बीकानेर का राठौड़ राजवंश: राव बीका और लूणकरण एवं जैतसी और कल्याणमल – Rajasthan History Chapter 24

बीकानेर के राठौड़ों का आरम्भ — बीका, लूणकरण, जैतसी, कल्याणमल और रायसिंह तक के मुख्य युद्ध व तथ्य।

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In this chapter (15 sections)
  1. एक नज़र में
  2. जांगल प्रदेश और देवियाँ
  3. राजस्थान के पितृहंता शासक
  4. राव बीका और लूणकरण
  5. बीका क्यों निकले
  6. बीकानेर नगर की स्थापना
  7. राव लूणकरण
  8. जैतसी और कल्याणमल
  9. राव जैतसी
  10. राव कल्याणमल
  11. महाराजा रायसिंह
  12. सेवा और सम्मान
  13. सैन्य अभियान
  14. जूनागढ़ और साहित्य
  15. रिवीजन पॉइंटर्स

बीकानेर की कहानी जोधपुर की छाया से निकलकर अपनी अलग पहचान बनाने की कहानी है — बीका ने जांगल की धरती जीती, जैतसी ने कामरान को लौटाया और कल्याणमल ने मुग़लों से रिश्ते की शुरुआत की। इस भाग में एक नज़र में मुख्य युद्ध, जांगल प्रदेश व देवियाँ, राजस्थान के पितृहंता शासक, बीका और लूणकरण, जैतसी-कल्याणमल तथा महाराजा रायसिंह का काल दिया गया है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — बीकानेर का राठौड़ राजवंश, 4 चॉक-बोर्ड चित्र, 4 चार्ट, 25 फ्लैशकार्ड और 13 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. एक नज़र में

युद्धवर्षक्या हुआ
ढोसी (नारनौल के पास)1526लूणकरण नवाब शेख अबीमीरा से लड़ते हुए मारा गया
रातीघाटी26 अक्टूबर 1534जैतसी ने कामरान को बीकानेर दुर्ग से भगाया
पाहेबा / साहेबा1541मालदेव (मारवाड़) की सेना से जैतसी मारा गया
गिरी-सुमेल5 जनवरी 1544कल्याणमल ने शेरशाह सूरी का साथ दिया; मालदेव हारा

… शेष 4 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

2. जांगल प्रदेश और देवियाँ

  • इस क्षेत्र का प्राचीन नाम जांगलू / कुरू जांगला / माद्रेय जांगला था; महाभारत काल में यह कुरू प्रदेश कहलाता था।
  • जांगल प्रदेश की राजधानी अहिच्छत्रपुर (आज का नागौर) थी।
  • जांगल का पूर्वी हिस्सा सपादलक्ष कहलाया, जिसकी राजधानी शाकम्भरी थी।

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

ट्रिक: दो कुलदेवियाँ: पूरे राठौड़ वंश की = नागणेची, बीकानेर शाखा की = करणी माता।

3. राजस्थान के पितृहंता शासक

क्र.पितृहंतापितावंश
1ऊदामहाराणा कुम्भागुहिल (मेवाड़)
2राव मालदेवराव गांगामारवाड़ के राठौड़
3बख्तसिंहअजीतसिंहमारवाड़ के राठौड़

ट्रिक: मारवाड़ की राठौड़ शाखा में दो नाम हैं — मालदेव (गांगा का पुत्र) और बख्तसिंह (अजीतसिंह का पुत्र); मेवाड़ में ऊदा; चौहानों में जग्गदेव।

4. राव बीका और लूणकरण

काल / क्रमघटनाविवरण
1465जांगल की ओरचाचा कांधल के साथ बीका ने जांगल देश जीतना शुरू किया।
1485पहला क़िलादुर्ग की नींव डाली, पर पूरा न हुआ — आज की “बीकाजी की टेकरी”।
12 अप्रैल 1488बीकानेर नगरआखातीज, करणी माता के आशीर्वाद से।

… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

5. बीका क्यों निकले

  • संस्थापक ➜ राव बीका
  • काल ➜ 1465–1504 ई.
  • पिता ➜ राव जोधा
  • ख्यात (दयालदास री ख्यात) और वीर विनोद के मत में बीका जोधा का दूसरा बेटा था; सबसे बड़ा निम्बा कम उम्र में चल बसा।
  • रानी जसमादे के प्रभाव में जोधा ने जोधपुर की गद्दी बीका की जगह सातलदेव को दी।
  • पिता के ताने पर बीका ने 1465 में चाचा कांधल के साथ मारवाड़ के उत्तर के जांगल देश पर चढ़ाई की।
  • उसने भाटी, चौहान, खीचियों और कायमख़ानियों जैसी स्थानीय ताक़तों की आपसी फूट का फ़ायदा उठाकर अनेक गाँव अपने क़ब्ज़े में किए।

याद रखें: तिलक का अधिकार गोदारा जाटों के पास — बीकानेर के राजा का राजतिलक जाट करता था।

6. बीकानेर नगर की स्थापना

  1. बीका की पहली राजधानी कोडमदेसर थी; वहाँ उसने मण्डोर से लाई भैरव की मूर्ति स्थापित कर भैरव मन्दिर बनवाया।
  2. 1485 में उसने एक दुर्ग बनवाना शुरू किया, जो पूरा न हो सका — आज इसे “बीकाजी की टेकरी” कहते हैं।
  3. वैशाख शुक्ल तृतीया (आखातीज), 12 अप्रैल 1488 — करणी माता का आशीष लेकर बीका ने बीकानेर नगर की नींव रखी और वही राजधानी बनी।

नाम की कथा: पुरानी मान्यता है कि बीका ने राजधानी के लिए जो ज़मीन चुनी, उसका मालिक नेरा / नरा नाम का जाट था। उसने ज़मीन इस शर्त पर दी कि राजधानी के नाम में उसका नाम भी जुड़े — इस तरह बीका + नरा = बीकानेर।

  • बीका के देहान्त पर कितनी रानियाँ सती हुईं — दयालदास री ख्यात आठ गिनाती है, स्मारक-लेख केवल तीन।

7. राव लूणकरण

  • काल ➜ 1505–1526 ई.
  • पद-प्राप्ति ➜ नरा की निःसन्तान मृत्यु पर
  • उपाधि-उपमा ➜ कलयुग का कर्ण
  • नरा के कोई सन्तान नहीं थी, इसलिए उसका छोटा भाई लूणकरण राजा बना।
  • 1509 में उसने लोद्रवा पर चढ़ाई की; 1512 में फतेहपुर के कायमख़ानियों को और 1513 में नागौर के मोहम्मद ख़ाँ को हराया।
  • जैसलमेर पर चढ़ाई के बाद संधि हुई; रावल जैतसी ने अपनी बेटियाँ लूणकरण के पुत्रों के साथ ब्याह दीं।
  • लूणकरण की पत्नी महाराणा रायमल की पुत्री थी।

8. जैतसी और कल्याणमल

काल / क्रमघटनाविवरण
1526जैतसी की गद्दीलूणकरण की मृत्यु के बाद।
1527खानवापुत्र कल्याणमल को सेना देकर साँगा की मदद को भेजा।
26 अक्टूबर 1534रातीघाटीकामरान को बीकानेर दुर्ग से भगाया।
1541पाहेबा / साहेबामालदेव के हाथों जैतसी की मृत्यु; बीकानेर पर मालदेव का क़ब्ज़ा।

9. राव जैतसी

  • 1527 में खानवा की लड़ाई के समय जैतसी ने बेटे कल्याणमल को फ़ौज के साथ राणा साँगा की मदद में भेजा।
  • भटनेर पर कामरान ने क़ब्ज़ा किया — वहाँ के शासक खेतसी पराजित हुए।
  • बाबर का बेटा कामरान 1534 में बीकानेर पर आ चढ़ा, क्योंकि जैतसी ने उसकी अधीनता लेने से इनकार किया था; उसने दुर्ग पर धावा बोला।

याद रखें: जैतसी के दो मोर्चे: पश्चिम से कामरान (जीता, 1534) और पूरब से मालदेव (हारा-मारा, 1541)।

10. राव कल्याणमल

  • काल ➜ 1541–1574 ई.
  • राज्याभिषेक ➜ ठुकरियासर (बीकानेर)
  • निर्वासन-ठिकाना ➜ सिरसा
  • बीकानेर पर मालदेव का क़ब्ज़ा होने से कल्याणमल का राज्याभिषेक ठुकरियासर में हुआ।
  • वह सिरसा में रहते हुए बीकानेर पाने की कोशिश करता रहा; शेरशाह सूरी की मदद से राज्य वापस मिला।
  • गिरी-सुमेल (5 जनवरी 1544) में मालदेव और शेरशाह के बीच हुए युद्ध में कल्याणमल ने शेरशाह का साथ दिया।

11. महाराजा रायसिंह

  • गद्दी ➜ 25 सितम्बर 1574
  • उपाधि ➜ महाराजाधिराज, महाराज
  • उपनाम ➜ राजपूताने का कर्ण

रायसिंह से पहले बीकानेर के शासक “राव” कहलाते थे; उनके बाद से “महाराजाधिराज / महाराजा”।

12. सेवा और सम्मान

  • 1570 के नागौर दरबार में पिता के साथ पहुँचकर रायसिंह मुग़ल सेना में शामिल हुआ और जल्द ही अकबर का विश्वासपात्र बन गया।
  • राजपूताने के शासकों में वह अकबर का दूसरा विश्वासपात्र राजा था (पहला — मानसिंह)।
  • अकबर ने उसे 4000 का मनसब दिया; 1572 में उसे जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया।
  • 1573 में इब्राहिम मिर्ज़ा ने नागौर में विद्रोह किया तो रायसिंह ने कठौली में मालवा के मिर्ज़ा बन्धुओं (इब्राहिम व मोहम्मद मिर्ज़ा) का दमन किया।
  • रायसिंह की एक बेटी का निकाह शहज़ादे सलीम से हुआ।

13. सैन्य अभियान

काल / क्रमघटनाविवरण
1573कठौलीमालवा के मिर्ज़ा बन्धुओं का दमन।
1574चन्द्रसेन के विरुद्धअकबर ने भेजा।
1581काबुलसैन्य अभियान।
1585बलूचिस्तानसैन्य अभियान।

रायसिंह ने दो मुग़ल बादशाहों — अकबर और जहाँगीर — की सेवा की।

  • 1612 में बुरहानपुर में रायसिंह की मृत्यु हुई; उसने पुत्र सूरसिंह को उत्तराधिकारी घोषित किया था।
  • पर जहाँगीर सूरसिंह से रुष्ट था; उसने गद्दी रायसिंह के दूसरे बेटे दलपतसिंह को सौंप दी।

14. जूनागढ़ और साहित्य

  • रायसिंह ने प्रधानमंत्री कर्मचन्द्र की देखरेख में जूनागढ़ दुर्ग बनवाया।
  • कर्मचन्द वंशोत्कीर्तनक काव्यम् — रचयिता जयसोम, जिन्होंने मंत्री कर्मचन्द के आश्रय में रहकर इसे लिखा; इसमें रायसिंह को “राजेन्द्र” (जीते जी शत्रुओं से भी अच्छा व्यवहार करने वाला) कहा गया है।
  • मुंशी देवीप्रसाद ने रायसिंह को “राजपूताने का कर्ण” की संज्ञा दी।
पहचानविवरण
उपनामराजपूताने का कर्ण
उपाधियाँमहाराजाधिराज, महाराज; “राय”
दुर्गजूनागढ़ — मंत्री कर्मचन्द्र की देखरेख

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. बीका जोधा के दूसरे पुत्र थे; 1465 में चाचा कांधल के साथ उन्होंने जांगल देश जीतना शुरू किया।
  2. बीकानेर नगर की नींव 12 अप्रैल 1488 (आखातीज) को करणी माता के आशीर्वाद से पड़ी; 1485 में शुरू हुआ पहला दुर्ग अधूरा रहा — आज की «बीकाजी की टेकरी»।
  3. बीकानेर के राजा का राजतिलक गोदारा जाट करते थे; नाम की कथा है — बीका + नरा = बीकानेर।
  4. पूरे राठौड़ वंश की कुलदेवी नागणेची हैं, जबकि बीकानेर शाखा की कुलदेवी करणी माता हैं।
  5. लूणकरण (1505–1526) को «कलयुग का कर्ण» कहा गया; 1526 में ढोसी (नारनौल के पास) लड़ते हुए मारे गए।
  6. जैतसी ने 26 अक्टूबर 1534 को रातीघाटी में कामरान को बीकानेर दुर्ग से भगाया, पर 1541 में पाहेबा/साहेबा में मालदेव के हाथों मारे गए।
  7. कल्याणमल (1541–1574) का राज्याभिषेक ठुकरियासर में हुआ और उन्होंने सिरसा से कोशिश करते हुए 5 जनवरी 1544 को गिरी-सुमेल में शेरशाह का साथ दिया।
  8. राजस्थान के पितृहंता — ऊदा (कुम्भा के पुत्र, मेवाड़), मालदेव (गांगा के पुत्र), बख्तसिंह (अजीतसिंह के पुत्र); चौहानों में जग्गदेव।
  9. रायसिंह (गद्दी 25 सितम्बर 1574) से पहले शासक «राव» कहलाते थे, बाद में «महाराजाधिराज / महाराजा»; उपनाम «राजपूताने का कर्ण»।

अगले भाग में दलपत की क़ैद, सूरसिंह-कर्णसिंह के अभियान, मतीरे की राड़, अनूपसिंह का स्वर्णकाल, 1818 की संधि और महाराजा गंगासिंह से अन्तिम शासक सार्दुल सिंह तक का दौर।

पिछला भाग: मारवाड़ का राठौड़ राजवंश: अभयसिंह से हनुवंत सिंह एवं उपाधियाँ, उपनाम, ग्रन्थ

अगला भाग: बीकानेर का राठौड़ राजवंश: दलपतसिंह से अनूपसिंह एवं स्वरूपसिंह से डूँगरसिंह

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