जाट राजवंश (भरतपुर, धौलपुर): बदनसिंह और सूरजमल एवं जवाहरसिंह से रणजीतसिंह – Rajasthan History Chapter 29

भरतपुर और धौलपुर के जाट राज्य का उदय — गोकुल से चूड़ामन, सूरजमल, रणजीतसिंह और धौलपुर के शासक।

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In this chapter (22 sections)
  1. एक नज़र में
  2. विद्रोह से राज्य तक
  3. गोकुल जाट
  4. राजाराम
  5. चूड़ामन (1695–1721)
  6. बदनसिंह और सूरजमल
  7. बदनसिंह (1722–1756)
  8. सूरजमल का उत्थान
  9. मराठे, अब्दाली, आगरा
  10. सूरजमल की विरासत
  11. जवाहरसिंह से रणजीतसिंह
  12. जवाहरसिंह (1763–1768)
  13. केसरीसिंह और गृहयुद्ध
  14. रणजीतसिंह (1775–1805)
  15. अंग्रेज़ी संरक्षण का दौर
  16. रणधीर, बलदेव, बलवंत
  17. जसवंतसिंह और रामसिंह
  18. किशनसिंह और बृजेन्द्रसिंह
  19. धौलपुर का जाट वंश
  20. गोहद से गठन तक
  21. धौलपुर के शासक
  22. रैपिड फायर तथ्य

भरतपुर का उदय एक विद्रोह की कोख से हुआ — खेती-किसानी करने वाली जाति ने मुग़ल दबाव के विरुद्ध हथियार उठाए और धीरे-धीरे अपना राज्य खड़ा कर लिया। इस भाग में गोकुल, राजाराम और चूड़ामन से लेकर बदनसिंह, सूरजमल, जवाहरसिंह और रणजीतसिंह तक का क्रम है, फिर अंग्रेज़ी संरक्षण का दौर और धौलपुर का जाट वंश। शासकों के नाम क्रम से याद हो जाएँ तो आधा अध्याय पक्का समझें।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — जाट राजवंश (भरतपुर, धौलपुर), 5 चॉक-बोर्ड चित्र, 4 चार्ट, 24 फ्लैशकार्ड और 12 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. एक नज़र में

जाट मूलतः खेती-किसानी और मेहनत वाली जाति है; वीरता में भी उसकी साख रही। 18वीं सदी के मध्य में भरतपुर, धौलपुर और डीग के इलाक़ों में इसी जाति का राजवंश तपा। इसकी चिंगारी औरंगज़ेब के राज में जगी — नीतियों और आर्थिक तंगी से परेशान आगरा-दिल्ली-मथुरा के जाटों ने पहला संगठित विद्रोह किया।

  • क्षेत्र ➜ भरतपुर · धौलपुर · डीग
  • जन्मभूमि ➜ सिनसिनी गाँव (डीग)
  • स्वतंत्र राज्य का संस्थापक ➜ चूड़ामन

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

रोचक तथ्य: मान्यता है कि भरतपुर का नाम श्रीराम के भाई भरत पर पड़ा, और राम के दूसरे भाई लक्ष्मण इस जाट राजवंश के कुलदेवता माने गए।

काल / क्रमघटनाविवरण
1669गोकुल का विद्रोहतिलपत का जमींदार; मुग़ल फ़ौजदार ने कुचला
1685राजाराम का विद्रोहसिकन्दरा में अकबर के मक़बरे की बेअदबी
1695चूड़ामन का उदयस्वतंत्र जाट राज्य की नींव
1722बदनसिंहथून पर जयसिंह की जीत के बाद राजा व ब्रजराज

… शेष 6 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

2. विद्रोह से राज्य तक

विद्रोह की कड़ी

  1. औरंगज़ेब की नीतियाँ
  2. गोकुल 1669
  3. राजाराम 1685

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

ट्रिक: क्रम याद रखें: गो-रा-चू-ब-सू-ज — गोकुल, राजाराम, चूड़ामन, बदनसिंह, सूरजमल, जवाहरसिंह।

3. गोकुल जाट

  • औरंगज़ेब की नीतियों से भड़के मथुरा-क्षेत्र के जाटों ने 1669 में तिलपत के जाट जमींदार गोकुल के नेतृत्व में बग़ावत की।
  • मुग़ल फ़ौजदार हसन अली ख़ाँ ने आन्दोलन कुचल दिया; गोकुल को पकड़कर मार डाला गया।
  • गोकुल के बाद सिनसिनी (डीग) के जमींदार खानचन्द के बेटे ब्रज ने जाटों को फिर जोड़ा और मुग़ल शासन को परेशान किया।
नेताठिकानापरिणाम
गोकुलतिलपतहसन अली ख़ाँ ने कुचला, हत्या
ब्रजसिनसिनी (डीग)जाटों को संगठित कर मुग़लों को तंग किया

4. राजाराम

  • गोकुल के अन्त के बाद इलाक़े के जाटों की अगुआई राजाराम के हाथ आई; उसी की कमान में 1685 में दूसरी बग़ावत उठी।
  • उसने सिकन्दरा (आगरा) में अकबर के मक़बरे को खोदकर हड्डियाँ जला डालीं।
  • औरंगज़ेब ने आमेर के रामसिंह प्रथम को मथुरा का फ़ौजदार बनाकर बग़ावत दबाने का ज़िम्मा दिया। उनकी जल्दी मृत्यु हो जाने पर बेटे बिशनसिंह और औरंगज़ेब के पौत्र बीदर बख़्श ने 1688 में राजाराम को हरा दिया।

राजाराम के बाद

  1. राजाराम हारा (1688)
  2. फतेहसिंह नेता बना
  3. बिशनसिंह से पराजित

5. चूड़ामन (1695–1721)

चूड़ामन को भरतपुर के स्वतंत्र जाट राज्य का संस्थापक माना जाता है — योग्य नेता और चतुर राजनीतिज्ञ। मथुरा-आगरा के मुग़ल इलाक़ों में छापे मारकर उसने मुग़ल ताक़त को हिला दिया; रसूलपुर को उसने कार्यक्षेत्र बनाया।

काल / क्रमघटनाविवरण
औरंगज़ेब-कालबिशनसिंह का दमनबिशनसिंह लौटे तो चूड़ामन फिर मज़बूत हो गया
1704सिनसिनी पर पुनः अधिकारडीग का गाँव दोबारा जाटों के हाथ
जाजऊ युद्धआज़म की सेना की लूटऔरंगज़ेब के बाद के उत्तराधिकार-संघर्ष में
  • 1500 जात व 500 सवार का मनसब चूड़ामन को बहादुरशाह से मिला, साथ में दिल्ली–आगरा की शाही सड़क की रखवाली भी।
  • फर्रूखसियर के काल में जाटों को दबाने पहले आगरा का सूबेदार छबीलाराम और बाद में ख़ान-ए-दौरां भेजे गए; ख़ान-ए-दौरां ने समझा-बुझाकर चूड़ामन को दरबार तक पहुँचा दिया।
  • थून के क़िले को चूड़ामन ने मज़बूत किया और अलवर, हिण्डौन, बयाना क्षेत्रों में थाने व गढ़ियाँ बैठा दीं।

6. बदनसिंह और सूरजमल

  • बदनसिंह ➜ 1722–1756 · चूड़ामन का भतीजा
  • सूरजमल ➜ 1756–1763 · बचपन का नाम सुजानसिंह
  • राजधानी ➜ डीग → भरतपुर (लोहागढ़)

7. बदनसिंह (1722–1756)

  • जयसिंह ने थून जीता तो चूड़ामन के भतीजे बदनसिंह ने उनकी अधीनता मान ली; बदले में राजा व ब्रजराज की उपाधि और जागीरें मिलीं।
  • बदनसिंह ने डीग को निवास बनाया — मज़बूत गढ़, सुन्दर जलमहल और बाग़-बग़ीचे वहीं बने।
  • उन्हीं के काल में चार दुर्ग उठे ➜ वैर, भरतपुर, कुम्हेर और डीग।

बदनसिंह का उदय

  1. थून पर जयसिंह की जीत
  2. अधीनता स्वीकार
  3. राजा व ब्रजराज

ट्रिक: चूड़ामन = संस्थापक; बदनसिंह = ब्रजराज (जयसिंह से); सूरजमल = जाटों का प्लेटो।

8. सूरजमल का उत्थान

काल / क्रमघटनाविवरण
1733लोहागढ़ का निर्माणखेमकरण जाट की कच्ची गढ़ी हटाकर, भरतपुर राजधानी
1741गंगवाना युद्धराठौड़ों के विरुद्ध कछवाहा सेना में जाट दस्तों के साथ
1742सवाई जयसिंह का अश्वमेध यज्ञसूरजमल उसमें सम्मिलित
जयसिंह के बादउत्तराधिकार का युद्धईश्वरीसिंह का पक्ष लिया; उन्होंने बादशाह से राजा-पदवी की सिफ़ारिश की
  • खेमकरण जाट पिता बदनसिंह का शत्रु था; उसे हराकर सूरजमल ने उसकी कच्ची गढ़ी की जगह लोहागढ़ खड़ा किया और भरतपुर को राजधानी बनाया।
  • जयपुर के प्रति उनकी नीति मैत्री व सहयोग की रही — ईश्वरीसिंह के पक्ष में लड़ने से जयपुर से रिश्ता और पक्का हुआ।
  • पदवी के बाद सूरजमल स्वतंत्र जाट शासक की तरह काम करने लगे।

याद रखें: 20 अक्टूबर 1752 के ख़िताब: सूरजमल को कुँवर बहादुर राजेन्द्र और पिता बदनसिंह को राजा महेन्द्र। मथुरा की फ़ौजदारी वज़ीर के प्रयास से कुछ समय बाद मिली।

9. मराठे, अब्दाली, आगरा

घटनावर्ष / तिथिब्योरा
कुम्हेर का घेरामार्च 1754मराठा सरदार खांडेराव होल्कर ने हमला किया; घेरे में वह मारा गया
जाट–मराठा समझौता18 मई 1754सूरजमल हर वर्ष कुछ धन मराठों को देने पर राज़ी
अब्दाली का हमलाफ़रवरी 1757दिल्ली पर क़ब्ज़े के बाद जाटों पर चढ़ाई; जाटों ने कड़ी टक्कर दी
दिल्ली पर मराठे3 अगस्त 1760भाऊ के नेतृत्व में; घमण्डी स्वभाव से सूरजमल और भाऊ में मतभेद
  • भाऊ से अनबन के बाद सूरजमल मराठों का साथ छोड़कर भरतपुर लौट आए — वे उसके दम्भी और हठी स्वभाव से खिन्न थे।
  • अब्दाली की चेतावनी के बावजूद सूरजमल ने मराठा सरदारों को उसे नहीं सौंपा; इसीलिए अब्दाली का हमला सपना ही रहा।

सूरजमल और पानीपत

  1. भाऊ से मतभेद
  2. पानीपत में मराठों की हार
  3. 50,000 मराठों को शरण

10. सूरजमल की विरासत

  • सूरजमल की सूझबूझ और राजनीतिक चतुराई देखकर उन्हें जाट जाति का प्लेटो (अफ़लातून) कहा गया।
  • भरतपुर शहर की स्थापना उन्हीं ने की।
  • दरबारी कवि: सुदन (वीर-रस की कृति सुजान चरित) और अखैराज गर्ग।
  • उपाधि ➜ जाटों का प्लेटो
  • नगर ➜ भरतपुर की स्थापना
  • दरबारी कवि ➜ सुदन (सुजान चरित) · अखैराज गर्ग

11. जवाहरसिंह से रणजीतसिंह

सूरजमल के बाद जाट राज्य की धार कमज़ोर पड़ने लगी — मराठों, रुहेलों और राजपूतों से लगातार टकराव रहा। फिर राजगद्दी की खींचतान और मुग़ल सेनापति नजफ़ ख़ाँ का दबाव आया। इस उथल-पुथल को रणजीतसिंह ने अंग्रेज़ों के सामने डटकर थामा।

12. जवाहरसिंह (1763–1768)

काल / क्रमघटनाविवरण
1764दिल्ली की घेराबन्दीमल्हारराव होल्कर के सहयोग से नजीबुद्दौला के विरुद्ध
1764संधिहोल्कर, सिक्ख सैनिक और अपना सेनापति भी नजीबुद्दौला से मित्रता पर ज़ोर देने लगे
1765जवाहर बुर्जदिल्ली पर विजय की स्मृति में, लोहागढ़ के भीतर
1765अष्टधातु किवाड़मुग़ल ख़ज़ाने की लूट के साथ लाल क़िले से लाकर लोहागढ़ के उत्तरी द्वार पर
  • जवाहरसिंह पर मराठों, रुहेलों और राजपूतों का दबाव एक साथ था; जाट शक्ति घटने लगी थी।
  • मराठों के विरुद्ध मिलकर चलने के लिए उन्होंने महाराजा विजयसिंह (मारवाड़) से रिश्ता गाढ़ा किया।
  • मावण्डा–मंढोली गाँव सीकर क्षेत्र में हैं; पुष्कर से लौटते समय कछवाहा सेना ने वहीं घेर लिया।

मावण्डा–मंढोली तक

  1. मराठों से टकराव
  2. विजयसिंह से मैत्री
  3. पुष्कर में पगड़ी-बदल भाई

13. केसरीसिंह और गृहयुद्ध

  • केसरीसिंह (रतनसिंह के पुत्र) को डेढ़ वर्ष की उम्र में गद्दी मिली; जाट सेनापति दानशाह संरक्षक बना।
  • रतनसिंह के भाई नवलसिंह और रणजीतसिंह में संरक्षक बनने पर झगड़ा छिड़ गया — भरतपुर में गृहयुद्ध।
  • मराठों ने रणजीतसिंह का साथ दिया और अप्रैल 1770 में नवलसिंह को हरा दिया।
तिथिघटनापरिणाम
अप्रैल 1770मराठों का जाटों पर हमलानवलसिंह परास्त
अक्टूबर 1773बरसाना का युद्ध — नजफ़ ख़ाँ बनाम नवलसिंहनवलसिंह की हार
फ़रवरी 1774आगरा का क़िलामुग़लों के अधिकार में

14. रणजीतसिंह (1775–1805)

काल / क्रमघटनाविवरण
1776डीग छिन गयानजफ़ ख़ाँ ने क़िला लिया; रणजीतसिंह ने कुम्हेर को ठिकाना बनाया
नवम्बर 1777कुम्हेर भी गयानजफ़ ख़ाँ के हमले के बाद माता किशोरी के साथ भरतपुर क़िले की शरण
बाद मेंनजफ़ ख़ाँ से संधितनाव ख़त्म
29 सित. 1803लॉर्ड लेक से संधिपरस्पर सहायता का वचन
  • 1803 की मैत्री-संधि के बावजूद रणजीतसिंह ने होल्कर को शरण दी, इसलिए लॉर्ड लेक ने भरतपुर क़िले को घेर लिया।
  • अंग्रेज़ चार बार धावा बोलकर भी जीत नहीं पाए — यही लोहागढ़ (अजेय दुर्ग) की ख्याति का आधार है।

15. अंग्रेज़ी संरक्षण का दौर

काल / क्रमघटनाविवरण
1814रणधीरसिंह–हेस्टिंग्ज़ भेंटफतेहपुर सीकरी
1818अंग्रेज़ों से संधि
1826लोहागढ़ पर अंग्रेज़ों का अधिकारकम्बरमेयर
1857क्रान्तिपॉलिटिकल एजेन्ट मॉरिसन को भरतपुर छोड़ना पड़ा

16. रणधीर, बलदेव, बलवंत

शासककालमुख्य बातें
रणधीरसिंह1805–18231814 में फतेहपुर सीकरी में गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्ज़ से भेंट; नेपाल-युद्ध, पिण्डारी-दमन और मराठों के विरुद्ध अंग्रेज़ों का साथ; 1818 में संधि
बलदेवसिंह1823–1825आन्तरिक झगड़ों से तंग होकर सर डेविड ऑक्टरलोनी को बुलाया, छह वर्षीय पुत्र बलवंतसिंह की हिफ़ाज़त माँगी और उसे उत्तराधिकारी बनाया
बलवंतसिंह1825–1853चचेरे भाइयों दुर्जनसिंह व माधोसिंह (लक्ष्मणसिंह के पुत्र) ने गद्दी रोकी; कम्बरमेयर की मदद से बलवंतसिंह शासक बना
  • जनवरी 1826 में अंग्रेज़ों ने लोहागढ़ पर अधिकार किया; कम्बरमेयर और चार्ल्स मेटकाफ़ ने कुँवर बलवंतसिंह को गद्दी पर बैठाया।
  • बलवंतसिंह कम उम्र के थे, इसलिए राजमाता अमृत कुँवरी की अध्यक्षता में रीजेन्सी कौंसिल चली और प्रशासन का कामकाज पॉलिटिकल एजेन्ट के पास रहा।

गद्दी की कलह 1825–26

  1. बलदेवसिंह का निधन
  2. दुर्जनसिंह-माधोसिंह का विरोध
  3. कम्बरमेयर की चढ़ाई

17. जसवंतसिंह और रामसिंह

  • जसवंतसिंह (यशवंतसिंह) तीन वर्ष की आयु में शासक बने; शासन पॉलिटिकल एजेन्ट मॉरिसन चलाता रहा।
  • 1857 में भरतपुर की जनता का झुकाव क्रान्तिकारियों की ओर था, फलतः मॉरिसन को वहाँ से भागना पड़ा।
  • 1879 में जसवंतसिंह ने ब्रिटिश सरकार से नमक संधि की।
  • नमक संधि ➜ 1879
  • सलामी ➜ 17 → 19 (1890)
  • रामसिंह का पतन ➜ 1900 · माउण्ट आबू

18. किशनसिंह और बृजेन्द्रसिंह

शासककालमुख्य बातें
किशनसिंह1900–192928 अगस्त 1900 को एक वर्ष की आयु में गद्दी; पालन-पोषण राजमाता गिरिराज कुमारी के हाथ; अंग्रेज़ों ने भरतपुर की सेना सोमालीलैण्ड (1903), तिब्बत (1904) और प्रथम विश्वयुद्ध (1914–18) में उतारी
29 नवम्बर 1918 — वायसराय लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड ने भरतपुर आकर पूरे अधिकार सौंपे
1928 — अंग्रेज़ों ने राज्य छोड़ने को विवश किया; 9 फ़रवरी को पी.जी. मैकेंज़ी प्रशासक
काल / क्रमघटनाविवरण
31 जुलाई 1947अधिमिलन-पत्र पर हस्ताक्षरबृजेन्द्रसिंह
18 मार्च 1948मत्स्य संघ में विलयभरतपुर रियासत का अन्त

19. धौलपुर का जाट वंश

  • स्थिति ➜ राजस्थान का सबसे पूर्वी भाग
  • मूल ➜ गोहद (मध्य प्रदेश)
  • गठन ➜ 1805

20. गोहद से गठन तक

  • राजस्थान में भरतपुर के अलावा दूसरी जाट रियासत धौलपुर थी।
  • धौलपुर के जाट वंश का उद्गम गोहद (मध्य प्रदेश) के राणा माने जाते हैं; वहाँ 16वीं सदी में जाट राजा महासिंह ने क़िला बनवाया था।
  • 1761 में पानीपत की उलझन में फँसे मराठों की कमज़ोरी का लाभ उठाकर गोहद के राणा ने ग्वालियर सहित कई मराठा क़िले हथिया लिए।
काल / क्रमघटनाविवरण
1761गोहद ने ग्वालियर लियापानीपत के बाद मराठों की कमज़ोरी में
1767पेशवा का गोहद पर हमलाख़िराज के बदले मान्यता का आश्वासन
1779–80कम्पनी की मददगोहद व ग्वालियर राणा को
17 जनवरी 1804कम्पनी की विजयद्वितीय आंग्ल–मराठा युद्ध में गोहद-ग्वालियर पर पुनः अधिकार; कीरतसिंह गोहद का शासक

21. धौलपुर के शासक

शासककालमुख्य बातें
कीरतसिंह1805–1836गोहद के जाट राणाओं की शाखा से; 1804 में अंग्रेज़ों से सहायक संधि; धौलपुर रियासत का पहला शासक
भगवतसिंह1836–1873इजलास ख़ास की स्थापना (महाराजा व दीवान मिलकर अपीलें और संगीन मुक़दमे सुनते); 1857 में क्रान्तिकारियों ने क़िला व महल घेरकर क़ब्ज़ा किया
निहालसिंह1873–1901भगवतसिंह के पौत्र; नाबालिग होने से प्रबन्ध सर दिनकर राव को; “प्यारे राजा साहब” नाम से प्रसिद्ध; 1875 में भूमि-बन्दोबस्त के लिए अंग्रेज़ अधिकारी बुलाया गया
काल / क्रमघटनाविवरण
14 अगस्त 1947अधिमिलन-पत्रउदयमानसिंह
18 मार्च 1948मत्स्य संघ में विलयउदयमानसिंह राजप्रमुख बने

22. रैपिड फायर तथ्य

  • पहला विद्रोह ➜ 1669, तिलपत के गोकुल; हसन अली ख़ाँ ने कुचला
  • दूसरा विद्रोह ➜ 1685, राजाराम; सिकन्दरा में अकबर के मक़बरे की बेअदबी
  • स्वतन्त्र जाट राज्य का संस्थापक ➜ चूड़ामन
  • बदनसिंह ➜ 1722 में राजा व ब्रजराज की उपाधि; उनके काल में चार दुर्ग — वैर, भरतपुर, कुम्हेर, डीग
  • लोहागढ़ ➜ 1733 में सूरजमल ने खेमकरण की कच्ची गढ़ी की जगह खड़ा किया
  • जाटों का प्लेटो ➜ सूरजमल
  • जवाहर बुर्ज ➜ 1765, दिल्ली पर विजय की स्मृति में, लोहागढ़ के भीतर
  • अजेय लोहागढ़ ➜ लॉर्ड लेक चार बार धावा बोलकर भी जीत नहीं पाए
  • भरतपुर का विलय ➜ 18 मार्च 1948, मत्स्य संघ में

अगले भाग में सभी रियासतों की एक तालिका और विलय की क्रमबद्ध समय-रेखा, फिर आबू–मालवा के परमार और भटनेर से जैसलमेर तक के भाटी।

पिछला भाग: आमेर का कछवाहा राजवंश: जयपुर के बाद के शासक

अगला भाग: राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश: परमार राजवंश एवं जैसलमेर के भाटी

इन्हें भी पढ़ें: राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश · जनजाति एवं किसान आन्दोलन

पूरी श्रृंखला: राजस्थान का इतिहास — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

इस अध्याय की पूरी तैयारी चाहिए? ऊपर दिए नोट्स हर खंड का चुना हुआ हिस्सा हैं। पूरी तालिकाएँ, बाक़ी बिंदु, याद रखने की ट्रिक, नक्शे-चित्र और अभ्यास-प्रश्न जाट राजवंश (भरतपुर, धौलपुर) के माइंड मैप में हैं। राजस्थान जी.के. के सभी विषय एक ही पास में उपलब्ध हैं।
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