सीकर, शेखावाटी, मारवाड़ और बीकानेर में माँगें लगभग एक-सी थीं — बेगार, लाग-बाग और लगान। फ़र्क़ पहचानने के लिए जगह, तारीख़ और घटना का नाम पक्का रखना पड़ता है। इस भाग में मारवाड़ के जागीरदारों के विरुद्ध संघर्ष, सीकर ठिकाने का आन्दोलन, शेखावाटी का किसान आन्दोलन और बीकानेर के आन्दोलन आते हैं। बीकानेर में नहरी इलाक़े और जागीरी इलाक़े की दो धाराएँ अलग-अलग समझाई गई हैं।
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1. मारवाड़ — जागीरदारों के विरुद्ध
- मारवाड़ हितकारिणी सभा ने मई 1929 में बेगार, लाग-बाग और लगान-दरों पर जागीरदारों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला; जागीरदार क़रीब 136 लागतें लेते थे।
- किसानों की आवाज़ उठाई ➜ जयनारायण व्यास, आनन्दराज सुराणा, भँवरलाल सर्राफ, हेमचन्द्र छगानी ने।
- सभा ने व्यास की दो पुस्तिकाएँ छापीं — “पोपाबाई की पोल” और “मारवाड़ की अवस्था”।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 24–25 नवम्बर 1931 | पुष्कर अधिवेशन | मारवाड़ राज्य लोक परिषद् का अधिवेशन — अध्यक्ष चाँदकरण शारदा, मुख्य अतिथि कस्तूरबा गाँधी; बिघोड़ी व बेगार के विरुद्ध प्रस्ताव |
| 16 जून 1934 | बिघोड़ी घटी | रियायतों के बाद दर में कमी; खालसा क्षेत्र का आन्दोलन शान्त |
| 1936 | 119 लागतें समाप्त घोषित | पर जागीरदार वसूलते रहे |
| 7 सितम्बर 1939 | अवैध लागतों के विरुद्ध आन्दोलन | मारवाड़ राज्य लोक परिषद् ने समर्थन किया; जागीरदारों ने मारपीट की, फ़सलें नष्ट कीं |
… शेष 7 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
मारवाड़ महाराजा ने आन्दोलन को बाँटने के लिए हर ठिकाने की शिकायत अलग-अलग निपटानी शुरू की और लाग-बाग व लगान की जाँच को आयोग बैठाया।
चण्डावल जैसी घटनाएँ
- उसी दिन (28 मार्च 1942) निमाज, गुन्दोज, रोडू, धामली में भी चण्डावल जैसा बर्ताव हुआ।
- जागीरदारों की शह पर 1942 में रोडू के उमाराम चौधरी और मीठड़ी के चैनदास स्वामी से मारपीट हुई।
- गुन्दोज के ठाकुर और उसके लोगों ने वहाँ की लोक परिषद् के प्रधान अमरसिंह की जान लेने का प्रयास किया।
डाबड़ा काण्ड — 13 मार्च 1947
- डाबड़ा गाँव (डीडवाना-कुचामन) में मारवाड़ लोक परिषद् व किसान सभा ने किसान सम्मेलन रखा; मुख्य आयोजक मथुरादास माथुर; जागीर-प्रथा व लाग-बाग के विरोध में नारे लगे।
- डीडवाना से आए कार्यकर्ताओं में शामिल — हरिन्द्र कुमार, वंशीधर पुरोहित, किशनलाल शाह, राधाकिशन बोहरा “तात”, नृसिंह कछवाहा, चुन्नीलाल शर्मा, जगन्नराज चौपासनीवाला, द्वारकादास पुरोहित व मथुरादास माथुर आदि।
- जाट किसानों की टोली जागीरदार की गढ़ी के निकट गई तो ठिकाने के कर्मचारियों और जागीरदार के सशस्त्र आदमियों ने उन पर धावा बोल दिया; जागीरदार-पक्ष का महताबसिंह मारा गया, किसानों में पन्नाराम, नन्दाराम, जग्गू जाट, चुन्नीलाल शर्मा, रामूराम (लाडनूं), रुघाराम चौधरी समेत 12 किसान शहीद हुए।
ट्रिक: मारवाड़ के तीन “नाम” — लोक परिषद् अधिवेशन पुष्कर (1931), किसान सभा जोधपुर (1941), बलिदान डाबड़ा (1947)।
2. सीकर ठिकाने का आन्दोलन
- शेखावाटी क्षेत्र में किसान आन्दोलन की शुरुआत सबसे पहले सीकर ठिकाने से हुई; अधिकतर किसान जाट थे। भूमि खालसा और जागीरी दो हिस्सों में बँटी थी।
- जून 1922 में नए राव राजा कल्याणसिंह ने पूर्व ठाकुर के मृत्युभोज और अपने पदग्रहण-समारोह का ख़र्च बताकर लगान 25 से 50 प्रतिशत बढ़ा दिया।
- विरोध पर अगले वर्ष से छूट का आश्वासन दिया, पर 1923 में भी बढ़ी दरों से सख़्ती से वसूली हुई; किसानों ने जयपुर महाराजा से शिकायत की।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| जुलाई 1924 | जयपुर में शिकायत | किसानों ने मुख्यमंत्री ग्लेन्सी के सामने बात रखी; रामनारायण चौधरी ने समझौते की कोशिश की, ठिकाना नहीं माना |
| 11 फ़रवरी 1925 | चौधरी निष्कासित | रामनारायण चौधरी तरुण राजस्थान और लन्दन के डेली हेराल्ड में किसानों के पक्ष में लिख रहे थे — उन्हें जयपुर राज्य से बाहर जाने का आदेश; तरुण राजस्थान पर रोक |
| 8 अगस्त 1925 | ब्रिटिश संसद में चर्चा | हाऊस ऑफ़ कॉमन्स में सीकर आन्दोलन पर चर्चा; रावराजा ने जाँच आयोग बनाया और अंग्रेज़ों ने भूमि बन्दोबस्त की सलाह दी |
| 1925–28 | जरीब की बेईमानी | सर्वेक्षण से पहले ठाकुर ने जरीब छोटी करवा दी ताकि बीघे बढ़ें; 1928 में किसानों ने भाँपा और जयपुर महाराजा व ब्रिटिश रेज़ीडेंट से शिकायत की |
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कुदण गाँव हत्याकाण्ड (25 अप्रैल 1935)
- कैप्टन वेब को लेकर ठिकाने का राजस्व अधिकारी कुदण गाँव लगान उगाहने गया; धापी दादी के कहने पर किसानों ने इनकार किया तो वेब ने गोलियाँ चलवाईं और गाँव में लूट मचाई।
- 4 जाट (चेतराम भूकर, टीकुराम भूकर, तुलछाराम भूकर, आशाराम पिलानिया) मारे गए, 14 घायल हुए।
- गोठड़ा व पलथाना में भी लूट और महिलाओं से दुर्व्यवहार हुआ — चर्चा ब्रिटिश संसद तक पहुँची; विरोध में पूरे भारत में “सीकर दिवस” मनाया गया।
ट्रिक: सीकर का क्रम — लगान +25–50% (1922) → ग्लेन्सी से शिकायत (1924) → कॉमन्स में चर्चा (1925) → जाट महायज्ञ (जनवरी 1934) → कटराथल (25 अप्रैल 1934) → कुदण (25 अप्रैल 1935)।
3. शेखावाटी का किसान आन्दोलन
- शेखावाटी में छोटे-बड़े 421 जागीरदार थे; पाँच बड़ी जागीरें — नवलगढ़, मण्डावा, डूंडलोद, बिसाऊ, मलसीसर — “पंचपाणे” कहलाती थीं।
- किसानों की मुख्य समस्याएँ ➜ जागीरदारों के अत्याचार, लगान-वृद्धि, बेगार और किसान-स्त्रियों से छेड़छाड़।
- 1921 में हरलालसिंह और उनकी पत्नी किशोरी देवी ने शेखावाटी में किसान पंचायतें बनाईं।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| अक्टूबर 1925 | पुष्कर में जाट महासभा | अखिल भारतीय जाट महासभा का अधिवेशन (अध्यक्ष भरतपुर के महाराजा); शेखावाटी के जाट बड़ी संख्या में |
| 5 नवम्बर 1925 | जाट संघर्ष समिति | किसानों की सभा में गठित |
| 16 मई 1934 | हनुमानपुरा की घटना | हमीरवास के ठाकुर कल्याणसिंह के आदमियों ने हनुमानपुरा के जाटों के घरों में आग लगाई — 23 घर राख |
| 21 जून 1934 | जयसिंहपुरा हत्याकाण्ड | खेतों में काम कर रहे किसानों को घेरकर डूंडलोद ठाकुर के भाई ईश्वरसिंह ने गोली चलाई — 4 जाट मारे गए; ईश्वरसिंह को डेढ़ वर्ष की सज़ा मिली |
… शेष 4 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
जयपुर रियासत में यह पहला मुक़दमा था जिसमें जाट अपने हत्यारों को दण्ड दिला सके; ज़ुल्म थामने के लिए अंग्रेज़ अधिकारी डब्ल्यू. टी. वेब तैनात हुआ।
4. बीकानेर के किसान आन्दोलन
बीकानेर के किसान आन्दोलन दूसरी रियासतों से देर से शुरू हुए; इनकी दो धाराएँ हैं — नहर वाले इलाक़े का आन्दोलन और जागीरदारों के गाँवों का आन्दोलन।
गंगनहर क्षेत्र
- 1927 के बाद गंगनहर का पानी मिलने लगा; 1929 में पानी के दाम, उसकी मात्रा, सिंचाई कर और बकाया रक़म के ब्याज को लेकर किसान असन्तुष्ट हुए। बीकानेर में आन्दोलन की पहल यहीं के किसानों ने की।
- 20 अप्रैल 1929 को नहरी किसानों ने जमींदार संघ बनाया — अध्यक्ष दरबारा सिंह; संघ ने सरकार को ज्ञापन दिया।
- महाराजा ने 1932–34 में पानी की कमी देख पानी-दर और ब्याज में रियायत दी; ब्याज व लगान पर संघर्ष 1933 से 1941 तक चलता रहा।
जागीरी क्षेत्र
- लगान के ऊपर जागीरदार 37 तरह की लागतें भी वसूलते थे; सीकर-शेखावाटी से प्रेरणा मिली, और कई किसान सीकर के जाट प्रजापति महायज्ञ में भी गए।
- उदरासर (बीकानेर) में 1937 में जीवन चौधरी के नेतृत्व में जागीरदारों के गाँवों में बेगार और लाग-बाग को लेकर राज्य का पहला आन्दोलन उठा; महाराजा ने मिलने से मना किया और दमन किया — मार्च 1937 में बाबू मुक्ता प्रसाद के साथ जीवन चौधरी को राज्य और प्रजामण्डल से निकाल दिया गया; असन्तोष देखकर लगान और चराई कर में थोड़ी राहत दी गई।
- महाजन ठिकाना (1938) — किसानों ने बीकानेर महाराजा से शिकायत की; जागीरदार ने कमी नहीं की। 16 जनवरी 1939 को खानीसर में सभा कर लगान न देने का निर्णय; ठिकाने ने नेताओं की सम्पत्ति नीलाम करनी शुरू की। राज्य ने समझौता कराया और 4 अक्टूबर 1940 को जागीरी क्षेत्र में 23 लागतें ख़त्म करने का आदेश निकला।
दूधवाखारा (चूरू)
- दूधवाखारा के जागीरदार सूरजमल सिंह शेखावत स्वयं बीकानेर सरकार के सचिव थे, इसलिए उनके विरुद्ध शिकायतें दरबार में दबी रहतीं। 1944 में उन्होंने बढ़े लगान का बहाना बनाकर राज्य पुलिस की मदद से किसानों को ज़मीन से उजाड़ दिया और माल लूट लिया।
- चौधरी हनुमानसिंह बुडानिया के नेतृत्व में किसान पहले भादरा (हनुमानगढ़) और फिर माउण्ट आबू में महाराजा शार्दूलसिंह से मिले; कार्रवाई की जगह हनुमानसिंह पर राजद्रोह का मुक़दमा चला।
- अनूपगढ़ क़िले की जेल में उन्होंने 65 दिन अनशन किया, तो महाराजा ने क्षमा करके छोड़ दिया। 20 मार्च 1946 को फिर पकड़े गए; जब 1948 में बीकानेर में जनता की सरकार बनी, तभी रिहा हुए।
प्रजा परिषद् के नेतृत्व में
- ग़लत पैमाइश के विरुद्ध राजगढ़ तहसील के चाँदगोठी और हमीरवास के किसान उठे; अगुवाई चौधरी कुम्भाराम व स्वामी कर्मानन्द (कालरी) ने की।
- चूरू की राजगढ़ तहसील के ललाना गाँव में 25 अप्रैल 1946 को कुम्भाराम व प्रतापसिंह की अगुवाई में किसानों की विशाल सभा हुई; जागीरदारों के ज़ुल्म की निन्दा हुई।
- राज्य ने प्रजा परिषद् को तोड़ने के लिए चौधरी खियालीसिंह से जाट सभा बनवाई, जिसने जाटों को परिषद् से अलग रहने को कहा; इनाम में खियालीसिंह को मन्त्रिमण्डल में ले लिया गया।
रायसिंहनगर गोलीकाण्ड व काँगड़
- जागीरदारों के ज़ुल्म के विरोध में रायसिंहनगर (अनूपगढ़ क्षेत्र) में प्रजा परिषद् की सभा पर पुलिस ने डण्डे चलाए। पुलिस-दमन के विरुद्ध 1 जुलाई 1946 को निकले किसानों के जुलूस पर गोलियों की बौछार हुई — कार्यकर्ता बीरबल सिंह शहीद हो गए।
- पूरे बीकानेर राज्य में 6 जुलाई 1946 को “किसान दिवस” और 17 जुलाई 1946 को “शहीद बीरबल दिवस” मना; माँग रही कि सारे क़ैदी छोड़े जाएँ और गोलीकाण्ड की जाँच हो।
- काँगड़ (रतनगढ़, चूरू) — 1946 के अकाल में भी जागीरदार ठाकुर गोपसिंह पूरा लगान वसूलना चाहता था; किसानों ने विरोध किया तो उसने अत्याचार किए।
रिवीजन पॉइंटर्स
- मारवाड़ हितकारिणी सभा ने मई 1929 में जागीरदारों के विरुद्ध मोर्चा खोला; जागीरदार क़रीब 136 लागतें लेते थे।
- डाबड़ा काण्ड 13 मार्च 1947 को हुआ; 12 किसान शहीद हुए।
- सीकर में 1922 में राव राजा कल्याणसिंह ने लगान 25 से 50 प्रतिशत बढ़ाया — यहीं से शेखावाटी क्षेत्र का किसान आन्दोलन शुरू माना जाता है।
- कुदण गाँव हत्याकाण्ड 25 अप्रैल 1935 को हुआ — 4 जाट मारे गए, 14 घायल हुए।
- शेखावाटी में 421 जागीरदार थे; नवलगढ़, मण्डावा, डूंडलोद, बिसाऊ और मलसीसर पाँच बड़ी जागीरें «पंचपाणे» कहलाती थीं।
- जयसिंहपुरा हत्याकाण्ड 21 जून 1934 को हुआ — 4 जाट मारे गए; जयपुर रियासत में पहली बार जाट अपने हत्यारों को दण्ड दिला सके।
- बीकानेर के नहरी किसानों ने 20 अप्रैल 1929 को जमींदार संघ बनाया; अध्यक्ष दरबारा सिंह थे।
- जागीरी क्षेत्र का राज्य का पहला आन्दोलन 1937 में उदरासर में जीवन चौधरी के नेतृत्व में उठा; जागीरदार 37 तरह की लागतें लेते थे।
- रायसिंहनगर गोलीकाण्ड 1 जुलाई 1946 को हुआ — बीरबल सिंह शहीद हुए; 17 जुलाई 1946 को «शहीद बीरबल दिवस» मना।
अगले भाग में हरिपुरा अधिवेशन से शुरू हुई प्रजामण्डल की लहर, सभी प्रजामण्डलों का सार तथा जयपुर, किशनगढ़ और पश्चिमी रियासतों के प्रजामण्डल।
पिछला भाग: जनजाति एवं किसान आन्दोलन: बिजौलिया, बेगूँ व बूँदी (भाग 2) एवं अलवर, भरतपुर व मेवात
अगला भाग: प्रजामण्डल व स्वतंत्रता आन्दोलन: जयपुर व किशनगढ़ एवं मारवाड़, बीकानेर, जैसलमेर, सिरोही
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