बीकानेर का राठौड़ राजवंश: दलपतसिंह से अनूपसिंह एवं स्वरूपसिंह से डूँगरसिंह – Rajasthan History Chapter 25

बीकानेर के शासकों का पूरा क्रम — दलपतसिंह से डूँगरसिंह तक, फिर गंगासिंह और सार्दुल सिंह का दौर।

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In this chapter (15 sections)
  1. दलपतसिंह से अनूपसिंह
  2. दलपतसिंह और सूरसिंह
  3. कर्णसिंह
  4. अनूपसिंह
  5. स्वरूपसिंह से डूँगरसिंह
  6. स्वरूपसिंह से गजसिंह
  7. सूरतसिंह
  8. रतनसिंह
  9. सरदारसिंह और डूँगरसिंह
  10. गंगासिंह व सार्दुल सिंह
  11. शासन और सुधार
  12. युद्ध और विश्व-मंच
  13. गंगनहर और सार्वजनिक सुरक्षा क़ानून
  14. सार्दुल सिंह
  15. रैपिड फायर तथ्य

बीकानेर का इतिहास पढ़ते समय सबसे बड़ी उलझन शासकों के क्रम की होती है — कौन किसका उत्तराधिकारी था और किसके समय कौन-सी घटना घटी। इस भाग में पूरा क्रम एक सीध में रखा गया है: दलपतसिंह से अनूपसिंह, फिर स्वरूपसिंह से डूँगरसिंह, और अन्त में गंगासिंह व सार्दुल सिंह। हर शासक को उसकी पहचान वाली एक घटना से जोड़ लें तो क्रम अपने-आप बैठ जाता है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — बीकानेर का राठौड़ राजवंश, 4 चॉक-बोर्ड चित्र, 4 चार्ट, 25 फ्लैशकार्ड और 13 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. दलपतसिंह से अनूपसिंह

काल / क्रमघटनाविवरण
1612–13दलपतसिंहजहाँगीर का विरोध; अजमेर में क़ैद, वहीं मृत्यु।
1613–31सूरसिंहखुर्रम का विद्रोह (1622), जुझारसिंह बुन्देला (1628), ख़ानेजहाँ लोदी (1629–30) का दमन।
1631–69कर्णसिंहमतीरे की राड़ (1644); जांगलधर बादशाह।

2. दलपतसिंह और सूरसिंह

दलपतसिंह (1612–1613) रायसिंह का पुत्र था। गद्दी पाकर वह जहाँगीर के विरोध में काम करने लगा; नाराज़ जहाँगीर ने उसे अजमेर में क़ैद करवा दिया और वहीं उसकी मृत्यु हो गई।

सूरसिंह (1613–1631) — दलपत के बाद जहाँगीर ने उसे बीकानेर का शासक बनाया।

वर्षअभियानपक्ष
1622खुर्रम का विद्रोहजहाँगीर की ओर से दमन; खुर्रम ही बाद में शाहजहाँ बना और सूरसिंह को 4000 सवार व 4000 जात का मनसब दिया
1628जुझारसिंह बुन्देला का विद्रोहमुग़ल सेना की सहायता
1629–30ख़ानेजहाँ लोदी का विद्रोहमुग़ल सेना की सहायता

याद रखें: दो भाई, दो नियति — दलपत (विरोध → अजमेर में क़ैद) और सूर (सेवा → शाहजहाँ से मनसब)।

3. कर्णसिंह

  • काल ➜ 1631–1669 ई.
  • समकालीन ➜ शाहजहाँ, औरंगज़ेब
  • उपाधि ➜ जांगलधर बादशाह

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

  • शाहजहाँ के दक्खिन के अभियानों में कर्णसिंह की भूमिका अहम रही।
  • मतीरे की राड़ (1644): बीकानेर की फ़ौज का सामना नागौर के अमरसिंह राठौड़ से हुआ; नागौरी दस्तों ने पहले सीलवा दबा लिया, पर आख़िर में बाज़ी बीकानेर के हाथ रही।
  • 1658 में शाहजहाँ की बीमारी से तख़्त की लड़ाई शुरू हुई तो कर्णसिंह दरबार छोड़कर बीकानेर लौट आया; फिर औरंगज़ेब को प्रबल देख बेटों पद्मसिंह व केसरीसिंह को उसकी सहायता में भेज दिया।

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

विद्वानग्रन्थ
स्वयं कर्णसिंह (विद्वानों की सहायता से)साहित्य कल्पद्रुम
गंगानन्द मैथिलकर्मभूषण, काव्य-डाकिनी
भट्ट होसिककर्णावतंस

ट्रिक: पंजाब का अटक + उज़्बेक संकट = जांगलधर बादशाह (कर्णसिंह) और आलमगीर (औरंगज़ेब)।

4. अनूपसिंह

  • काल ➜ 1669–1698 ई.
  • उपाधियाँ ➜ महाराजा, माही मरातिब
  • पहला अभियान ➜ 1670 — मराठों के विरुद्ध

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

  • औरंगज़ेब ने 1670 में अनूपसिंह को मराठों के विरुद्ध भेजा; उसकी वीरता से प्रभावित होकर बादशाह ने “महाराजा” और “माही मरातिब” की उपाधियाँ दीं।
  • वह औरंगज़ेब का राजनीतिक सलाहकार था; 1685–86 में बीजापुर और 1687 में गोलकुण्डा के घेरे के समय मुग़ल सेना के साथ था।
  • उसका शासन “बीकानेर चित्रकला का स्वर्णकाल” कहा जाता है; इस समय बीकानेर शैली पर दक्षिण की चित्रकला का प्रभाव दिखता है।
  • दक्षिण के अभियानों में उसने अनेक मूर्तियाँ इकट्ठी करके बीकानेर भेजीं, जो “तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं” के मन्दिर में रखी गईं।
कविग्रन्थ
मणिरामअनूप व्यवहार सागर, अनूप विलास
अनंग भट्टतीर्थ रत्नाकर
वैद्यनाथज्योत्पति सार

याद रखें: अनूपसिंह = चित्रकला का स्वर्णकाल + पुस्तकालय + 33 करोड़ देवताओं का मन्दिर — तीन “संग्रह” की पहचान।

5. स्वरूपसिंह से डूँगरसिंह

शासककालमुख्य बात
स्वरूपसिंह1698–1700अनूपसिंह का पुत्र
सुजानसिंह1700–1735स्वरूपसिंह का छोटा भाई; हुरड़ा सम्मेलन (1734)
जोरावरसिंह1735–1746वैद्यकसार, पूजा पद्धति
गजसिंह1746–1787सफ़दरजंग का दमन; 7000 का मनसब

ट्रिक: क्रम याद करें — “स्वरूप सुजान, जोरावर गज, सूरत रतन सरदार डूँगर”।

6. स्वरूपसिंह से गजसिंह

  • स्वरूपसिंह (1698–1700) अनूपसिंह का पुत्र था।
  • सुजानसिंह (1700–1735) स्वरूपसिंह का छोटा भाई; इस समय मारवाड़ के अजीतसिंह और नागौर के बख्तसिंह ने बीकानेर पर हमले किए, पर सफल न हुए।
  • औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद सुजानसिंह के काल में बीकानेर के राजाओं का मुग़ल राजनीति से विशेष लगाव नहीं रहा; उसने 1734 के हुरड़ा सम्मेलन में बीकानेर की ओर से भाग लिया।
कविग्रन्थ
गोपीनाथ गाडणमहाराजा गजसिंघोत रो रूपक (ग्रन्थराज)
फतेराम सिंढायचमहाराजा गजसिंघ जी रा गीत दुहा कवित

7. सूरतसिंह

  • काल ➜ 1787–1828 ई.
  • भटनेर विजय ➜ 16 अप्रैल 1805
  • नया नाम ➜ हनुमानगढ़
काल / क्रमघटनाविवरण
16 अप्रैल 1805भटनेरज़ाबता ख़ाँ भाटी को हराकर दुर्ग जीता; हनुमान मन्दिर बनवाकर नाम हनुमानगढ़ रखा (मंगलवार का दिन)।
1814चूरूअमरचंद सुराणा की अगुआई में चढ़ाई; चूरू के क़िले से बीकानेरी फ़ौज पर चाँदी के गोले बरसे।
9 मार्च 1818अंग्रेज़ों से संधिसूरतसिंह ने कम्पनी से संधि की (गवर्नर-जनरल ने 21 मार्च को मंज़ूरी दी)।
  • सामन्तों की बग़ावत उसे झेलनी पड़ी, जो अंग्रेज़ी फ़ौज की मदद से कुचली गई।

8. रतनसिंह

  • वासणपी का युद्ध: 1828 में रतनसिंह ने जैसलमेर पर आक्रमण किया पर हार गया; मेवाड़ के महाराणा जवानसिंह की मध्यस्थता से 1835 में दोनों के बीच संधि हुई।
  • गयाजी में (1836) रतनसिंह ने राजपूत राजाओं को इकट्ठा कर बेटियों की हत्या न करने की क़सम दिलाई।
  • राज्य में 1844 में राजपूत कन्याओं की हत्या के विरुद्ध आण (राजाज्ञा) निकली।

दयालदास — जन्म 1798 में बीकानेर के कुडिया गाँव में; सूरतसिंह, रतनसिंह और सरदारसिंह — तीन महाराजाओं के दरबारी कवि। उनकी दयालदास री ख्यात (बीकानेर रै राठौड़ां री ख्यात) में राठौड़ों के उद्भव से सरदारसिंह के गद्दी पर बैठने (1851) तक का वृत्तान्त दर्ज है।

9. सरदारसिंह और डूँगरसिंह

  • सरदारसिंह (1851–1872) राजस्थान के शासकों में एकमात्र था जिसने 1857 की क्रान्ति के दमन में व्यक्तिगत रूप से सक्रिय भाग लिया।
  • बीकानेर में सती और जीवित समाधि की प्रथाओं पर पहली बार पाबन्दी उसी ने लगाई।
  • सरदारसिंह की निःसन्तान मृत्यु पर मेवाड़ महाराणा शम्भुसिंह की सिफ़ारिश से अंग्रेज़ सरकार ने 1872 में डूँगरसिंह (1872–1887) को बीकानेर का शासक बनाया।

10. गंगासिंह व सार्दुल सिंह

  • गद्दी ➜ 31 अगस्त 1887 (7 वर्ष की आयु)
  • काल ➜ 1887–1943
  • मृत्यु ➜ 2 फ़रवरी 1943, बम्बई

11. शासन और सुधार

  • भाई डूँगरसिंह के निधन पर 31 अगस्त 1887 को सात साल के गंगासिंह राजा बने।
  • शासन में सहायता के लिए कर्नल थॉर्नटन की अध्यक्षता में रीजेन्सी कौंसिल बनी।
  • उन्हें “आधुनिक बीकानेर का निर्माता” और “आधुनिक भारत का भगीरथ” कहा जाता है।
  • राजपूताने की सबसे लम्बी रेल-लाइन उन्हीं के राज्य में बिछी।
काल / क्रमघटनाविवरण
1887गद्दी7 वर्ष की आयु; रीजेन्सी कौंसिल।
1889गंगा रिसालाऊँट-सवार सैनिक टुकड़ी तैयार की।
1891PWDसड़क निर्माण के लिए।

12. युद्ध और विश्व-मंच

वर्षघटनागंगासिंह की भूमिका
1900–01बॉक्सर विद्रोह (चीन)गंगा रिसाला के साथ गए; पिटांग क़िले की जीत (सर अल्फ्रेड के साथ); के.सी.आई.ई. और चीन युद्ध पदक
1902एडवर्ड सप्तम का राज्याभिषेकलन्दन समारोह में शामिल; ए.डी.सी. बनाए गए
जनवरी 1903दिल्ली दरबार; सोमालीलैण्डड्यूक ऑफ़ कनाट के सम्मान में दरबार; गंगा रिसाला को मुहम्मद बिन अब्दुल्ला से लड़ने सोमालीलैण्ड भेजा
1914–18प्रथम विश्व युद्धशार्दुल लाइट इन्फेन्ट्री और गंगा रिसाला मोर्चे पर भेजे; ब्रिटिश इम्पीरियल वार कैबिनेट के सदस्य
  • रियासतों के प्रतिनिधि बनकर वे राष्ट्रमण्डल सम्मेलन में गए।
  • लन्दन के तीनों गोलमेज़ सम्मेलनों (1930, 1931, 1932) में जाने वाले राजस्थान के अकेले शासक; राष्ट्रसंघ के पाँचवें सत्र में भारत के प्रतिनिधि भी।

13. गंगनहर और सार्वजनिक सुरक्षा क़ानून

  • गंगनहर: 1921–27 के बीच सतलज (पंजाब) का जल बीकानेर तक पहुँचाने वाली नहर तैयार करवाई।
  • सार्वजनिक सुरक्षा क़ानून (1932): पब्लिक सैफ़्टी एक्ट बनाकर सरकार-विरोधी आन्दोलन करने वालों और अख़बार-प्रकाशन पर निषेध लगा दिया; देश भर में इसका विरोध हुआ और 17 दिसम्बर 1933 को “बीकानेर दिवस” मनाया गया।
  • 1937 में इंग्लैण्ड में राज्याभिषेक समारोह में भाग लिया।

गंगनहर की कड़ी

  1. पंजाब की सतलज
  2. गंगनहर 1921–27
  3. बीकानेर का मरुस्थल

14. सार्दुल सिंह

  • काल ➜ 1943–1949
  • विलय-पत्र ➜ 7 अगस्त 1947 — राजस्थान का पहला
  • संविधान सभा ➜ 1947 में पहला राजस्थानी राज्य
  • एकीकरण की घड़ी में बीकानेर की गद्दी पर वही थे।
  • उन्होंने नोता कर (विवाह निमंत्रण कर) और तख़्तनशीनी की माफ़ी (उत्तराधिकारी कर) समाप्त किए।
  • दूसरे महायुद्ध में बीकानेरी टुकड़ियों का मुआयना करने वे बर्मा और ईरान तक गए।
  • केन्द्रीय संविधान सभा में शामिल होने वाली राजस्थान की पहली रियासत बीकानेर थी (1947); बीकानेर की ओर से के.एम. पन्नीकर को मनोनीत किया गया।

15. रैपिड फायर तथ्य

  • मतीरे की राड़ ➜ 1644, कर्णसिंह के समय; सामने नागौर के अमरसिंह राठौड़
  • कर्णसिंह की उपाधि ➜ जांगलधर बादशाह
  • अनूपसिंह को मिली उपाधियाँ ➜ महाराजा और माही मरातिब
  • भटनेर विजय ➜ 16 अप्रैल 1805, सूरतसिंह के हाथों; नया नाम हनुमानगढ़
  • सती और जीवित समाधि पर पहली पाबन्दी ➜ सरदारसिंह ने लगाई
  • 1857 के दमन में व्यक्तिगत रूप से सक्रिय ➜ सरदारसिंह, राजस्थान के शासकों में अकेला
  • गंगनहर ➜ 1921–27, सतलज का जल बीकानेर तक
  • गोलमेज़ सम्मेलन ➜ तीनों (1930, 1931, 1932) में जाने वाले राजस्थान के अकेले शासक गंगासिंह
  • विलय-पत्र ➜ 7 अगस्त 1947, सार्दुल सिंह — राजस्थान का पहला

अगले भाग में आमेर के कछवाहा राजवंश की शुरुआत — दौसा की नींव, आमेर की राजधानी, भारमल व भगवन्तदास और मुग़लों से पहला रिश्ता।

पिछला भाग: बीकानेर का राठौड़ राजवंश: राव बीका और लूणकरण एवं जैतसी और कल्याणमल

अगला भाग: आमेर का कछवाहा राजवंश: आरम्भिक शासक एवं भारमल व भगवन्तदास

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