मारवाड़ और मुग़लों का रिश्ता कभी सेवा और सम्मान का रहा तो कभी खुली लड़ाई का, और इसी उतार-चढ़ाव में अमरसिंह, जसवंत सिंह, दुर्गादास और गोरा धाय जैसे नाम बार-बार उभरते हैं। इस भाग में सूरसिंह और गजसिंह, अमरसिंह राठौड़, जसवंत सिंह प्रथम, दुर्गादास व गोरा धाय और अजीतसिंह (1707–24) का काल क्रम से दिया गया है। जहाँ ग्रन्थों में ब्योरे अलग-अलग मिलते हैं, वहाँ वह अन्तर भी साथ में लिखा है।
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1. सूरसिंह और गजसिंह
| सूरसिंह (1595–1619) | गजसिंह (1619–38) | |
|---|---|---|
| राज्याभिषेक | लाहौर में, अकबर द्वारा | 8 दिसम्बर 1619, बुरहानपुर में, जहाँगीर द्वारा |
| उपाधि | सवाई राजा | राजा (साथ में झण्डा); दलथम्मन |
| मनसब | अकबर: 2,000 ज़ात + 2,000 सवार; जहाँगीर: 5,000 ज़ात + 3,000 सवार | जहाँगीर: 3,000 ज़ात + 2,000 सवार (आरम्भ में) |
… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
- सूरसिंह अकबर और जहाँगीर — दो मुग़ल सम्राटों का समकालीन था।
- जहाँगीर ने गजसिंह की जागीर में पोकरण, सातलमेर, तेरवाड़ा, सिवाणा, सोजत, जैतारण और जोधपुर के परगने रखे।
- पराक्रम देखकर जहाँगीर ने उसे “दलथम्मन” (सेना को थामने वाला) कहा और उसके घोड़े शाही दाग की बाध्यता से मुक्त किए।
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
ट्रिक: उपाधि जोड़ी: सूरसिंह = सवाई राजा; गजसिंह = दलथम्मन।
2. अमरसिंह राठौड़
अमरसिंह की कथा
- जन्म 1613
- उत्तराधिकार से वंचित
- 1633 शाहजहाँ की सेवा में
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
- अमरसिंह तेजस्वी और पराक्रमी था। 1633 में नाराज़ होकर वह शाहजहाँ के पास चला गया; बहादुरी से प्रसन्न शाहजहाँ ने 1635 में उसे नागौर का परगना और “राव” की उपाधि दी।
- उसके घोड़े का नाम बादल था।
- जुलाई 1644 में शाही दरबार के बीच सलावत खाँ ने अमरसिंह को “गँवार” कह दिया; अमरसिंह ने वहीं उसे मार गिराया और स्वयं भी लड़ते-लड़ते मारे गए।
ट्रिक: अमरसिंह = “कटार का धणी”; घोड़ा बादल; जागीर नागौर।
3. जसवंत सिंह प्रथम (1638–78)
- जन्म ➜ 26 दिसम्बर 1626, बुरहानपुर
- राज्याभिषेक ➜ आगरा; उम्र 11–12 वर्ष
- मंत्री (आरम्भ में) ➜ आसोप के राजसिंह कूँपावत
- शाहजहाँ ने उसे राजा का ख़िताब और 4,000 ज़ात-सवार का मनसब दिया। 1645 में आगरा का प्रबन्ध सौंपा और 1648 में कंधार अभियान पर भेजा; वीरता दिखाने पर मनसब बढ़कर 6,000 ज़ात + 6,000 सवार हो गया।
- 1657–58 में शाहजहाँ बीमार पड़े; दारा, सूजा, मुराद, औरंगज़ेब में गद्दी की होड़ लगी। शाहजहाँ दारा को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे; औरंगज़ेब स्वयं बादशाह बनना चाहता था।
| युद्ध | वर्ष / स्थान | क्या हुआ |
|---|---|---|
| धरमत | 15 अप्रैल 1658, मध्यप्रदेश | शाही सेना में जसवंत सिंह, सुजानसिंह (शाहपुरा), मुकुन्दसिंह हाड़ा (कोटा), कासिम खाँ। मुकुन्दसिंह व सुजानसिंह मारे गए; जसवंत सिंह बुरी तरह घायल हुए और आसकरण राठौड़ व गोवर्धन उन्हें निकालकर जोधपुर लाए |
| सामूगढ़ | 29 मई 1658 | दारा की हार, औरंगज़ेब की निर्णायक जीत; जुलाई 1658 में औरंगज़ेब बादशाह बना — जसवंत सिंह दिल्ली पहुँचे; पहले नाराज़गी, फिर मनसब बहाल |
| खजुवा (इलाहाबाद के पास) | 5 जनवरी (1659) | भरोसा टूटने पर जसवंत सिंह शाही शिविर को लूटते हुए जोधपुर लौट गए; बाद में मिर्ज़ा राजा जयसिंह के बीच-बचाव से कड़वाहट कम हुई |
- 1659 में गुजरात के सूबेदार बनाए गए; 1662 में शाइस्ता खाँ की सहायता के लिए दक्षिण में शिवाजी के दमन को भेजे गए, पर बड़ी सफलता नहीं मिली।
- 1673 में औरंगज़ेब ने काबुल भेजा, फिर जमरूद (अफ़ग़ानिस्तान) में रहने को कहा; वहीं 28 नवम्बर 1678 को निधन हुआ। उस समय मनसब 7,000 था।
- मृत्यु पर औरंगज़ेब के मुँह से निकला — “आज कुफ़्र का दरवाज़ा टूट गया।”
महारानी जसवन्तदे और परिवार
- वीर विनोद (श्यामलदास) में प्रसंग है कि हारकर घायल लौटे पति के लिए रानी जसवन्तदे (करमेती), बूँदी के शत्रुशाल हाड़ा की बेटी, ने दुर्ग के फाटक बन्द करा दिए।
- रूपा धाय जसवंत सिंह की धाय थी।
- निधन के समय कोई पुत्र नहीं था; दोनों रानियाँ जादम और नरूकी गर्भवती थीं — जादम रानी से अजीतसिंह और नरूकी रानी से दलथंमन जन्मे।
दरबारी साहित्यकार
- सूरत मिश्र, दलपत मिश्र, नरहरि दास, बनारसी दास और नवीन कवि।
- नरहरि दास: अवतार चरित्र, रामचरित्र कथा, नरसिंह अवतार कथा; दलपत मिश्र: जसवंत उद्योग।
- मुहणौत नैणसी उसका मंत्री और दरबारी साहित्यकार था।
4. दुर्गादास और गोरा धाय
दुर्गादास राठौड़
- जन्म ➜ 13 अगस्त 1638, सालवा गाँव
- पिता ➜ आसकरण, दुनेरा के जागीरदार
- संघर्ष ➜ 30 वर्ष मुग़लों से
- तीन दशक (30 वर्ष) मुग़लों से टक्कर लेकर दुर्गादास ने अजीतसिंह को गद्दी दिलाई, पर राजा बनते ही अजीतसिंह ने उन्हें राज्य से निष्कासित कर दिया। वे परिवार सहित महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय (मेवाड़) की शरण में गए और 1717 में उज्जैन चले गए।
- कर्नल टॉड ने उसे “राठौड़ों का यूलीसेस” कहा।
अजीतसिंह को दिल्ली से निकालना
- औरंगज़ेब ने मनसब देने के बहाने बालक अजीत को राजपरिवार सहित दिल्ली बुलाया और रूपसिंह राठौड़ की हवेली में नज़रबन्द करवा दिया। राठौड़ सरदार दिल्ली पहुँचकर उसे जोधपुर भेजने का दबाव डालने लगे।
- बच निकलने की कथा के ब्योरे ग्रन्थों में भिन्न हैं — जोधपुर की ख्यात, सूरजप्रकाश, अभयविलास, अजीतविलास में राजकुमार को गुप्त रूप से निकालने का वर्णन है; वीर विनोद व फ़ारसी ग्रन्थ (फुतुहात-ए-आलमगिरी, मआसिरे आलमगिरी) इसे दुर्गादास का काम बताते हैं; रेऊ लिखते हैं कि दुर्गादास शिशु को पीठ पर बाँधकर लड़ते हुए निकाल लाए।
- वंश भास्कर के अनुसार दुर्गादास ने मुकुन्ददास खींची को सपेरे/कालबेलिया के वेश में भेजा; पहले से मेहतरानी के वेश में मौजूद गोरा धाय ने अपने पुत्र को अजीत की जगह सुला दिया और अजीत को मुकुन्ददास को सौंप दिया।
गोरा टाक (गोरा धाय), मण्डोर के मनोहर गोपी गहलोत की पत्नी, ने 1679 में अपने ही बेटे की बलि देकर अजीतसिंह को औरंगज़ेब की पकड़ से बाहर निकाला। इसीलिए उन्हें “मारवाड़ की पन्ना धाय” कहा जाता है।
अजीत सुरक्षित कैसे रहे
- दिल्ली से रवाना
- कुछ समय बुलन्दे में
- सिरोही का कालिन्दी: पुरोहित जयदेव की पत्नी ने देखभाल की
शहज़ादा अकबर और औरंगज़ेब
- राजसिंह, दुर्गादास और अजीतसिंह ➜ तीनों औरंगज़ेब के प्रखर विरोधी बन चुके थे। दमन के लिए बादशाह ने बेटे शहज़ादे अकबर को भेजा, पर राजसिंह-दुर्गादास ने गद्दी का लोभ दिखाकर उसे अपने पाले में कर लिया; ख़ुद को “भारत का सम्राट” घोषित करने की यह घटना 1 जनवरी 1681 को नाडोल (पाली) में हुई।
- औरंगज़ेब का ध्यान बँटाने के लिए दुर्गादास अकबर को लेकर मारवाड़ गया, फिर शिवाजी के पुत्र शम्भाजी की रक्षा में दक्षिण भेजा; औरंगज़ेब वहाँ भी पहुँचा तो अकबर पारस (ईरान) चला गया।
- जाने से पहले अकबर ने पुत्र बुलन्द अख़्तर और पुत्री सफ़ीयतुन्निसा दुर्गादास को सौंपे। दुर्गादास ने उन्हें जगन्नाथ रामचन्दोत की देखरेख में रखवाया, जहाँ उन्हें इस्लाम की तालीम मिली।
याद रखें: दुर्गादास = यूलीसेस (टॉड), अणबिन्दिया मोती, मारवाड़ का उद्धारक; गोरा धाय = मारवाड़ की पन्ना धाय।
5. अजीतसिंह (1707–24)
- औरंगज़ेब ने जोधपुर को खालसा कर दिया और 36 लाख रुपये के एवज़ में उसे इन्द्रसिंह (अमरसिंह राठौड़ के पौत्र) को सौंप दिया।
- फरवरी 1707 में औरंगज़ेब चल बसा; इसके तुरन्त बाद अजीतसिंह ने जोधपुर के नायब फ़ौजदार जफ़रकुली को हटाकर जोधपुर पर क़ब्ज़ा किया और 12 मार्च 1707 को पुरखों की राजधानी में दाख़िल हुए।
- औरंगज़ेब के बेटों की गद्दी-लड़ाई से मारवाड़ अलग रहा। जीतकर बादशाह बने बहादुरशाह ने अजीतसिंह का मारवाड़ पर अधिकार स्वीकार नहीं किया।
- देबारी समझौता ➜ तीन राजाओं का गठजोड़: अजीतसिंह (जोधपुर), सवाई जयसिंह (जयपुर), महाराणा अमरसिंह द्वितीय (मेवाड़)। इसी अवसर पर अजीतसिंह ने बेटी सूरज कुँवरी जयसिंह को ब्याही।
- सांभर (अक्टूबर 1708) ➜ अजीतसिंह और जयसिंह की मिली-जुली फ़ौज ने शाही मुग़ल सेना को शिकस्त दी; नतीजतन आमेर जयसिंह को और जोधपुर अजीतसिंह को मिल गया।
फर्रूखसियर से संधि
- फर्रूखसियर के गद्दी पर आते ही अजीतसिंह ने मारवाड़ में तैनात शाही कर्मचारियों को खदेड़ा, उनकी चौकियाँ उजाड़ीं और मस्जिदों की अज़ान रुकवा दी। जवाब में बादशाह ने हुसैन अली खाँ की कमान में फ़ौज भेजी।
- अन्त में हुसैन अली खाँ की मध्यस्थता से संधि हुई। अजीतसिंह ने पुत्री इन्द्र कुँवरी का विवाह 1715 में फर्रूखसियर से किया — यह मुग़लों और राजपूतों के बीच अन्तिम वैवाहिक सम्बन्ध था।
- ज्येष्ठ पुत्र अभयसिंह दिल्ली दरबार में भेजे गए, और फर्रूखसियर ने अजीतसिंह को “राज राजेश्वर” का ख़िताब दिया।
मृत्यु और ग्रन्थ
- ज़नाने में सो रहे अजीतसिंह की 23 जून 1724 को हत्या हुई — अभयसिंह के उकसाने पर छोटे भाई बख्तसिंह ने वार किया; इसलिए बख्तसिंह “मारवाड़ का दूसरा पितृहन्ता” है।
- गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने अजीतसिंह को “कान का कच्चा” कहा।
- ग्रन्थ: जगजीवन भट्ट — अजीतोदय (32 सर्गों का महाकाव्य) और मरु-भाषा में अजीत चरित्र; पण्डित बालकृष्ण शर्मा — अजीत चरित्र (संस्कृत); पण्डित श्यामराम — ब्रह्माण्ड वर्णन।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1678–79 | जन्म व रक्षा | जादम रानी से जन्म; 1679 में गोरा धाय व दुर्गादास ने औरंगज़ेब से बचाया |
| 1 जनवरी 1681 | नाडोल | शहज़ादा अकबर ने स्वयं को सम्राट घोषित किया |
| 1695–98 | अकबर की सन्तानें | पुत्री को 1695–96 में, पुत्र को 1698 में औरंगज़ेब को सौंपा गया |
| 12 मार्च 1707 | जोधपुर पर अधिकार | औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद |
रिवीजन पॉइंटर्स
- सूरसिंह को «सवाई राजा» कहा गया, जबकि गजसिंह को जहाँगीर ने «दलथम्मन» (सेना को थामने वाला) कहा।
- अमरसिंह राठौड़ का जन्म 1613 में हुआ; 1635 में शाहजहाँ ने नागौर और «राव» की उपाधि दी; घोड़े का नाम बादल था; जुलाई 1644 में दरबार में सलावत खाँ को मार गिराया।
- जसवंत सिंह प्रथम का जन्म 26 दिसम्बर 1626 को बुरहानपुर में हुआ और 28 नवम्बर 1678 को जमरूद में निधन; तब उनका मनसब 7,000 था।
- उत्तराधिकार-युद्ध का क्रम — धरमत (15 अप्रैल 1658) ➜ सामूगढ़ (29 मई 1658) ➜ खजुवा (5 जनवरी 1659)।
- दुर्गादास का जन्म 13 अगस्त 1638 को सालवा में हुआ; 30 वर्ष मुग़लों से टक्कर लेकर उन्होंने अजीतसिंह को गद्दी दिलाई, और टॉड ने उन्हें «राठौड़ों का यूलीसेस» कहा।
- गोरा धाय (गोरा टाक) ने 1679 में अपने बेटे की बलि देकर अजीतसिंह को बचाया, इसीलिए वे «मारवाड़ की पन्ना धाय» कहलाती हैं।
- 1 जनवरी 1681 को नाडोल (पाली) में शहज़ादे अकबर ने स्वयं को भारत का सम्राट घोषित किया।
- अजीतसिंह ने 12 मार्च 1707 को जोधपुर पर क़ब्ज़ा किया, अक्टूबर 1708 में सांभर में शाही सेना को हराया और 1715 में बेटी इन्द्र कुँवरी का विवाह फर्रूखसियर से किया।
- 23 जून 1724 को अजीतसिंह की हत्या हुई; वार करने वाले बख्तसिंह «मारवाड़ के दूसरे पितृहन्ता» कहलाए।
अगले भाग में अभयसिंह से हनुवंत सिंह तक — मराठों का संघर्ष, अंग्रेज़ों से संधि, सुधार और वृहद् राजस्थान में विलय — तथा उपाधियों, ग्रन्थों और महिलाओं की सारणियाँ।
पिछला भाग: मारवाड़ का राठौड़ राजवंश: रणमल्ल से गांगा (भाग 2) एवं राव मालदेव — शौर्य युग
अगला भाग: मारवाड़ का राठौड़ राजवंश: अभयसिंह से हनुवंत सिंह एवं उपाधियाँ, उपनाम, ग्रन्थ
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