | 1897–1941 | भीलवाड़ा (मेवाड़) | सीताराम दास → पथिक → माणिक्यलाल वर्मा | 84 लागें, चँवरी, तलवार बँधाई, युद्ध-चन्दा | 1922 का समझौता; 1941 में हल |
| बेगूँ | 1921–25 | चित्तौड़गढ़ | रामनारायण चौधरी, पथिक | 53 लागें व बेगार | 53 में से 34 लागें ख़त्म; बेगार बन्द |
| बूँदी (बरड़) | 1922–23 | बूँदी | नयनूराम शर्मा, हरिभाई किंकर | ऊँची लगान, 25 तरह की लाग-बाग | डाबी गोलीकाण्ड; कुछ रियायतें |
| बूँदी गुर्जर | 1936–43 | बूँदी | गुर्जर-मीणा किसान | नुक्ता-पाबन्दी, नए कर | 1943 में चराई कर में छूट |
5. आँकड़ों में
ट्रिक: तीन “जलियाँवाला” — मानगढ़ 1913 (भारत का प्रथम), नीमड़ा 1922 (दूसरा; गुजरात का) और नीमूचाणा 1925 (“राजस्थान का जलियाँवाला”; गाँधी: “दोहरी डायरशाही”)।
6. जनजाति — शुरुआती विद्रोह
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1818–21 | मेर आन्दोलन | मेरवाड़ा |
| 1818–28 | पहला भील विद्रोह | उदयपुर राज्य — भोमट |
| 1839–42 | भोमट का आन्दोलन | सरदारसिंह की लगान-वसूली |
ट्रिक: सैन्य दलों का क्रम — मेरवाड़ा (1822) → जोधपुर लीजन (1835) → मेवाड़ भील कोर (1841) → देवली रेजीमेंट।
7. मेर आन्दोलन
- मेरवाड़ा मेवाड़, मारवाड़ और अजमेर — तीनों के बीच बँटा था; किसी एक का सीधा राजनीतिक-प्रशासनिक नियन्त्रण नहीं था। मेर पास के इलाक़ों में लूटपाट से गुज़ारा करते थे।
- कारण ➜ अंग्रेज़ों ने मेरों को पूरी तरह अपने क़ाबू में लेना चाहा; यही कोशिश विद्रोह की चिनगारी बनी।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1818 | झाक गाँव का समझौता | अंग्रेज़ सुपरिन्टेन्डेंट एफ. विल्डर और मेरों में; मेरों ने लूटपाट न करने की सहमति दी |
| मार्च 1819 | विल्डर का आक्रमण | मेरों पर वादाख़िलाफ़ी का इल्ज़ाम लगा विल्डर की फ़ौज मेरवाड़ा में घुसी — मेर क्रोधित हुए |
| 1820 | झाक में हमला | मेरों ने झाक की पुलिस चौकियों पर हमला कर सिपाहियों की जान ले ली |
मेरवाड़ा रेजीमेंट (मेरवाड़ा बटालियन) में मेर सैनिक ही भर्ती किए गए — पहले जिनसे ख़तरा था, उन्हीं को वर्दी देकर इलाक़ा सँभलवाया गया। गठन डेविड ऑक्टरलोनी के आदेश पर माना जाता है।
8. पहला भील विद्रोह
- मेवाड़ में मराठा दखल ने महाराणा की सैनिक कमज़ोरी उजागर कर दी थी; भोमट के भील सरदारों ने इसका फ़ायदा उठाकर लूटमार शुरू की।
- 13 जनवरी 1818 को महाराणा भीमसिंह ने अंग्रेज़ों से सहायक संधि की — आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार अंग्रेज़ों को मिल गया; उनकी पाबन्दियों से भील विद्रोह पर उतर आए।
- यह राजस्थान का पहला भील विद्रोह था और उदयपुर राज्य में ही शुरू हुआ।
| क्रम | 1818 में भील विद्रोह के कारण |
|---|---|
| 1 | अंग्रेज़ों ने भीलों पर कर थोपने की कोशिश की |
| 2 | अंग्रेज़ों की भील-दमन नीति |
| 3 | उदयपुर के भीतरी शासन की बागडोर कर्नल टॉड ने सँभाल ली और भोमट के भीलों पर अंकुश लगाने की चेष्टा की |
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| जनवरी–दिसम्बर 1823 | दमन | कर्नल लूम्बे की अगुवाई में अंग्रेज़ों व उदयपुर की संयुक्त सेना |
| 12 मई 1825 | लिम्बाराबारू संधि | भोमट से प्रेरित डूँगरपुर के लिम्बाराबारू के भीलों का विद्रोह; संधि में अंग्रेज़ों ने कई कर थोप दिए |
| जनवरी 1826 | दौलतसिंह व गोविन्दा | गरासिया-भील मुखियाओं ने थानों पर हमला कर सैकड़ों सिपाही मारे; कैप्टन ब्लैक ने स्थिति सँभाली |
याद रखें: रखवाली = चौकीदारी कर, बोलाई = रास्ते से गुज़रते माल/यात्री पर सुरक्षा कर — दोनों भीलों के अपने हक़ थे, जिन्हें टॉड ने छीना।
9. दमन के लिए बने सैन्य दल
| दल | स्थापना | मुख्यालय | काम / विशेष |
|---|---|---|---|
| मेरवाड़ा रेजीमेंट | 1822 | ब्यावर | कैप्टन हॉल के नेतृत्व में; मेर व मीणा उपद्रव शान्त करने को; भर्ती मेर सैनिकों की |
| जोधपुर लीजन | 1835 | एरिनपुरा (तत्कालीन सिरोही राज्य) | भीलों के लगातार विद्रोह पर क़ाबू के लिए बनी सैनिक टुकड़ी |
| मेवाड़ भील कोर | जनवरी 1841 (स्वीकृति अप्रैल 1841) | खैरवाड़ा | भोमट के भील, भोमिया व गरासिया सरदारों पर नियन्त्रण; गवर्नर जनरल ने अपनी परिषद की सलाह से मंज़ूरी दी; पहले कमाण्डर विलियम हण्टर |
10. जहाजपुर का मीणा विद्रोह
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1851 | विद्रोह की शुरुआत | महाराणा ने जहाजपुर परगने में हाकिम रघुनाथसिंह मेहता भेजा, जो धन कमाने में लगा रहा; प्रशासनिक सुधारों के नाम पर धन-वसूली के विरोध में मीणा उठे |
| 1851 के बाद | लुहारी पर चढ़ाई | उदयपुर की सेना ने मुखियाओं के गाँव छोटी लुहारी व बड़ी लुहारी उजाड़े; मीणा सपरिवार पहाड़ियों में छिपे; आसपास की रियासतों से लगभग 5,000 मीणा जहाजपुर आ जुटे |
| दिसम्बर 1854 | अंग्रेज़ सेना पहुँची | ए.जी.जी. के साथ मेवाड़-हाड़ौती के राजनीतिक एजेन्टों के अधीन |
11. भोमट, बाँसवाड़ा व बारापाल
भोमट का भील आन्दोलन (1839–42)
- महाराणा सरदारसिंह ने 1839 में भोमट से लगान उगाहने को सेना भेजी, तो भील भड़क उठे।
- सहायता के लिए महाराणा उदयपुर के अंग्रेज़ एजेन्ट के पास गए, पर उसने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि यह मेवाड़ का अपना मामला है।
- जनवरी 1841 में भीलों, भोमियों और गरासिया सरदारों पर नज़र रखने को मेवाड़ भील कोर बनी; इसी कोर की सहायता से आन्दोलन दबाया गया।
बाँसवाड़ा में भील विद्रोह (1872–75)
- 1868 के बाँसवाड़ा-अंग्रेज़ समझौते ने अंग्रेज़ों को भीलों को कुचलने की खुली छूट दे दी थी।
- भील राज्य की सत्ता मानने की निशानी के तौर पर बराड़ नाम का कर भरते थे; अंग्रेज़ों ने इसकी रक़म चढ़ा दी।
- बराड़ को लेकर 1872–73 में सोढलपुर के भील मुखिया दल्ला महारावल से भिड़ गए; अंग्रेज़ पॉलिटिकल ऑफ़िसर के सुझाव पर महारावल ने उनसे सुलह कर ली।
बारापाल का विद्रोह (1881–82)
- उदयपुर राज्य व ब्रिटिश सरकार ने भीलों के महुए की शराब मावड़ी निकालने पर रोक लगाई; भीलों के आराध्य रिखबदेव (ऋषभदेव) का मन्दिर राज्य ने सीधे अपने हाथ में ले लिया।
- रिखबदेव के पुजारी खेमराज मण्डारी ने भीलों को उकसाया; महाराणा सज्जनसिंह ने अमानसिंह (मामा) और एक अंग्रेज़ प्रतिनिधि की अगुवाई में सेना बारापाल गाँव भेजी।
- मार्च 1881 में घमासान लड़ाई हुई; उन्नीसवीं सदी में भीलों का इतना ख़ूनी विद्रोह दूसरा नहीं हुआ (सबसे भयानक)। नेता: बीलखपाल का गामेती नीमा, पीपली का खेमा, सगातरी का जोयता।
| विद्रोह | कर / मुद्दा | नेता | अन्त |
|---|---|---|---|
| भोमट 1839–42 | लगान-वसूली | भील सरदार | मेवाड़ भील कोर |
| बाँसवाड़ा 1872–75 | बराड़ कर | दल्ला (सोढलपुर) | महारावल से समझौता |
| बारापाल 1881–82 | मावड़ी, रिखबदेव मन्दिर | नीमा, खेमा, जोयता; खेमराज मण्डारी | 25 अप्रैल 1881 — आधा बराड़ माफ़ |
12. रैपिड फायर तथ्य
- मेर आन्दोलन ➜ 1818–21, मेरवाड़ा; 1818 में झाक समझौता (विल्डर)
- मेरवाड़ा रेजीमेंट ➜ 1822, मुख्यालय ब्यावर; भर्ती मेर सैनिकों की
- पहला भील विद्रोह ➜ 1818–28, भोमट (उदयपुर); नेता दौलतसिंह व गोविन्दा
- मेवाड़ की सहायक संधि ➜ 13 जनवरी 1818, महाराणा भीमसिंह
- लिम्बाराबारू संधि ➜ 12 मई 1825, डूँगरपुर
- जोधपुर लीजन ➜ 1835, एरिनपुरा
- मेवाड़ भील कोर ➜ जनवरी 1841, खैरवाड़ा; पहले कमाण्डर विलियम हण्टर
- जहाजपुर का मीणा विद्रोह ➜ 1851 से शुरू; जनवरी 1855 में आत्मसमर्पण
- बारापाल का विद्रोह ➜ 1881–82; उन्नीसवीं सदी में भीलों का सबसे भयानक संघर्ष
अगले भाग में भीलों में जागृति लाने वाले गोविन्द गिरी और मोतीलाल तेजावत, आपराधिक जाति घोषित मीणाओं की लड़ाई और बिजौलिया आन्दोलन का शुरुआती दौर।
पिछला भाग: सामाजिक एवं राजनीतिक संगठन: राजनीतिक संस्थाएँ (भाग 2) एवं राजस्थान के समाचार-पत्र
अगला भाग: जनजाति एवं किसान आन्दोलन: गोविन्द गिरी व तेजावत एवं बिजौलिया, बेगूँ व बूँदी (भाग 1)
इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान में 1857 की क्रांति · राजस्थान की जनजातियाँ
पूरी श्रृंखला: राजस्थान का इतिहास — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय
इस विषय का माइंड मैप ➜Complete Rajasthan GK पास देखें



