आमेर के इतिहास में यह हिस्सा सबसे ज़्यादा घटनाओं से भरा है, क्योंकि यहाँ एक के बाद एक कई शासक मुग़ल राजनीति के बीच खड़े दिखते हैं। इसमें मानसिंह की सेवाएँ, मिर्ज़ा राजा जयसिंह प्रथम, रामसिंह प्रथम व बिशनसिंह और फिर सवाई जयसिंह द्वितीय के आरम्भिक वर्ष क्रम से आए हैं। तिथियों और संधियों को साथ-साथ याद करें, तो ज़्यादातर सवाल आसान हो जाते हैं।
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1. अकबर की सेवा में शासक (1589–1605)
अकबर की स्वीकृति से मानसिंह आमेर आया और गद्दी पर बैठा; अकबर ने उसे 5000 का मनसब और “राजा” की उपाधि दी। फिर वह बिहार लौटा और अफ़ग़ानों व कुछ हिन्दू राजाओं को हराया।
| वर्ष | क्षेत्र | कार्य |
|---|---|---|
| 1590 | खड़गपुर | शासक संग्रामसिंह को पराजित किया |
| 1592 | उड़ीसा | अफ़ग़ान शासक कतलू ख़ाँ और पुत्र नासिर ख़ाँ को हराकर उड़ीसा को पहली बार मुग़ल साम्राज्य का अंग बनाया |
| 1592 | खुर्दा | शासक रामचन्द्र देव को आत्मसमर्पण पर बाध्य किया; उसने बेटी का विवाह मानसिंह से किया |
| मार्च 1594–98 | बंगाल | सईद ख़ाँ की जगह सूबेदार; राजधानी टुंडा से हटाकर राजमहल बनाई |
… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
- बंगाल विद्रोह में मानसिंह के दो पुत्र खेत रहे — दुर्जनसिंह (ईसा ख़ाँ के हमले में) और हिम्मतसिंह (हैज़े से)।
- जगतसिंह (ज्येष्ठ पुत्र) ने कांगड़ा में अकबर-विरोधी कलाल ख़ाँ को हराया, अकबर से “रायज़ादा” की उपाधि पाई और 1599 में बंगाल में अचानक चल बसा।
- मानसिंह का मनसब बढ़कर सात हज़ारी हो गया — यही उसकी प्रतिष्ठा का शिखर था; 15 अक्टूबर 1605 को अकबर चल बसा।
2. जहाँगीर की सेवा में (1605–14)
- जहाँगीर और मानसिंह की पटरी अकबर के रहते भी नहीं बैठती थी; तख़्त मिलने पर जहाँगीर ने मानसिंह पर कम ही विश्वास किया।
- जहाँगीर ने मानसिंह की हैसियत घटाई ➜ मनसब 7000 से 5000 — और उसे बंगाल में तैनात कर दिया।
- बंगाल (1605) में उसे सफलता न मिली, इसलिए वापस बुला लिया गया।
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1605 | मनसब कटौती | 7000 से 5000; बंगाल में नियुक्ति। |
| 1609 | दक्खिन | दक्षिण भारत भेजा गया। |
| 1611 | अहमदनगर | अभियान पर नियुक्ति। |
3. उपलब्धियाँ, निर्माण, साहित्य
- अकबर के कहने पर भी मानसिंह ने “दीन-ए-इलाही” स्वीकार नहीं किया।
- जयपुर में गोविन्द देवजी की प्रतिष्ठा से पहले मानसिंह वृन्दावन में राधा-गोविन्द देवजी का मन्दिर और गोवर्धन में मानसी गंगा बनवा चुका था; मन्दिर के काम में आमेर के शिल्पी कल्याणदास, माणकचन्द चोपड़ा, गोविन्ददास और गोरखदास लगाए गए।
| निर्माण | स्थान |
|---|---|
| अकबरपुर (आज का राजमहल) | बंगाल |
| मानपुर नगर | बिहार |
| मानमहल | पुष्कर (अजमेर) |
… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
| कवि / विद्वान | ग्रन्थ |
|---|---|
| दलपतराज | राजप्रशस्ति, पवन पश्चिम |
| जगन्नाथ | मानसिंह कीर्ति मुक्तावली |
| मुरारीदान | मानप्रकाश |
मानसिंह के संरक्षण में नरोत्तम कवि, हरिनाम, सुन्दरदास और जगन्नाथ जैसे विद्वान रहे।
4. मिर्ज़ा राजा जयसिंह प्रथम
याद रखें: जयसिंह प्रथम ने जहाँगीर → शाहजहाँ → औरंगज़ेब — तीन बादशाहों की सेवा की; सवाई जयसिंह ने सात की।
5. गद्दी तक और मनसब
- गद्दी ➜ 1621 (23 दिसम्बर)
- आयु ➜ 11 वर्ष
- पिता ➜ महासिंह
- भावसिंह (1614–1621) निःसन्तान मरा; तब जगतसिंह के पौत्र और महासिंह के पुत्र जयसिंह को 11 वर्ष की उम्र में गद्दी मिली।
- 1614 में मानसिंह की मृत्यु के समय जयसिंह केवल 2 वर्ष का था; माता दमयन्ती कँवर उसे दौसा ले गईं और भावसिंह के बाद वहीं से आमेर लाया गया।
- कछवाहा शासकों में सबसे लम्बे समय तक — 46 वर्ष — इन्होंने राज किया और जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगज़ेब की सेवा की।
6. शाहजहाँ के समय के अभियान
| वर्ष | अभियान | क्या हुआ |
|---|---|---|
| 1623 | अहमदनगर | गद्दी के तुरन्त बाद मलिक अम्बर के विरुद्ध भेजा गया; वीरता दिखाई |
| 1625 | दलेल ख़ाँ पठान | जयसिंह ने उसे परास्त किया |
| 1629 | उत्तर-पश्चिम सीमा | उज़्बेकों के विद्रोह का दमन |
7. उत्तराधिकार युद्ध (1657–59)
| तिथि | घटना | जयसिंह की भूमिका |
|---|---|---|
| फ़रवरी 1658 (24 को) | बहादुरपुर | दारा की ओर से शाही सेना का नेतृत्व कर शाहशुजा को हराया; मनसब बढ़कर 6000 जात-सवार |
| 15 अप्रैल 1658 | धरमत (उज्जैन के पास) | औरंगज़ेब जीता; जयसिंह उस समय पूरब में शुजा के मोर्चे पर था |
| 29 मई 1658 | सामूगढ़ | दारा हारकर भागा; जयसिंह फिर भी पूरब में डटा था |
दारा का साथ देने से औरंगज़ेब पहले नाराज़ था; जब वही जीता तो जयसिंह ने स्वयं मथुरा पहुँचकर उससे मेल कर लिया।
ट्रिक: क्रम: बहादुरपुर (फ़र.) → धरमत (अप्रैल) → सामूगढ़ (मई) → दौराई (मार्च 1659)।
8. शिवाजी और पुरन्दर की संधि
- सितम्बर 1664 में जयसिंह को 14,000 की शाही सेना देकर दक्खिन में शिवाजी (और शम्भाजी) को दबाने भेजा गया।
- उसने पुरन्दर क़िले को घेर लिया; शिवाजी ने आत्मसमर्पण किया और 11 जून 1665 को दोनों के बीच पुरन्दर की संधि हुई।
- शिवाजी को 23 क़िले मुग़लों को सौंपने पड़े और 12 अपने पास रखे।
ध्यान दें: पुरन्दर की संधि को जयसिंह की दूरदर्शिता और शक्ति की पराकाष्ठा माना जाता है — पर आगरा-प्रसंग ने उसे बादशाह का कोपभाजन बना दिया।
9. निर्माण और साहित्य
- जयसिंह ने औरंगाबाद के पास जयसिंहपुरा कस्बा बसाया, आमेर में महल बनवाए और जयगढ़ क़िला बनवाया।
- उसे “चौगान खेलों का संरक्षक” कहा जाता है।
- वह कई भाषाओं का जानकार और विद्वानों का सम्मान करने वाला था; बिहारी (हिन्दी के प्रसिद्ध कवि) उसके दरबारी कवि थे।
| कवि | रचना / बात |
|---|---|
| बिहारी | बिहारी सतसई — हर दोहे पर जयसिंह ने एक स्वर्ण मुद्रा दी; कवि को काली पहाड़ी की जागीर |
| रामकवि | जयसिंह चरित्र |
| कुलपति मिश्र | दक्षिण अभियान में जयसिंह के साथ गए |
10. रामसिंह प्रथम व बिशनसिंह
- रामसिंह प्रथम (1667–1689) ने पिता के साथ शाहजहाँ के उत्तराधिकार संघर्ष में भाग लिया था; औरंगज़ेब ने पहले 4000 का मनसब दिया, 1669 में बढ़ाकर 5000 कर दिया।
- रामसिंह के देहान्त (1689) पर उसका पोता बिशनसिंह (1689–1699) आमेर का राजा बना।
| ग्रन्थ | रचयिता |
|---|---|
| रस रहस्य | कुलपति मिश्र |
| वैद्य विनोद संहिता | शंकर भट्ट |
| चगता पादशाही | दलपतिराम |
ट्रिक: रामसिंह प्रथम के समय के चार ग्रन्थ — रस, वैद्य, चगता, मुहूर्त: “कु-शं-द-ग”।
11. सवाई जयसिंह द्वितीय
- गद्दी ➜ 1700 (पिता की मृत्यु दिसम्बर 1699)
- मूल नाम ➜ विजयसिंह
- उपाधि ➜ सवाई (औरंगज़ेब से)
सवाई जयसिंह के मोड़
- सवाई की उपाधि
- जाजऊ 1707
- देबारी समझौता 1708
- सांभर 1708
12. सवाई की उपाधि और गद्दी की जंग
- पिता बिशनसिंह की मृत्यु (दिसम्बर 1699) के बाद जयसिंह आमेर का शासक बना; 1700 से उसने राज-काज सँभाला।
- उसका मूल नाम विजयसिंह था और छोटे भाई का नाम जयसिंह; योग्यता से प्रभावित औरंगज़ेब ने दोनों के नाम आपस में बदल दिए।
- सवाई की कथा: दरबार में औरंगज़ेब ने किशोर जयसिंह की दोनों कलाइयाँ थाम लीं, तो उसने बड़ी चतुराई से जवाब दिया; बादशाह ने उसे पूर्वज जयसिंह प्रथम से बढ़कर पाया और उसी दिन “सवाई” ख़िताब दिया। तब से जयपुर के सभी राजा नाम के आगे “सवाई” लगाते रहे।
| घटना | तिथि | विवरण |
|---|---|---|
| औरंगज़ेब की मृत्यु | फ़रवरी 1707 | पुत्रों — मुअज़्ज़म, आज़म, कामबख़्श — में उत्तराधिकार युद्ध |
| जाजऊ (उ.प्र.) | 2 जून 1707 | मुअज़्ज़म बनाम आज़म; जयसिंह आज़म की ओर था; मुअज़्ज़म ने जयसिंह के भाई विजयसिंह को आमेर की गद्दी का लालच देकर साथ मिला लिया — जीत मुअज़्ज़म की |
| बहादुरशाह का क़दम | 1707 | मुअज़्ज़म ने बहादुरशाह नाम रखा; आमेर पहुँचकर विजयसिंह को शासक बनाया; आमेर का नाम इस्लामाबाद, फिर मोमिनाबाद |
| सूबेदार | 1707–08 | बहादुरशाह ने जयसिंह (आमेर) और अजीतसिंह (मारवाड़) को सूबेदार बनाया |
- साँभर में मुग़ल सेना का नेतृत्व सैयद हुसैन बरहा (नारनौल का सूबेदार) और अली अहमद ख़ाँ (साँभर का फ़ौजदार) ने किया; राजपूत सेना में सवाई जयसिंह, अजीतसिंह, दुर्गादास राठौड़ और श्यामसिंह कछवाहा आदि थे।
- इस जीत से आमेर फिर जयसिंह के हाथ आया और जोधपुर अजीतसिंह के।
- 1708 में जयसिंह ने मेवाड़ की चन्द्रकँवरी से विवाह किया; आगे चलकर मारवाड़ी रानी सूरज कुँवरी से ईश्वरीसिंह (1722) और चन्द्रकँवरी से माधोसिंह (1728) हुए — देबारी की शर्तें गृहयुद्ध की जड़ बनीं।
13. राजनीति और युद्ध
| वर्ष | घटना | परिणाम |
|---|---|---|
| 1713 | फ़र्रुख़सियर से 7000 जात-सवार का मनसब | पहली मालवा की सूबेदारी (1713–17); मेवाड़ व अन्य राजपूतों के सहयोग से मराठों को हराया |
| 1722 | भरतपुर में चूड़ामन जाट का विद्रोह | बादशाह मुहम्मद शाह ने जयसिंह को भेजा; उसने चूड़ामन के भतीजे बदनसिंह को अपनी ओर मिला कर चूड़ामन को खदेड़ा |
| 1722 | बदनसिंह को ईनाम | ब्रजराज की उपाधि, डीग की जागीर, “राजा” का ख़िताब — जाटों का नेता बना दिया |
| 1722 के बाद | मुहम्मद शाह की ख़ुशी | जयसिंह को “राज राजेश्वर श्री राजाधिराज सवाई” की उपाधि |
अजमेर परगना तब जयसिंह की सूबेदारी में था; नागौर के बख्तसिंह राठौड़ ने उस पर क़ब्ज़ा कर लिया — यही गंगवाना की जड़ थी।
14. रैपिड फायर तथ्य
- उड़ीसा विजय ➜ 1592, मानसिंह ने उसे पहली बार मुग़ल साम्राज्य का अंग बनाया
- मानसिंह का शिखर ➜ मनसब बढ़कर सात हज़ारी
- जहाँगीर का फ़ैसला ➜ 1605 में मनसब 7000 से घटाकर 5000
- जयसिंह प्रथम का शासन ➜ 1621 से पूरे 46 वर्ष, कछवाहों में सबसे लम्बा
- पुरन्दर की संधि ➜ 11 जून 1665; शिवाजी ने 23 क़िले सौंपे और 12 अपने पास रखे
- दरबारी कवि बिहारी ➜ बिहारी सतसई के हर दोहे पर एक स्वर्ण मुद्रा
- सवाई की उपाधि ➜ जयसिंह द्वितीय को औरंगज़ेब से; मूल नाम विजयसिंह
- जाजऊ का युद्ध ➜ 2 जून 1707, जीत मुअज़्ज़म की
- बदनसिंह को ईनाम ➜ 1722 में ब्रजराज की उपाधि और डीग की जागीर
अगले भाग में सवाई जयसिंह द्वितीय का शेष शासन — जयपुर नगर, वेधशालाएँ और अश्वमेध — और उसके बाद के शासकों की भाइयों की लड़ाई व अंग्रेज़ी संरक्षण।
पिछला भाग: आमेर का कछवाहा राजवंश: आरम्भिक शासक एवं भारमल व भगवन्तदास
अगला भाग: आमेर का कछवाहा राजवंश: जयपुर के बाद के शासक
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