प्रजामण्डलों को याद रखने का सबसे आसान ढाँचा यही है कि हर रियासत के लिए वर्ष, संस्थापक और पहला अध्यक्ष एक तालिका की तरह जोड़ लें। इस भाग में मेवाड़ के साथ शाहपुरा, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़ और कुशलगढ़ आते हैं। फिर हाड़ौती की तीन रियासतें, अलवर, भरतपुर, धौलपुर व करौली, और अन्त में अजमेर का जनजागरण तथा शासकों का रुख़ दिया गया है।
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1. मेवाड़ व दक्षिणी रियासतें
| रियासत | वर्ष | संस्थापक | पहला अध्यक्ष |
|---|---|---|---|
| मेवाड़ | 24 अप्रैल 1938 | माणिक्यलाल वर्मा | बलवंतसिंह मेहता |
| शाहपुरा | 18 अप्रैल 1938 | रमेशचन्द्र ओझा | अभयसिंह डांगी |
| कुशलगढ़ | अप्रैल 1942 | भंवरलाल निगम | भंवरलाल निगम |
… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
2. मेवाड़ प्रजामण्डल 1938–1941
- बिजौलिया किसान आन्दोलन ने किसानों के साथ आम जनता में भी जागृति पैदा की; 1932–1938 में उदयपुर में अधिकारों व अनियमित करों के विरोध में प्रदर्शन हुए।
- ब्रिटिश आदेश से विवश महाराणा ने 28 जुलाई 1921 को युवराज भूपालसिंह को शासनाधिकार सौंपे; राजस्व विभाग मि. ट्रेन्च को।
- 24 अप्रैल 1938 ➜ माणिक्यलाल वर्मा ने बलवंतसिंह मेहता के निवास पर प्रजामण्डल बनाया; अध्यक्ष मेहता, उपाध्यक्ष भूरेलाल बयां, महामंत्री वर्मा। अन्य कार्यकर्ता — हीरालाल कोठारी, रमेशचन्द्र व्यास, भवानीशंकर वैद्य।
- 11 मई 1938 ➜ प्रधानमंत्री धर्मनारायण ने प्रजामण्डल अवैध घोषित किया; सभा-भाषण-समाचार पत्रों पर रोक; वर्मा और रमेशचन्द्र व्यास के लिए उदयपुर से बाहर जाने का हुक्म।
- वर्मा ने वर्धा जाकर गाँधीजी की सलाह ली, अजमेर में अस्थायी कार्यालय बनाया और वहाँ से सत्याग्रह चलाया; उन्होंने “मेवाड़ का वर्तमान शासन” पुस्तक लिखी।
… शेष 6 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
ट्रिक: तीन तारीख़ें — 24 अप्रैल (स्थापना) → 11 मई (प्रतिबन्ध, तीन सप्ताह में) → 4 अक्टूबर (विजयदशमी, सत्याग्रह)।
3. मेवाड़ — 1941 से 1948
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 25–28 नवम्बर 1941 | प्रथम अधिवेशन | उदयपुर की शाहपुरा हवेली; अध्यक्ष माणिक्यलाल वर्मा, उद्घाटन आचार्य कृपलानी |
| अगस्त 1942 | भारत छोड़ो | नारा “राजाओ अँग्रेज़ों का साथ छोड़ो” |
| 21 अगस्त 1942 | गिरफ्तारियाँ | वर्मा, मोहनलाल सुखाड़िया, बलवंतसिंह मेहता, भूरेलाल बयां आदि; भाषण-सभा-प्रदर्शन पर रोक |
| 1944 | रिहाई | सत्याग्रही — नारायणी देवी व भगवती देवी विश्नोई सहित — रिहा |
… शेष 4 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
- उदयपुर में नारायणी देवी ने महिलाओं की टोली के साथ सत्याग्रह किया; भगवती देवी विश्नोई (प्यारचन्द विश्नोई की पत्नी) ने गिरफ्तारी दी।
- अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के सातवें अधिवेशन में रियासतों में उत्तरदायी शासन की माँग हुई।
4. शाहपुरा
- 18 अप्रैल 1938 ➜ अभयसिंह डांगी और लादूराम व्यास की मदद से रमेशचन्द्र ओझा ने प्रजामण्डल की नींव रखी।
- पहले अध्यक्ष अभयसिंह डांगी (1945 तक); 1945 में गोकुललाल असावा अध्यक्ष।
- 1946 में असावा के सभापतित्व में संविधान समिति बनी; महाराजा सुदर्शनदेव ने उसका प्रारूप मानकर 14 अगस्त 1947 से लागू कर दिया।
5. डूँगरपुर
- जनजागृति का श्रेय गुरु गोविन्द गिरी के बाद भोगीलाल पाण्ड्या को।
- अगस्त 1944 ➜ साथी गौरीशंकर उपाध्याय, शिवलाल कोटड़िया व हरिदेव जोशी; पाण्ड्या ने प्रजामण्डल बनाया और स्वयं अध्यक्ष बने। उन्होंने वागड़ सेवा मन्दिर भी बनाया।
- 19 जून 1947 ➜ रास्तापाल गाँव में पाठशाला बन्द कराने पर सेंगाभाई, नानाभाई खाँट और भील बालिका कालीबाई पुलिस दमन का शिकार हुए।
6. बाँसवाड़ा
- 1943 ➜ भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी ने स्थापना की; साथ थे धूलजीभाई, मणिशंकर और मोतीलाल जाड़िया।
- पहले अध्यक्ष विनोदचन्द्र कोठारी।
- 1948 ➜ त्रिवेदी के नेतृत्व में बना मंत्रिमण्डल 48 दिन चला।
7. प्रतापगढ़
- 1936 ➜ ठक्कर बापा से प्रेरित होकर अमृतलाल पायक ने हरिजन पाठशाला चलाई।
- 1945 ➜ चुन्नीलाल प्रभाकर को साथ लेकर पायक ने प्रजामण्डल गठित किया।
- रियासत ने 15 अगस्त 1947 को लोकप्रिय मंत्रिमण्डल बनाने की घोषणा की; 2 मार्च 1948 को अमृतलाल पायक व माणिक्यलाल शाह मंत्री बने।
8. कुशलगढ़
- कुशलगढ़ पहले बाँसवाड़ा राज्य का भाग था; अँग्रेज़ी शासन में स्वतन्त्र ठिकाना (चीफ़शिप) बन गया।
- यहाँ जागृति के सूत्रधार पन्नालाल गौरीशंकर त्रिवेदी माने जाते हैं; पथिक से प्रभावित होकर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी।
- अप्रैल 1942 ➜ भंवरलाल निगम की अध्यक्षता में प्रजामण्डल; उपाध्यक्ष वर्द्धमान गदिया, मंत्री कन्हैयालाल सेठिया।
9. हाड़ौती — बूँदी, कोटा, झालावाड़
| रियासत | वर्ष | संस्थापक | पहला अध्यक्ष |
|---|---|---|---|
| बूँदी | 1931 | कांतिलाल जैन | कांतिलाल जैन |
| हाड़ौती (कोटा) | 1934 | नयनूराम शर्मा (साथ: अभिन्न हरि) | हाजी फैज मोहम्मद |
| कोटा राज्य | 1939 (माँगरोल) | नयनूराम शर्मा, अभिन्न हरि | नयनूराम शर्मा |
10. बूँदी
- बूँदी में राजनीतिक जागरण की शुरुआत पं. नयनूराम शर्मा के हाथों हुई।
- 1931 ➜ कांतिलाल जैन ने प्रजामण्डल बनाया; 1937 में ऋषिदत्त मेहता अध्यक्ष बने, पर गिरफ्तार होकर बूँदी से निर्वासित।
- 1939 ➜ पशु-निकासी और जकात पर आन्दोलन; 1940 में मेहता लौटे।
- 1942 ➜ भारत छोड़ो के समय नित्यानन्द नागर, बृज सुन्दर शर्मा और मेहता ने सभाएँ, भाषण व धरने किए; सरकार ने प्रजामण्डल को गैरकानूनी ठहरा दिया।
11. कोटा (हाड़ौती प्रजामण्डल)
- कोटा में चेतना का श्रेय पं. नयनूराम शर्मा को; 1918 में प्रजा प्रतिनिधि सभा बनाकर जनता की शिकायतें महाराव तक पहुँचाईं।
- असहयोग-काल में सभा ने खादी बढ़ाई और विदेशी माल का बहिष्कार कराया; घबराई सरकार ने सार्वजनिक सुरक्षा कानून व राजद्रोह अधिनियम से उसे दबा दिया।
- 1934 ➜ नयनूराम ने पं. अभिन्न हरि के साथ हाड़ौती प्रजामण्डल बनाया; पहले अध्यक्ष हाजी फैज मोहम्मद; जल्दी ही निष्क्रिय।
- 1939 ➜ माँगरोल में कोटा राज्य प्रजामण्डल; पहले अध्यक्ष नयनूराम शर्मा; पहले अधिवेशन में उत्तरदायी शासन का प्रस्ताव; पहली बार महिला सम्मेलन (अध्यक्ष शारदा भार्गव)।
- 1941 ➜ अज्ञात लोगों ने नयनूराम की हत्या कर दी; बागडोर अभिन्न हरि ने सँभाली।
ध्यान दें: दो नाम — हाड़ौती प्रजामण्डल (1934) और कोटा राज्य प्रजामण्डल (1939, माँगरोल); दोनों के पीछे नयनूराम व अभिन्न हरि। माँगरोल अब बारां ज़िले में है।
12. झालावाड़
- 25 नवम्बर 1946 ➜ माँगीलाल भव्य अध्यक्ष बने; साथी थे रतनलाल, मकबूल आलम, कन्हैयालाल मित्तल और मदनगोपाल।
- यह राजस्थान का अन्तिम प्रजामण्डल था।
- अक्टूबर 1947 ➜ शासक राजराणा हरीशचन्द्र ने उत्तरदायी शासन की योजना रखी, स्वयं प्रधानमंत्री बने; मंत्री भव्य व कन्हैयालाल।
13. पूर्वी रियासतें
| रियासत | वर्ष | संस्थापक | पहला अध्यक्ष |
|---|---|---|---|
| अलवर | 1938 | हरिनारायण शर्मा | हरिनारायण शर्मा |
| भरतपुर (रेवाड़ी) | मार्च 1938 | किशनलाल जोशी | गोपीलाल यादव |
| धौलपुर | 1936 | ज्वालाप्रसाद जिज्ञासु | कृष्णदत्त पालीवाल |
याद रखें: चारों 18 मार्च 1948 को मत्स्य संघ में मिलीं; इनमें से किसी की जनता को पूर्ण उत्तरदायी शासन का अवसर नहीं मिला।
14. अलवर
- जागृति का काम हरिनारायण शर्मा व कुंजबिहारी मोदी ने किया; महाराजा जयसिंह राष्ट्रभावना वाले थे और शर्मा उनके अवैतनिक सलाहकार जैसे बन गए।
- 1921 ➜ जंगली सूअर मारने पर रोक के बाद आन्दोलन। 1933 — तेजसिंह को गद्दी देकर अँग्रेज़ों ने जयसिंह को राज्य से बाहर कर दिया।
- 1933 ➜ अलवर में कांग्रेस समिति; 1938 में उसी का नाम अलवर राज्य प्रजामण्डल कर दिया; संस्थापक व पहले अध्यक्ष हरिनारायण शर्मा।
- दो वर्ष बिना पंजीकरण; 1 अगस्त 1940 को पंजीकरण, पर अलग झण्डे की अनुमति नहीं।
- 1–2 जून 1941 ➜ राजगढ़ में जागीर-माफ़ी प्रजा सम्मेलन; अध्यक्ष गुरु बृजनारायण, उद्घाटन सत्यदेव विद्यालंकार।
15. भरतपुर
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1920 तक | आर्य समाज की शाखाएँ | भरतपुर, डीग (अब डीग ज़िला), कुम्हेर में; श्रेय जगन्नाथ दास अधिकारी व गंगाप्रसाद शास्त्री |
| 1924–27 | किसानों की सभाएँ | ठाकुर देशराज |
| 1927 | महाराजा किशनसिंह की घोषणा | उत्तरदायी शासन देने का वादा |
| 1928 | किशनसिंह हटाए गए | बालक बृजेन्द्रसिंह गद्दी पर; शासन-अधिकार डंकन मैकेन्ज़ी को; सभाओं व जुलूसों पर रोक |
- जमींदार किसान सभा ➜ 1939 के अन्त में फकीरचन्द कपूर ने बनाई; सरकार-समर्थित संस्था। (दूसरी मान्यता: 1938 में पंजीकृत जाट सभा का नाम 1941 में किसान जमींदार सभा हुआ।)
- भारत छोड़ो में सरस्वती बोहरा के नेतृत्व में महिलाओं ने भाग लिया।
- प्रजामण्डल के पहले पदाधिकारी ➜ अध्यक्ष गोपीलाल यादव; उपाध्यक्ष ठाकुर देशराज व रेवतीशरण उपाध्याय; कोषाध्यक्ष मास्टर आदित्येन्द्र।
ध्यान दें: भरतपुर की गिनती — तीन नाम (प्रजा संघ 1928 → कांग्रेस मण्डल 1937 → प्रजामण्डल 1938 → प्रजा परिषद 1939) और बाहर बना (रेवाड़ी, हरियाणा)।
16. धौलपुर
- जागृति के अग्रदूत यमुनाप्रसाद शर्मा व ज्वालाप्रसाद जिज्ञासु; 1910 में आचार सुधारिणी सभा।
- 1934 ➜ ज्वालाप्रसाद व जौहरीलाल ने नागरी प्रचारिणी सभा बनाई; 1936 में ज्वालाप्रसाद ने हरिजन-उद्धार आन्दोलन चलाया।
- 1936 ➜ धौलपुर प्रजामण्डल: संस्थापक ज्वालाप्रसाद जिज्ञासु (सहयोगी जौहरीलाल इन्दु, मूलचन्द, कृष्णदत्त पालीवाल); पहले अध्यक्ष कृष्णदत्त पालीवाल।
- 1941 ➜ राज्य ने सभाओं व जुलूसों पर रोक लगाई; भारत छोड़ो में प्रजामण्डल ने आन्दोलन चलाया।
17. करौली
- चेतना का श्रेय कुँवर मदनसिंह व ठाकुर पूर्णसिंह को; 1921 में मदनसिंह ने पत्नी के साथ अनशन किया — माँगें: बेगार की समाप्ति, सूअर मारने की अनुमति, प्रशासन में हिन्दी।
- भँवरलाल कवि ने खादी, चिरंजीलाल ने हरिजन-उद्धार, कल्याणदास व रामगोपाल ने बेगार-विरोध के रास्ते जनजागृति फैलाई।
- 1938 ➜ मुंशी त्रिलोकचन्द माथुर ने साथियों के साथ करौली प्रजामण्डल बनाया; पहले अध्यक्ष माथुर। शुरू में उत्तरदायी शासन नहीं माँगा गया; अप्रैल 1939 के अधिवेशन में केवल शासन-सुधार माँगे गए।
18. अजमेर व शासकों का रुख़
अजमेर एकमात्र ब्रिटिश प्रान्त था, इसलिए राजस्थान की सारी राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र बना; यहीं से प्रजामण्डलों को संगठन, पत्र और पनाह मिली।
19. अजमेर में जनजागरण
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 26 जनवरी 1940 | स्वतंत्रता दिवस | जिलाधीश ने सभा की अनुमति नहीं दी; नागरिक व विद्यार्थी नारे लगाते रहे, कई विद्यार्थी गिरफ्तार |
| 10 अप्रैल 1940 | अमर प्रिंटिंग प्रेस की तलाशी | सुरक्षा कानून के तहत प्रेस और व्यवस्थापक अम्बालाल माथुर के मकानों की; सूचना थी कि ज़ब्त पुस्तक “उस पार रोशनी” की प्रतियाँ वहाँ हैं |
| 15 अगस्त 1941 | रेलवे वर्कशॉप की हड़ताल | लगभग 2000 कर्मचारियों की “बैठे रहो” हड़ताल |
20. शासकों का रुख़
- राजपूताने के अधिकांश शासक अँग्रेज़ी सत्ता के समर्थक बने रहे।
- बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने कहा था कि भारत और इंग्लैण्ड में युद्ध हुआ तो नरेशों का समर्थन इंग्लैण्ड को रहेगा।
- अलवर के जयसिंह का कहना था — जो अँग्रेज़ों का दोस्त या दुश्मन, वही देशी राजाओं का भी दोस्त या दुश्मन।
रिवीजन पॉइंटर्स
- मेवाड़ प्रजामण्डल 24 अप्रैल 1938 को माणिक्यलाल वर्मा ने बनाया; पहले अध्यक्ष बलवंतसिंह मेहता थे।
- 11 मई 1938 को प्रजामण्डल को अवैध घोषित कर दिया गया; मेवाड़ का प्रथम अधिवेशन 25–28 नवम्बर 1941 को हुआ।
- शाहपुरा का प्रजामण्डल 18 अप्रैल 1938 को बना — संस्थापक रमेशचन्द्र ओझा, पहले अध्यक्ष अभयसिंह डांगी।
- डूँगरपुर में अगस्त 1944 में भोगीलाल पाण्ड्या ने प्रजामण्डल बनाया; 19 जून 1947 को रास्तापाल में कालीबाई पुलिस दमन का शिकार हुईं।
- बाँसवाड़ा का प्रजामण्डल 1943 में भूपेन्द्रनाथ त्रिवेदी ने बनाया; 1948 में उनका मंत्रिमण्डल 48 दिन चला।
- कुशलगढ़ का प्रजामण्डल अप्रैल 1942 में भंवरलाल निगम की अध्यक्षता में बना।
- हाड़ौती प्रजामण्डल (1934) और कोटा राज्य प्रजामण्डल (1939, माँगरोल) दो अलग नाम हैं, पर दोनों के पीछे नयनूराम शर्मा व अभिन्न हरि हैं।
- झालावाड़ का प्रजामण्डल 25 नवम्बर 1946 को बना और राजस्थान का अन्तिम प्रजामण्डल था।
- अलवर, भरतपुर, धौलपुर व करौली — चारों 18 मार्च 1948 को मत्स्य संघ में मिलीं; अजमेर एकमात्र ब्रिटिश प्रान्त था।
अगले भाग में राजस्थान के एकीकरण की सात चरणों की झलक, तारीखें और पदाधिकारी, फिर एकीकरण से पहले राजपूताना की इकाइयाँ, तोपों की सलामी का दर्जा और अगस्त 1947 के विलय-पत्र।
पिछला भाग: प्रजामण्डल व स्वतंत्रता आन्दोलन: जयपुर व किशनगढ़ एवं मारवाड़, बीकानेर, जैसलमेर, सिरोही
अगला भाग: राजस्थान का एकीकरण: सात चरण एक नज़र में एवं एकीकरण से पहले
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