बीकानेर की कहानी जोधपुर की छाया से निकलकर अपनी अलग पहचान बनाने की कहानी है — बीका ने जांगल की धरती जीती, जैतसी ने कामरान को लौटाया और कल्याणमल ने मुग़लों से रिश्ते की शुरुआत की। इस भाग में एक नज़र में मुख्य युद्ध, जांगल प्रदेश व देवियाँ, राजस्थान के पितृहंता शासक, बीका और लूणकरण, जैतसी-कल्याणमल तथा महाराजा रायसिंह का काल दिया गया है।
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1. एक नज़र में
| युद्ध | वर्ष | क्या हुआ |
|---|---|---|
| ढोसी (नारनौल के पास) | 1526 | लूणकरण नवाब शेख अबीमीरा से लड़ते हुए मारा गया |
| रातीघाटी | 26 अक्टूबर 1534 | जैतसी ने कामरान को बीकानेर दुर्ग से भगाया |
| पाहेबा / साहेबा | 1541 | मालदेव (मारवाड़) की सेना से जैतसी मारा गया |
| गिरी-सुमेल | 5 जनवरी 1544 | कल्याणमल ने शेरशाह सूरी का साथ दिया; मालदेव हारा |
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2. जांगल प्रदेश और देवियाँ
- इस क्षेत्र का प्राचीन नाम जांगलू / कुरू जांगला / माद्रेय जांगला था; महाभारत काल में यह कुरू प्रदेश कहलाता था।
- जांगल प्रदेश की राजधानी अहिच्छत्रपुर (आज का नागौर) थी।
- जांगल का पूर्वी हिस्सा सपादलक्ष कहलाया, जिसकी राजधानी शाकम्भरी थी।
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ट्रिक: दो कुलदेवियाँ: पूरे राठौड़ वंश की = नागणेची, बीकानेर शाखा की = करणी माता।
3. राजस्थान के पितृहंता शासक
| क्र. | पितृहंता | पिता | वंश |
|---|---|---|---|
| 1 | ऊदा | महाराणा कुम्भा | गुहिल (मेवाड़) |
| 2 | राव मालदेव | राव गांगा | मारवाड़ के राठौड़ |
| 3 | बख्तसिंह | अजीतसिंह | मारवाड़ के राठौड़ |
ट्रिक: मारवाड़ की राठौड़ शाखा में दो नाम हैं — मालदेव (गांगा का पुत्र) और बख्तसिंह (अजीतसिंह का पुत्र); मेवाड़ में ऊदा; चौहानों में जग्गदेव।
4. राव बीका और लूणकरण
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1465 | जांगल की ओर | चाचा कांधल के साथ बीका ने जांगल देश जीतना शुरू किया। |
| 1485 | पहला क़िला | दुर्ग की नींव डाली, पर पूरा न हुआ — आज की “बीकाजी की टेकरी”। |
| 12 अप्रैल 1488 | बीकानेर नगर | आखातीज, करणी माता के आशीर्वाद से। |
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5. बीका क्यों निकले
- संस्थापक ➜ राव बीका
- काल ➜ 1465–1504 ई.
- पिता ➜ राव जोधा
- ख्यात (दयालदास री ख्यात) और वीर विनोद के मत में बीका जोधा का दूसरा बेटा था; सबसे बड़ा निम्बा कम उम्र में चल बसा।
- रानी जसमादे के प्रभाव में जोधा ने जोधपुर की गद्दी बीका की जगह सातलदेव को दी।
- पिता के ताने पर बीका ने 1465 में चाचा कांधल के साथ मारवाड़ के उत्तर के जांगल देश पर चढ़ाई की।
- उसने भाटी, चौहान, खीचियों और कायमख़ानियों जैसी स्थानीय ताक़तों की आपसी फूट का फ़ायदा उठाकर अनेक गाँव अपने क़ब्ज़े में किए।
याद रखें: तिलक का अधिकार गोदारा जाटों के पास — बीकानेर के राजा का राजतिलक जाट करता था।
6. बीकानेर नगर की स्थापना
- बीका की पहली राजधानी कोडमदेसर थी; वहाँ उसने मण्डोर से लाई भैरव की मूर्ति स्थापित कर भैरव मन्दिर बनवाया।
- 1485 में उसने एक दुर्ग बनवाना शुरू किया, जो पूरा न हो सका — आज इसे “बीकाजी की टेकरी” कहते हैं।
- वैशाख शुक्ल तृतीया (आखातीज), 12 अप्रैल 1488 — करणी माता का आशीष लेकर बीका ने बीकानेर नगर की नींव रखी और वही राजधानी बनी।
नाम की कथा: पुरानी मान्यता है कि बीका ने राजधानी के लिए जो ज़मीन चुनी, उसका मालिक नेरा / नरा नाम का जाट था। उसने ज़मीन इस शर्त पर दी कि राजधानी के नाम में उसका नाम भी जुड़े — इस तरह बीका + नरा = बीकानेर।
- बीका के देहान्त पर कितनी रानियाँ सती हुईं — दयालदास री ख्यात आठ गिनाती है, स्मारक-लेख केवल तीन।
7. राव लूणकरण
- काल ➜ 1505–1526 ई.
- पद-प्राप्ति ➜ नरा की निःसन्तान मृत्यु पर
- उपाधि-उपमा ➜ कलयुग का कर्ण
- नरा के कोई सन्तान नहीं थी, इसलिए उसका छोटा भाई लूणकरण राजा बना।
- 1509 में उसने लोद्रवा पर चढ़ाई की; 1512 में फतेहपुर के कायमख़ानियों को और 1513 में नागौर के मोहम्मद ख़ाँ को हराया।
- जैसलमेर पर चढ़ाई के बाद संधि हुई; रावल जैतसी ने अपनी बेटियाँ लूणकरण के पुत्रों के साथ ब्याह दीं।
- लूणकरण की पत्नी महाराणा रायमल की पुत्री थी।
8. जैतसी और कल्याणमल
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1526 | जैतसी की गद्दी | लूणकरण की मृत्यु के बाद। |
| 1527 | खानवा | पुत्र कल्याणमल को सेना देकर साँगा की मदद को भेजा। |
| 26 अक्टूबर 1534 | रातीघाटी | कामरान को बीकानेर दुर्ग से भगाया। |
| 1541 | पाहेबा / साहेबा | मालदेव के हाथों जैतसी की मृत्यु; बीकानेर पर मालदेव का क़ब्ज़ा। |
9. राव जैतसी
- 1527 में खानवा की लड़ाई के समय जैतसी ने बेटे कल्याणमल को फ़ौज के साथ राणा साँगा की मदद में भेजा।
- भटनेर पर कामरान ने क़ब्ज़ा किया — वहाँ के शासक खेतसी पराजित हुए।
- बाबर का बेटा कामरान 1534 में बीकानेर पर आ चढ़ा, क्योंकि जैतसी ने उसकी अधीनता लेने से इनकार किया था; उसने दुर्ग पर धावा बोला।
याद रखें: जैतसी के दो मोर्चे: पश्चिम से कामरान (जीता, 1534) और पूरब से मालदेव (हारा-मारा, 1541)।
10. राव कल्याणमल
- काल ➜ 1541–1574 ई.
- राज्याभिषेक ➜ ठुकरियासर (बीकानेर)
- निर्वासन-ठिकाना ➜ सिरसा
- बीकानेर पर मालदेव का क़ब्ज़ा होने से कल्याणमल का राज्याभिषेक ठुकरियासर में हुआ।
- वह सिरसा में रहते हुए बीकानेर पाने की कोशिश करता रहा; शेरशाह सूरी की मदद से राज्य वापस मिला।
- गिरी-सुमेल (5 जनवरी 1544) में मालदेव और शेरशाह के बीच हुए युद्ध में कल्याणमल ने शेरशाह का साथ दिया।
11. महाराजा रायसिंह
- गद्दी ➜ 25 सितम्बर 1574
- उपाधि ➜ महाराजाधिराज, महाराज
- उपनाम ➜ राजपूताने का कर्ण
रायसिंह से पहले बीकानेर के शासक “राव” कहलाते थे; उनके बाद से “महाराजाधिराज / महाराजा”।
12. सेवा और सम्मान
- 1570 के नागौर दरबार में पिता के साथ पहुँचकर रायसिंह मुग़ल सेना में शामिल हुआ और जल्द ही अकबर का विश्वासपात्र बन गया।
- राजपूताने के शासकों में वह अकबर का दूसरा विश्वासपात्र राजा था (पहला — मानसिंह)।
- अकबर ने उसे 4000 का मनसब दिया; 1572 में उसे जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया।
- 1573 में इब्राहिम मिर्ज़ा ने नागौर में विद्रोह किया तो रायसिंह ने कठौली में मालवा के मिर्ज़ा बन्धुओं (इब्राहिम व मोहम्मद मिर्ज़ा) का दमन किया।
- रायसिंह की एक बेटी का निकाह शहज़ादे सलीम से हुआ।
13. सैन्य अभियान
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1573 | कठौली | मालवा के मिर्ज़ा बन्धुओं का दमन। |
| 1574 | चन्द्रसेन के विरुद्ध | अकबर ने भेजा। |
| 1581 | काबुल | सैन्य अभियान। |
| 1585 | बलूचिस्तान | सैन्य अभियान। |
रायसिंह ने दो मुग़ल बादशाहों — अकबर और जहाँगीर — की सेवा की।
- 1612 में बुरहानपुर में रायसिंह की मृत्यु हुई; उसने पुत्र सूरसिंह को उत्तराधिकारी घोषित किया था।
- पर जहाँगीर सूरसिंह से रुष्ट था; उसने गद्दी रायसिंह के दूसरे बेटे दलपतसिंह को सौंप दी।
14. जूनागढ़ और साहित्य
- रायसिंह ने प्रधानमंत्री कर्मचन्द्र की देखरेख में जूनागढ़ दुर्ग बनवाया।
- कर्मचन्द वंशोत्कीर्तनक काव्यम् — रचयिता जयसोम, जिन्होंने मंत्री कर्मचन्द के आश्रय में रहकर इसे लिखा; इसमें रायसिंह को “राजेन्द्र” (जीते जी शत्रुओं से भी अच्छा व्यवहार करने वाला) कहा गया है।
- मुंशी देवीप्रसाद ने रायसिंह को “राजपूताने का कर्ण” की संज्ञा दी।
| पहचान | विवरण |
|---|---|
| उपनाम | राजपूताने का कर्ण |
| उपाधियाँ | महाराजाधिराज, महाराज; “राय” |
| दुर्ग | जूनागढ़ — मंत्री कर्मचन्द्र की देखरेख |
रिवीजन पॉइंटर्स
- बीका जोधा के दूसरे पुत्र थे; 1465 में चाचा कांधल के साथ उन्होंने जांगल देश जीतना शुरू किया।
- बीकानेर नगर की नींव 12 अप्रैल 1488 (आखातीज) को करणी माता के आशीर्वाद से पड़ी; 1485 में शुरू हुआ पहला दुर्ग अधूरा रहा — आज की «बीकाजी की टेकरी»।
- बीकानेर के राजा का राजतिलक गोदारा जाट करते थे; नाम की कथा है — बीका + नरा = बीकानेर।
- पूरे राठौड़ वंश की कुलदेवी नागणेची हैं, जबकि बीकानेर शाखा की कुलदेवी करणी माता हैं।
- लूणकरण (1505–1526) को «कलयुग का कर्ण» कहा गया; 1526 में ढोसी (नारनौल के पास) लड़ते हुए मारे गए।
- जैतसी ने 26 अक्टूबर 1534 को रातीघाटी में कामरान को बीकानेर दुर्ग से भगाया, पर 1541 में पाहेबा/साहेबा में मालदेव के हाथों मारे गए।
- कल्याणमल (1541–1574) का राज्याभिषेक ठुकरियासर में हुआ और उन्होंने सिरसा से कोशिश करते हुए 5 जनवरी 1544 को गिरी-सुमेल में शेरशाह का साथ दिया।
- राजस्थान के पितृहंता — ऊदा (कुम्भा के पुत्र, मेवाड़), मालदेव (गांगा के पुत्र), बख्तसिंह (अजीतसिंह के पुत्र); चौहानों में जग्गदेव।
- रायसिंह (गद्दी 25 सितम्बर 1574) से पहले शासक «राव» कहलाते थे, बाद में «महाराजाधिराज / महाराजा»; उपनाम «राजपूताने का कर्ण»।
अगले भाग में दलपत की क़ैद, सूरसिंह-कर्णसिंह के अभियान, मतीरे की राड़, अनूपसिंह का स्वर्णकाल, 1818 की संधि और महाराजा गंगासिंह से अन्तिम शासक सार्दुल सिंह तक का दौर।
पिछला भाग: मारवाड़ का राठौड़ राजवंश: अभयसिंह से हनुवंत सिंह एवं उपाधियाँ, उपनाम, ग्रन्थ
अगला भाग: बीकानेर का राठौड़ राजवंश: दलपतसिंह से अनूपसिंह एवं स्वरूपसिंह से डूँगरसिंह
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