तात्या टोपे राजपूताने में सहारा ढूँढने आए थे, पर रियासतों से मदद की जो उम्मीद थी वह पूरी नहीं हुई — और यहीं से पूरी क्रांति की असफलता की कहानी भी खुलती है। इस भाग में तात्या के दोनों आगमन, असफलता के कारण और प्रसिद्ध कथन हैं। फिर उन क्रांतिकारियों की सूची है जिन्होंने धन, कलम या शरण देकर साथ निभाया — अमरचन्द बाँठिया, सूर्यमल्ल मिश्रण, बांकीदास, आनन्दसिंह और अन्य।
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1. तात्या टोपे
तात्या टोपे (मूल नाम रामचन्द्र पाण्डुरंग) उन नाना साहब के निष्ठावान सेनानायक थे जिन्हें पेशवा बाजीराव ने गोद लिया था। नाना साहब और लक्ष्मीबाई के हारने के बाद वे जयपुर व हाड़ौती से मदद मिलने की उम्मीद लिए अपनी सेना समेत राजस्थान पहुँचे।
- पहला आगमन ➜ मांडलगढ़ (भीलवाड़ा), 8 अगस्त 1858
- दूसरा आगमन ➜ बाँसवाड़ा, दिसम्बर 1858
- गिरफ़्तारी ➜ नरवर के जंगल — मानसिंह नरूका के विश्वासघात से
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रोचक तथ्य: जैसलमेर को छोड़कर तात्या राजपूताने की हर रियासत में घूमा।
2. पहला आगमन — अगस्त 1858
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 8 अगस्त 1858 | मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) | तात्या टोपे का पहली बार राजस्थान में प्रवेश। |
| 9 अगस्त | कुहाड़ा (भीलवाड़ा, कोठारी नदी) | जनरल रॉबर्ट्स की सेना से युद्ध; तात्या को पीछे हटना पड़ा। |
| अगस्त | कोठारिया → नाथद्वारा | रावत जोधसिंह से रसद ली और नाथद्वारा में श्रीनाथजी के दर्शन किए। |
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याद रखें: कोठारिया के रावत जोधसिंह ने कुशालसिंह, नाना साहब और तात्या — तीनों को सहारा दिया।
3. दूसरा आगमन व अंत
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 11 दिसम्बर 1858 | बाँसवाड़ा | महारावल लक्ष्मणसिंह को हराकर बाँसवाड़ा पर क़ब्ज़ा; पर अंग्रेज़ अफ़सर लिनमाउथ की सेना ने उन्हें वहाँ से भगा दिया। |
| जनवरी 1859 | टोंक | बनास नदी के किनारे और अमीरगढ़ क़िले के पास नवाब की सेना हारी; सूचना पाकर मेजर ईडन (जयपुर) ने दमन किया। |
| 16 जनवरी | दौसा | शावर्स ने तात्या की सेना पर हमला किया। |
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ट्रिक: कुशालसिंह के पीछे भी होम्स और तात्या के पीछे भी होम्स — दोनों जगह (आउवा, सीकर) नाम वही।
4. असफलता व अन्य तथ्य
राजस्थान में क्रांति सैनिक विद्रोह से शुरू हुई और कई जगह जनता भी जुड़ी, पर शासकों का साथ और समन्वय की कमी ने इसे कुचल दिया।
क्यों दबी
- शासक अंग्रेज़ों के साथ
- अलग-अलग समय पर विद्रोह
- केंद्रीय संगठन-संपर्क नहीं
5. असफलता के कारण
- अधिकांश राजाओं ने ब्रिटिश सत्ता का सहयोग देकर विप्लव को थामा।
- विद्रोहियों में आपसी एकता और संपर्क का अभाव; नसीराबाद, नीमच, कोटा, भरतपुर, धौलपुर आदि में विस्फोट एक साथ नहीं, अलग-अलग मौक़ों पर हुए — इससे अंग्रेज़ एक-एक करके निपटते गए।
- तात्या टोपे को जोधपुर, उदयपुर और जयपुर के शासकों से कोई मदद नहीं मिली।
- रियासतें भी आपस में संगठित नहीं थीं।
6. अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य
- 6 छावनियों में सबसे शक्तिशाली नसीराबाद थी; राजस्थान में अंग्रेज़ी सत्ता का केंद्र व प्रतीक अजमेर था, जहाँ गोला-बारूद, शस्त्रागार और सरकारी ख़ज़ाना रखा था।
- जयपुर एकमात्र रियासत थी, जहाँ राजा के साथ आम जनता ने भी अंग्रेज़ों का साथ दिया।
| किसने कहा | कथन का सार |
|---|---|
| प्रिचार्ड (The Mutinies in Rajputana) | आउवा के ठाकुर का झगड़ा अपने राजा (जोधपुर) से था, अंग्रेज़ सरकार से नहीं। |
| प्रिचार्ड | प्रिचार्ड का मत — अजमेर विद्रोहियों के हाथ आ जाता तो राजस्थान के राजा उनके पाले में चले जाते। |
| जॉन लॉरेन्स | भारत में बहादुरशाह ज़फ़र की जगह कोई योग्य नेता होता तो अंग्रेज़ हार जाते। |
ध्यान दें: दो लॉरेन्स — जॉर्ज (राजस्थान का AGG, आउवा में हारा) और जॉन (भारत के लिए यह कथन)।
7. प्रमुख क्रांतिकारी
मैदान में लड़ने वालों के साथ क्रांति को धन, क़लम और शरण देने वाले भी थे — इस शाखा में दोनों तरह के लोग हैं।
8. अमरचन्द बाँठिया
- जन्म ➜ बीकानेर, 1793
- पिता ➜ अबीरचन्द बाँठिया
- पदवी ➜ नगर सेठ (जीयाजीराव सिंधिया से)
- व्यापार के सिलसिले में पिता के साथ ग्वालियर जा बसे; वहाँ के शासक जीयाजीराव सिंधिया ने “नगर सेठ” की पदवी दी।
- 1857 में उन्होंने राजकोष का ख़ज़ाना और अपनी पैतृक संपत्ति लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे को सौंप दी।
- भेद खुलने पर अंग्रेज़ों ने उनके 8 वर्ष के बेटे को तोप से बाँधकर उड़ाया और 22 जून 1858 को ग्वालियर के सर्राफ़ा बाज़ार में नीम की डाल से फाँसी दे दी।
9. सूर्यमल्ल मिश्रण व बांकीदास
सूर्यमल्ल मिश्रण
- जन्म 19 अक्टूबर 1815, हरणा (बूँदी); बूँदी के महाराव रामसिंह के दरबारी कवि।
- 1857 के समय रची वीर सतसई डिंगल भाषा में वीर रस के दोहों की रचना है; इसने राजस्थान के लोगों में राष्ट्रीय चेतना के अंकुर रोपे; शुरुआत में ही 1857 के संग्राम का साफ़ ज़िक्र है।
- उन्होंने राजस्थान के अनेक राजाओं-सामंतों को पत्र लिखकर संगठित होकर बग़ावत करने को कहा।
बांकीदास
- जोधपुर महाराजा मानसिंह के राजकवि और काव्यगुरु; रचना-संग्रह बांकीदास ग्रन्थावली नागरी प्रचारिणी सभा ने तीन खण्डों में छापा।
- भरतपुर पर अंग्रेज़ी हमले पर उनकी कविता — “आछो गोरा हट जा राज भरतपुर को रै, गोरा हट जा”।
- दूसरी प्रसिद्ध पंक्तियाँ ➜ “आयौ इंगरेज मुलक रै ऊपर … धणियाँ मरै न दीधी धरती” — राजाओं को ज़मीन के लिए मर-मिटने की सीख।
10. लोटू जाट, आनन्दसिंह व अन्य
| नाम | पहचान | योगदान |
|---|---|---|
| लोटिया (लोठराम) जाट | निठारवाल गोत्र; रींगस (सीकर), जन्म 1804 | ठाकुर से अनबन होने पर बहन के पास बठोठ आए; वहाँ डूँगजी-जवाहरजी से जुड़े। अंग्रेज़ों ने डूँगजी को आगरा क़िले में बंद किया, तब लोठू ने जवाहरजी तथा बालू नाई, सांखू लुहार, करणा मीणा के साथ मिलकर उन्हें निकाल लाने का साहस दिखाया। अंग्रेज़-विरोधी गतिविधियाँ जारी रखीं; 1855 में मृत्यु। |
| ठाकुर आनन्दसिंह | मंडावा (झुंझुनूँ) के ठाकुर | 1857 में हरियाणा के बहल पर बीकानेर व अंग्रेज़ी सेना के हमले में 300 शेखावत सरदारों के साथ मुक़ाबला कर उन्हें पीछे धकेला; आलनियावास के अजीतसिंह की मदद की; तात्या टोपे को मंडावा में ठहराया, धन-रसद दी। |
| अभयसिंह व चिमनसिंह | खोंखरी (जोधपुर) के दो भाई | अंग्रेज़ी डाक और ख़ज़ाना कई बार लूटा, पलटनों से टक्कर ली; डूँगजी-जवाहरजी के साथी। जोधपुर महाराजा ने अंग्रेज़ों के दबाव में उनकी जागीर छीनी; वे अरावली में भाखर ढाणा को ठिकाना बनाकर रहे और वहीं अंग्रेज़ सैनिकों से लड़ते मारे गए। |
11. 29 अन्य क्रांतिकारी
| नाम | मूल स्थान / छावनी | विशेष विवरण |
|---|---|---|
| मेहराब खाँ | करौली | कोटा की सेना में रिसालदार; विद्रोही सैनिकों को जोड़कर कोटा के एजेंसी हाउस पर चढ़ाई की। |
| लाला जयदयाल | कामां (डीग) | कोटा के विद्रोहियों के नेता; बाद में बैराठ से पकड़े गए और सितम्बर 1860 में फाँसी हुई। |
| हरदयाल भटनागर | कामां (डीग) | जयदयाल के छोटे भाई; कोटा विद्रोह में साथ रहे, मार्च 1858 में अंग्रेज़ी सेना से लड़ते शहीद। |
| खवास खान | कोटा | ब्रिटिश एजेंट के निवास पर हुए हमले में आगे रहे; 1860 में फाँसी। |
रिवीजन पॉइंटर्स
- तात्या टोपे का मूल नाम रामचन्द्र पाण्डुरंग था; वे नाना साहब के निष्ठावान सेनानायक थे।
- तात्या का पहला आगमन मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में 8 अगस्त 1858 को हुआ, दूसरा बाँसवाड़ा में दिसम्बर 1858 में।
- जैसलमेर को छोड़कर तात्या राजपूताने की हर रियासत में घूमे; नरवर के जंगल में मानसिंह नरूका के विश्वासघात से पकड़े गए।
- कोठारिया के रावत जोधसिंह ने कुशालसिंह, नाना साहब और तात्या — तीनों को सहारा दिया।
- असफलता के तीन कारण — शासकों का अंग्रेज़ों के साथ होना, अलग-अलग समय पर विद्रोह और केंद्रीय संगठन का अभाव।
- 6 छावनियों में सबसे शक्तिशाली नसीराबाद थी; अंग्रेज़ी सत्ता का केंद्र और प्रतीक अजमेर था।
- दो लॉरेन्स का फ़र्क याद रखें — जॉर्ज राजस्थान का AGG था, जबकि बहादुरशाह ज़फ़र वाला कथन जॉन लॉरेन्स का है।
- अमरचन्द बाँठिया (जन्म बीकानेर, 1793) ने ख़ज़ाना लक्ष्मीबाई व तात्या को सौंपा; 22 जून 1858 को ग्वालियर में उन्हें फाँसी दी गई।
- सूर्यमल्ल मिश्रण ने डिंगल में वीर सतसई रची; बांकीदास जोधपुर महाराजा मानसिंह के राजकवि थे।
अगले भाग में कम्पनी राज से ताज के राज तक का बदलाव और घोषणा के बाद पाँच बड़ी रियासतों में हुए प्रशासनिक, आर्थिक व शैक्षिक सुधार।
पिछला भाग: राजस्थान में 1857 की क्रांति: प्रमुख केंद्र (भाग 2) एवं शासक, सामंत व पुरस्कार
अगला भाग: 1857 के बाद सुधार और राजनीतिक चेतना: राज्यवार सुधार एवं प्रमुख दरबार व यात्राएँ
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