शिलालेख रटते समय सबसे ज़्यादा गड़बड़ तब होती है जब वर्ष, स्थान और रचयिता आपस में उलझ जाएँ। इसलिए इस भाग को वंश और काल के हिसाब से बाँटकर पढ़ें। यहाँ परमार, चौलुक्य व चौहान लेख, मेवाड़ के लेख (13वीं सदी से मोकल, कुम्भा और रायमल तक), 16वीं–18वीं सदी के लेख और फ़ारसी लेख आए हैं। अंत में ताम्र-पत्रों की शुरुआत है, जो 679 से 1206 तक के हैं।
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1. परमार, चौलुक्य व चौहान लेख
| लेख | वर्ष (ई.) | स्थान | शासक / वंश | ख़ास बात |
|---|---|---|---|---|
| पाणाहेड़ा | 1059 | मंडलीश्वर शिव मंदिर, पाणाहेड़ा (बाँसवाड़ा) | मालवा व बागड़ के परमार | बागड़ वंशावली धनिक से मंडलिक तक |
| अर्थुना (शिव मंदिर) | 1079 | मंडलेश्वर शिवालय, अर्थुना (बाँसवाड़ा) | वागड़ के परमार | 87 श्लोक; चामुण्डराज ने पिता मंडलिक के लिए मंदिर बनवाया |
| अर्थुना (जैन मंदिर) | 1109 | अर्थुना (बाँसवाड़ा) | परमार — मंडलिक, चामुण्डराज, विजयराज | वागड़ के परमारों का वर्णन |
| जालौर | 1118 | जालौर दुर्ग की उत्तरी दीवार | जालौर के परमार — वाक्पतिराज | आबू के धरणीवराह से सम्बन्ध |
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बागड़-आबू-जालौर के परमार
- पाणाहेड़ा (1059) ➜ मंडलीश्वर शिव मंदिर की एक ताक पर खुदा; मालवा के परमारों की वंशावली व कुछ उपलब्धियाँ इसमें हैं, साथ ही बागड़ के परमारों की सूची धनिक से मंडलिक तक।
- अर्थुना शिव मंदिर प्रशस्ति (1079) ➜ 87 श्लोकों में बागड़ के परमार राजाओं का अच्छा वर्णन; मंडलेश्वर शिवालय परमार मंडलिक के पुत्र चामुण्डराज ने अपने पिता के लिए बनवाया।
- अर्थुना जैन मंदिर प्रशस्ति (1109) ➜ मंडलिक, चामुण्डराज और उसके पुत्र विजयराज का वर्णन।
- जालौर लेख (1118) ➜ सफ़ेद पत्थर पर; जालौर दुर्ग की उत्तरी दीवार में लगा था, अब जोधपुर संग्रहालय में है। इससे जालौर शाखा के परमारों का पता चलता है; इस शाखा का प्रवर्तक वाक्पतिराज था, जिसका सम्बन्ध आबू के धरणीवराह से जोड़ा गया है।
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कुमारपाल, हरिकेली और सुंधा
- कुमारपाल लेख (1150) ➜ चित्तौड़ किले के समिधेश्वर मंदिर में; चालुक्य वंश की प्रशंसा, मूलराज व सिद्धराज का वर्णन; कुमारपाल के प्रसंग में शाकम्भरी-विजय का उल्लेख।
- हरिकेली नाटक (1153) ➜ विग्रहराज चतुर्थ द्वारा रचा नाटक चार पाषाण-पट्टिकाओं पर खुदवाया गया। अंत में लिखा है कि चौहान सूर्यवंशी हैं। नाटक के कुछ अंश अढ़ाई दिन के झोंपड़े की दीवारों पर हैं और कुछ ब्रिटेन में राममोहन राय की समाधि पर लगे हैं। झोंपड़े वाला अंश अजमेर संग्रहालय में है।
- सुंधा पर्वत लेख (1262) ➜ दो शिला-खण्डों पर; जैन साधु जयमंगलाचार्य ने रचा; भाषा संस्कृत, लिपि देवनागरी। इसमें चाचिगदेव चौहान के पूर्वजों और पड़ोसी शासकों की नामावली है।
बिजोलिया का लेख (5 फ़रवरी 1170)
- पार्श्वनाथ मंदिर के उत्तर की ओर एक चट्टान पर खुदा; यह मूलतः दिगम्बर पंथ का लेख है, जिसे दिगम्बर जैन श्रावक लोलाक ने मंदिर व कुण्ड-निर्माण की स्मृति में लगवाया।
- सोमेश्वर (चौहान) के काल का; गुणभद्र ने रचा। सांभर-अजमेर के चौहानों की सूची और उपलब्धियाँ; चौहानों को वत्सगोत्र ब्राह्मण बताया गया है।
- चौहान-वंश के आदि पुरुष वासुदेव चाहमान ने लगभग 551 ई. में शाकम्भरी में राज्य बसाया और सांभर झील बनवाई। राज्य का मुख्य भाग सपादलक्ष (सांभर) था और राजधानी अहिछत्रपुर (नागौर)।
ट्रिक: चौहान लेख: हर्षनाथ 973 → हरिकेली 1153 → बिजोलिया 1170 → सुंधा 1262; परमार लेख: पाणाहेड़ा → अर्थुना (दो) → जालौर → किराडू → लूणवसही-नेमिनाथ।
याद रखें: बिजोलिया का मूल नाम विंध्यवल्ली है; नाडोल का नड्डूल, जालौर का जाबालिपुर।
2. मेवाड़ — 13वीं सदी
| लेख | वर्ष (ई.) | स्थान | शासक / वंश | ख़ास बात |
|---|---|---|---|---|
| गम्भीरी नदी के पुल का लेख | 1267 | गम्भीरी पुल, चित्तौड़ | — | तुर्की हमले में टूटे मंदिरों के अवशेष के साथ ग्यास खाँ ने पुल में लगवाया |
| चीरवा | 1273 | चीरवा गाँव (उदयपुर) | गुहिल — पद्मसिंह, जैत्रसिंह, तेजसिंह, समरसिंह | 51 श्लोक; रचयिता रत्नप्रभसूरि |
| रसिया की छतरी | 1274 | चित्तौड़ दुर्ग | गुहिल — बापा से नरवर्मा तक | 61 श्लोक |
… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
- गम्भीरी पुल लेख (1267) ➜ पुल बनाते समय चित्तौड़ के आसपास के मकानों व मंदिरों के जो अवशेष तुर्की आक्रमण में बिखर गए थे, उनके साथ यह लेख भी पुल में जड़ दिया गया।
- चीरवा (1273) ➜ 51 श्लोक, वागेश्वर-वागेश्वरी की स्तुति से आरम्भ। बापा रावल के वंशज पद्मसिंह, जैत्रसिंह, तेजसिंह, समरसिंह की उपलब्धियाँ। जैत्रसिंह इतना बलवान था कि मालवा, गुजरात, मारवाड़, जांगल देश और सुल्तान उसका मान नहीं तोड़ सके। रचयिता रत्नप्रभसूरि, भुवनसिंह सूरि के शिष्य।
- रसिया की छतरी (1274) ➜ 61 श्लोक; इसका एक शिला-खण्ड किसी हमले में टूट गया। इसमें 13वीं सदी के मेवाड़ की प्राकृतिक स्थिति, उपज, वृक्ष और पक्षियों की जानकारी है; देलवाड़ा-नागदा का वर्णन नगर-योजना समझाता है।
- श्लोक 10 से बापा की कथा आरम्भ होती है — हारीत ऋषि की कृपा से सुवर्ण-कटक व राज्य मिलना। आगे प्रशस्तिकार से भूल हुई: उसने गुहिल को बापा का पुत्र लिख दिया।
ट्रिक: तीनों प्रशस्तियाँ (रसिया की छतरी, अचलेश्वर, चीरवा) बापा-हारीत की कथा बताती हैं; मेदपाट नाम की व्याख्या अचलेश्वर लेख में है।
3. मेवाड़ — मोकल से रायमल
| लेख | वर्ष (ई.) | स्थान | शासक / वंश | ख़ास बात |
|---|---|---|---|---|
| समाधीश्वर | 1428 | समाधीश्वर मंदिर, चित्तौड़ दुर्ग | गुहिल — मोकल का काल | 53 पंक्ति, 75 श्लोक; हम्मीर, क्षेत्रसिंह का वर्णन |
| श्रृंगी ऋषि | 1428 | श्रृंगी ऋषि, एकलिंगजी से 6 मील (उदयपुर) | गुहिल — मोकल | फिरोज़ खाँ (नागौर) व अहमद (गुजरात) से दो युद्ध |
| पदराड़ा | 1433 | पदराड़ा (उदयपुर) | कुम्भा | वि.सं. 1490; कुम्भाकालीन लेखों में सबसे पहला |
| रणकपुर प्रशस्ति | 1439 | चौमुखा मंदिर, रणकपुर (पाली) | कुम्भा | धरणा श्रेष्ठि वंश व शिल्पी का परिचय |
मोकल के काल के दो लेख
- समाधीश्वर (1428) ➜ संगमूसा पत्थर की शिला; 53 पंक्तियाँ और 75 श्लोक। हम्मीर की तुलना अच्युत, कामदेव, ब्रह्मा, शंकर और कर्ण से की गई है। क्षेत्रसिंह के समय की शांति का वर्णन है, जो अलाउद्दीन के आक्रमण से भंग हुई थी।
- श्रृंगी ऋषि (1428) ➜ आरम्भ विद्या-देवी की प्रार्थना से; आगे मोकल तक की पीढ़ियों — हम्मीर, क्षेत्रसिंह, लक्षसिंह, मोकल — के कार्य। मोकल ने फिरोज़ खाँ (नागौर) और अहमद (गुजरात) से दो युद्ध लड़कर उन्हें हराया तथा एकलिंग मंदिर को परकोटे से घिरवाया।
कुम्भा के लेख
- पदराड़ा (1433) ➜ आठ पंक्तियों का संस्कृत गद्य लेख; पदराड़ा का नाम “पाटकेपद्र” लिखा है। महत्त्व यह कि विद्रोहियों को कुम्भा ने दबाया, रणमल्ल ने नहीं — जैसा जोधपुर की ख्यातों में लिखा है।
- रणकपुर प्रशस्ति (1439) ➜ चौमुखा मंदिर के बाएँ स्तम्भ पर; भाषा संस्कृत, लिपि नागरी। इसमें बापा से कुम्भा तक वंशावली, कुम्भा की विजयें व विरुद, धरणा श्रेष्ठि का वंश और शिल्पी का परिचय है।
- इसमें भी गुहिल को बापा का पुत्र लिखा गया है। पर यह स्पष्ट होता है कि बापा और कालभोज अलग-अलग हैं, जिससे ओझा के “दोनों एक हैं” वाले सुझाव पर सवाल उठता है।
- कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति (1460) ➜ चित्तौड़ के कीर्तिस्तम्भ की सबसे ऊपरी मंज़िल पर कई शिलाओं पर थी; अब दो ही बची हैं। इसमें बापा और हम्मीर का वर्णन है, और कुम्भा द्वारा मंडोर से हनुमान मूर्ति लाकर वि.सं. 1515 में उसे किले के प्रमुख प्रवेश-द्वार पर लगाना।
कुम्भलगढ़ का पाँच शिलाओं वाला लेख
- पाँच में से पहली, तीसरी और चौथी शिला बची हैं; पहले कुम्भलगढ़ के मामादेव मंदिर में लगी थीं, अब उदयपुर संग्रहालय में।
- पहली शिला ➜ एकलिंगजी मंदिर और कुटिला नदी का वर्णन; चित्तौड़ के मंदिर, मेवाड़ के नगर, नदियाँ, पहाड़, झीलें, बाग और लोगों का चित्रण — 13वीं सदी का जनजीवन।
- दूसरी शिला ➜ केवल 6 पंक्तियाँ बची; बापा रावल को “विप्रवंशीय ब्राह्मण” कहा गया।
एकलिंगजी की दक्षिण-द्वार प्रशस्ति (1488)
- मंदिर के दक्षिणी प्रवेश की ताक में लगी; रायमल द्वारा मरम्मत (जीर्णोद्धार) के अवसर पर खुदवाई गई।
- हम्मीर के बाद से रायमल तक की अनेक घटनाएँ दर्ज; बापा का संन्यास; तथा समय-समय पर मंदिर को दिए अनुदान — हम्मीर, क्षेत्रसिंह, लक्ष्मणसिंह, मोकल और कुम्भा द्वारा।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1428 | समाधीश्वर व श्रृंगी ऋषि | मोकल का काल। |
| 1433 | पदराड़ा | कुम्भा का पहला लेख। |
| 1439 | रणकपुर | धरणा श्रेष्ठि का चौमुखा मंदिर। |
4. 16वीं–18वीं सदी के लेख
| लेख | वर्ष (ई.) | स्थान | शासक / वंश | ख़ास बात |
|---|---|---|---|---|
| घोसुण्डी की बावड़ी | 1504 | घोसुण्डी (चित्तौड़गढ़) | रायमल — रानी श्रृंगारदेवी | 25 श्लोक; रानी राव जोधा की पुत्री |
| नौलखा बावड़ी प्रशस्ति | 1587 | डूँगरपुर | महारावल आसकरण — रानी प्रेमलदेवी | वागड़ के चौहानों की वंशावली (लाखण से) |
| बीकानेर / रायसिंह प्रशस्ति | 1594 | बीकानेर किले का सूरजपोल | रायसिंह | रचयिता जइता; किले का निर्माण-काल |
| आमेर का शिलालेख | 1612 | आमेर | कछवाहा — मानसिंह (जहाँगीर का काल) | संस्कृत, नागरी |
बावड़ी और किले के लेख
- घोसुण्डी बावड़ी लेख (1504) ➜ 25 श्लोक; महाराणा रायमल की रानी श्रृंगारदेवी (मारवाड़ी राव जोधा की बेटी) ने बावड़ी बनवाई। रायमल ने मालवा के सुल्तान को हराया — यह भी दर्ज है।
- नौलखा बावड़ी प्रशस्ति (1587) ➜ डूँगरपुर की बावड़ी महारावल आसकरण की रानी प्रेमलदेवी ने बनवाई। चौहान लाखण से 1587 तक की वागड़ के चौहानों की वंशावली मिलती है।
- बीकानेर / रायसिंह प्रशस्ति (1594) ➜ संस्कृत; किले के निर्माण का काम 30 जनवरी 1589 को शुरू हुआ और 17 जनवरी 1594 को पूरा, मंत्री कर्मचंद की निगरानी में। इसमें बीका से रायसिंह तक की उपलब्धियाँ हैं; 60वीं पंक्ति से रायसिंह के कार्य — साहित्य-प्रेमी, विद्वानों का आश्रयदाता, कवि।
जगन्नाथराय, राजप्रशस्ति और बेडवास
- जगन्नाथराय प्रशस्ति (1652) ➜ जगदीश मंदिर के सभामंडप की दोनों दीवारों पर काले पत्थर में खुदी। पूर्वार्द्ध में बापा से सांगा तक के पूर्वजों की उपलब्धियाँ; हल्दीघाटी का वर्णन यथार्थ के निकट। मंदिर अर्जुन की निगरानी और सूत्रधार भाणा व पुत्र मुकुन्द की अध्यक्षता में बना।
- इसके अनुसार जगतसिंह ने जगदीश मंदिर पर लाखों रुपये खर्च किए; साथ ही पिछोला में मोहन मंदिर और रूपसागर तालाब बनवाए। रचयिता कृष्णभट्ट।
- राजप्रशस्ति (1676) ➜ राजसमंद की नौचोकी पाल पर 25 श्याम शिलाएँ, प्रत्येक पर एक सर्ग; इसकी गिनती महाकाव्य में की जाती है। रचयिता रणछोड़ भट्ट (तैलंग ब्राह्मण), भाषा संस्कृत।
- इसमें बापा से जगतसिंह व राजसिंह तक की वंशावली है; राजसिंह का पहला ब्याह बारह वर्ष की आयु में हुआ; 1660 में औरंगज़ेब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ किशनगढ़ की राजकुमारी चारूमती से ब्याह; औरंगज़ेब से युद्ध और सन्धि।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1504 | घोसुण्डी बावड़ी | रायमल की रानी श्रृंगारदेवी। |
| 1587 | नौलखा बावड़ी | डूँगरपुर — प्रेमलदेवी। |
| 1594 | रायसिंह प्रशस्ति | बीकानेर किला पूरा। |
| 1612 | आमेर शिलालेख | मानसिंह तक की वंशावली। |
5. फ़ारसी भाषा के लेख
राजस्थान में फ़ारसी के लेख बड़ी संख्या में मिलते हैं। इन्हें मस्जिदों, दरगाहों, कब्रों, राजमहलों, सरायों और बावड़ियों पर पत्थर में खुदवाकर लगाया गया था।
ऊपर के स्थानों से ऐसे लेख ज़्यादा मिले हैं, क्योंकि वहाँ मुग़ल सत्ता का असर या शासन रहा।
| लेख | वर्ष (ई.) | ख़ास बात |
|---|---|---|
| अजमेर का लेख | 1200 | राजस्थान में फ़ारसी का सबसे प्राचीन अभिलेख |
| ईदगाह, जालौर का लेख | 1318 | जालौर की ईदगाह पर |
| शाहजहाँनी मस्जिद, अजमेर का लेख | 1637 | शाहजहाँ के काल की मस्जिद |
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1200 | अजमेर | पहला फ़ारसी लेख। |
| 1318 | जालौर की ईदगाह | सल्तनत काल। |
| 1637 | अजमेर की शाहजहाँनी मस्जिद | मुग़ल काल। |
6. ताम्र-पत्र (दान-पत्र)
दान-पत्रों को ताम्र-पत्र भी कहते हैं, क्योंकि ये ताँबे की चद्दरों पर लिखे जाते थे। ये इतिहास का भरोसेमंद स्रोत हैं।
- भाषा ➜ संस्कृत और स्थानीय भाषा। पूर्व-मध्यकाल के दान-पत्रों में संस्कृत चलती थी; उत्तर-मध्यकाल में स्थानीय भाषा आ गई।
- लिपि ➜ पहले कुटिल; स्थानीय भाषा हावी होती गई तो महाजनी लिपि अपनाई जाने लगी।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 679 | धुलेव | सबसे पुराना यहाँ गिना गया दान-पत्र। |
| 959 | मथनदेव | राजौरगढ़ (अलवर)। |
| 978 | ब्रोच गुर्जर | राजपूतों के कुषाण-मूल वाले मत का आधार। |
| 1180 | धारावर्ष | आबू के परमार। |
7. ताम्र-पत्र — 679 से 1206
| ताम्र-पत्र | वर्ष (ई.) | स्थान / शासक | विषय |
|---|---|---|---|
| धुलेव | 679 | ऋषभदेव (उदयपुर); किष्किन्धा (कल्याणपुर) के महाराज भेटी | भेटी ने “महाराज बप्पदति” के पुण्य के लिए उब्बरक गाँव ब्राह्मण भट्टिनाग को दिया |
| मथनदेव | 959 | राजौरगढ़ (अलवर) का शासक मथनदेव | संस्कृत; गाँव के प्रतिष्ठित लोगों के सामने एक देवालय के लिए भूमि-दान |
| ब्रोच गुर्जर | 978 | गुर्जर | सप्तसैंधव से गंगा-कावेरी तक अभियान का वर्णन; कनिंघम के अनुसार राजपूतों के पूर्वज यू-ए-ची (कुषाण) |
- धुलेव ➜ संस्कृत; एक ब्राह्मण के पास से मिला।
- ब्रोच गुर्जर ➜ कनिंघम का मत: कनिष्क के ज़माने में यू-ए-ची भारत आए और राजपूत उन्हीं के वंशज हैं; इस मत का आधार यही दान-पत्र बताया जाता है।
- धारावर्ष ➜ एक ब्राह्मण के पास हाथल गाँव में मिला।
याद रखें: हाथल (धारावर्ष) अब भी सिरोही में; राजौरगढ़ अलवर में; धुलेव यानी ऋषभदेव उदयपुर में।
रिवीजन पॉइंटर्स
- चौहान लेखों का क्रम — हर्षनाथ 973 ➜ हरिकेली 1153 ➜ बिजोलिया 1170 ➜ सुंधा 1262।
- बिजोलिया का लेख (1170) गुणभद्र ने रचा; इसमें चौहानों को वत्सगोत्र ब्राह्मण बताया गया है और वासुदेव चाहमान को आदि पुरुष, जिसने लगभग 551 ई. में शाकम्भरी में राज्य बसाया।
- हरिकेली नाटक विग्रहराज चतुर्थ का रचा हुआ है; इसे चार पाषाण-पट्टिकाओं पर खुदवाया गया और अंत में चौहानों को सूर्यवंशी कहा गया है।
- मेवाड़ की तीन प्रशस्तियाँ — रसिया की छतरी, अचलेश्वर और चीरवा — बापा-हारीत की कथा बताती हैं।
- कुम्भा के लेखों में सबसे पहला पदराड़ा (1433) है; रणकपुर प्रशस्ति (1439) में बापा से कुम्भा तक की वंशावली और धरणा श्रेष्ठि के वंश का वर्णन है।
- बीकानेर की रायसिंह प्रशस्ति (1594) के अनुसार किले का काम 30 जनवरी 1589 को शुरू हुआ और 17 जनवरी 1594 को पूरा; रचयिता जइता।
- राजप्रशस्ति (1676) राजसमंद की नौचोकी पाल पर 25 श्याम शिलाओं पर है, एक शिला पर एक सर्ग; रचयिता रणछोड़ भट्ट।
- फ़ारसी का सबसे प्राचीन अभिलेख अजमेर का (1200) है; आगे जालौर की ईदगाह (1318) और अजमेर की शाहजहाँनी मस्जिद (1637) के लेख आते हैं।
- ताम्र-पत्रों में धुलेव (679) सबसे पुराना गिना गया है; धुलेव यानी ऋषभदेव उदयपुर में, राजौरगढ़ अलवर में और हाथल (धारावर्ष) सिरोही में है।
अगले भाग में मेवाड़ के ताम्र-पत्र, आहड़-रैढ़ की खुदाई से रियासती टकसालों तक के सिक्के, तथा बीकानेर में सुरक्षित पुरालेख और बहियाँ।
पिछला भाग: राजस्थान के इतिहास के स्रोत: शिलालेख व प्रशस्तियाँ (भाग 1)
अगला भाग: राजस्थान के इतिहास के स्रोत: सिक्के (मुद्राएँ) एवं पुरालेख सामग्री
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