अलग-अलग रियासतों के आन्दोलन एक-दूसरे में घुल जाते हैं, इसलिए हर आन्दोलन के साथ नेता, लागतों की संख्या और अन्तिम नतीजा जोड़कर पढ़ना काम आता है। इस भाग में बिजौलिया का तीसरा चरण व अन्त, बेगूँ, बूँदी (बरड़) और बूँदी का गुर्जर आन्दोलन दिए हैं। उसके बाद अलवर का सुअर आन्दोलन, नीमूचाणा हत्याकाण्ड, मेव और भरतपुर के आन्दोलन तथा मारवाड़ के तौल व पशु-निर्यात संघर्ष आते हैं।
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1. बिजौलिया — तृतीय चरण व अन्त
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1923–26 | अतिवृष्टि-अनावृष्टि | फ़सलें नष्ट, फिर भी लाग-बाग वसूली; 1926 के बन्दोबस्त में लगान बहुत ऊँचा |
| मई 1927 | ज़मीन छोड़ने की सलाह | पथिक की सलाह पर किसान पंचायत ने धाकड़ किसानों से बारानी (असिंचित) भूमि छोड़ने को कहा; महाजनों व दूसरे किसानों ने वे ज़मीनें ले लीं |
| 1929 | पथिक अलग हुए | दोष पथिक पर आया; आहत होकर आन्दोलन से हटे |
… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
- किसानों ने माणिक्यलाल वर्मा को मुखिया बनाया और खोई ज़मीनें लौटाने को सत्याग्रह ठाना।
- बिजौलिया पहला संगठित और अहिंसक आन्दोलन था, और 44 वर्ष के साथ देश का सबसे लम्बा किसान आन्दोलन भी।
महिलाओं की भूमिका
| महिला | किसकी पत्नी |
|---|---|
| विजया | शोभालाल गुप्त |
| अंजना देवी | रामनारायण चौधरी |
| विमला देवी | दुर्गाप्रसाद |
… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
ट्रिक: जनक की उपाधियाँ — बिजौलिया आन्दोलन के साधु सीताराम दास, पूरे राजस्थान के किसान आन्दोलनों के विजयसिंह पथिक।
2. बेगूँ किसान आन्दोलन
- बेगूँ ठिकाना मेवाड़ में बिजौलिया के पास था, आज चित्तौड़गढ़ ज़िले में। बिजौलिया का असर पड़ोसी बेगूँ तक पहुँचा।
- बेगूँ के काश्तकारों ने 53 लागतों व बेगार की शिकायत महाराणा से की, पर सुनवाई नहीं हुई।
- किसान 21 मई 1921 को मेनाल के भैरूकुण्ड पर इकट्ठे हुए; तय किया कि बिजौलिया की राह पर लाग-बाग और बेगार से लड़ेंगे, और राजस्थान सेवा संघ से मदद ली।
किसानों की दो मुख्य माँगें — (1) फ़सल का कूँता (अनुमान से बँटवारा) न हो; (2) बन्दोबस्त के बाद जो लगान तय हो, वही लिया जाए।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1921 | चाँदखेड़ी की घटना | सभा में ठिकाने के फ़ौजदार व कुछ महाजनों ने बाधा डाली; किसान नेता खेमा धाकड़ बन्दी |
| 25 फ़रवरी 1922 | पूर्वी मेवाड़ परिषद् | किसान पंचायतों को मज़बूत करने को तिलस्वाँ गाँव (बूँदी) में; उसी दिन 15,000 किसानों का पहला किसान सम्मेलन, अध्यक्ष बेगूँ पंचायत के सरपंच गोकुल धाकड़ |
| जून 1922 | अनूपसिंह समझौता | पथिक की मध्यस्थता में रावत अनूपसिंह (बेगूँ के ठाकुर) व सेवा संघ राज़ी हुए — किसानों की सारी माँगें स्वीकार |
| मार्च 1923 | मुंसरमात | महाराणा फतेहसिंह ने समझौते को “बोल्शेविक समझौता” कहकर ठुकराया; अनूपसिंह उदयपुर में नज़रबन्द; ठिकाना मुंसरमात में — मुंशी अमृतलाल मुंसरिम |
… शेष 5 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
3. बूँदी (बरड़) किसान आन्दोलन
- ऊँचा लगान, लागतें, बेगार और भ्रष्ट प्रशासन बूँदी के किसानों को भी सता रहे थे; बिजौलिया-बेगूँ की तरह जागीरदार को वे क़रीब 25 क़िस्म की लाग-बाग चुकाते थे।
- बरड़ ➜ बूँदी का पथरीला, जंगली और बीहड़ इलाक़ा (दक्षिण-पश्चिम में), जिसकी सीमा बिजौलिया से लगती है।
- बरड़ के किसानों को जगाने का काम 1922 में हरिभाई किंकर (हरिजी ब्रह्मचारी), रामनारायण चौधरी और पं. नयनूराम शर्मा ने किया; अप्रैल 1922 से आन्दोलन चल पड़ा। केन्द्र — बरड़, डाबी, बरूँधन, नीमाणा, गरदड़ा।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| जून 1922 | पैम्फ़लेट | रामनारायण चौधरी की पुस्तिका “बूँदी राज्य में स्त्रियों पर अत्याचार” |
| — | अख़बारों पर रोक | आन्दोलन की ख़बरें छापने वाले राजस्थान केसरी (वर्धा), नवीन राजस्थान (अजमेर), प्रताप (कानपुर) का बूँदी में प्रवेश बन्द |
| अक्टूबर 1922 | दमनकारी अफ़सर | सेवानिवृत्त अफ़सर पं. सरूपनारायण मुख्य राजस्व अधिकारी; यू.पी. पुलिस के मुंशी इकराम हुसैन पुलिस सुपरिटेंडेंट |
- नानक भील की याद में “अर्जी” गीत रचा गया (रचयिता — नयनूराम शर्मा; कुछ लेखक माणिक्यलाल वर्मा बताते हैं)।
- जाँच आयोग ➜ सेवा संघ की जाँच-माँग पर बूँदी शासक ने महाराज पृथ्वीसिंह, पं. रामप्रताप व लाला भैरोंलाल का आयोग बनाया; किसानों ने बहिष्कार किया।
- किसानों से मिलने सेवा संघ के मंत्री रामनारायण चौधरी पहुँचे; शासन ने कुछ शिकायतें सुलझाईं और लाग-बाग-बेगार में ढील दी, पर किसान पूरे सन्तुष्ट नहीं हुए।
4. बूँदी का गुर्जर आन्दोलन
- 1936 में बरड़ क्षेत्र में आन्दोलन फिर उठा; गुर्जर किसान नुक्ता प्रथा (मृत्युभोज) को ग़ैरक़ानूनी ठहराने और नए कर लगाने से प्रशासन के विरुद्ध हो गए।
- 5 अक्टूबर 1936 को बूँदी के हिण्डौली में एक महादेव मन्दिर पर 90 गाँवों के गुर्जर-मीणा किसानों के 500 प्रतिनिधि इकट्ठे हुए और माँगपत्र भेजा; अनसुनी होने पर आन्दोलन छिड़ गया।
- 1943 में सरकार ने पशु-चराई कर में छूट दी — आन्दोलन ख़त्म।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1936 | आन्दोलन फिर शुरू | बरड़ क्षेत्र |
| 5 अक्टूबर 1936 | हिण्डौली सम्मेलन | 90 गाँव · 500 प्रतिनिधि |
| 1943 | अन्त | पशु-चराई कर में छूट |
5. अलवर, भरतपुर व मेवात
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1921 | अलवर का सुअर आन्दोलन | जंगली सुअर मारने की अनुमति |
| 1923–24 | अलवर का तीसरा भू-बन्दोबस्त | लगान 40% बढ़ा |
| 14 मई 1925 | नीमूचाणा हत्याकाण्ड |
6. अलवर का सुअर आन्दोलन
- अलवर में महाराजा जयसिंह के राज में (1921) जंगली सुअरों को मारना वर्जित था।
- ये सुअर किसानों की खड़ी फ़सल बर्बाद कर देते थे; समाधान के लिए किसानों ने 1921 में आन्दोलन छेड़ा।
- अन्त में सरकार झुकी और किसानों को सुअर मारने की इजाज़त मिल गई।
7. नीमूचाणा हत्याकाण्ड
- अलवर के तीसरे भू-बन्दोबस्त (1923–24) के बाद महाराजा जयसिंह ने लगान-दरें 40% चढ़ा दीं और ब्राह्मणों-राजपूतों की लगान-रियायतें समाप्त कर दीं। विश्वेदारों ने ठाना कि वे बढ़ी दर से लगान नहीं देंगे।
- आन्दोलन का केन्द्र नीमूचाणा (कोटपूतली-बहरोड़); नेता माधोसिंह व गोविन्दसिंह, अन्य अमरसिंह व गगासिंह।
- किसानों की माँगों पर महाराजा ने ध्यान नहीं दिया।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| जनवरी 1925 | दिल्ली की सभा | अलवर के राजपूत किसानों की सभा; पुस्तिका “पुकार” में समस्याएँ छपीं |
| 6 मई 1925 | पाबन्दी | अलवर के दीवान ने सभा करने और हथियार रखने पर रोक लगाई |
| 13 मई 1925 | जमावड़ा | बड़ी संख्या में किसान नीमूचाणा में जुटे; राज्य की सेना ने गाँव घेर लिया |
- इसे “राजस्थान का जलियाँवाला बाग कांड” कहते हैं; गाँधीजी की नज़र में यह जलियाँवाला से भी बर्बर था — उन्होंने इसे “दोहरी डायरशाही” (Dyrism Double Distilled) की संज्ञा दी।
- कमाण्डर छाजूसिंह को “राजस्थान का जनरल डायर” कहते हैं।
- सीतादेवी ➜ नीमूचाणा के किसान रघुनाथ की पुत्री; उन्होंने महिलाओं का नेतृत्व किया।
8. मेव किसान आन्दोलन
- 1923–24 के भू-राजस्व बन्दोबस्त से मेव किसान नाराज़ थे। अलवर-भरतपुर के मेवात के किसानों ने 1932 में मोहम्मद हादी के नेतृत्व में आन्दोलन छेड़ा।
- हादी ने 1932 में “अंजुमन खादिम उल इस्लाम” बनाकर किसानों को संगठित किया; बाद में गुड़गाँव के चौधरी यासीन खाँ ने कमान ली और किसानों ने ख़रीफ़ की फ़सल का लगान देना बन्द कर दिया।
- इस आन्दोलन में साम्प्रदायिक हिंसा भी हुई — मेवों ने हिन्दुओं के घर-सम्पत्ति लूटनी शुरू कर दी थी।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1932 | हादी का संगठन | अंजुमन खादिम उल इस्लाम |
| जनवरी 1933 | अंग्रेज़ सेना अलवर में | महाराजा जयसिंह की इच्छा के विरुद्ध आन्दोलन दबाने |
| 22 मई 1933 | महाराजा जयसिंह देश-निकाला | अंग्रेज़ों ने उन्हें यूरोप भेज दिया |
9. भरतपुर किसान आन्दोलन
- भरतपुर की 95% भूमि सीधे राज्य के नियन्त्रण में थी।
- 1931 में नया भूमि-बन्दोबस्त लागू हुआ और लगान की दरें बढ़ीं; किसानों और नम्बरदारों ने विरोध किया।
- नम्बरदार भोज की अगुवाई में किसानों ने 23 नवम्बर 1931 को कौन्सिल दफ़्तर के बाहर धरना-प्रदर्शन किया; अगले दिन भोज पकड़ लिए गए और आन्दोलन ढीला पड़ा।
10. मारवाड़, शेखावाटी व बीकानेर
| रियासत | आन्दोलन | मुख्य नेता | चरम घटना |
|---|---|---|---|
| मारवाड़ | तौल (1920–21), पशु-निर्यात (1923–24), जागीरदारों के विरुद्ध (1929–48) | चाँदमल सुराणा, जयनारायण व्यास, बलदेवराम मिर्धा | चण्डावल 1942 · डाबड़ा 13 मार्च 1947 |
| जयपुर — सीकर | 1922–35 | हरलालसिंह, ठाकुर देशराज, रामनारायण चौधरी | कटराथल 1934 · कुदण 25 अप्रैल 1935 |
| जयपुर — शेखावाटी | 1921–47 | हरलालसिंह, किशोरी देवी, ठाकुर देशराज | जयसिंहपुरा 21 जून 1934 |
याद रखें: जयपुर रियासत में किसान आन्दोलन का मूल केन्द्र पश्चिमी भाग था — शेखावाटी, तोरावाटी, साँभर, सीकर और खेतड़ी के ठिकाने।
11. मारवाड़ — तौल व पशु-निर्यात
तौल आन्दोलन (1920–21)
- मारवाड़ का सेर 100 तौले का चलता था; सरकार ने ब्रिटिश भारत के ढंग पर 80 तौले का सेर लागू करना चाहा।
- सामाजिक कार्यकर्ता चाँदमल सुराणा के नेतृत्व में 1920–21 में आन्दोलन चला; उन्होंने मारवाड़ के कार्यकर्ताओं के साथ हड़ताल की।
- दबाव में सरकार ने नया तौल जारी करने का फ़ैसला रद्द किया — मारवाड़ के लोगों की पहली जीत।
मादा पशुओं का निर्यात
- मारवाड़ राज्य ने 29 अक्टूबर 1923 को मादा पशुओं को बाहर भेजने पर लगी रोक हटा दी; हज़ारों पशु बाहर जाने लगे और किसानों को दही-घी के कारोबार पर संकट दिखा।
- मारवाड़ हितकारिणी सभा ने किसानों के साथ रेल की पटरियों पर लेटकर विरोध किया।
- सरकार ने 1 सितम्बर 1924 को मादा पशुओं तथा घास-फूस के निर्यात पर दुबारा पाबन्दी लगाई — दूसरी जीत।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1920–21 | तौल आन्दोलन | सेर 100 तौले का 80 तौले करने की योजना रद्द |
| 29 अक्टूबर 1923 | निर्यात पर रोक हटी | |
| 1 सितम्बर 1924 | रोक फिर लगी | किसानों की दूसरी जीत |
12. रैपिड फायर तथ्य
- बिजौलिया ➜ 44 वर्ष चला, देश का सबसे लम्बा किसान आन्दोलन; 1929 में पथिक अलग हुए, कमान माणिक्यलाल वर्मा को मिली
- बेगूँ ➜ 53 लागतें व बेगार; 21 मई 1921 को मेनाल के भैरूकुण्ड पर किसान जुटे
- अनूपसिंह समझौता ➜ जून 1922; महाराणा फतेहसिंह ने इसे «बोल्शेविक समझौता» कहकर ठुकराया
- बूँदी (बरड़) ➜ 1922; लगभग 25 क़िस्म की लाग-बाग; जगाने वाले हरिभाई किंकर, रामनारायण चौधरी, नयनूराम शर्मा
- बूँदी का गुर्जर आन्दोलन ➜ हिण्डौली सम्मेलन 5 अक्टूबर 1936 (90 गाँव, 500 प्रतिनिधि); 1943 में चराई कर में छूट
- अलवर का सुअर आन्दोलन ➜ 1921; अन्त में किसानों को सुअर मारने की इजाज़त मिली
- नीमूचाणा हत्याकाण्ड ➜ 1925; लगान 40% बढ़ा था; गाँधीजी ने इसे «दोहरी डायरशाही» कहा
- मेव आन्दोलन ➜ 1932, मोहम्मद हादी; संगठन अंजुमन खादिम उल इस्लाम
- तौल आन्दोलन ➜ 1920–21, चाँदमल सुराणा; 100 तौले के सेर की जगह 80 तौले का सेर लागू करने की योजना रद्द
अगले भाग में पश्चिमी और उत्तरी रियासतों — मारवाड़, जयपुर के सीकर-शेखावाटी और बीकानेर — के किसान आन्दोलन।
पिछला भाग: जनजाति एवं किसान आन्दोलन: गोविन्द गिरी व तेजावत एवं बिजौलिया, बेगूँ व बूँदी (भाग 1)
अगला भाग: जनजाति एवं किसान आन्दोलन: मारवाड़, शेखावाटी व बीकानेर
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