राजस्थान का इतिहास अशोक के शिलालेखों पर आकर नहीं रुकता; खुदाइयों ने उसे हज़ारों साल पीछे धकेल दिया है। इस भाग में पहले तीन बड़े काल और खोज का क्रम समझें, फिर पाषाण युग के तीन चरण आते हैं। उसके बाद बागोर, तिलवाड़ा, दौसा, डीडवाना और शैलाश्रयों वाले स्थल हैं। पुरास्थल, ज़िला और उत्खननकर्ता को जोड़ी में याद करना यहाँ सबसे काम की आदत है।
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1. एक नज़र में
खुदाई से पहले राजस्थान का लिखित इतिहास केवल मौर्यकाल (लगभग 300 ई.पू.) तक जाता था — सबसे पुराने लिखित सबूत अशोक के शिलालेख थे। उत्खननों ने इस कहानी को हज़ारों साल पीछे धकेल दिया।
- पहला सर्वेक्षण ➜ 1871 — ए.सी.एल. कार्लाइल
- सबसे पुरानी ताम्र बस्ती ➜ गणेश्वर (सीकर)
- हड़प्पाई नगर ➜ कालीबंगा (हनुमानगढ़)
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2. तीन बड़े काल
अध्ययन की सुविधा के लिए पूरे मानव-अतीत को इस आधार पर बाँटा गया है कि लिखित सामग्री कितनी और कैसी मिलती है।
| काल | समय | पहचान |
|---|---|---|
| प्राक् इतिहास | लगभग 20 लाख ई.पू. – 3000 ई.पू. | लेखन-कला नहीं थी; सृष्टि के आरम्भ से हड़प्पा से ठीक पहले तक |
| आद्य (पुरा) इतिहास | हड़प्पा काल – लगभग 600 ई.पू. | लिखावट है, पर अस्पष्ट या ऐसी लिपि में जो आज भी पढ़ी नहीं गई |
| ऐतिहासिक काल | 600 ई.पू. से आज तक | पुरातात्विक अवशेषों के साथ पठनीय लिखित प्रमाण भी |
धातुओं का क्रम
- ताँबा (सबसे पहले)
- काँसा (मिश्र धातु)
- लोहा (सबसे बाद)
ट्रिक: लिखावट से पहचानो: नहीं = प्राक्, अस्पष्ट = आद्य, पठनीय = ऐतिहासिक।
3. खोज का इतिहास
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1840 | भाब्रू लेख | कैप्टन बर्ट को बैराठ की पहाड़ी पर अशोक का शिलालेख मिला; कोलकाता भेजा गया। |
| 1870 | पुरापाषाण औज़ार | सी.ए. हैकेट ने जयपुर व इन्द्रगढ़ (बूँदी) से हस्त-कुठार खोजे। |
| 1871 | पहला सर्वेक्षण | कार्लाइल ने राजपूताने का सर्वेक्षण शुरू किया — दौसा, नगर, चाकसू, बैराठ। |
| 1904 | नगरी | डी.आर. भंडारकर की खुदाई (दूसरा दौर 1915–16)। |
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पुरास्थल — वर्ष — उत्खननकर्ता
| पुरास्थल | आज का ज़िला | वर्ष | खोज / उत्खनन किसने |
|---|---|---|---|
| जयपुर व इन्द्रगढ़ | जयपुर; बूँदी | 1870 | सी.ए. हैकेट |
| बैराठ | कोटपुतली-बहरोड़ | 1840; 1936; 1962–63 | कैप्टन बर्ट; दयाराम साहनी; नीलरत्न बनर्जी व कैलाशनाथ दीक्षित |
| नगर (उनियारा) | टोंक | 1871–72 | कार्लाइल (खोज); केदारनाथ पुरी (उत्खनन) |
| झालावाड़ क्षेत्र | झालावाड़ | 1908 | सेटनकार |
… शेष 18 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
ट्रिक: नाम जोड़ी: कालीबंगा = लाल + थापर, बागोर = मिश्र, गणेश्वर = अग्रवाल + विजय कुमार, आहड़ = व्यास → अग्रवाल → मिश्र–सांकलिया।
ध्यान दें: बैराठ का भाब्रू लेख कुछ सामग्री में 1837 की खोज बताया जाता है; विश्वसनीय स्रोत बर्ट की खोज 1840 की मानते हैं और उसी वर्ष इसे कोलकाता पहुँचाया गया।
4. पाषाण युग
पत्थर के औज़ार-हथियार ही इस युग की पहचान हैं। खुदाइयों से साफ़ है कि पत्थर-युगीन मानव चम्बल, बनास, बेड़च, गंभीरी, वाघन की घाटियों और लूणी तट पर बसता था।
5. तीन चरण
| चरण | लगभग समय | औज़ार व जीवन |
|---|---|---|
| पुरापाषाण (पेलियोलेथिक) | 20 लाख ई.पू. – 10,000 ई.पू. | खुरदरे हस्त-कुठार व गंडासे; शिकार व कंद-मूल; आग जलाना सीख लिया |
| मध्यपाषाण (मेसोलिथिक) | लगभग 10,000 – 6,000 ई.पू. | छोटे, हल्के, बारीक माइक्रोलिथ; पशुपालन शुरू, खेती अज्ञात; स्थायी आवास की शुरुआत |
| नवपाषाण (नियोलिथिक) | लगभग 6,000 ई.पू. के बाद | खेती, गाँव-बस्ती, कब्र में दफ़न, उन्नत पशुपालन, चित्रित मृद्भांड, पहिये का आविष्कार |
रोचक तथ्य: पुरापाषाण का राजस्थानी मानव मुख्यतः क्वार्टज़ाइट पत्थर के औज़ार बनाता था; इनसे अनुमान है कि लगभग डेढ़–दो लाख वर्ष पहले यहाँ मानव-संस्कृति मौजूद थी।
6. पुरापाषाण की खोज
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1870 | हैकेट की खोज | सी.ए. हैकेट को जयपुर व इन्द्रगढ़ (बूँदी) से पत्थर के हस्त-कुठार मिले, जो कोलकाता संग्रहालय में रखे हैं। |
| 1908 | झालावाड़ | झालावाड़ क्षेत्र में सेटनकार को इसी काल के कई औज़ार हाथ लगे। |
| 1942 | सरस्वती-सर्वे | ऑरेल स्टीन ने लुप्त सरस्वती के किनारे के प्राचीन स्थलों पर सर्वे-रिपोर्ट लिखी। |
- चम्बल, बनास और उनकी सहायक नदियों के किनारे पुरापाषाण औज़ार मिले हैं।
- लूणी के तट और जालोर के रेतीले टीलों में श्रीमती बी. आल्चिन ने इस संस्कृति के चिह्न खोजे।
- इन्द्रगढ़ (बूँदी) ➜ 1870 में हैकेट को हस्त-कुठार, एश्यूलियन व क्लीवर औज़ार मिले।
- डीडवाना क्षेत्र (कोलिया, जानकीपुरा, अमरपुरा, इन्दोला की ढाणी, सिंघी तालाब) में हाथ से गढ़ी कुल्हाड़ियाँ; जायल (नागौर) में हस्त-कुठार व चॉपर।
7. मध्य व नव पाषाण
मध्यपाषाण में औज़ार छोटे, हल्के और कुशलता से गढ़े मिलते हैं — इन्हें माइक्रोलिथ (लघु पाषाण उपकरण) कहा गया। मनुष्य पशु पालने लगा था, पर खेती से अभी अपरिचित था।
| क्षेत्र / स्थल | ज़िला | क्या मिला |
|---|---|---|
| लूणी व उसकी सहायक नदियाँ | पश्चिमी राजस्थान | मध्यपाषाण औज़ार |
| बेड़च घाटी | चित्तौड़गढ़ | मध्यपाषाण औज़ार |
| विराटनगर | कोटपुतली-बहरोड़ | पुरापाषाण से उत्तरपाषाण तक की सामग्री |
| चन्द्रावती | झालावाड़ | मध्यपाषाणकालीन स्थल |
नवपाषाण के औज़ार जोधपुर, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, जयपुर, झुंझुनूं, सीकर, नागौर और अजमेर आदि क्षेत्रों में मिले; इनमें बागोर (भीलवाड़ा) और तिलवाड़ा (बालोतरा) सबसे ख़ास हैं।
8. बागोर (भीलवाड़ा)
- नदी ➜ कोठारी
- टीला ➜ महासतियाँ (बागोर ठिकाने के श्मशान के पास)
- उत्खनन ➜ 1967–70, वी.एन. मिश्र व एल.एस. लेस्निक (जर्मनी)
| स्तर | क्या मिला | क्या पता चलता है |
|---|---|---|
| प्रथम | लघुपाषाण औज़ार, मृत पशुओं के अवशेष, पश्चिम–पूर्व दिशा में घर पर दफ़नाया कंकाल, लाल-पीला गेरू, मणकों की माला | भोजन-संग्राहक व शिकारी जीवन; अलंकरण का शौक़ |
| द्वितीय | खेती व चाक पर बने मिट्टी के पात्र; ताँबे के तीर-फल, भाले का फल, सुआ; शव के पास उपहार (बर्तन, औज़ार, खाद्य, मनके) | कृषि की शुरुआत, धातु का प्रयोग, मृत्यु के बाद की मान्यता |
| तृतीय | पत्थर, ताँबे व लोहे के औज़ार, मृद्भांड, त्रिभुज फलक, पशु-अस्थियाँ, दो कंकाल दैनिक सामान के साथ, अधजली हड्डियाँ | माँस भोजन का ज़रूरी हिस्सा; लौह प्रवेश |
- मछली पकड़ने, शिकार, चमड़ा छीलने और छेद करने के औज़ार मिले।
- हथौड़े, गोफन की गोलियाँ और छेद वाले पत्थर बड़ी संख्या में — निवासी मुख्यतः आखेटक थे।
- ताँबे की सुई सबसे महत्त्वपूर्ण ताम्र-उपकरण है।
9. तिलवाड़ा, दौसा, डीडवाना
तिलवाड़ा (बालोतरा)
- लूणी के किनारे; उत्खनन 1966–67 में।
- पालतू पशुओं के अवशेष; चाक से गढ़े लाल और स्लेटी पात्र; सिलबट्टा, जली हड्डियाँ और पाँच आवास-स्थलों के चिह्न।
- एक अग्निकुण्ड मिला जिसमें मानव अस्थि-भस्म और मृत पशुओं की हड्डियाँ थीं — आखेट की पुष्टि।
दौसा
- हज़ारों वर्ष पहले यहाँ आदिम मानव की बस्ती थी; कार्लाइल ने 1871–72 में सर्वेक्षण किया।
- पहाड़ की उत्तरी ढलान पर पत्थर के घेरों वाली चार कब्रें दिखीं — सबसे बड़ी की परिधि 24 फुट; बीच में ऊँची स्मारक-शिला (मोनोलिथ)।
डीडवाना (डीडवाना-कुचामन) और डाडाथोरा
- डीडवाना ➜ पुरापाषाणकालीन स्थल।
- डाडाथोरा (बीकानेर) ➜ लघुपाषाणकालीन स्थल।
सरस्वती-सर्वे
ब्रिटिश पुरातत्त्ववेत्ता ऑरेल स्टीन ने 1942 में लुप्त सरस्वती नदी के किनारे के स्थलों का सर्वे किया और उसकी रिपोर्ट छापी।
10. शैलचित्र स्थल
| स्थल | ज़िला | विशेषता |
|---|---|---|
| विराटनगर (बैराठ) | कोटपुतली-बहरोड़ | 250 से अधिक गुफाएँ व शैलाश्रय; सैकड़ों शैलचित्र |
| गरदड़ा | बूँदी | छाजा नदी के किनारे पहली बर्ड-राइडर रॉक पेंटिंग |
| आलनिया, मानपुरा, तिपटिया | कोटा | शैलचित्र — 1978 में डॉ. जगतनारायण श्रीवास्तव ने हाड़ौती में खोजे |
| दर | भरतपुर | चित्रित शैलाश्रय |
11. अन्य पाषाण स्थल
| स्थल | ज़िला | पहचान |
|---|---|---|
| इन्द्रगढ़ | बूँदी | हस्त-कुठार (1870, हैकेट) |
| जायल | नागौर | पुरापाषाण — हस्त-कुठार, चॉपर |
| बूढ़ा पुष्कर, होकरा | अजमेर | पुरापाषाण |
| भानगढ़, ढिगरिया | अलवर | पुरापाषाण हस्त-कुल्हाड़ी |
रिवीजन पॉइंटर्स
- पहला सर्वेक्षण 1871 में ए.सी.एल. कार्लाइल ने शुरू किया; सबसे पुरानी ताम्र बस्ती गणेश्वर (सीकर) है और हड़प्पाई नगर कालीबंगा (हनुमानगढ़)।
- तीन काल — प्राक् इतिहास (लगभग 20 लाख ई.पू. – 3000 ई.पू.), आद्य इतिहास (हड़प्पा – लगभग 600 ई.पू.) और ऐतिहासिक काल (600 ई.पू. से आज तक); पहचान लिखावट से: नहीं, अस्पष्ट, पठनीय।
- धातुओं का क्रम ताँबा ➜ काँसा ➜ लोहा है; ताँबा सबसे पहले आया, लोहा सबसे बाद में।
- 1870 में सी.ए. हैकेट ने जयपुर व इन्द्रगढ़ (बूँदी) से हस्त-कुठार खोजे; भाब्रू लेख 1840 में कैप्टन बर्ट को मिला।
- पाषाण युग के तीन चरण — पुरापाषाण (20 लाख ई.पू. – 10,000 ई.पू.), मध्यपाषाण (लगभग 10,000 – 6,000 ई.पू., माइक्रोलिथ) और नवपाषाण (लगभग 6,000 ई.पू. के बाद, खेती व गाँव)।
- बागोर (भीलवाड़ा) कोठारी नदी पर है; टीला महासतियाँ; उत्खनन 1967–70 में वी.एन. मिश्र व एल.एस. लेस्निक ने किया।
- तिलवाड़ा (बालोतरा) लूणी के किनारे है और इसका उत्खनन 1966–67 में हुआ।
- ऑरेल स्टीन ने 1942 में लुप्त सरस्वती नदी के किनारे के स्थलों का सर्वे किया।
- विराटनगर (बैराठ) में 250 से अधिक गुफाएँ व शैलाश्रय हैं; गरदड़ा (बूँदी) में छाजा नदी के किनारे पहली बर्ड-राइडर रॉक पेंटिंग मिली।
अगले भाग में पाषाण के बाद का धातु-युग — ताँबे की बस्तियाँ गणेश्वर, आहड़-बनास संस्कृति और जयपुर क्षेत्र, फिर घग्घर किनारे का कालीबंगा।
पिछला भाग: राजस्थान के इतिहास के स्रोत: सिक्के (मुद्राएँ) एवं पुरालेख सामग्री
अगला भाग: प्राचीन सभ्यताएँ व पुरास्थल: ताम्रयुगीन सभ्यताएँ एवं कांस्य युग — कालीबंगा
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