लोहे की पहचान ने मानव-जीवन की दिशा बदल दी, और राजस्थान में यह कहानी रैढ़, जोधपुरा, नोह जैसी बस्तियों में पढ़ी जाती है। इस भाग में पहले लौह युग के स्थलों की तुलना है, फिर बैराठ (विराटनगर) का पूरा ब्योरा — खोज-क्रम, भाब्रू शिलालेख, बौद्ध अवशेष और ह्वेनसांग। अंत में अन्य बौद्ध व गुप्तकालीन स्थल और आर्य संस्कृति आती है। नदी, खोजकर्ता और सिक्कों की संख्या याद रखने के लिहाज़ से सबसे अहम बिंदु हैं।
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1. लौह युग
ताम्र और कांस्य के बाद लोहे का ज्ञान मानव-सभ्यता की युगान्तकारी घटना थी। वैदिक आर्यों के युग को भी लौह-युग से जोड़ा जाता है।
2. लौह युग — तुलना
लौह-काल के साथ राजस्थान में भी चित्रित धूसर मृद्भांड संस्कृति (Painted Grey Ware, PGW) उभरी — स्लेटी रंग के बर्तन। इसका उदय लगभग 600 ई.पू. माना गया। अवशेष विराटनगर, जोधपुरा, सुनारी और नोह से मिले हैं।
ट्रिक: सिक्कों के गुच्छे: नगर 6000 > रैढ़ 3075 > गुरारा 2744; रिंग-वेल: रैढ़ 115 सबसे अधिक।
3. रैढ़ (टोंक)
- नदी ➜ ढील
- क्षेत्र ➜ निवाई, टोंक
- शुरुआत ➜ जून 1938 — दयाराम साहनी
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
- 115 घेरेदार कूप (अँगूठी कुएँ) और 3075 चाँदी की आहत मुद्राएँ (पंचमार्क)।
- सिक्कों में मालव गण, यूनानी शासक अपोलोडोटस और इण्डो-ससैनियन सिक्के।
- एक सीसे की मुहर पर मालव जनपद का अंकन — क्षेत्र पर मालव आधिपत्य का प्रमाण।
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
ट्रिक: रैढ़ = ढील + साहनी–पुरी + टाटानगर + 3075 सिक्के।
4. जोधपुरा (कोटपुतली-बहरोड़)
- नदी ➜ साबी (पूर्वी किनारा)
- दूसरा नाम ➜ धरतूल घाट
- उत्खनन ➜ 1972–73 — विजय कुमार; निदेशक आर.सी. अग्रवाल
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
- लोहा गलाने की भट्टियाँ (लौहयुगीन), लोहे के शस्त्र, तीरों के अग्रभाग, कीलें; मिट्टी-पत्थर के मनके; शंख की चूड़ियों के टुकड़े।
- चित्रित धूसर बर्तनों में कटोरे, पानी के पात्र और तश्तरियाँ — लौह-संस्कृति की पहचान।
- गणेश्वर और जोधपुरा के गैरिक मृद्भांड आकार व डिज़ाइन में एक जैसे हैं।
5. सुनारी व ईसवाल
सुनारी (झुंझुनूं, खेतड़ी तहसील)
- कांतली किनारे; राजस्थान पुरातत्त्व विभाग का 1980 का उत्खनन।
- लौह बाण, मिट्टी व पत्थर के मनके, मातृदेवी की मूर्तियाँ, शंख-चूड़ियाँ और चाक पर गढ़े काले मृद्भांड (कुषाणकालीन)।
- निवासी चावल खाते और घोड़ों से रथ खींचते थे; संभवतः वैदिक आर्यों की बस्ती।
ईसवाल (उदयपुर)
- प्राचीन औद्योगिक बस्ती; लगभग 2000 वर्ष तक निरन्तर लोहा गलाने के प्रमाण।
- लौह अयस्क, लौह-मल और मिट्टी के पाइप; मकान पत्थर के खंडों के; हड्डियाँ व ऊँट का दाँत।
- पाँच स्तरों की बस्तियाँ ➜ प्राक्-ऐतिहासिक काल से मध्यकाल तक।
6. नोह (भरतपुर)
- नदी ➜ रूपारेल
- खोज ➜ 1963–64 — रतनचन्द्र अग्रवाल
- काल ➜ 1100–900 ई.पू.
- निचले स्तर पर सादे लाल-काले मृद्भांड; ऊपरी स्तर पर अनेक शासकों के ताम्र सिक्के, मानव-पशु मृण्मूर्तियाँ, लोहे के कृषि-उपकरण और चक्रकूप।
- ताम्रयुग के बाद यहाँ लौह-संस्कृति आई; PGW के अवशेष और एक स्थान से 16 रिंग-वेल।
- 8 फुट ऊँची यक्ष (जाख बाबा) प्रतिमा — शककालीन; पक्षी-चित्रित ईंट।
याद रखें: नोह का लोहा भारत में लौह युग की शुरुआत की सीमा-रेखा तय करने का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।
7. नगरी, नगर, नालियासर
नगरी (चित्तौड़गढ़)
- बेड़च तट का स्थल; यहाँ महाभारत-काल तथा गुप्त-काल, दोनों के चिह्न मिले; 1872 में कार्लाइल ने पहली बार खोजा।
- उत्खनन: भंडारकर (1904; 1915–16), के.वी. सौन्दरराजन (ASI, 1962–63)।
- गुप्तकालीन मंदिर के अवशेष ➜ शिव मूर्ति सहित; शिलालेख, मृण्मूर्तियाँ, अलंकृत ईंटें; 4 चक्राकार कुएँ।
नगर (उनियारा, टोंक)
- उत्खनन केदारनाथ पुरी; खोज कार्लाइल (1871–72)।
- 6000 मालव ताम्र मुद्राएँ ➜ “मालवानाम जय” और मालव सरदारों के नाम; विद्वान इसे मालवों की प्राचीन राजधानी कर्कोट नगर से मिलाते हैं, या फिर मालव गण की टकसाल मानते हैं।
- लाल मृद्भांड, आभूषण, लौह उपकरण; गुप्तोत्तर काल की स्लेटी पत्थर की महिषासुरमर्दिनी, एकमुखी शिवलिंग, गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी।
नालियासर (जयपुर, साँभर के पास)
- साँभर झील से 6 किमी की दूरी; खुदाई पहले कर्नल हैण्डले ने, फिर दयाराम साहनी ने करवाई।
- हैण्डले ने लेख Buddhist Remains near Sambhar में इसे बौद्ध क़स्बे का टीला बताया।
- सोने का सिंह-शीर्ष, ताम्र पात्र, मिट्टी के बाट, तलवार, सजावटी ईंटें, पूजा-पात्र, हड्डी के पासे और काँसे के कड़े।
8. भीनमाल, लाछुरा, बहज
| स्थल | ज़िला | विवरण |
|---|---|---|
| भीनमाल | जालोर | 1953–54, रतनचन्द्र अग्रवाल; रोमन ऐम्फ़ोरा (सुरापात्र), यूनानी दो-हत्थी सुराही — विदेशी व्यापार का केन्द्र; मृद्भांड व शक क्षत्रपों के सिक्के |
| लाछुरा | भीलवाड़ा | 1998–99, बी.आर. मीणा; 700 ई.पू. – 200 ई.; बौद्धकाल, मौर्य, शुंग, कुषाण अवशेष; लोहे के चाकू, ताँबे की चूड़ियाँ, मिट्टी की मुहरें, मृण्मूर्तियाँ, शुंगकालीन तीखे किनारे वाले प्याले |
| बहज | डीग | ASI की खुदाई जनवरी 2024 से; हड़प्पा-उत्तर, महाभारतकालीन (चित्रित धूसर), मौर्य, कुषाण, गुप्त — पाँच कालखंड; एक प्राचीन जलधारा (पैलियो-चैनल) के चिह्न |
9. बैराठ (विराटनगर)
बैराठ का प्राचीन नाम विराटनगर है और यह मत्स्य जनपद की राजधानी रहा है। यह कोटपुतली-बहरोड़ ज़िले में बाणगंगा नदी के किनारे है।
10. परिचय व खोज-क्रम
- प्राचीन नाम ➜ विराटनगर
- राजधानी ➜ मत्स्य जनपद
- काल ➜ 600–322 ई.पू.
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1840 | भाब्रू लेख | बीजक की पहाड़ी पर कैप्टन बर्ट के हाथ अशोक का शिलालेख लगा। |
| 1860 के दशक | कनिंघम | परीक्षण के तौर पर दो खाइयों की खुदाई करवाई। |
| 1871 | कार्लाइल | गहन सर्वेक्षण; भीम डूंगरी से एक और शिलालेख। |
महाभारत से नाता
- परम्परा के अनुसार नगर राजा विराट ने बसाया।
- महाभारतकालीन भीमलात तालाब यहीं है।
- पाण्डवों ने अज्ञातवास विराटनगर में बिताया।
11. भाब्रू (बैराठ) शिलालेख
- खोजा ➜ कैप्टन बर्ट — 1840, बीजक पहाड़ी
- लिपि-भाषा ➜ ब्राह्मी — प्राकृत (मागधी)
- वर्तमान स्थान ➜ एशियाटिक सोसायटी संग्रहालय, कोलकाता
- आरम्भ में अशोक को “मगध का राजा प्रियदर्शी” कहा गया है।
- अशोक बुद्ध, धम्म और संघ में अपनी आस्था बताता है।
- भिक्षु-भिक्षुणियों और उपासक-उपासिकाओं को सुनने, मनन और अध्ययन के लिए धर्म-ग्रन्थों की सूची सुझाता है (बौद्ध ग्रन्थों के सात पाठ)।
12. बौद्ध अवशेष व कला
- वृत्ताकार बौद्ध मंदिर ➜ बीजक पहाड़ी के समतल मैदान में, प्रदक्षिणापथ (परिक्रमा) वाला ईंटों का मंदिर; अशोककालीन माना गया।
- यहाँ शंख लिपि (कूट/गुप्त लिपि — अत्यधिक अलंकृत ब्राह्मी) के प्रमाण।
- पत्थर की भरमार के बावजूद भवन व मठ मिट्टी की ईंटों से बने — ईंटों की बनावट मोहनजोदड़ो की ईंटों जैसी।
- 6–7 कमरों का खण्डहरनुमा बौद्ध मठ; मठ के पास लोहे का कारख़ाना था जो मठ के लिए औज़ार बनाता था।
13. ह्वेनसांग व स्वर्ण-कलश
- चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 634 ई. में हर्षवर्धन के समय बैराठ की यात्रा की और 8 बौद्ध विहार बताए।
- बैराठ की तबाही का दोष उसने हूण राजा मिहिरकुल पर डाला।
- सवाई रामसिंह द्वितीय के शासन में किलेदार किताजी खंगारोत को स्वर्ण-कलश प्राप्त हुआ; माना जाता है कि उसमें बुद्ध की अस्थियाँ रखी थीं।
14. अन्य स्थल व संस्थाएँ
ऊपर के बड़े स्थलों के अलावा राजस्थान में कई छोटे-बड़े पुरास्थल हैं जो बौद्ध धर्म, गुप्त शासन और मध्यकालीन मन्दिर-परम्परा की कहानी कहते हैं।
15. बौद्ध स्थल
| स्थल | ज़िला | क्या मिला |
|---|---|---|
| लालसोट | दौसा | शुंगकालीन बौद्ध-स्तूप के अवशेष (बनजारे की छतरी में जड़े, डाक बंगले के ठीक सामने) |
| कोलवी | झालावाड़ | प्राचीन बौद्ध गुफाएँ व स्तूप; इसी क्षेत्र में हथियागौड़ और बिनायका |
| शेरगढ़ | बारां | देवदत्त नामक शासक का शिलालेख — कोशवर्द्धन पर्वत के पूर्व में बौद्ध विहार व मठ |
16. गुप्त से मध्यकाल तक
| स्थल | ज़िला | विवरण |
|---|---|---|
| चाकसू | जयपुर | प्राचीन नाम चम्पावती/चाटसु (जनश्रुति में ताम्बावती, पहपावती); छठी सदी से गुहिलों के पास, फिर चौहानों के; कार्लाइल का सर्वेक्षण 1871–72 — तालाब गोलेलाव की सीढ़ियों पर खुदा लेख मिला; दयाराम साहनी को 6 भुजाओं वाली प्रतिमा, गणेश प्रतिमा, बुद्ध-मूर्ति का सिर मिले |
| बयाना | भरतपुर | गुप्तकालीन सिक्कों का भंडार; मुग़लकाल में नील का सर्वाधिक उत्पादन |
| ढलिया | हनुमानगढ़ | गोलाकार पकी मिट्टी की मुहर — गुप्तकालीन ब्राह्मी में “श्री समकाजिक कुमारामात्य अधिकरणस्य” |
| पल्लू | हनुमानगढ़ | 10–11वीं सदी की सफ़ेद संगमरमर की जैन सरस्वती प्रतिमा — उत्कृष्ट शिल्प |
17. आर्य संस्कृति व संस्थाएँ
लगभग 1800 ई.पू. के आसपास हड़प्पा के ह्रास के बाद वैदिक सभ्यता आई; चारों वेद ही इसकी जानकारी के प्रमुख आधार हैं, इसी कारण यह नाम मिला।
- आर्य संस्कृति से जुड़े अवशेष अनूपगढ़, तरखानवाला डेरा और चक 86 (श्रीगंगानगर क्षेत्र) से मिले हैं।
- पुरातत्त्व व संग्रहालय विभाग (राजस्थान) 1950 में जयपुर में गठित हुआ।
ध्यान दें: तरखानवाला डेरा से हड़प्पाकालीन बस्ती भी मिली है; चित्रित धूसर (PGW) की परतें चक 86 में स्पष्ट हैं।
रिवीजन पॉइंटर्स
- रैढ़ (टोंक) ढील नदी पर है; खुदाई जून 1938 में दयाराम साहनी ने शुरू की; यहाँ 115 घेरेदार कूप और 3075 चाँदी की आहत मुद्राएँ मिलीं।
- सिक्कों के गुच्छों का क्रम — नगर 6000 ➜ रैढ़ 3075 ➜ गुरारा 2744; रिंग-वेल में रैढ़ (115) सबसे आगे है।
- जोधपुरा साबी नदी के पूर्वी किनारे पर है; उत्खनन 1972–73 में हुआ; लोहा गलाने की भट्टियाँ और चित्रित धूसर बर्तन यहाँ की पहचान हैं।
- नोह (भरतपुर) रूपारेल नदी पर है; खोज 1963–64 में रतनचन्द्र अग्रवाल ने की; यहाँ 8 फुट ऊँची यक्ष (जाख बाबा) प्रतिमा मिली।
- ईसवाल (उदयपुर) में लगभग 2000 वर्ष तक लगातार लोहा गलाने के प्रमाण मिले हैं।
- नगरी (चित्तौड़गढ़) बेड़च के तट पर है; 1872 में कार्लाइल ने इसे खोजा और भंडारकर ने 1904 में खुदाई की।
- बैराठ का प्राचीन नाम विराटनगर है, यह मत्स्य जनपद की राजधानी रहा और बाणगंगा के किनारे है; भाब्रू शिलालेख 1840 में कैप्टन बर्ट को बीजक पहाड़ी पर मिला, अब कोलकाता में है।
- चीनी यात्री ह्वेनसांग 634 ई. में बैराठ आया और 8 बौद्ध विहार गिनाए; तबाही का दोष उसने मिहिरकुल पर डाला।
- पुरातत्त्व व संग्रहालय विभाग 1950 में जयपुर में बना; बहज (डीग) में ASI की खुदाई जनवरी 2024 से चल रही है।
अगले भाग में नया अध्याय — पौराणिक स्वरूप व जनपद युग: पूरी कालरेखा, आर्यों का प्रवेश, मरु–जांगल देश और रामायण–महाभारत से जुड़े स्थल।
पिछला भाग: प्राचीन सभ्यताएँ व पुरास्थल: ताम्रयुगीन सभ्यताएँ एवं कांस्य युग — कालीबंगा
अगला भाग: पौराणिक स्वरूप व जनपद युग: आर्य व पौराणिक युग एवं जनपद युग
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