जैसलमेर की कथा में राजधानी और शासकों के साथ यह भी पूछा जा सकता है कि कौन-सी रियासत किस बात में अकेली थी। इस भाग में घड़सी से गिरधरसिंह तक के भाटी शासक पूरे होते हैं, फिर करौली, चावड़ा, वरीक व औलीकर वंश आते हैं। अन्त में टोंक, झालावाड़ और अलवर की रियासतें हैं। «पहली», «एकमात्र» और «आख़िरी» जैसे शब्दों वाले तथ्य अलग से पक्के कर लें।
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1. घड़सी से अमरसिंह तक
| शासक | काल | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| घड़सी | 1343–1361 | घड़सीसर सरोवर (गड़ीसर तालाब) |
| लक्ष्मण (केहर के पुत्र) | 1396–1436 | दुर्ग में लक्ष्मीनाथ मन्दिर; शासक स्वयं को लक्ष्मीनाथ का प्रतिनिधि मानकर राज चलाते थे |
| बैरीसिंह | 1436–1447 | लक्ष्मण का पुत्र |
| जैतसिंह द्वितीय | 1506–1528 | — |
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उपाधियाँ
- राव
- रावल (852, देवराज)
- महारावल (1613–27, कल्याण)
अकबर से सम्बन्ध
- हरराय 1561
- नागौर दरबार 1570
- पुत्री का विवाह अकबर से
ट्रिक: 1550 अर्द्ध साका (लूणकरण) → 1570 नागौर दरबार (हरराय) → 1688 अमर सागर (अमरसिंह)।
- अर्द्ध साका ➜ 1550 · अमीर अली (कंधार)
- पिंगल शिरोमणि ➜ रावल हरराय
- डोडिया ➜ ताँबे की मुद्रा 1659
2. अखैसिंह से गिरधरसिंह तक
| शासक | काल | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| अखैसिंह | 1722–1761 | 1756 में टकसाल (मुहम्मदशाही व अखैशाही सिक्के); अखैपोल (मुख्य प्रवेश-द्वार) व अखैविलास महल |
| मूलराज द्वितीय | 1761–1819 | किशनगढ़ की राजकुमारी रूपकंवर से 1772 में शादी; कम्पनी-संधि 12 दिसम्बर 1818 की; साहित्य-प्रेमी — लक्ष्मी कीर्ति संवाद |
| गजसिंह | 1820–1846 | 1828 में पालीवालों का जैसलमेर-त्याग; बासनपीर का युद्ध (1828) — बीकानेर की सेना हारी |
| रणजीतसिंह | 1846–1864 | 1857 में खुलकर अंग्रेज़ों का साथ; गोकुल नाथ भट्ट — रणजीत रत्नमाला; भट्टि वंश प्रशस्ति |
… शेष 4 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1756 | टकसाल की स्थापना | अखैसिंह |
| 12 दिसम्बर 1818 | ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि | मूलराज द्वितीय |
| 1828 | पालीवालों का जैसलमेर-त्याग; बासनपीर का युद्ध | गजसिंह |
| 19 अक्टूबर 1865 | बैरीशाल गद्दी पर | कर्नल ईडन के समझाने पर |
… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
याद रखें: बासनपीर (1828): जैसलमेर जीता, बीकानेर हारा — इसी वर्ष पालीवालों ने जैसलमेर छोड़ा।
3. करौली · चावड़ा · प्राचीन वंश
जैसलमेर के अतिरिक्त यादवों का दूसरा राज्य करौली में था। कहा जाता है कि इस वंश की जड़ चन्द्रवंशी ययाति के बेटे यदु में है; इस राजघराने का दावा है कि वह मथुरा की शूरसेनी शाखा से निकला और इसी राह श्रीकृष्ण से जुड़ता है।
4. करौली के यदुवंशी
- जनपद-काल में इस भू-भाग का एक हिस्सा मत्स्य में और बाक़ी शूरसेन जनपद में गिना जाता था।
- विजयपाल यादव ने 1040 ई. में करौली में यदुवंश की स्थापना की; बयाना (भरतपुर) को राजधानी बनाकर बयाना दुर्ग बनवाया।
- तिमनगढ़ दुर्ग (करौली) विजयपाल के पुत्र तिमनपाल (त्रिभुवनपाल) की देन है। मुहम्मद गौरी ने शासक कुँवरपाल को हराकर तिमनगढ़ पर क़ब्ज़ा किया।
| शासक | क्या ख़ास |
|---|---|
| हरबक्षपाल | 9 नवम्बर 1817 को ब्रिटिश सरकार से संधि; 1817–18 की संधियों में राजस्थान की पहली रियासत जिसने अंग्रेज़ों से संधि की |
| नरसिंहपाल (मृत्यु 1852) | लॉर्ड डलहौज़ी ने करौली को कम्पनी राज्य में मिलाना चाहा; बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने अनुमति नहीं दी |
| मदनपाल (1854–1869) | 1857 की क्रान्ति में अंग्रेज़ों की सहायता; GCSI (ग्रांड कमांडर ऑफ द स्टार ऑफ इण्डिया); 1862 में गोद लेने की अनुमति; इन्हीं के आग्रह पर स्वामी दयानन्द की राजस्थान की पहली यात्रा जून 1865 |
करौली की राजधानियाँ
- बयाना (विजयपाल, 1040)
- तिमनगढ़ (तिमनपाल)
- कल्याणपुरी = करौली (अर्जुनपाल, 1348)
5. चावड़ा राजवंश
- भीनमाल चावड़ा राजपूतों का सबसे पुराना राज्य था; वढवाण (काठियावाड़) और अन्हिलवाड़ा (पाटन) में भी इनके राज्य थे।
- चावड़ों की अपनी मान्यता थी कि वे शिव के चाप (धनुष) से प्रकटे; इतिहासकारों में कोई इन्हें परमारों की, कुछ गुर्जरों की शाखा कहते हैं; कर्नल टॉड ने इन्हें सीथियन माना।
- संस्कृत लेखों में नाम चाप, चापोटक या चाबोटक मिलता है; राजधानी भीनमाल।
- प्रसिद्ध शासक वर्मल्लात — वसन्तगढ़ के 625 ई. के लेख से ज्ञात। कहा जाता है कि भीनमाल का राज्य चावड़ों को गुर्जरों से मिला।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 625 | वसन्तगढ़ का लेख | वर्मल्लात |
| 628 | ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त | व्याघ्रमुख का उल्लेख |
| 641 | ह्वेनसांग का भीनमाल आगमन | चावड़ा शासन |
ट्रिक: माघ (शिशुपाल वध) और ब्रह्मगुप्त (ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त) — दोनों भीनमाल के; शासक वर्मल्लात → सुप्रभदेव → व्याघ्रमुख की ओर इशारा।
6. वरीक व औलीकर वंश
- वरीक वंश ➜ बयाना (भरतपुर)
- लेख ➜ विजयगढ़ यूप स्तम्भ लेख · 371 ई.
- राजा ➜ विष्णुवर्धन (पिता यशोवर्धन)
- वरीक वंश बयाना अंचल का शासक था; 371 ई. के विजयगढ़ यूप स्तम्भ लेख में विष्णुवर्धन का नाम आता है, पिता यशोवर्धन। सम्भवतः ये समुद्रगुप्त के सामन्त थे।
- राजस्थान के दक्षिण-पूर्व में औलीकर वंश का शासन था; 423 ई. के गंगधार (झालावाड़) लेख से राजा विश्ववर्मा का पता चलता है।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 371 | विजयगढ़ लेख | वरीक — बयाना |
| 423 | गंगधार लेख | औलीकर — झालावाड़ |
7. पाँच अन्य रियासतें
| रियासत | बनी | संस्थापक | अन्तिम शासक | विलय |
|---|---|---|---|---|
| टोंक | 1817 की संधि | अमीर ख़ाँ पिण्डारी | फ़ारूख़ अली ख़ाँ | 25 मार्च 1948 |
| झालावाड़ | 1838 | मदनसिंह झाला | हरिश्चन्द्र | 25 मार्च 1948 |
| अलवर | 1775 | प्रतापसिंह नरूका | तेजसिंह | 18 मार्च 1948 |
- टोंक ➜ राजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत
- झालावाड़ ➜ अंग्रेज़ों की बनाई आख़िरी रियासत
- अलवर ➜ प्राचीन मत्स्य प्रदेश का भाग
8. टोंक का मुस्लिम राज्य
- संस्थापक मोहम्मद अमीर ख़ाँ पिण्डारी — मूलतः अफ़गान वंश का; पहले इन्दौर के होल्कर की सेना में भर्ती होकर उसका मुख्य सेनानायक बना। जन्म 1768; नवाब 1817–1834।
- ईस्ट इंडिया कम्पनी के साथ 15 नवम्बर 1817 की संधि — इसके बदले टोंक का पहला नवाब बनने का सम्मान और राज्य।
- टोंक राज्य में राजपूताना एजेंसी के तीन ज़िले — टोंक, अलीगढ़ (रामपुरा), निम्बाहेड़ा — और सेन्ट्रल एजेंसी के तीन — छबड़ा, पिरावा, सिरोंज शामिल थे।
- वज़ीर ख़ाँ (1834–1864) के समय 1857 का विद्रोह; नवाब वज़ीरुद्दौला ने भी राजपूताने के अन्य शासकों की तरह अंग्रेज़ों की मदद की।
9. झालावाड़ का झाला वंश
- 1838 में अंग्रेज़ों ने कोटा से 19 परगने अलग करके नया झालावाड़ राज्य बनाया (एक मत 17 परगने राजपूताना एजेंसी को देने का भी है); जालिमसिंह का पौत्र मदनसिंह पहला शासक। अप्रैल 1838 की संधि से रियासत को मान्यता मिली।
- राजराणा मदनसिंह (1838–1845) ➜ 8 अप्रैल 1838 को संधि: 80,000 रुपये वार्षिक ख़िराज; 1 अगस्त 1838 का राज्याभिषेक पाटन में; पाटन का नाम झालरापाटन, राज्य का नाम झालावाड़; शासक की उपाधि राजराणा।
- पृथ्वीसिंह (1845–1875) ➜ 1857 में अंग्रेज़ों की सहायता; रेलायता के युद्ध में तात्या टोपे ने उन्हें हराकर झालावाड़ पर अधिकार कर लिया; 1862 में गोद लेने का अधिकार।
- जालिमसिंह द्वितीय (1875–1896) ➜ 1881 में नमक संधि; पॉलिटिकल एजेन्ट से मतभेद के कारण 1896 में गद्दी से हटाए गए; 1 जनवरी 1899 को कुछ परगने कोटा को लौटाए गए।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1838 | कोटा से 19 परगने अलग | |
| 8 अप्रैल 1838 | मदनसिंह की संधि | 80,000 रु. ख़िराज |
| 1 अगस्त 1838 | राज्याभिषेक | पाटन → झालरापाटन |
| 1881 | नमक संधि | जालिमसिंह द्वितीय |
10. अलवर का कछवाहा वंश
- अलवर प्राचीन मत्स्य प्रदेश का भाग रहा; तब राजधानी विराटनगर (बैराठ)। कनिंघम के अनुसार नाम साल्व जाति से — साल्वपुर → सल्वर → हलवर → अलवर।
- माचेड़ी (अलवर) का धूसर बनिया हेमचन्द्र (हेमू) पृथ्वीराज चौहान के बाद दिल्ली के सिंहासन पर बैठने वाला एकमात्र हिन्दू शासक; उसने विक्रमादित्य हेमचन्द्र नाम रखा और अपने नाम के सिक्के चलवाए; शुरुआती दिनों में वह रेवाड़ी की गलियों में नमक बेचकर गुज़ारा करता था।
- मौजमाबाद की जागीर आमेर के उदयकरण के बेटे वीरसिंह को दी गई; पुत्र नरू के वंशज नरूका कछवाहा। मिर्ज़ा राजा जयसिंह ने मौजमाबाद के कल्याणसिंह नरूका को माचेड़ी की जागीर दी।
| शासक | काल | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| प्रतापसिंह (मोहब्बतसिंह नरूका का पुत्र) | 1775–1790 | 1775 में अलवर राज्य; आरम्भ में माधोसिंह प्रथम (जयपुर) का सेवक; 1767 मावण्डा–मंढोली में जवाहरसिंह के विरुद्ध जयपुर की मदद, उसके बाद जाटों से अलवर-दुर्ग और आसपास का इलाक़ा छीना; नजफ़ ख़ाँ को आगरा-विजय में सहायता; 1774 में राव राजा बहादुर और 5000 का मनसब; माचेड़ी जयपुर से स्वतन्त्र — दिसम्बर 1775 से स्वतन्त्र शासक |
| बख्तावरसिंह | 1790–1815 | लसवाड़ी का युद्ध (1803) में मराठों के विरुद्ध अंग्रेज़ों की सहायता; जनरल लेक से मिले 13 परगने, जिनमें नीमराणा भी; 14 नवम्बर 1803 की संधि से तिजारा, टपूकड़ा, कठूमर |
| विनयसिंह | 1815–1857 | बख्तावरसिंह का भतीजा; उसके साथ नाबालिग बलवंतसिंह (पासवान-पुत्र) भी गद्दी पर — दबाव में बलवंतसिंह को नीमराणा-तिजारा की जागीर देकर हटाया, इस तरह नीमराणा अलग ठिकाना बना; 1857 में अंग्रेज़ों की सहायता; उसी वर्ष निधन |
| शिवदानसिंह | 1857–1874 | अल्पवयस्क; शासन मुंशी अम्मू ने सँभाला; राजपूत सरदारों के विद्रोह की अव्यवस्था पॉलिटिकल एजेन्ट निक्सन ने |
11. रैपिड फायर तथ्य
- अर्द्ध साका ➜ 1550, लूणकरण के समय; अमीर अली (कंधार)
- पिंगल शिरोमणि ➜ रावल हरराय की रचना
- जैसलमेर की टकसाल ➜ 1756, अखैसिंह ने स्थापित की
- बासनपीर का युद्ध ➜ 1828, गजसिंह; बीकानेर की सेना हारी, उसी वर्ष पालीवालों ने जैसलमेर छोड़ा
- करौली में यदुवंश की स्थापना ➜ 1040, विजयपाल; राजधानी बयाना
- अंग्रेज़ों से संधि करने वाली राजस्थान की पहली रियासत ➜ करौली, 9 नवम्बर 1817 (हरबक्षपाल)
- चावड़ा शासक वर्मल्लात ➜ 625 ई. के वसन्तगढ़ लेख से ज्ञात; राजधानी भीनमाल
- टोंक ➜ राजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत; संस्थापक अमीर ख़ाँ पिण्डारी
- झालावाड़ ➜ 1838, अंग्रेज़ों की बनाई आख़िरी रियासत; पहले शासक मदनसिंह झाला
अगले भाग में शेखावाटी के कछवाहे और किशनगढ़ का राठौड़ वंश, फिर मेवाड़ की गुहिल शाखाएँ — डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, शाहपुरा — और साकों की तालिका।
पिछला भाग: राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश: परमार राजवंश एवं जैसलमेर के भाटी
अगला भाग: राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश: मेवाड़ की गुहिल शाखाएँ
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