भरतपुर का उदय एक विद्रोह की कोख से हुआ — खेती-किसानी करने वाली जाति ने मुग़ल दबाव के विरुद्ध हथियार उठाए और धीरे-धीरे अपना राज्य खड़ा कर लिया। इस भाग में गोकुल, राजाराम और चूड़ामन से लेकर बदनसिंह, सूरजमल, जवाहरसिंह और रणजीतसिंह तक का क्रम है, फिर अंग्रेज़ी संरक्षण का दौर और धौलपुर का जाट वंश। शासकों के नाम क्रम से याद हो जाएँ तो आधा अध्याय पक्का समझें।
माइंड मैप खोलें ➜
1. एक नज़र में
जाट मूलतः खेती-किसानी और मेहनत वाली जाति है; वीरता में भी उसकी साख रही। 18वीं सदी के मध्य में भरतपुर, धौलपुर और डीग के इलाक़ों में इसी जाति का राजवंश तपा। इसकी चिंगारी औरंगज़ेब के राज में जगी — नीतियों और आर्थिक तंगी से परेशान आगरा-दिल्ली-मथुरा के जाटों ने पहला संगठित विद्रोह किया।
- क्षेत्र ➜ भरतपुर · धौलपुर · डीग
- जन्मभूमि ➜ सिनसिनी गाँव (डीग)
- स्वतंत्र राज्य का संस्थापक ➜ चूड़ामन
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
रोचक तथ्य: मान्यता है कि भरतपुर का नाम श्रीराम के भाई भरत पर पड़ा, और राम के दूसरे भाई लक्ष्मण इस जाट राजवंश के कुलदेवता माने गए।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1669 | गोकुल का विद्रोह | तिलपत का जमींदार; मुग़ल फ़ौजदार ने कुचला |
| 1685 | राजाराम का विद्रोह | सिकन्दरा में अकबर के मक़बरे की बेअदबी |
| 1695 | चूड़ामन का उदय | स्वतंत्र जाट राज्य की नींव |
| 1722 | बदनसिंह | थून पर जयसिंह की जीत के बाद राजा व ब्रजराज |
… शेष 6 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
2. विद्रोह से राज्य तक
विद्रोह की कड़ी
- औरंगज़ेब की नीतियाँ
- गोकुल 1669
- राजाराम 1685
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
ट्रिक: क्रम याद रखें: गो-रा-चू-ब-सू-ज — गोकुल, राजाराम, चूड़ामन, बदनसिंह, सूरजमल, जवाहरसिंह।
3. गोकुल जाट
- औरंगज़ेब की नीतियों से भड़के मथुरा-क्षेत्र के जाटों ने 1669 में तिलपत के जाट जमींदार गोकुल के नेतृत्व में बग़ावत की।
- मुग़ल फ़ौजदार हसन अली ख़ाँ ने आन्दोलन कुचल दिया; गोकुल को पकड़कर मार डाला गया।
- गोकुल के बाद सिनसिनी (डीग) के जमींदार खानचन्द के बेटे ब्रज ने जाटों को फिर जोड़ा और मुग़ल शासन को परेशान किया।
| नेता | ठिकाना | परिणाम |
|---|---|---|
| गोकुल | तिलपत | हसन अली ख़ाँ ने कुचला, हत्या |
| ब्रज | सिनसिनी (डीग) | जाटों को संगठित कर मुग़लों को तंग किया |
4. राजाराम
- गोकुल के अन्त के बाद इलाक़े के जाटों की अगुआई राजाराम के हाथ आई; उसी की कमान में 1685 में दूसरी बग़ावत उठी।
- उसने सिकन्दरा (आगरा) में अकबर के मक़बरे को खोदकर हड्डियाँ जला डालीं।
- औरंगज़ेब ने आमेर के रामसिंह प्रथम को मथुरा का फ़ौजदार बनाकर बग़ावत दबाने का ज़िम्मा दिया। उनकी जल्दी मृत्यु हो जाने पर बेटे बिशनसिंह और औरंगज़ेब के पौत्र बीदर बख़्श ने 1688 में राजाराम को हरा दिया।
राजाराम के बाद
- राजाराम हारा (1688)
- फतेहसिंह नेता बना
- बिशनसिंह से पराजित
5. चूड़ामन (1695–1721)
चूड़ामन को भरतपुर के स्वतंत्र जाट राज्य का संस्थापक माना जाता है — योग्य नेता और चतुर राजनीतिज्ञ। मथुरा-आगरा के मुग़ल इलाक़ों में छापे मारकर उसने मुग़ल ताक़त को हिला दिया; रसूलपुर को उसने कार्यक्षेत्र बनाया।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| औरंगज़ेब-काल | बिशनसिंह का दमन | बिशनसिंह लौटे तो चूड़ामन फिर मज़बूत हो गया |
| 1704 | सिनसिनी पर पुनः अधिकार | डीग का गाँव दोबारा जाटों के हाथ |
| जाजऊ युद्ध | आज़म की सेना की लूट | औरंगज़ेब के बाद के उत्तराधिकार-संघर्ष में |
- 1500 जात व 500 सवार का मनसब चूड़ामन को बहादुरशाह से मिला, साथ में दिल्ली–आगरा की शाही सड़क की रखवाली भी।
- फर्रूखसियर के काल में जाटों को दबाने पहले आगरा का सूबेदार छबीलाराम और बाद में ख़ान-ए-दौरां भेजे गए; ख़ान-ए-दौरां ने समझा-बुझाकर चूड़ामन को दरबार तक पहुँचा दिया।
- थून के क़िले को चूड़ामन ने मज़बूत किया और अलवर, हिण्डौन, बयाना क्षेत्रों में थाने व गढ़ियाँ बैठा दीं।
6. बदनसिंह और सूरजमल
- बदनसिंह ➜ 1722–1756 · चूड़ामन का भतीजा
- सूरजमल ➜ 1756–1763 · बचपन का नाम सुजानसिंह
- राजधानी ➜ डीग → भरतपुर (लोहागढ़)
7. बदनसिंह (1722–1756)
- जयसिंह ने थून जीता तो चूड़ामन के भतीजे बदनसिंह ने उनकी अधीनता मान ली; बदले में राजा व ब्रजराज की उपाधि और जागीरें मिलीं।
- बदनसिंह ने डीग को निवास बनाया — मज़बूत गढ़, सुन्दर जलमहल और बाग़-बग़ीचे वहीं बने।
- उन्हीं के काल में चार दुर्ग उठे ➜ वैर, भरतपुर, कुम्हेर और डीग।
बदनसिंह का उदय
- थून पर जयसिंह की जीत
- अधीनता स्वीकार
- राजा व ब्रजराज
ट्रिक: चूड़ामन = संस्थापक; बदनसिंह = ब्रजराज (जयसिंह से); सूरजमल = जाटों का प्लेटो।
8. सूरजमल का उत्थान
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1733 | लोहागढ़ का निर्माण | खेमकरण जाट की कच्ची गढ़ी हटाकर, भरतपुर राजधानी |
| 1741 | गंगवाना युद्ध | राठौड़ों के विरुद्ध कछवाहा सेना में जाट दस्तों के साथ |
| 1742 | सवाई जयसिंह का अश्वमेध यज्ञ | सूरजमल उसमें सम्मिलित |
| जयसिंह के बाद | उत्तराधिकार का युद्ध | ईश्वरीसिंह का पक्ष लिया; उन्होंने बादशाह से राजा-पदवी की सिफ़ारिश की |
- खेमकरण जाट पिता बदनसिंह का शत्रु था; उसे हराकर सूरजमल ने उसकी कच्ची गढ़ी की जगह लोहागढ़ खड़ा किया और भरतपुर को राजधानी बनाया।
- जयपुर के प्रति उनकी नीति मैत्री व सहयोग की रही — ईश्वरीसिंह के पक्ष में लड़ने से जयपुर से रिश्ता और पक्का हुआ।
- पदवी के बाद सूरजमल स्वतंत्र जाट शासक की तरह काम करने लगे।
याद रखें: 20 अक्टूबर 1752 के ख़िताब: सूरजमल को कुँवर बहादुर राजेन्द्र और पिता बदनसिंह को राजा महेन्द्र। मथुरा की फ़ौजदारी वज़ीर के प्रयास से कुछ समय बाद मिली।
9. मराठे, अब्दाली, आगरा
| घटना | वर्ष / तिथि | ब्योरा |
|---|---|---|
| कुम्हेर का घेरा | मार्च 1754 | मराठा सरदार खांडेराव होल्कर ने हमला किया; घेरे में वह मारा गया |
| जाट–मराठा समझौता | 18 मई 1754 | सूरजमल हर वर्ष कुछ धन मराठों को देने पर राज़ी |
| अब्दाली का हमला | फ़रवरी 1757 | दिल्ली पर क़ब्ज़े के बाद जाटों पर चढ़ाई; जाटों ने कड़ी टक्कर दी |
| दिल्ली पर मराठे | 3 अगस्त 1760 | भाऊ के नेतृत्व में; घमण्डी स्वभाव से सूरजमल और भाऊ में मतभेद |
- भाऊ से अनबन के बाद सूरजमल मराठों का साथ छोड़कर भरतपुर लौट आए — वे उसके दम्भी और हठी स्वभाव से खिन्न थे।
- अब्दाली की चेतावनी के बावजूद सूरजमल ने मराठा सरदारों को उसे नहीं सौंपा; इसीलिए अब्दाली का हमला सपना ही रहा।
सूरजमल और पानीपत
- भाऊ से मतभेद
- पानीपत में मराठों की हार
- 50,000 मराठों को शरण
10. सूरजमल की विरासत
- सूरजमल की सूझबूझ और राजनीतिक चतुराई देखकर उन्हें जाट जाति का प्लेटो (अफ़लातून) कहा गया।
- भरतपुर शहर की स्थापना उन्हीं ने की।
- दरबारी कवि: सुदन (वीर-रस की कृति सुजान चरित) और अखैराज गर्ग।
- उपाधि ➜ जाटों का प्लेटो
- नगर ➜ भरतपुर की स्थापना
- दरबारी कवि ➜ सुदन (सुजान चरित) · अखैराज गर्ग
11. जवाहरसिंह से रणजीतसिंह
सूरजमल के बाद जाट राज्य की धार कमज़ोर पड़ने लगी — मराठों, रुहेलों और राजपूतों से लगातार टकराव रहा। फिर राजगद्दी की खींचतान और मुग़ल सेनापति नजफ़ ख़ाँ का दबाव आया। इस उथल-पुथल को रणजीतसिंह ने अंग्रेज़ों के सामने डटकर थामा।
12. जवाहरसिंह (1763–1768)
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1764 | दिल्ली की घेराबन्दी | मल्हारराव होल्कर के सहयोग से नजीबुद्दौला के विरुद्ध |
| 1764 | संधि | होल्कर, सिक्ख सैनिक और अपना सेनापति भी नजीबुद्दौला से मित्रता पर ज़ोर देने लगे |
| 1765 | जवाहर बुर्ज | दिल्ली पर विजय की स्मृति में, लोहागढ़ के भीतर |
| 1765 | अष्टधातु किवाड़ | मुग़ल ख़ज़ाने की लूट के साथ लाल क़िले से लाकर लोहागढ़ के उत्तरी द्वार पर |
- जवाहरसिंह पर मराठों, रुहेलों और राजपूतों का दबाव एक साथ था; जाट शक्ति घटने लगी थी।
- मराठों के विरुद्ध मिलकर चलने के लिए उन्होंने महाराजा विजयसिंह (मारवाड़) से रिश्ता गाढ़ा किया।
- मावण्डा–मंढोली गाँव सीकर क्षेत्र में हैं; पुष्कर से लौटते समय कछवाहा सेना ने वहीं घेर लिया।
मावण्डा–मंढोली तक
- मराठों से टकराव
- विजयसिंह से मैत्री
- पुष्कर में पगड़ी-बदल भाई
13. केसरीसिंह और गृहयुद्ध
- केसरीसिंह (रतनसिंह के पुत्र) को डेढ़ वर्ष की उम्र में गद्दी मिली; जाट सेनापति दानशाह संरक्षक बना।
- रतनसिंह के भाई नवलसिंह और रणजीतसिंह में संरक्षक बनने पर झगड़ा छिड़ गया — भरतपुर में गृहयुद्ध।
- मराठों ने रणजीतसिंह का साथ दिया और अप्रैल 1770 में नवलसिंह को हरा दिया।
| तिथि | घटना | परिणाम |
|---|---|---|
| अप्रैल 1770 | मराठों का जाटों पर हमला | नवलसिंह परास्त |
| अक्टूबर 1773 | बरसाना का युद्ध — नजफ़ ख़ाँ बनाम नवलसिंह | नवलसिंह की हार |
| फ़रवरी 1774 | आगरा का क़िला | मुग़लों के अधिकार में |
14. रणजीतसिंह (1775–1805)
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1776 | डीग छिन गया | नजफ़ ख़ाँ ने क़िला लिया; रणजीतसिंह ने कुम्हेर को ठिकाना बनाया |
| नवम्बर 1777 | कुम्हेर भी गया | नजफ़ ख़ाँ के हमले के बाद माता किशोरी के साथ भरतपुर क़िले की शरण |
| बाद में | नजफ़ ख़ाँ से संधि | तनाव ख़त्म |
| 29 सित. 1803 | लॉर्ड लेक से संधि | परस्पर सहायता का वचन |
- 1803 की मैत्री-संधि के बावजूद रणजीतसिंह ने होल्कर को शरण दी, इसलिए लॉर्ड लेक ने भरतपुर क़िले को घेर लिया।
- अंग्रेज़ चार बार धावा बोलकर भी जीत नहीं पाए — यही लोहागढ़ (अजेय दुर्ग) की ख्याति का आधार है।
15. अंग्रेज़ी संरक्षण का दौर
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1814 | रणधीरसिंह–हेस्टिंग्ज़ भेंट | फतेहपुर सीकरी |
| 1818 | अंग्रेज़ों से संधि | |
| 1826 | लोहागढ़ पर अंग्रेज़ों का अधिकार | कम्बरमेयर |
| 1857 | क्रान्ति | पॉलिटिकल एजेन्ट मॉरिसन को भरतपुर छोड़ना पड़ा |
16. रणधीर, बलदेव, बलवंत
| शासक | काल | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| रणधीरसिंह | 1805–1823 | 1814 में फतेहपुर सीकरी में गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्ज़ से भेंट; नेपाल-युद्ध, पिण्डारी-दमन और मराठों के विरुद्ध अंग्रेज़ों का साथ; 1818 में संधि |
| बलदेवसिंह | 1823–1825 | आन्तरिक झगड़ों से तंग होकर सर डेविड ऑक्टरलोनी को बुलाया, छह वर्षीय पुत्र बलवंतसिंह की हिफ़ाज़त माँगी और उसे उत्तराधिकारी बनाया |
| बलवंतसिंह | 1825–1853 | चचेरे भाइयों दुर्जनसिंह व माधोसिंह (लक्ष्मणसिंह के पुत्र) ने गद्दी रोकी; कम्बरमेयर की मदद से बलवंतसिंह शासक बना |
- जनवरी 1826 में अंग्रेज़ों ने लोहागढ़ पर अधिकार किया; कम्बरमेयर और चार्ल्स मेटकाफ़ ने कुँवर बलवंतसिंह को गद्दी पर बैठाया।
- बलवंतसिंह कम उम्र के थे, इसलिए राजमाता अमृत कुँवरी की अध्यक्षता में रीजेन्सी कौंसिल चली और प्रशासन का कामकाज पॉलिटिकल एजेन्ट के पास रहा।
गद्दी की कलह 1825–26
- बलदेवसिंह का निधन
- दुर्जनसिंह-माधोसिंह का विरोध
- कम्बरमेयर की चढ़ाई
17. जसवंतसिंह और रामसिंह
- जसवंतसिंह (यशवंतसिंह) तीन वर्ष की आयु में शासक बने; शासन पॉलिटिकल एजेन्ट मॉरिसन चलाता रहा।
- 1857 में भरतपुर की जनता का झुकाव क्रान्तिकारियों की ओर था, फलतः मॉरिसन को वहाँ से भागना पड़ा।
- 1879 में जसवंतसिंह ने ब्रिटिश सरकार से नमक संधि की।
- नमक संधि ➜ 1879
- सलामी ➜ 17 → 19 (1890)
- रामसिंह का पतन ➜ 1900 · माउण्ट आबू
18. किशनसिंह और बृजेन्द्रसिंह
| शासक | काल | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| किशनसिंह | 1900–1929 | 28 अगस्त 1900 को एक वर्ष की आयु में गद्दी; पालन-पोषण राजमाता गिरिराज कुमारी के हाथ; अंग्रेज़ों ने भरतपुर की सेना सोमालीलैण्ड (1903), तिब्बत (1904) और प्रथम विश्वयुद्ध (1914–18) में उतारी |
| 29 नवम्बर 1918 — वायसराय लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड ने भरतपुर आकर पूरे अधिकार सौंपे | ||
| 1928 — अंग्रेज़ों ने राज्य छोड़ने को विवश किया; 9 फ़रवरी को पी.जी. मैकेंज़ी प्रशासक |
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 31 जुलाई 1947 | अधिमिलन-पत्र पर हस्ताक्षर | बृजेन्द्रसिंह |
| 18 मार्च 1948 | मत्स्य संघ में विलय | भरतपुर रियासत का अन्त |
19. धौलपुर का जाट वंश
- स्थिति ➜ राजस्थान का सबसे पूर्वी भाग
- मूल ➜ गोहद (मध्य प्रदेश)
- गठन ➜ 1805
20. गोहद से गठन तक
- राजस्थान में भरतपुर के अलावा दूसरी जाट रियासत धौलपुर थी।
- धौलपुर के जाट वंश का उद्गम गोहद (मध्य प्रदेश) के राणा माने जाते हैं; वहाँ 16वीं सदी में जाट राजा महासिंह ने क़िला बनवाया था।
- 1761 में पानीपत की उलझन में फँसे मराठों की कमज़ोरी का लाभ उठाकर गोहद के राणा ने ग्वालियर सहित कई मराठा क़िले हथिया लिए।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1761 | गोहद ने ग्वालियर लिया | पानीपत के बाद मराठों की कमज़ोरी में |
| 1767 | पेशवा का गोहद पर हमला | ख़िराज के बदले मान्यता का आश्वासन |
| 1779–80 | कम्पनी की मदद | गोहद व ग्वालियर राणा को |
| 17 जनवरी 1804 | कम्पनी की विजय | द्वितीय आंग्ल–मराठा युद्ध में गोहद-ग्वालियर पर पुनः अधिकार; कीरतसिंह गोहद का शासक |
21. धौलपुर के शासक
| शासक | काल | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| कीरतसिंह | 1805–1836 | गोहद के जाट राणाओं की शाखा से; 1804 में अंग्रेज़ों से सहायक संधि; धौलपुर रियासत का पहला शासक |
| भगवतसिंह | 1836–1873 | इजलास ख़ास की स्थापना (महाराजा व दीवान मिलकर अपीलें और संगीन मुक़दमे सुनते); 1857 में क्रान्तिकारियों ने क़िला व महल घेरकर क़ब्ज़ा किया |
| निहालसिंह | 1873–1901 | भगवतसिंह के पौत्र; नाबालिग होने से प्रबन्ध सर दिनकर राव को; “प्यारे राजा साहब” नाम से प्रसिद्ध; 1875 में भूमि-बन्दोबस्त के लिए अंग्रेज़ अधिकारी बुलाया गया |
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 14 अगस्त 1947 | अधिमिलन-पत्र | उदयमानसिंह |
| 18 मार्च 1948 | मत्स्य संघ में विलय | उदयमानसिंह राजप्रमुख बने |
22. रैपिड फायर तथ्य
- पहला विद्रोह ➜ 1669, तिलपत के गोकुल; हसन अली ख़ाँ ने कुचला
- दूसरा विद्रोह ➜ 1685, राजाराम; सिकन्दरा में अकबर के मक़बरे की बेअदबी
- स्वतन्त्र जाट राज्य का संस्थापक ➜ चूड़ामन
- बदनसिंह ➜ 1722 में राजा व ब्रजराज की उपाधि; उनके काल में चार दुर्ग — वैर, भरतपुर, कुम्हेर, डीग
- लोहागढ़ ➜ 1733 में सूरजमल ने खेमकरण की कच्ची गढ़ी की जगह खड़ा किया
- जाटों का प्लेटो ➜ सूरजमल
- जवाहर बुर्ज ➜ 1765, दिल्ली पर विजय की स्मृति में, लोहागढ़ के भीतर
- अजेय लोहागढ़ ➜ लॉर्ड लेक चार बार धावा बोलकर भी जीत नहीं पाए
- भरतपुर का विलय ➜ 18 मार्च 1948, मत्स्य संघ में
अगले भाग में सभी रियासतों की एक तालिका और विलय की क्रमबद्ध समय-रेखा, फिर आबू–मालवा के परमार और भटनेर से जैसलमेर तक के भाटी।
पिछला भाग: आमेर का कछवाहा राजवंश: जयपुर के बाद के शासक
अगला भाग: राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश: परमार राजवंश एवं जैसलमेर के भाटी
इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश · जनजाति एवं किसान आन्दोलन
पूरी श्रृंखला: राजस्थान का इतिहास — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय
इस विषय का माइंड मैप ➜Complete Rajasthan GK पास देखें



