जनजाति एवं किसान आन्दोलन: बिजौलिया, बेगूँ व बूँदी (भाग 2) एवं अलवर, भरतपुर व मेवात – Rajasthan History Chapter 45

बिजौलिया का अन्त, बेगूँ, बूँदी, अलवर-भरतपुर-मेवात और मारवाड़ के तौल व पशु-निर्यात आन्दोलन।

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In this chapter (12 sections)
  1. बिजौलिया — तृतीय चरण व अन्त
  2. बेगूँ किसान आन्दोलन
  3. बूँदी (बरड़) किसान आन्दोलन
  4. बूँदी का गुर्जर आन्दोलन
  5. अलवर, भरतपुर व मेवात
  6. अलवर का सुअर आन्दोलन
  7. नीमूचाणा हत्याकाण्ड
  8. मेव किसान आन्दोलन
  9. भरतपुर किसान आन्दोलन
  10. मारवाड़, शेखावाटी व बीकानेर
  11. मारवाड़ — तौल व पशु-निर्यात
  12. रैपिड फायर तथ्य

अलग-अलग रियासतों के आन्दोलन एक-दूसरे में घुल जाते हैं, इसलिए हर आन्दोलन के साथ नेता, लागतों की संख्या और अन्तिम नतीजा जोड़कर पढ़ना काम आता है। इस भाग में बिजौलिया का तीसरा चरण व अन्त, बेगूँ, बूँदी (बरड़) और बूँदी का गुर्जर आन्दोलन दिए हैं। उसके बाद अलवर का सुअर आन्दोलन, नीमूचाणा हत्याकाण्ड, मेव और भरतपुर के आन्दोलन तथा मारवाड़ के तौल व पशु-निर्यात संघर्ष आते हैं।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — जनजाति एवं किसान आन्दोलन, 9 चॉक-बोर्ड चित्र, 1 नक्शे, 9 चार्ट, 26 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. बिजौलिया — तृतीय चरण व अन्त

काल / क्रमघटनाविवरण
1923–26अतिवृष्टि-अनावृष्टिफ़सलें नष्ट, फिर भी लाग-बाग वसूली; 1926 के बन्दोबस्त में लगान बहुत ऊँचा
मई 1927ज़मीन छोड़ने की सलाहपथिक की सलाह पर किसान पंचायत ने धाकड़ किसानों से बारानी (असिंचित) भूमि छोड़ने को कहा; महाजनों व दूसरे किसानों ने वे ज़मीनें ले लीं
1929पथिक अलग हुएदोष पथिक पर आया; आहत होकर आन्दोलन से हटे

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

  • किसानों ने माणिक्यलाल वर्मा को मुखिया बनाया और खोई ज़मीनें लौटाने को सत्याग्रह ठाना।
  • बिजौलिया पहला संगठित और अहिंसक आन्दोलन था, और 44 वर्ष के साथ देश का सबसे लम्बा किसान आन्दोलन भी।

महिलाओं की भूमिका

महिलाकिसकी पत्नी
विजयाशोभालाल गुप्त
अंजना देवीरामनारायण चौधरी
विमला देवीदुर्गाप्रसाद

… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ट्रिक: जनक की उपाधियाँ — बिजौलिया आन्दोलन के साधु सीताराम दास, पूरे राजस्थान के किसान आन्दोलनों के विजयसिंह पथिक।

2. बेगूँ किसान आन्दोलन

  • बेगूँ ठिकाना मेवाड़ में बिजौलिया के पास था, आज चित्तौड़गढ़ ज़िले में। बिजौलिया का असर पड़ोसी बेगूँ तक पहुँचा।
  • बेगूँ के काश्तकारों ने 53 लागतों व बेगार की शिकायत महाराणा से की, पर सुनवाई नहीं हुई।
  • किसान 21 मई 1921 को मेनाल के भैरूकुण्ड पर इकट्ठे हुए; तय किया कि बिजौलिया की राह पर लाग-बाग और बेगार से लड़ेंगे, और राजस्थान सेवा संघ से मदद ली।

किसानों की दो मुख्य माँगें — (1) फ़सल का कूँता (अनुमान से बँटवारा) न हो; (2) बन्दोबस्त के बाद जो लगान तय हो, वही लिया जाए।

काल / क्रमघटनाविवरण
1921चाँदखेड़ी की घटनासभा में ठिकाने के फ़ौजदार व कुछ महाजनों ने बाधा डाली; किसान नेता खेमा धाकड़ बन्दी
25 फ़रवरी 1922पूर्वी मेवाड़ परिषद्किसान पंचायतों को मज़बूत करने को तिलस्वाँ गाँव (बूँदी) में; उसी दिन 15,000 किसानों का पहला किसान सम्मेलन, अध्यक्ष बेगूँ पंचायत के सरपंच गोकुल धाकड़
जून 1922अनूपसिंह समझौतापथिक की मध्यस्थता में रावत अनूपसिंह (बेगूँ के ठाकुर) व सेवा संघ राज़ी हुए — किसानों की सारी माँगें स्वीकार
मार्च 1923मुंसरमातमहाराणा फतेहसिंह ने समझौते को “बोल्शेविक समझौता” कहकर ठुकराया; अनूपसिंह उदयपुर में नज़रबन्द; ठिकाना मुंसरमात में — मुंशी अमृतलाल मुंसरिम

… शेष 5 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

3. बूँदी (बरड़) किसान आन्दोलन

  • ऊँचा लगान, लागतें, बेगार और भ्रष्ट प्रशासन बूँदी के किसानों को भी सता रहे थे; बिजौलिया-बेगूँ की तरह जागीरदार को वे क़रीब 25 क़िस्म की लाग-बाग चुकाते थे।
  • बरड़ ➜ बूँदी का पथरीला, जंगली और बीहड़ इलाक़ा (दक्षिण-पश्चिम में), जिसकी सीमा बिजौलिया से लगती है।
  • बरड़ के किसानों को जगाने का काम 1922 में हरिभाई किंकर (हरिजी ब्रह्मचारी), रामनारायण चौधरी और पं. नयनूराम शर्मा ने किया; अप्रैल 1922 से आन्दोलन चल पड़ा। केन्द्र — बरड़, डाबी, बरूँधन, नीमाणा, गरदड़ा।
काल / क्रमघटनाविवरण
जून 1922पैम्फ़लेटरामनारायण चौधरी की पुस्तिका “बूँदी राज्य में स्त्रियों पर अत्याचार”
—अख़बारों पर रोकआन्दोलन की ख़बरें छापने वाले राजस्थान केसरी (वर्धा), नवीन राजस्थान (अजमेर), प्रताप (कानपुर) का बूँदी में प्रवेश बन्द
अक्टूबर 1922दमनकारी अफ़सरसेवानिवृत्त अफ़सर पं. सरूपनारायण मुख्य राजस्व अधिकारी; यू.पी. पुलिस के मुंशी इकराम हुसैन पुलिस सुपरिटेंडेंट
  • नानक भील की याद में “अर्जी” गीत रचा गया (रचयिता — नयनूराम शर्मा; कुछ लेखक माणिक्यलाल वर्मा बताते हैं)।
  • जाँच आयोग ➜ सेवा संघ की जाँच-माँग पर बूँदी शासक ने महाराज पृथ्वीसिंह, पं. रामप्रताप व लाला भैरोंलाल का आयोग बनाया; किसानों ने बहिष्कार किया।
  • किसानों से मिलने सेवा संघ के मंत्री रामनारायण चौधरी पहुँचे; शासन ने कुछ शिकायतें सुलझाईं और लाग-बाग-बेगार में ढील दी, पर किसान पूरे सन्तुष्ट नहीं हुए।

4. बूँदी का गुर्जर आन्दोलन

  • 1936 में बरड़ क्षेत्र में आन्दोलन फिर उठा; गुर्जर किसान नुक्ता प्रथा (मृत्युभोज) को ग़ैरक़ानूनी ठहराने और नए कर लगाने से प्रशासन के विरुद्ध हो गए।
  • 5 अक्टूबर 1936 को बूँदी के हिण्डौली में एक महादेव मन्दिर पर 90 गाँवों के गुर्जर-मीणा किसानों के 500 प्रतिनिधि इकट्ठे हुए और माँगपत्र भेजा; अनसुनी होने पर आन्दोलन छिड़ गया।
  • 1943 में सरकार ने पशु-चराई कर में छूट दी — आन्दोलन ख़त्म।
काल / क्रमघटनाविवरण
1936आन्दोलन फिर शुरूबरड़ क्षेत्र
5 अक्टूबर 1936हिण्डौली सम्मेलन90 गाँव · 500 प्रतिनिधि
1943अन्तपशु-चराई कर में छूट

5. अलवर, भरतपुर व मेवात

काल / क्रमघटनाविवरण
1921अलवर का सुअर आन्दोलनजंगली सुअर मारने की अनुमति
1923–24अलवर का तीसरा भू-बन्दोबस्तलगान 40% बढ़ा
14 मई 1925नीमूचाणा हत्याकाण्ड

6. अलवर का सुअर आन्दोलन

  • अलवर में महाराजा जयसिंह के राज में (1921) जंगली सुअरों को मारना वर्जित था।
  • ये सुअर किसानों की खड़ी फ़सल बर्बाद कर देते थे; समाधान के लिए किसानों ने 1921 में आन्दोलन छेड़ा।
  • अन्त में सरकार झुकी और किसानों को सुअर मारने की इजाज़त मिल गई।

7. नीमूचाणा हत्याकाण्ड

  • अलवर के तीसरे भू-बन्दोबस्त (1923–24) के बाद महाराजा जयसिंह ने लगान-दरें 40% चढ़ा दीं और ब्राह्मणों-राजपूतों की लगान-रियायतें समाप्त कर दीं। विश्वेदारों ने ठाना कि वे बढ़ी दर से लगान नहीं देंगे।
  • आन्दोलन का केन्द्र नीमूचाणा (कोटपूतली-बहरोड़); नेता माधोसिंह व गोविन्दसिंह, अन्य अमरसिंह व गगासिंह।
  • किसानों की माँगों पर महाराजा ने ध्यान नहीं दिया।
काल / क्रमघटनाविवरण
जनवरी 1925दिल्ली की सभाअलवर के राजपूत किसानों की सभा; पुस्तिका “पुकार” में समस्याएँ छपीं
6 मई 1925पाबन्दीअलवर के दीवान ने सभा करने और हथियार रखने पर रोक लगाई
13 मई 1925जमावड़ाबड़ी संख्या में किसान नीमूचाणा में जुटे; राज्य की सेना ने गाँव घेर लिया
  • इसे “राजस्थान का जलियाँवाला बाग कांड” कहते हैं; गाँधीजी की नज़र में यह जलियाँवाला से भी बर्बर था — उन्होंने इसे “दोहरी डायरशाही” (Dyrism Double Distilled) की संज्ञा दी।
  • कमाण्डर छाजूसिंह को “राजस्थान का जनरल डायर” कहते हैं।
  • सीतादेवी ➜ नीमूचाणा के किसान रघुनाथ की पुत्री; उन्होंने महिलाओं का नेतृत्व किया।

8. मेव किसान आन्दोलन

  • 1923–24 के भू-राजस्व बन्दोबस्त से मेव किसान नाराज़ थे। अलवर-भरतपुर के मेवात के किसानों ने 1932 में मोहम्मद हादी के नेतृत्व में आन्दोलन छेड़ा।
  • हादी ने 1932 में “अंजुमन खादिम उल इस्लाम” बनाकर किसानों को संगठित किया; बाद में गुड़गाँव के चौधरी यासीन खाँ ने कमान ली और किसानों ने ख़रीफ़ की फ़सल का लगान देना बन्द कर दिया।
  • इस आन्दोलन में साम्प्रदायिक हिंसा भी हुई — मेवों ने हिन्दुओं के घर-सम्पत्ति लूटनी शुरू कर दी थी।
काल / क्रमघटनाविवरण
1932हादी का संगठनअंजुमन खादिम उल इस्लाम
जनवरी 1933अंग्रेज़ सेना अलवर मेंमहाराजा जयसिंह की इच्छा के विरुद्ध आन्दोलन दबाने
22 मई 1933महाराजा जयसिंह देश-निकालाअंग्रेज़ों ने उन्हें यूरोप भेज दिया

9. भरतपुर किसान आन्दोलन

  • भरतपुर की 95% भूमि सीधे राज्य के नियन्त्रण में थी।
  • 1931 में नया भूमि-बन्दोबस्त लागू हुआ और लगान की दरें बढ़ीं; किसानों और नम्बरदारों ने विरोध किया।
  • नम्बरदार भोज की अगुवाई में किसानों ने 23 नवम्बर 1931 को कौन्सिल दफ़्तर के बाहर धरना-प्रदर्शन किया; अगले दिन भोज पकड़ लिए गए और आन्दोलन ढीला पड़ा।

10. मारवाड़, शेखावाटी व बीकानेर

रियासतआन्दोलनमुख्य नेताचरम घटना
मारवाड़तौल (1920–21), पशु-निर्यात (1923–24), जागीरदारों के विरुद्ध (1929–48)चाँदमल सुराणा, जयनारायण व्यास, बलदेवराम मिर्धाचण्डावल 1942 · डाबड़ा 13 मार्च 1947
जयपुर — सीकर1922–35हरलालसिंह, ठाकुर देशराज, रामनारायण चौधरीकटराथल 1934 · कुदण 25 अप्रैल 1935
जयपुर — शेखावाटी1921–47हरलालसिंह, किशोरी देवी, ठाकुर देशराजजयसिंहपुरा 21 जून 1934

याद रखें: जयपुर रियासत में किसान आन्दोलन का मूल केन्द्र पश्चिमी भाग था — शेखावाटी, तोरावाटी, साँभर, सीकर और खेतड़ी के ठिकाने।

11. मारवाड़ — तौल व पशु-निर्यात

तौल आन्दोलन (1920–21)

  • मारवाड़ का सेर 100 तौले का चलता था; सरकार ने ब्रिटिश भारत के ढंग पर 80 तौले का सेर लागू करना चाहा।
  • सामाजिक कार्यकर्ता चाँदमल सुराणा के नेतृत्व में 1920–21 में आन्दोलन चला; उन्होंने मारवाड़ के कार्यकर्ताओं के साथ हड़ताल की।
  • दबाव में सरकार ने नया तौल जारी करने का फ़ैसला रद्द किया — मारवाड़ के लोगों की पहली जीत।

मादा पशुओं का निर्यात

  • मारवाड़ राज्य ने 29 अक्टूबर 1923 को मादा पशुओं को बाहर भेजने पर लगी रोक हटा दी; हज़ारों पशु बाहर जाने लगे और किसानों को दही-घी के कारोबार पर संकट दिखा।
  • मारवाड़ हितकारिणी सभा ने किसानों के साथ रेल की पटरियों पर लेटकर विरोध किया।
  • सरकार ने 1 सितम्बर 1924 को मादा पशुओं तथा घास-फूस के निर्यात पर दुबारा पाबन्दी लगाई — दूसरी जीत।
काल / क्रमघटनाविवरण
1920–21तौल आन्दोलनसेर 100 तौले का 80 तौले करने की योजना रद्द
29 अक्टूबर 1923निर्यात पर रोक हटी
1 सितम्बर 1924रोक फिर लगीकिसानों की दूसरी जीत

12. रैपिड फायर तथ्य

  • बिजौलिया ➜ 44 वर्ष चला, देश का सबसे लम्बा किसान आन्दोलन; 1929 में पथिक अलग हुए, कमान माणिक्यलाल वर्मा को मिली
  • बेगूँ ➜ 53 लागतें व बेगार; 21 मई 1921 को मेनाल के भैरूकुण्ड पर किसान जुटे
  • अनूपसिंह समझौता ➜ जून 1922; महाराणा फतेहसिंह ने इसे «बोल्शेविक समझौता» कहकर ठुकराया
  • बूँदी (बरड़) ➜ 1922; लगभग 25 क़िस्म की लाग-बाग; जगाने वाले हरिभाई किंकर, रामनारायण चौधरी, नयनूराम शर्मा
  • बूँदी का गुर्जर आन्दोलन ➜ हिण्डौली सम्मेलन 5 अक्टूबर 1936 (90 गाँव, 500 प्रतिनिधि); 1943 में चराई कर में छूट
  • अलवर का सुअर आन्दोलन ➜ 1921; अन्त में किसानों को सुअर मारने की इजाज़त मिली
  • नीमूचाणा हत्याकाण्ड ➜ 1925; लगान 40% बढ़ा था; गाँधीजी ने इसे «दोहरी डायरशाही» कहा
  • मेव आन्दोलन ➜ 1932, मोहम्मद हादी; संगठन अंजुमन खादिम उल इस्लाम
  • तौल आन्दोलन ➜ 1920–21, चाँदमल सुराणा; 100 तौले के सेर की जगह 80 तौले का सेर लागू करने की योजना रद्द

अगले भाग में पश्चिमी और उत्तरी रियासतों — मारवाड़, जयपुर के सीकर-शेखावाटी और बीकानेर — के किसान आन्दोलन।

पिछला भाग: जनजाति एवं किसान आन्दोलन: गोविन्द गिरी व तेजावत एवं बिजौलिया, बेगूँ व बूँदी (भाग 1)

अगला भाग: जनजाति एवं किसान आन्दोलन: मारवाड़, शेखावाटी व बीकानेर

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