इस भाग में तीन अलग कहानियाँ साथ-साथ चलती हैं — वागड़ के गोविन्द गिरी, भोमट के तेजावत और जयपुर के मीणा — और इन्हें आपस में उलझा देना आम भूल है। इसलिए नेता, इलाक़ा, संगठन और घटना की जोड़ी पक्की कीजिए। नोट्स में सम्प सभा व मानगढ़ नरसंहार, एकी आन्दोलन व नीमड़ा काण्ड, मीणाओं के क़ानून और संघर्ष, तथा बिजौलिया का परिचय और पथिक का दौर क्रमवार दिए गए हैं।
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1. गोविन्द गिरी व तेजावत
| गोविन्द गिरी | मोतीलाल तेजावत | |
|---|---|---|
| आन्दोलन | भगत आन्दोलन (सम्प सभा) | एकी आन्दोलन (भोमट भील आन्दोलन) |
| क्षेत्र | वागड़ — डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, ईडर | भोमट — कोटड़ा, झाड़ोल, फलासिया, सिरोही |
| संगठन | सम्प सभा (1883) | एकी (1921) |
… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1883 | सम्प सभा | गोविन्द गिरी |
| 1903 | पहला अधिवेशन | मानगढ़ पहाड़ी |
| 1910 | ईडर समझौता | 24 फ़रवरी — 21 शर्तें |
| 1911 | भगत पंथ | बेड़सा |
… शेष 4 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
ट्रिक: उपाधियाँ — गोविन्द गिरी = मानगढ़ (प्रथम जलियाँवाला), तेजावत = नीमड़ा (दूसरा जलियाँवाला / गुजरात का जलियाँवाला)।
2. गोविन्द गिरी व सम्प सभा
- जन्म ➜ 1858 · बाँसिया (डूँगरपुर) · बंजारा परिवार
- सम्प सभा ➜ 1883 · सिरोही
- पहला अधिवेशन ➜ 1903 · मानगढ़ पहाड़ी (बाँसवाड़ा)
- भीलों में जनजागृति फैलाने का सबसे बड़ा श्रेय गोविन्द गिरी को जाता है — वे सामाजिक और राजनीतिक चेतना जगाने वाले नेता थे।
- सम्प सभा ➜ “सम्प” यानी आपसी एकता, भाईचारा और प्रेम; इसी भाव वाले संगठन का नाम। उसका पहला अधिवेशन 1903 में मानगढ़ पहाड़ी पर हुआ।
- भीलों ने जागीरदारों और राज्य कर्मचारियों को बेगार देना बन्द किया और शासन के अत्याचारों के ख़िलाफ़ संगठित होने लगे।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1908 | बेड़सा से निकाले गए | ईडर व सूंथ (गुजरात) को कर्मस्थली बनाया; उकरेली गाँव में हाली (खेत-मज़दूर) बनकर रहे |
| 24 फ़रवरी 1910 | ईडर के जागीरदार से समझौता | भीलों के हक़ों से जुड़ी कुल 21 शर्तें; दोनों प्रदेशों के भीलों को सामन्ती शोषण से टकराने की हिम्मत मिली — इसे गोविन्द गिरी के आन्दोलन की जीत माना जाता है |
| 1911 के आरम्भ में | बेड़सा लौटे | भगत पंथ की स्थापना; हर भील गाँव में धूनी और उसकी रक्षा को कोतवाल |
सम्प सभा की चेतना मालवा, मेवाड़, डूँगरपुर, ईडर, विजयनगर और गुजरात के भीलों तक पहुँची; इससे शासक घबराए — भीलों पर भगत पंथ छोड़ने का दबाव पड़ा और अंग्रेज़ों को इस संगठन के पीछे “भील राज्य” बनाने की मंशा दिखने लगी।
3. मानगढ़ नरसंहार
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| अक्टूबर 1913 | बुलावा | गोविन्द गिरी ने भीलों को मानगढ़ पर इकट्ठा होने का सन्देश दिया; भील रसद और हथियार लेकर जुटने लगे |
| 30 अक्टूबर 1913 | सिपाही की मौत | गोविन्द गुरु के मुख्य साथी पूंजा धीरजी और अन्य भीलों ने सिपाही गुल मोहम्मद को मार डाला |
| 10 नवम्बर 1913 | पहाड़ी का घेरा | मेजर हेमिल्टन की अगुवाई में मेवाड़ भील कोर, 104 वेलेजली रायफ़ल्स, सातवीं राजपूत रेजीमेंट और जाट रेजीमेंट |
- गोविन्द गिरी और पूंजा धीरजी गिरफ़्तार कर अहमदाबाद जेल भेजे गए; सम्प सभा को अवैध घोषित कर दिया गया।
- इसे भारत का प्रथम जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड कहा गया; मानगढ़ धाम को “राजस्थान का जलियाँवाला बाग” कहते हैं।
- विशेष अदालत ने गोविन्द गिरी को मौत की सज़ा सुनाई, जो अपील पर आजीवन कारावास में बदली; 1919 में रिहा किए गए। साथ में बाँसवाड़ा, डूँगरपुर, कुशलगढ़, सूँथ और ईडर में प्रवेश पर रोक लगी।
याद रखें: मानगढ़ पहाड़ी राजस्थान-गुजरात सीमा पर बाँसवाड़ा ज़िले में है। घेरने वाले दल याद रखें — भील कोर, 104 रायफ़ल्स, 7वीं राजपूत, जाट।
4. एकी आन्दोलन
- बिजौलिया की आँच भीलों तक पहुँची; लगान, लाग-बाग और बेगार पर उन्होंने भी आपत्ति जताई और मई 1917 में महाराणा को अर्ज़ी दी।
- भीलों का जीवन बेहतर करने में जुटे मोतीलाल तेजावत को उन्होंने अपना नेता माना। तेजावत पहले झाड़ोल ठिकाने के कामदार थे, पर आदिवासियों पर सरकार व ठिकाने की ज़्यादती देख नौकरी छोड़ दी।
- 1921 की वैशाख पूर्णिमा को मातृकुण्डिया (चित्तौड़गढ़) के मेले में दूर-दूर से आए किसानों से तेजावत मिले; एकजुटता के इस अभियान को एकी आन्दोलन कहा गया। प्रेरणा उन्हें गाँधीजी से मिली थी।
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
मेवाड़ की पुकार
तेजावत ने आदिवासियों की व्यथा का क्रमवार ब्यौरा देने वाला 21 सूत्री माँगपत्र “मेवाड़ की पुकार” महाराणा के सामने रखा (महाराणा ने उनमें से 18 माँगें मान लीं)।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| जुलाई 1921 | कर बन्दी | मादड़ीपट्टा व जवास क्षेत्र के भील कर चुकाने से मुकर गए |
| 19 अगस्त 1921 | तेजावत गिरफ़्तार | झाड़ोल ठाकुर ने भड़काने का आरोप लगाकर पकड़ा; हज़ारों भील झाड़ोल में जुट गए तो घबराकर छोड़ना पड़ा |
| दिसम्बर 1921 | फैलाव | ईडर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, दान्ता और सिरोही तक |
भील आन्दोलन की सुनकर गाँधीजी ने भरोसेमन्द सहयोगी मणिलाल कोठारी को हाल जानने भेजा।
5. नीमड़ा काण्ड
- विजयनगर (गुजरात) के नीमड़ा गाँव में 7 मार्च 1922 को आदिवासियों का बड़ा जमावड़ा था; मेजर सूटन की कमान में मेवाड़ भील कोर ने उस पर गोलियाँ बरसाईं — 1200 भील मारे गए और तेजावत के पाँव में गोली धँसी।
- इसे दूसरा जलियाँवाला बाग और गुजरात का जलियाँवाला बाग कहा जाता है।
- साथी तेजावत को उठाकर सुरक्षित ठिकाने पर ले गए और वे भूमिगत हो गए। इसके साथ खैरवाड़ा इलाक़े में भील आन्दोलन थम गया; कोटड़ा के भीलों-गरासियों को थोड़ी रियायतों से मना लिया गया।
ध्यान दें: कुछ लेखक इसी घटना को पाल (चितरिया) गाँव की घटना बताते हैं; परीक्षा में सामान्यतः नीमड़ा / 7 मार्च 1922 / 1200 भील ही चलता है।
6. सिरोही में एकी व तेजावत का अन्त
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| जनवरी 1922 | सिरोही में प्रवेश | उदयपुर के भीलों की तर्ज़ पर गरासियों में समाज-सुधार; अनेक सभाएँ — सिरोही में एकी आन्दोलन आरम्भ |
| 28 जनवरी 1922 | सभाओं पर रोक | सभा-सम्मेलनों पर सिरोही सरकार का प्रतिबन्ध |
| 3 व 12 फ़रवरी 1922 | रोक के बावजूद सभाएँ | संगाना (आबू रोड) व गोपेश्वर |
| 12 अप्रैल 1922 | सियावा गोलीबारी | सियावा गाँव (सिरोही) में मेवाड़ भील कोर व राज्य की सेना — 3 व्यक्ति मारे गए |
- गाँधीजी ने नवजीवन में तेजावत को कैद से छोड़ने की सिफ़ारिश की।
- भीलों का नारा ➜ “हाकिम और हुक्म नहीं” (न राजा, न उसका हुक्म)।
ट्रिक: एकी के पड़ाव — मातृकुण्डिया (1921) → नीमड़ा (7 मार्च 1922) → सियावा (12 अप्रैल 1922) → खेड़ब्रह्म (3 जून 1929) → रिहाई (1936)।
7. मीणा आन्दोलन
- नई अंग्रेज़ी शासन-व्यवस्था का मीणाओं ने विरोध किया, तो उन्हें आपराधिक जाति ठहराकर सख़्त क़ानूनों से जकड़ने की कोशिश की गई।
- आन्दोलन का मुख्य अखाड़ा जयपुर रियासत रहा।
8. आपराधिक जाति के क़ानून
- लूटमार और उपद्रवों का हवाला देकर भारत सरकार ने 1924 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट लागू किया।
- जयपुर रियासत ने 1930 में जरायम पेशा क़ानून बनाया और मीणों को अपराधी जाति ठहरा दिया।
- इसके तहत 12 साल से ऊपर हर सदस्य को रोज़ थाने में हाज़िरी देनी पड़ती थी; पुलिस ने प्रावधान कठोरता से लागू किए — मीणाओं में असन्तोष बढ़ा।
9. संघर्ष और मुक्ति
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1933 | मीणा क्षेत्रीय महासभा | गठन हुआ, पर रियासत ने संस्था भंग करवा दी |
| 7 अप्रैल 1944 | नीमकाथाना अधिवेशन | जैन मुनि मगन सागर की अध्यक्षता में मीणा जाति का बड़ा अधिवेशन; बंशीधर शर्मा की अध्यक्षता में मीणा सुधार समिति — मंत्री राजेन्द्र कुमार, संयुक्त मंत्री लक्ष्मीनारायण झरवाल |
| 1944 | राज्यव्यापी निर्णय | झरवाल के नेतृत्व में जरायम पेशा क़ानून के विरुद्ध आन्दोलन |
| 31 दिसम्बर 1945 | उदयपुर सम्मेलन | अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् में राजेन्द्र कुमार व झरवाल के प्रयास से क़ानून रद्द करने का प्रस्ताव स्वीकृत |
10. बिजौलिया, बेगूँ व बूँदी
| बिजौलिया | बेगूँ | बूँदी (बरड़) | |
|---|---|---|---|
| वर्ष | 1897–1941 | 1921–1925 | 1922–1923 |
| ज़िला (आज) | भीलवाड़ा | चित्तौड़गढ़ | बूँदी |
| लागतें | 84 | 53 | लगभग 25 |
11. बिजौलिया — परिचय व प्रथम चरण
- ठिकाना ➜ मेवाड़ का प्रथम श्रेणी का ठिकाना · जागीरदार “रावजी”
- संस्थापक ➜ अशोक परमार (जगनेर, उत्तर प्रदेश)
- मुख्य जाति ➜ धाकड़ किसान
- आज के भीलवाड़ा ज़िले का बिजौलिया आज़ादी से पहले मेवाड़ का प्रथम श्रेणी का ठिकाना था; ऊपरमाल जागीर का सदर मुक़ाम बिजौलिया ही था।
- राव गोविन्ददास के ज़माने तक किसान जागीरदार से लगभग सन्तुष्ट थे।
- राजस्थान का सबसे पहला किसान आन्दोलन यही गिना जाता है।
प्रथम चरण (1897–1915)
- 1894 में राव कृष्णसिंह जागीरदार बना; उसके समय 84 प्रकार की लाग-बाग चलती थीं और उसने ज़्यादा लगान उगाहने के आदेश दिए।
- नेतृत्व स्थानीय लोगों के हाथ में रहा।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1897 | गिरधारीपुरा की बैठक | किसान गंगाराम धाकड़ के पिता के मृत्युभोज (नुक्ता) पर इकट्ठा होकर जागीरदार के अत्याचार का उपाय सोचा |
| 1897 | महाराणा के पास शिकायत | नानजी व ठाकरी पटेल उदयपुर गए; महाराणा फतेहसिंह ने चेतावनी भर दी; कृष्णसिंह ने दोनों को ऊपरमाल से निकाल दिया |
| 1903 | चँवरी कर | ऊपरमाल की जनता पर 13 रुपये का नया कर (बेटी की शादी पर) |
| 1905 | अक्षय तृतीया | किसानों ने खेत जोतने से हाथ खींच लिया; घबराए राव ने चँवरी कर वापस लिया और लगान आधी उपज के बजाय 2/5 तय करने का ऐलान किया |
इस दौर के किसान नेता — साधु सीताराम दास, ब्रह्मदेव, फतेहकरण चारण।
12. बिजौलिया — पथिक का दौर
- साधु सीताराम दास के बुलावे पर 1916 में विजयसिंह पथिक ने कमान ली।
- पथिक ने विद्या प्रचारिणी सभा बनाई — उसके तहत पुस्तकालय, पाठशाला और अखाड़ा।
- उसी वर्ष ठिकाने ने प्रथम विश्वयुद्ध के चन्दे के नाम पर 10 रुपये प्रति हल वसूलना शुरू किया।
चन्दा और बेगार न देने पर ठिकाने ने किसानों को जेल में डालकर यातना दी, खड़ी फ़सलें नष्ट कीं; वर्मा और सीताराम दास गिरफ़्तार हुए और पथिक भूमिगत।
आन्दोलन को राष्ट्रीय मंच
- कानपुर के प्रताप में आन्दोलन की ख़बरें छपवाने का इन्तज़ाम पथिक ने उसके सम्पादक गणेश शंकर विद्यार्थी से किया।
- गाँधीजी ने सच जानने के लिए सचिव महादेव देसाई को पथिक के साथ बिजौलिया भेजा और महाराणा को पत्र लिखा।
- दिसम्बर 1919 के अमृतसर कांग्रेस में पथिक ने बिजौलिया का प्रस्ताव रखवाया; केलकर ने समर्थन किया।
जाँच आयोग और समझौता
| समय | आयोग / घटना | सदस्य | नतीजा |
|---|---|---|---|
| अप्रैल 1919 | बिन्दुलाल भट्टाचार्य जाँच आयोग (महाराणा फतेहसिंह) | बिन्दुलाल भट्टाचार्य, ठाकुर अमरसिंह, अफ़ज़ल अली | लाग-बाग घटाने, बेगार बन्द करने, कार्यकर्ता छोड़ने की सिफ़ारिश — राज्य ने कुछ नहीं किया |
| 1920 | राजपूताना मध्य भारत सभा का आयोग | अध्यक्ष भवानीदयाल | बाहरी जाँच पर महाराणा को आपत्ति |
| फ़रवरी 1921 | महाराणा का तीन-सदस्यीय आयोग | बेदला के ठाकुर राजसिंह, रमाकान्त मालवीय, तख्तसिंह मेहता | उदयपुर में सुनवाई; वर्मा के साथ 15 किसान; शिकायतें सही मानीं — सिफ़ारिशें अनसुनी |
रिवीजन पॉइंटर्स
- गोविन्द गिरी ने 1883 में सम्प सभा बनाई; उसका पहला अधिवेशन 1903 में मानगढ़ पहाड़ी पर हुआ।
- 24 फरवरी 1910 के ईडर समझौते में 21 शर्तें थीं; 1911 में बेड़सा में भगत पंथ की स्थापना हुई।
- मानगढ़ (नवम्बर 1913) को भारत का प्रथम जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड कहा गया।
- तेजावत का एकी आन्दोलन 1921 में मातृकुण्डिया के मेले से शुरू हुआ; उनके 21 सूत्री माँगपत्र का नाम «मेवाड़ की पुकार» था।
- नीमड़ा काण्ड 7 मार्च 1922 को हुआ — 1200 भील मारे गए; इसे दूसरा जलियाँवाला कहते हैं।
- एकी के पड़ाव — मातृकुण्डिया (1921) ➜ नीमड़ा (7 मार्च 1922) ➜ सियावा (12 अप्रैल 1922)।
- भारत सरकार ने 1924 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट लागू किया; जयपुर रियासत ने 1930 में जरायम पेशा क़ानून बनाया।
- मीणा आन्दोलन के पड़ाव — 1933 की क्षेत्रीय महासभा, 7 अप्रैल 1944 का नीमकाथाना अधिवेशन, 31 दिसम्बर 1945 का उदयपुर सम्मेलन।
- बिजौलिया आन्दोलन 1897–1941 चला; राव कृष्णसिंह के समय 84 प्रकार की लाग-बाग थीं, और 1916 में पथिक ने कमान सँभाली।
अगले भाग में मेवाड़ और बूँदी के किसान आन्दोलन — बिजौलिया का अन्तिम चरण, बेगूँ, बूँदी (बरड़) और बूँदी का गुर्जर आन्दोलन — साथ में अलवर, भरतपुर व मेवात के आन्दोलन।
पिछला भाग: जनजाति — शुरुआती विद्रोह
अगला भाग: जनजाति एवं किसान आन्दोलन: बिजौलिया, बेगूँ व बूँदी (भाग 2) एवं अलवर, भरतपुर व मेवात
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