मध्यकालीन प्रशासन व सामंती व्यवस्था: कर व लागें एवं सामंती व्यवस्था – Rajasthan History Chapter 34

कर व लागों के राज्यवार नाम, रेख और उत्तराधिकार शुल्क तथा मारवाड़, मेवाड़ आदि के सामंतों की श्रेणियाँ।

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In this chapter (13 sections)
  1. कर व लागें
  2. राज्यवार नामों की तुलना
  3. राज्य और सेना के कर
  4. जागीरदारों की लागें
  5. सामंती व्यवस्था
  6. उद्भव व स्वरूप
  7. रेख व उत्तराधिकार शुल्क
  8. मारवाड़ के सामंत
  9. मेवाड़ के सामंत
  10. बीकानेर के सामंत
  11. कोटा, जयपुर, जैसलमेर
  12. ग्रासिया, भोमिया, सिरोपाव
  13. रिवीजन पॉइंटर्स

सामंती व्यवस्था और करों के नाम रटने का विषय लगते हैं, पर इनके पीछे एक सीधा तर्क है: मुगलों की मनसबदारी की नकल पर राजपूत राजाओं ने श्रेणियाँ बनाईं, और उन्हीं से दरबार का सम्मान तथा देय रकम तय होने लगी। इस भाग में पहले कर और लागें राज्यवार नामों के साथ आती हैं, फिर सामंतों की उत्पत्ति, रेख, उत्तराधिकार शुल्क और हर रियासत की सामंत-श्रेणियाँ।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — मध्यकालीन प्रशासन व सामंती व्यवस्था, 7 चॉक-बोर्ड चित्र, 4 चार्ट, 23 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. कर व लागें

ज़मीन के लगान के साथ-साथ किसानों पर दर्जनों छोटे-बड़े कर लगते थे। कुछ राज्य वसूलता था, कुछ जागीरदार अपनी मर्ज़ी से। एक ही कर का नाम हर रियासत में अलग होता — यही परीक्षा में पूछा जाता है।

2. राज्यवार नामों की तुलना

करमारवाड़मेवाड़कोटाजयपुरबीकानेर
गृह करघर गिनती / घर बाबघर गिनती बराड़घर बराड़घर की बिछौतीधूँआ माछ
विधवा-विवाह (नाता) करकागली / नाता (जोधपुर, 1 रु. प्रति विवाह)नाता बराड़नाता कागलीछेली राशिनाता
लकड़ी करकबाड़ाबाबखड़लाकड़—दरखत की बिछौतीकाठ

… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

  • दाण ➜ मेवाड़-जैसलमेर में बाहर से आने और बाहर जाने वाले माल पर लगने वाला शुल्क।
  • राहदारी ➜ राज्य-क्षेत्र से गुज़रते माल पर चुंगी।
  • मटक, विछायत, चू-मराई ➜ स्थानीय करों के नाम।

ट्रिक: जकात-सायर जोड़ी याद रखें: बीकानेर = जकात, जोधपुर-जयपुर = सायर। मेवाड़-जैसलमेर का आयात-निर्यात कर दाण है।

3. राज्य और सेना के कर

कर / लागकिस अवसर पर, किससे
नजरानाराज्याभिषेक, जन्मदिन, त्योहार और विशेष दरबारों पर सामंत, मुत्सद्दी, अफ़सर राजा को भेंट देते
पेशकशीपट्टा या पद की सनद मिलने पर पट्टेदार, चौधरी, पटवारी, ज़मींदार राजकोष में रकम जमा करते
अंगा कर / अंग लागकिसान-परिवार के हर सदस्य से 1 रुपया
खेड़ ख़र्च (फौज ख़र्च)सेना के ख़र्च के नाम पर

… शेष 6 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

4. जागीरदारों की लागें

लागक्या था
जाजम लागभूमि बेचने पर
सिंगोटीपशु बेचने पर
कुँवर जी का घोड़ाराजकुमार के लिए घोड़ा ख़रीदने हेतु हर घर से
राली लागकाश्तकार को हर साल जागीरदार के लिए गद्दा / राली बनाकर देना

… शेष 12 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

बीकानेर का बीजा कर

  • नाली ➜ तिल पर लगा कर।
  • ठाकुरजी ➜ मंदिर की भेंट।
  • सिराणा ➜ अधिकारियों के खान-पान का ख़र्च।

मारवाड़ और मेवाड़ की बातें

  • मारवाड़ के जागीर-क्षेत्र की प्रमुख लागें: खारखार, कांसा, शुकराना (खिड़की या बारी लाग), हासा, माचा, हल, मवाली।
  • मेवाड़ में जागीरदार अपनी आय का छठा भाग (1/6) शासक को देता — इसे छटूद कहते।
  • जयनारायण व्यास ने इन अनुचित वसूलियों पर गैर कानूनी लागें पुस्तक लिखी।

याद रखें: राजस्थान में सबसे पहले भूमि बंदोबस्त कोटा में झाला जालिमसिंह ने 1807 में करवाया — पूरी ज़मीन नपवाई, बीघों में बाँटी और चकबन्दी की।

5. सामंती व्यवस्था

मुगलों की मनसबदारी से प्रेरित होकर राजपूत राजाओं ने सामंतों के पद और प्रतिष्ठा के आधार पर श्रेणियाँ बनाईं। इन्हीं श्रेणियों से तय होता था कि दरबार में सम्मान, बैठने की जगह, पेशकश और ताजीम (राजा द्वारा स्वागत) कितनी मिलेगी।

रियासतश्रेणियाँ
मारवाड़राजवी · सरदार · मुत्सद्दी · गनायत
मेवाड़सोलह · बत्तीस · गोल
बीकानेरबीका की सन्तानें · बीका के भाइयों-चाचा की सन्तानें · स्थानीय व बाहरी सामंत

ट्रिक: मेवाड़ की गिनती 16 → 32 → गोल (सैकड़ों) — सोलह का दोगुना बत्तीस। मारवाड़ के चार वर्ग: राजवी, सरदार, मुत्सद्दी, गनायत — “रा-स-मु-ग”।

6. उद्भव व स्वरूप

  • राजपूत रियासतों में सामंत व्यवस्था शासकों की कुलीय (कुल-आधारित) परम्परा से उपजी; राज्य बसते ही सामंत भी अस्तित्व में आ गए।
  • 15वीं सदी के बाद यह व्यवस्था राजनीतिक और सामाजिक रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण हो गई।
  • कर्नल टॉड इस प्रणाली को मध्यकालीन यूरोप की फ़्यूडल प्रथा जैसा मानते थे; राजस्थान की जागीरदारी का वर्णन करने वाले 19वीं सदी के वे पहले इतिहासकार हैं — एनाल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ़ राजस्थान (भाग 1)।

सामंत कैसे बनता था

  1. राजा की मृत्यु
  2. बड़ा पुत्र नया राजा
  3. छोटे भाइयों को वंशानुगत जागीर
  • भाईबंद / भैयाद ➜ जागीरों के और भी छोटे टुकड़ों में बँटते जाने की परम्परा।

मुगलों के आने के बाद

  • सामंत और राजा का रिश्ता भाई-बन्धु से बदलकर स्वामी और सेवक का हो चला।
  • सामंत के बग़ावत करने पर राजा मुगल फ़ौज के सहारे उसे दबा सकता था।

याद रखें: सामंत व्यवस्था पर लिखने वाला पहला इतिहासकार: कर्नल टॉड; उसकी किताब: Annals and Antiquities of Rajasthan, भाग 1।

7. रेख व उत्तराधिकार शुल्क

  • सामंतों की सैनिक सेवा मोटे तौर पर दो प्रकार की थी — युद्धकाल की और शांतिकाल की; आगे चलकर उसकी मात्रा रेख से तय होने लगी।
  • रेख मुगल परिपाटी की देन थी — जागीर की सालाना उपज का अनुमान, जो राजा के दिए पट्टे में लिखा जाता।
  • इसी रेख से तय होता कि सामंत से कितनी सैनिक सेवा और कितनी सरकारी रकम ली जाएगी।
रूपअर्थ
पट्टा रेखजागीर के पट्टे में लिखी अनुमानित सालाना आय
भरतु रेखजागीरदार जो रकम पट्टा रेख के आधार पर राजकोष में जमा करता

उत्तराधिकार शुल्क

सामंत की मृत्यु पर राज्य के अफ़सर तुरंत जागीर ज़ब्त कर लेते; नए उत्तराधिकारी से शुल्क लेने के बाद ही उसके नाम नया पट्टा जारी होता।

रियासतशुल्क का नाम
जोधपुरपहले पेशकशी; महाराजा अजीतसिंह के काल में हुक्मनामा
जयपुरनजराना
मेवाड़कैदखालसा और तलवार बँधाई
  • उत्तराधिकार शुल्क को पेशकशी के रूप में पहली बार जोधपुर के मोटा राजा उदयसिंह ने चलाया।
  • रेख ही पैमाना थी ➜ उसी से राजकुमारी के ब्याह का न्योता शुल्क और तलवार बँधाई भी बाँधी जाती।

8. मारवाड़ के सामंत

श्रेणीकौन
राजवीराजा के अनुज व करीबी रिश्तेदार; गुज़ारे के लिए जागीर; तीन पुश्तों तक रेख, चाकरी और हुक्मनामा माफ़
सरदारचार दर्जों में बँटे (नीचे देखें)
मुत्सद्दीराज्य-प्रशासन में काम के बदले जागीर; जागीर सेवा-काल तक ही रहती
  1. सिरायत
  2. इकहरी ताजीम के सरदार
  3. बाँह पसाव ताजीम वाले सरदार
  • सिरायत पहली श्रेणी के सरदार थे — शुरू में 8, बाद में 12।
  • दरबार में राजा के सबसे पास जगह; महाराजा के दोनों ओर दो पंक्तियों (मिशल) में बैठते — दायीं पंक्ति राव रणमल्ल के वंशजों की, बायीं जोधा के वंशजों की।
  • 30 मई 1850 के अध्यादेश से महाराजा तख्तसिंह ने सामंतों का भूमि-दान देना अवैध ठहरा दिया।

9. मेवाड़ के सामंत

  • महाराणा अमरसिंह द्वितीय के समय पहली बार सामंती प्रथा को क्रमबद्ध किया गया और जागीर बदलने की परम्परा बंद हुई।
  • सामंत तीन वर्गों में बँटे ➜ सोलह, बत्तीस और गोल; इस व्यवस्था का नाम अमरशाही रेख।
  • महाराणा के नीचे क्रमशः दो राजा, 16 उमराव, 32 सामंत और अंत में तीसरे दर्जे के बहुत-से जागीरदार।
श्रेणीसंख्यानाम
प्रथम16उमराव
द्वितीय32बत्तीस के सरदार
तृतीयसैकड़ोंगोल

सलूम्बर का ठाकुर

  • महाराणा की गैर-मौजूदगी में प्रशासन चलाता और राजमहल की रक्षा करता।
  • नए महाराणा का सिंहासनारोहण उसकी सहमति से होता; नए महाराणा की कमर में तलवार बाँधना और युद्ध में हरावल में रहना उसके विशेष अधिकार।
  • मेवाड़ में प्रधान का पद उसे वंशानुगत मिला हुआ था; जागीर के पट्टों पर सलूम्बर ठाकुर की मोहर लगती।
  • प्राचीन रीति से महाराणा के राजतिलक पर भील मुखिया (गमेती), जो उन्दरी गाँव का होता, अपना अँगूठा चीरकर रक्त से टीका करता; राजसिंह द्वितीय के काल में यह चलन थम गया।
  • मेवाड़ के सामंतों को छटूद (जागीर की सालाना आय का छठा भाग), तलवार बँधाई और नजराना नियमानुसार राजकोष में जमा करना पड़ता।

10. बीकानेर के सामंत

  • पट्टे की प्रथा बीकानेर में रायसिंह की देन है; उन्होंने सामंती ढाँचे में कई बदलाव भी किए।
वर्गकौन
पहलाबीका के वंशज
दूसराबीका के भाइयों और चाचा के वंशज
तीसरास्थानीय और परदेशी सामंत

11. कोटा, जयपुर, जैसलमेर

कोटा

  • राज्य-सेवा के अनुसार पद तय होता; सामंत दो वर्गों में — देशाथी (देश के जागीरदार) और हजूरथी (दरबार के जागीरदार)।
  • देश के जागीरदार ➜ राज्य-सेवा के बदले जागीर वाले; अधिकांश हाड़ा राजपूत।
  • दरबार के जागीरदार ➜ महाराव के निकट-दूर के रिश्तेदार।

जयपुर

  • आमेर के कछवाहा पृथ्वीराज (17 पुत्र) के काल में 12 प्रमुख घराने बने; उनकी स्थायी जागीरें बारह कोटड़ी कहलाईं और यही जयपुर के सामंत-बँटवारे का आधार थीं।
  • प्रमुख कोटड़ियाँ: चतुर्भुजोत, कल्याणोत, नाथावत, बलभद्रोत, खंगारोत, सुल्तानोत, पचायणोत, कुम्भाणी, शिवब्रह्मपोता, बनवीरपोता।
  • जयपुर के सरदारों में राजावतों का महत्त्व सबसे अधिक था।

जैसलमेर

  • जैसलमेर की ख्यात के अनुसार रावल हरराज के शासनकाल में डावी (बायीं) और जीवणी (दायीं) मिशलें बनीं।
  • राज-परिवार के दूर के सम्बन्धी रावलोत कहलाए।
  • कमरबंधाई के नाम पर भी वारिस से कुछ नहीं लिया जाता था — मृत जागीरदार का उत्तराधिकारी शुल्क-मुक्त रहता।
रियासतवर्गख़ास बात
कोटादेशाथी · हजूरथीताजीमी 36, कोटड़ियात 8
जयपुरताजीमी · खास चौकीबारह कोटड़ी; राजावत सबसे प्रमुख
जैसलमेरडावी · जीवणीरावल हरराज; कमरबंधाई नहीं

12. ग्रासिया, भोमिया, सिरोपाव

सामंतपहचान
ग्रासिया ठाकुरशासक के पट्टे/सनद से निश्चित सैनिक सेवा के बदले भूमि पाने वाले भूमिपति
भौमिया जागीरदारसीमांत-रक्षा और राज्य-सेवा में बलिदान के बदले भूमि; वंशानुगत अधिकार; हासल जैसे करों से मुक्त

सिरोपाव

  • कवियों, दरबारियों, सेनापतियों और अन्य श्रेष्ठ जनों को राजा द्वारा दिया जाने वाला सम्मान / पुरस्कार — विशेष वस्त्र, आभूषण, नकद।
  • मारवाड़ का सर्वोच्च सिरोपाव — हाथी सिरोपाव।
  • प्रथम श्रेणी के सामंत दरबार से लौटते तो राजा सिरोपाव देकर विदा करता; राज्याभिषेक, राजपरिवार के विवाह और जन्मदिन जैसे अवसरों पर भी दिया जाता।

मुगल नीति और टीका

  • गोपीनाथ शर्मा के अनुसार मुगलों ने अपने कृपापात्रों को राजा बनाने की नीति चलाई — यह उनके लिए सर्वोच्चता का प्रतीक था।
  • अकबर ने शासक के निधन पर उसके उत्तराधिकारी को टीका लगाने का रिवाज शुरू किया।

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. एक ही कर का नाम हर रियासत में अलग था — जैसे गृह कर मारवाड़ में घर गिनती और बीकानेर में धूँआ माछ।
  2. जकात-सायर जोड़ी याद रखें: बीकानेर में जकात, जोधपुर-जयपुर में सायर; मेवाड़-जैसलमेर में आयात-निर्यात का शुल्क दाण कहलाता था।
  3. मेवाड़ में जागीरदार अपनी आय का छठा भाग (1/6) शासक को देता था, इसे छटूद कहते थे।
  4. राजस्थान में सबसे पहला भूमि बंदोबस्त कोटा में झाला जालिमसिंह ने 1807 में करवाया।
  5. रेख मुगल परिपाटी की देन है — जागीर की अनुमानित सालाना आय; इसके दो रूप पट्टा रेख और भरतु रेख हैं।
  6. उत्तराधिकार शुल्क को पेशकशी के रूप में पहली बार जोधपुर के मोटा राजा उदयसिंह ने चलाया।
  7. सामंत व्यवस्था पर लिखने वाले पहले इतिहासकार कर्नल टॉड हैं; उनका ग्रंथ एनाल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ़ राजस्थान (भाग 1) है।
  8. मेवाड़ की श्रेणियाँ सोलह, बत्तीस और गोल (अमरशाही रेख); मारवाड़ की चार — राजवी, सरदार, मुत्सद्दी, गनायत।
  9. जयपुर में बारह कोटड़ी, कोटा में देशाथी व हजूरथी और जैसलमेर में डावी व जीवणी मिशलें सामंत-बँटवारे का आधार थीं।

अगले भाग में 1818 से पहले की संधियाँ — 1803-04 की पाँच संधियाँ, भरतपुर का संघर्ष और बार्लो द्वारा उनका रद्दीकरण।

पिछला भाग: मध्यकालीन प्रशासन व सामंती व्यवस्था: केन्द्रीय प्रशासन एवं भूमि व भू-राजस्व

अगला भाग: अंग्रेजी प्रभुत्व और उसके प्रभाव: 1818 से पहले की संधियाँ एवं 1817-18 की संधियाँ

इन्हें भी पढ़ें: अंग्रेजी प्रभुत्व और उसके प्रभाव · संभाग व जिला प्रशासन

पूरी श्रृंखला: राजस्थान का इतिहास — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

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