मध्यकालीन प्रशासन व सामंती व्यवस्था: केन्द्रीय प्रशासन एवं भूमि व भू-राजस्व – Rajasthan History Chapter 33

मध्यकालीन राजपूत रियासतों का केन्द्रीय व स्थानीय प्रशासन, भूमि के प्रकार और लगान वसूलने की विधियाँ।

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In this chapter (17 sections)
  1. एक नज़र में
  2. केन्द्रीय प्रशासन
  3. राजा, युवराज व सामंत
  4. मंत्रिमंडल व प्रधान
  5. दीवान, बख्शी, मुत्सद्दी
  6. अन्य अफ़सर व विभाग
  7. स्थानीय प्रशासन
  8. परगना प्रशासन
  9. बीकानेर का चीरा
  10. नगर प्रशासन
  11. ग्राम प्रशासन
  12. भूमि व भू-राजस्व
  13. स्वामित्व के प्रकार
  14. अन्य भूमि-अनुदान
  15. किसान व भूमि का वर्गीकरण
  16. लगान वसूलने की विधियाँ
  17. रैपिड फायर तथ्य

रियासती शासन पढ़ते समय सबसे बड़ी उलझन यह है कि एक ही पद को हर राज्य में अलग नाम मिल जाता है — कहीं मुसाहिब, कहीं दीवान, कहीं फौजदार। इसलिए पद, उसका काम और राज्य का नाम, तीनों को जोड़कर याद करना ज़रूरी है। इस भाग में राजा से लेकर गाँव के पटवारी तक की पूरी सीढ़ी दी गई है, उसके बाद ज़मीन के प्रकार, किसानों की श्रेणियाँ और लगान वसूलने के तरीके।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — मध्यकालीन प्रशासन व सामंती व्यवस्था, 7 चॉक-बोर्ड चित्र, 4 चार्ट, 23 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. एक नज़र में

आठवीं से बारहवीं सदी के राजस्थान के शासन की सीधी जानकारी कम मिलती है; दानपत्रों, शिलालेखों और साहित्यिक ग्रंथों से ही उसकी झलक मिलती है। जब दिल्ली-आगरा में मुगल सत्ता जमी और राजपूत राजा उसके सम्पर्क में आए, तब रियासतों के प्रशासन पर मुगल ढंग की छाप साफ़ दिखने लगी।

  • रेख पहली बार ➜ मारवाड़ — सूरसिंह
  • अमरशाही रेख ➜ मेवाड़ — अमरसिंह द्वितीय
  • पट्टा प्रणाली ➜ बीकानेर — रायसिंह

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

काल / क्रमघटनाविवरण
953 ई.सारणेश्वर प्रशस्तिउदयपुर के सारणेश्वर मंदिर का लेख — मेवाड़ के मंत्रिमंडल के पदों का पूर्वमध्यकालीन ब्योरा
1574–1612रायसिंह (बीकानेर)रायसिंह ने बीकानेर में पट्टे की प्रथा पहली बार चलाई; सामंती ढाँचा बदला
1583–95मोटा राजा उदयसिंह (जोधपुर)उत्तराधिकार शुल्क को पेशकशी के रूप में चलाया
1595–1619सूरसिंह (मारवाड़)पहली बार जागीरों की रेख तय हुई

… शेष 4 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

2. केन्द्रीय प्रशासन

  • शासन की धुरी राजा था; पर उसकी मनमानी पर मंत्रिमंडल, सामंत, धर्मशास्त्र की मर्यादा और प्रजा का अंकुश रहता था।
  • राजा के बाद सबसे ऊँचा अधिकारी प्रधान होता था, फिर दीवान (धन) और बख्शी (सेना)।
  • हर रियासत में एक ही पद के नाम अलग थे — आगे की तालिकाएँ यही तुलना देती हैं।

3. राजा, युवराज व सामंत

पूरे राज्य की सैनिक, राजनीतिक, न्यायिक और प्रशासनिक शक्ति राजा में जुड़ी हुई थी।

राजा के अधिकार

  • मंत्रियों, राजदूतों और बड़े अफ़सरों की नियुक्ति।
  • राज्य का सर्वोच्च न्यायाधीश — दीवानी और फौजदारी दोनों में आख़िरी फ़ैसला उसी का।
  • लड़ाई के समय आम तौर पर सेना की कमान स्वयं सँभालता।

खिलअत व टीका

मुगल काल में नए राजा को गद्दी पर बैठने से पहले बादशाह की मान्यता लेनी पड़ती थी। इसके लिए उसे बड़ी रकम और भेंटें देनी होती थीं, तब बादशाह की ओर से खिलअत (सम्मान-वस्त्र) और टीका मिलता था।

युवराज

  • बहुविवाह के कारण राजकुमार कई होते थे; अक्सर सबसे बड़े पुत्र को युवराज घोषित किया जाता।
  • चुनाव राजा का अपना होता ➜ वह किसी एक को उत्तराधिकारी चुनता।

सामंत

  • राजा के बाद शासन में सबसे बड़ी हैसियत सामंतों की — उन्हें राज्य की रीढ़ कहा गया।
  • राज्य की रक्षा का भार उन पर था और बुलावे पर वे सैनिक सेवा में हाज़िर होते थे; उनके सहयोग बिना राजा अकेला शासन नहीं चला सकता था।

4. मंत्रिमंडल व प्रधान

  • मुगलों के सम्पर्क से बहुत पहले के ग्रंथों और शिलालेखों में भी राजा की सहायता के लिए मंत्रिमंडल मिलता है।
  • मंत्री चुनते समय कुल, जाति और काबिलियत देखी जाती थी।
  • राजा चाहे जब नियुक्त करता या हटा देता; पर जो मंत्री जनहित के कामों में योग्य ठहरते, उनका पद पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता।
स्रोत / कालमंत्रिमंडल के पद
सारणेश्वर प्रशस्ति, 953 ई. (उदयपुर)अमात्य (मुख्यमंत्री) · अक्षपटलिक (वित्त / आय-व्यय का हिसाब) · बंदीपति (मुख्य माट) आदि
महाराणा राजसिंह द्वितीय (मेवाड़)प्रधान · पुरोहित · खजांची · पाठशालाध्यक्ष · धर्माध्यक्ष · दानाध्यक्ष · मुख्य मुसाहिब

प्रधान (प्रधानमंत्री)

  • राजधानी में राजा के ठीक नीचे का सबसे बड़ा पद; राजा का प्रमुख परामर्शदाता।
  • सेना और न्याय के कामों में भी राजा का हाथ बँटाता।
  • राजा की गैर-मौजूदगी में राज्य चलाने की ज़िम्मेदारी उसी की।
रियासतप्रधानमंत्री का पदनाम
जयपुरमुसाहिब (प्रधानमंत्री + सैन्य मंत्री)
कोटाफौजदार या दीवान
बीकानेरदीवान; कहीं-कहीं मुख्त्यार
बूँदीदीवान

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ट्रिक: कोटा का फौजदार झाला जालिमसिंह था — राज्य की असली बागडोर उसी के हाथ में थी। जयपुर का मुसाहिब और बीकानेर का मुख्त्यार याद रखें — ये दोनों नाम अलग-अलग पूछे जाते हैं।

5. दीवान, बख्शी, मुत्सद्दी

दीवान

  • राजपूत रियासतों में प्रशासन-तंत्र का मुखिया; वित्त और राजस्व पर नियंत्रण।
  • उससे अपेक्षा थी कि आमदनी बढ़ाकर सारे ख़र्च निभाए।
  • प्रधान का पद न होने पर दीवान ही उसकी भूमिका निभाता।
  • नियुक्ति पर उसे अपने नाम की राजकीय मुहर (सील) सौंपी जाती; हर बड़े सरकारी कागज़ पर वही मुहर लगती।

बख्शी

  • दीवान के बाद दूसरा बड़ा पदाधिकारी; मुख्यतः सेना विभाग का अध्यक्ष।
  • रसद, अनुशासन, सैनिक-प्रशिक्षण, युद्धभूमि में घायल सैनिकों व पशुओं का उपचार और सुरक्षा उसके ज़िम्मे।
  • उसके अधीन खबरनवीस, किलेदार, मुशरिफ, हवलदार, दरोगा तोपखाना काम करते।

मुत्सद्दी व शिकदार

  • रियासतों में प्रशासन चलाने वाले अधिकारी को सामान्यतः मुत्सद्दी कहा जाता था।
  • शिकदार परगने का मुखिया नहीं, बल्कि नगर कोतवाल के बराबर अधिकारी था; जोधपुर में शहर का पूरा प्रशासन और शांति-व्यवस्था उसके पास थी। आगे चलकर मारवाड़ में यही पद कोतवाल कहलाने लगा।
पदकिस विभाग का मुखिया
दीवानवित्त · राजस्व
बख्शीसेना
मुसाहिब (जयपुर)प्रधानमंत्री + सेना

6. अन्य अफ़सर व विभाग

पदकामदूसरे नाम / विशेष
खानसामा / खानसामाननिर्माण, सामान की ख़रीद और संग्रहउदयपुर में पुरानी परम्परा से पाकाध्यक्ष; जयपुर में खानसामान
वकीलपड़ोसी राज्यों से कूटनीति; मुगल काल में दरबार में राजा का प्रतिनिधिमुगल दरबार की ख़बरें राजा तक पहुँचाता
मीर मुंशीकूटनीतिक पत्र-व्यवहार का अलग विभागमारवाड़ में
खजांचीख़ज़ाने में आमद-ख़र्च का ब्योरामेवाड़ में आरम्भ में कोषपति

छोटे विभागों के दरोगा

याद रखें: दरोगा का नाम ही उसका विभाग बता देता है — डाकचौकी = डाक, सायर = चुंगी, आबदार = खाने-पीने का इंतज़ाम। कहीं-कहीं इन्हीं को हवलदार भी कहा गया।

7. स्थानीय प्रशासन

  • प्राचीन-पूर्वमध्य काल में छोटी इकाइयाँ ग्राम, मण्डल और दुर्ग थीं; इनके अधिकारी क्रमशः ग्रामिक, मण्डलपति और दुर्गाधिपति कहलाते थे।
  • मारवाड़ में शिक और परगना नाम की इकाइयाँ मिलती हैं।
  • मुगल सम्बन्धों के असर से राज्यों को परगनों में बाँटा गया; हर परगने में बीस या अधिक मौजे (गाँव) होते।

8. परगना प्रशासन

अधिकारीकाम
हाकिमपरगने का सर्वोच्च अधिकारी — शासन और न्याय
फौजदारपरगने का दूसरे दर्जे का अफ़सर; पुलिस-सैनिक बल की कमान और सुरक्षा की जवाबदेही; कई थानेदार उसके मातहत
ओहदेदारबड़े परगनों में हाकिम का सहायक
खुफिया नवीसपरगने का हाल-चाल दीवान तक पहुँचाना
रियासतपरगने का प्रधान अधिकारी
मारवाड़ · मेवाड़ · बीकानेरहाकिम
जयपुरफौजदार
कोटाहवालगिर

9. बीकानेर का चीरा

  • बीकानेर में क्षेत्रीय प्रशासन और राजस्व-वसूली के लिए चीरा व्यवस्था बनी।
  • हर चीरे में लगभग 200 गाँव शामिल होते थे।
  • चीरों के साथ परगने भी स्वतंत्र इकाई बने रहे।

ट्रिक: चीरा = बीकानेर, चिरायत = उसका मुखिया — दोनों शब्द एक ही अक्षर “ची” से शुरू होते हैं।

10. नगर प्रशासन

  • नगर का मुख्य अधिकारी कोतवाल; उसका काम नगर में शांति और व्यवस्था रखना।
  • मेवाड़ के हर बड़े नगर में नगरसेठ को न्यायाधीश मनोनीत किया जाता — नगरवासी और राज्य, दोनों उसका बड़ा आदर करते थे।
  • जोधपुर में नगर का सारा काम शिकदार के पास रहा, जो आगे चलकर कोतवाल कहलाया।

11. ग्राम प्रशासन

राजस्व की सुविधा के लिए ढाँचा

  1. परगना
  2. तपो (गाँवों का समूह)
  3. मौजा (गाँव) — सबसे छोटी इकाई
मौजे के प्रकारअर्थ
असलीपहले से बसे हुए मौजे
दाखिलीनए बसे मौजे
  • पूर्वमध्यकाल में गाँव के प्रधान को ग्रामिक कहते थे; ज़मीन के रिकॉर्ड और राजस्व का काम उसी के पास होने से आगे चलकर उसे पटवारी नाम भी मिल गया।
  • गाँव में स्थायी स्थानीय अधिकारी चौधरी या पटेल होता — प्रशासन और जनता के बीच कड़ी।
पटवारी के सहयोगीकाम
कनवारियाखेतों की रखवाली
तफेवारराज्य के हिस्से का लेखा-जोखा
तौलावाटीउपज तौलना

12. भूमि व भू-राजस्व

हर रियासत में राजस्व, कर और भूमि की व्यवस्था एक-सी नहीं थी। फिर भी मध्यकाल में राज्य की कमाई का मुख्य आधार खेती और उससे मिलने वाला राजस्व ही था।

13. स्वामित्व के प्रकार

प्रकारनियंत्रणविशेषता
खालसाराजा / राज्य का सीधा स्वामित्वज़्यादा पैदावार वाले परगना-गाँव यहाँ रखे जाते; प्रबन्ध दीवान के हाथ
हवालादेखभाल हवालदार की—
जागीरसीधे जागीरदार / सामंत के हाथतय सालाना रकम राजकोष में जमा कराना ज़रूरी

रोचक तथ्य: चारणों को दान में मिली जागीर राजा भी नहीं लौटवाता था — पूरे राजस्थान में यह कहावत मशहूर थी: “उदक उथापै ताही उदक लागै नाहीं”।

14. अन्य भूमि-अनुदान

नामकिसे / क्यों
माफीब्राह्मण, चारण, भाट और संन्यासियों के नाम राजा का भूमि-दान
जीविकामहारानियों व राजा के करीबी रिश्तेदारों का गुज़ारा और मान बनाए रखने के लिए
जूनी जागीरराजा भाई-बन्धुओं की जागीर ज़ब्त करे तो उनके भरण-पोषण के लिए दी गई कुछ भूमि
डोहलीदेवस्थान या मठ को खेत (एक या कई) भेंट करना

15. किसान व भूमि का वर्गीकरण

रियासतवर्गीकरण / स्थिति
मारवाड़काश्तकार दो प्रकार के — बापीदार और गैर-बापीदार
जयपुरराजस्व की दृष्टि से गाँव असली और दाखली में बँटे
कोटातोजी तकशीम में गाँव असली और मजारा
काश्तकारअधिकार
बापीदारभूमि पर स्वामित्व; राज्य से कई रियायतें; खेत की लकड़ी और घास पर अधिकार; कुएँ खोदकर उपज बढ़ा सकता
गैर-बापीदारबापीदार जैसे हक़ नहीं; केवल शिकमी काश्तकार; हर साल निश्चित किराया चुकाकर खेत जोतने को लेता
मजारा (कोटा) का किसानअपनी जोत को न बेच सकता था, न गिरवी रख सकता

भू-राजस्व के नाम और आधार

  • राजस्व के पर्यायवाची नाम: लगान, भोग, भोज, हासिल।
  • भोग (राज्य का भाग) तय करते समय देखा जाता — भूमि का स्वरूप, फ़सल की विशेषता और काश्तकार की जाति।

16. लगान वसूलने की विधियाँ

पद्धतिकैसे चलती थी
लाटाठिकाने के अधिकारी की देखरेख में कटाई; साफ़ अनाज का ढेर तौला या रस्सी से नापा जाता और हिस्सा तौलकर लिया जाता
कूँता (कूँत)खेत में खड़ी फ़सल आँककर हिस्सा तय होता; मौक़े पर मालिक, ग्राम-कर्मचारी, पटेल, पटवारी व गाँव के प्रतिष्ठित लोग रहते; इसी का दूसरा नाम कांकड़ कूता
बँटाई (गल्ला बख्शी / दानाबंदी / भाओली)सबसे पुरानी और आम प्रणाली; राज्य को प्रायः उपज का 1/3
बीघोड़ीज़मीन की उर्वरता और पैदावार के हिसाब से प्रति बीघा कर — मारवाड़ और बीकानेर में

बँटाई के तीन रूप

रूपबँटवारा कब
खेत बँटाईफ़सल पकते ही खेत में ही
लंक बँटाईकटाई के बाद खलिहान में लाने पर
रास बँटाईअनाज तैयार होने के बाद

17. रैपिड फायर तथ्य

  • रेख पहली बार ➜ मारवाड़ — सूरसिंह
  • पट्टा प्रथा चलाने वाला ➜ बीकानेर के रायसिंह
  • अमरशाही रेख ➜ मेवाड़ — अमरसिंह द्वितीय
  • जयपुर का प्रधानमंत्री ➜ मुसाहिब (प्रधानमंत्री + सैन्य मंत्री)
  • कोटा का फौजदार ➜ झाला जालिमसिंह, जिनके हाथ में असली बागडोर थी
  • बीकानेर का चीरा ➜ लगभग 200 गाँव की इकाई, मुखिया चिरायत
  • परगने का सर्वोच्च अधिकारी ➜ हाकिम; जयपुर में फौजदार, कोटा में हवालगिर
  • सबसे पुरानी लगान पद्धति ➜ बँटाई, राज्य का हिस्सा प्रायः 1/3
  • बापीदार और गैर-बापीदार ➜ पहला भूमि का स्वामी, दूसरा केवल शिकमी काश्तकार

अगले भाग में भू-राजस्व के अलावा लगने वाले कर, रियासत-दर-रियासत उनके नाम और राजपूत रियासतों की सामंत-प्रणाली।

पिछला भाग: राजस्थान के अन्य महत्त्वपूर्ण राजवंश: मेवाड़ की गुहिल शाखाएँ

अगला भाग: मध्यकालीन प्रशासन व सामंती व्यवस्था: कर व लागें एवं सामंती व्यवस्था

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पूरी श्रृंखला: राजस्थान का इतिहास — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

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