मेवाड़ का गुहिल राजवंश: उदयसिंह व प्रताप (भाग 2) एवं अमरसिंह से भूपालसिंह (भाग 1) – Rajasthan History Chapter 18

हल्दीघाटी का युद्ध-क्रम, भामाशाह, दिवेर, चावण्ड और अमरसिंह प्रथम की 1615 की संधि तक का इतिहास।

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In this chapter (7 sections)
  1. हल्दीघाटी: युद्ध का क्रम
  2. हल्दीघाटी के बाद
  3. प्रताप से जुड़े स्थान व साथी
  4. अमरसिंह से भूपालसिंह
  5. अमरसिंह प्रथम व 1615 की संधि
  6. कर्णसिंह व जगतसिंह प्रथम
  7. रिवीजन पॉइंटर्स

हल्दीघाटी की लड़ाई में दोनों पक्ष अपनी-अपनी जीत मानते रहे, और यही उलझन इस पूरे प्रकरण के तथ्यों को याद रखने लायक बनाती है। असली कहानी तो लड़ाई के बाद शुरू होती है, जब प्रताप पहाड़ों से छापामार संघर्ष चलाते हैं। इस भाग में हल्दीघाटी का क्रम, उसके बाद की घटनाएँ, प्रताप से जुड़े स्थान व साथी, फिर अमरसिंह प्रथम, 1615 की संधि और कर्णसिंह व जगतसिंह प्रथम का काल आता है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — मेवाड़ का गुहिल राजवंश, 14 चॉक-बोर्ड चित्र, 5 चार्ट, 25 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. हल्दीघाटी: युद्ध का क्रम

लड़ाई की कड़ियाँ

  1. हल्दीघाटी के तंग दर्रे में पहला जोशीला वार — मुग़ल भागे, बदायूँनी भी
  2. महतर ख़ाँ ने झूठी अफ़वाह फैलाई कि “अकबर ख़ुद आ रहे हैं” — मुग़ल सँभले
  3. राजपूत बनास किनारे रक्त तलाई (खमनौर) में डटे — पहले हाथियों की लड़ाई

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

  • अफ़रा-तफ़री में अपने-पराये राजपूतों को पहचानना कठिन था; बदायूँनी ने आसफ़ ख़ाँ से पूछा तो उत्तर मिला — “तुम वार करते जाओ, जिस पक्ष का राजपूत मरे, इस्लाम को लाभ ही होगा।”
  • हाथी ➜ प्रताप की ओर रामप्रसाद और लूणा; मुग़लों की ओर गजमुक्ता, गजराज, रणमन्दर। रामप्रसाद मुग़लों के हाथ लगा; अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा।
  • मानसिंह पर हमला ➜ मानसिंह “मरदाना” हाथी पर था; चेतक ने पैर हाथी के सिर पर टिकाए और प्रताप ने भाले से वार किया; मानसिंह हौदे में छिप गया, पीछे का अंगरक्षक मारा गया; हाथी की सूँड़ में बँधे ज़हरीले ख़ंजर से चेतक का पैर घायल हुआ।
  • घायल प्रताप को घिरा देख झाला बीदा (बड़ी सादड़ी) ने उनसे बाहर जाने का निवेदन किया और राज चिह्न धारण कर लड़ा — मुग़ल उस पर टूट पड़े और बीदा वीरगति को प्राप्त हुआ।
  • बाहर जाते प्रताप के पीछे दो मुग़ल सैनिक लगे; भाई शक्तिसिंह ने देखा तो भ्रातृ-प्रेम जागा और उसने दोनों को मार गिराया। एक नाला लाँघकर चेतक गिर पड़ा और प्राण त्याग दिए — उसी जगह, बलीचा गाँव (राजसमंद) में, चेतक की छतरी बनी है।

… शेष 5 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

पक्ष / स्रोतनिष्कर्ष
राजप्रशस्ति, राजविलास, जगदीश मंदिर प्रशस्तिप्रताप की विजय
फ़ारसी इतिहासकारअकबर की विजय
असल स्थितिमानसिंह की सेना न प्रताप को मार सकी, न बंदी बना सकी, और न कुम्भलगढ़ ले सकी — दोनों पक्ष अपनी जीत मानते रहे
काल / क्रमघटनाविवरण
13 अक्टूबर 1576अकबर गोगुन्दा मेंख़ुद सेना लेकर आया।
नवम्बर 1576उदयपुर पर क़ब्ज़ानाम मुहम्मदाबाद रखा; फ़ख़रुद्दीन व जगन्नाथ को उदयपुर में, सैयद अब्दुल्ला ख़ाँ व राजा भगवानदास को घाटियों में रखकर अकबर मालवा गया।
बाद मेंगोगुन्दामानसिंह के जाने के बाद प्रताप ने गोगुन्दा फिर ले लिया।

ट्रिक: हल्दीघाटी की उपमाएँ — टॉड: मेवाड़ की थर्मोपली; दिवेर — मेवाड़ का मैराथन। तीन नाम — बदायूँनी = गोगुन्दा, अबुल फ़ज़ल = खमनोर, इतिहासकार = हल्दीघाटी।

2. हल्दीघाटी के बाद

काल / क्रमघटनाविवरण
1576 के बादपहाड़ी नीतिहल्दीघाटी के बाद प्रताप रणकपुर होते ईडर गए; आर्थिक हालत कमज़ोर; गुरिल्ला युद्ध जारी — पर्वतीय नीति ने मुग़ल शक्ति को विफल किया।
1577–1580शाहबाज़ ख़ाँतीन बार मेवाड़ पर आक्रमण।
3 अप्रैल 1578कुम्भलगढ़ का पतनप्रताप ने किला भाण सोनगरा को सौंपा और आधी रात पहाड़ों में निकल गए; शाहबाज़ ख़ाँ ने क़ब्ज़ा किया, ग़ाज़ी ख़ाँ बख़्शी को किले में छोड़ा — पहली बार किसी ने कुम्भलगढ़ जीता।
1580अब्दुर रहीम ख़ानख़ानाअजमेर का गवर्नर (सूबेदार); अभियान का नेतृत्व।

… शेष 4 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

गठबंधन / अभियानविवरण
ईडरनारायणदास से मैत्री; अकबर के विरुद्ध विद्रोह को प्रोत्साहन
सिरोहीराव सूरताण को मुग़ल संघर्ष में साथ आने का निमंत्रण
जालौरताज ख़ाँ को अपनी ओर मिलाया
  • रहीम का परिवार ➜ कुँवर अमरसिंह ने शेरपुर पर धावा बोलकर रहीम के घराने की स्त्रियों को पकड़ लिया; प्रताप ने नाराज़ होकर अमरसिंह से उन्हें ससम्मान लौटाने को कहा। इस उदारता से प्रभावित रहीम ने प्रताप से लड़ने का इरादा त्याग दिया।
  • भामाशाह की मदद ➜ चूलिया (चुलिया) ग्राम के निकट प्रताप से मिलकर मंत्री भामाशाह और भाई ताराचन्द ने 25 लाख रुपये और 20,000 सोने की अशर्फ़ियाँ दीं — इतना धन कि 25,000 सैनिकों का 12 वर्ष तक ख़र्च चल सके।
  • दिवेर ➜ किलेदार सेरिमा सुल्तान ख़ाँ; अमरसिंह का भाला सुल्तान ख़ाँ और घोड़े को एक साथ भेदता हुआ पार निकल गया; सुल्तान ख़ाँ के मरते ही बची मुग़ल सेना भाग गई। प्रताप ने यह युद्ध गुरिल्ला (छापामार) पद्धति से लड़ा। टॉड ने इसे “मेवाड़ का मैराथन” कहा।
  • चावण्ड ➜ दिवेर के बाद लगभग 1585 में लूणा चावण्डिया (राठौड़) को परास्त कर प्रताप ने चावण्ड (सलूम्बर) को राजधानी का दर्जा दिया; अमरसिंह प्रथम के समय 1615 तक यह राजधानी रही। प्रताप ने यहाँ महल और चामुण्डा माता का मंदिर बनवाया।

भामाशाह कावड़िया (1547–1600)

  • मेवाड़ राज्य के दीवान; प्रताप ने प्रधान रामा महासहानी को हटाकर इनको वह पद दिया।
  • पिता भारमल कावड़िया (ओसवाल) को सांगा ने रणथम्भौर का किलेदार बनाया था; भाई ताराचन्द गोडवाड़ का हाकिम रहा।
  • उपाधियाँ ➜ मेवाड़ का दानवीर / उद्धारक। पुत्र जीवाशाह अमरसिंह प्रथम के काल में दीवान।

पतन से पुनरुत्थान

  1. 1578 — कुम्भलगढ़ गया
  2. भामाशाह की भेंट
  3. 1582 — दिवेर विजय

ट्रिक: प्रताप के बाद के साल — 1578 पतन · 1582 दिवेर · 1585 चावण्ड · 1597 मृत्यु; भामाशाह = 25 लाख रुपये + 20,000 अशर्फ़ियाँ।

3. प्रताप से जुड़े स्थान व साथी

स्थानक्या है
मायरागोगुन्दा का पूर्वी पहाड़ी भाग; मायरा की गुफा छापामार युद्ध में प्रताप का शस्त्रागार
धुलिया / राणा गाँवगोगुन्दा के पश्चिम पठार पर महाराणा के महलों के खंडहर; संकट के समय परिवार यहाँ रहता था; पास में राणा गाँव
मचीन्द (राजसमंद)ऊँची पहाड़ी की 4–5 मील लम्बी सुरंगनुमा गुफ़ा (दूसरे छोर पर भी द्वार) — मुग़ल हमलों में छिपने की जगह; यहाँ प्रताप का मंदिर है, सम्भवतः देश का एकमात्र
उबेश्वरउदयपुर से 16 मील पश्चिम; शिव मंदिर और महाराणा के आवास के खंडहर
साथीभूमिका
भामाशाह (ताराचन्द)दीवान; 25 लाख रुपये और 20,000 अशर्फ़ियाँ
हकीम ख़ाँ सूरपठान सेनानायक; हरावल; मकबरा खमनौर
राणा पूँजाभील सेना (चन्द्रावल) के नेता
झाला बीदाहल्दीघाटी में राज चिह्न धारण कर बलिदान
  • पृथ्वीराज राठौड़ से प्रताप का मौसेरा रिश्ता था — दोनों की ननिहाल पाली में अखैराज सोनगरा का घर।

4. अमरसिंह से भूपालसिंह

काल / क्रमघटनाविवरण
1615मुग़ल-मेवाड़ संधिअमरसिंह प्रथम और खुर्रम (5 फ़रवरी)।
1631प्रतापगढ़ व शाहपुराशाहजहाँ ने मेवाड़ से अलग रियासत माना।
1660चारुमतीराजसिंह का रूपनगर की राजकुमारी से विवाह।
1681जयसिंह की संधिराजसमंद झील पर मुअज्जम से।

5. अमरसिंह प्रथम व 1615 की संधि

अमरसिंह प्रथम (1597–1620) की गद्दी-नशीनी 19 जनवरी 1597 को चावण्ड में हुई। प्रताप की मृत्यु के बाद अकबर ने फिर मेवाड़ पर हमले शुरू किए; इस बार ज़िम्मेदारी बेटे शहज़ादा सलीम (जहाँगीर) को दी। सलीम ने उदयपुर पर हमला किया और ऊँटाला के किले (1600) पर अधिकार कर लिया; कुँवर अमरसिंह के जवाबी हमले में मुग़ल हारे और जहाँगीर दिल्ली लौट गया।

वर्ष (ई.)मुग़ल सेनापतिनतीजा
1600सलीम (जहाँगीर)ऊँटाला पर क़ब्ज़ा, पर कुँवर अमरसिंह से हार
1605शहज़ादा परवेज़, आसिफ़ ख़ाँ, ज़फ़र ख़ाँ, सगरदेबारी के पास अनिर्णायक युद्ध (1605 में अकबर की मृत्यु, जहाँगीर बादशाह)
1608महावत ख़ाँसफलता नहीं
1609अब्दुल्ला ख़ाँसफलता नहीं
  • दो वर्ष के लगातार हमलों से जनता त्रस्त हुई; अधिकांश मुग़ल थानों पर फिर मुग़ल क़ब्ज़ा हो गया। खस्ता अर्थ-व्यवस्था तथा सरदारों और युवराज कर्णसिंह के आग्रह पर अमरसिंह ने मन मारकर संधि का प्रस्ताव भेजा।
  • अमरसिंह के दूत हरिदास झाला और शुभकरण खुर्रम के गोगुन्दा वाले पड़ाव पर पहुँचे; उधर मुल्ला शकुल्लाह शीराज़ी और सुन्दरदास इसे लेकर जहाँगीर के दरबार गए; जहाँगीर ने मंज़ूरी दी और खुर्रम को भेजा।
  • कर्णसिंह ➜ मेवाड़ की तरफ़ से मुग़ल दरबार में सबसे पहले हाज़िर होने वाले; अमरसिंह प्रथम — मुग़लों की अधीनता मानने वाला मेवाड़ का पहला शासक।

6. कर्णसिंह व जगतसिंह प्रथम

शासककाल (ई.)मुख्य बातें
कर्णसिंह1620–1628जन्म 7 जून 1584; राज्याभिषेक 26 जनवरी 1620; जहाँगीर ने “राणा” पदवी का फ़रमान व खिलअत भेजे; मनसबदारी से अलंकृत मेवाड़ का पहला शासक; 1622 में खुर्रम ने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर मेवाड़ में शरण ली — पहले देलवाड़ा की हवेली (उदयपुर), फिर जगमंदिर (पिछोला); बाद में मालवा जाने का इंतज़ाम भी; कर्णविलास, दिलखुश महल, बड़ा दरीखाना बनवाए; मार्च 1628 में मृत्यु, छतरी आहड़ में
जगतसिंह प्रथम1628–16521615 की संधि की अनदेखी कर चित्तौड़ दुर्ग की मरम्मत शुरू करवाई — शाहजहाँ रुष्ट; देवलिया (प्रतापगढ़) के जसवन्त सिंह और उनके बेटे महासिंह को उदयपुर बुलाकर छल से मरवा दिया; जसवन्त के पुत्र हरिसिंह की शिकायत पर 1631 में शाहजहाँ ने प्रतापगढ़ को अलग रियासत बना दिया; उसी वर्ष शाहपुरा भी अलग; 1643 में शाहजहाँ अजमेर आया तो युवराज राजसिंह को सेवा में भेजा; सिरोही-विजय की याद में पिछोला में मोहन मंदिर; पिता का शुरू किया जगमंदिर महल 1651 में पूरा करवाया

ध्यान दें: 1631 — मेवाड़ से दो रियासतें कटीं: प्रतापगढ़ और शाहपुरा; वजह — जगतसिंह प्रथम की हरकतें।

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. हल्दीघाटी में दोनों पक्ष जीत का दावा करते रहे; मानसिंह की सेना न प्रताप को मार पाई, न पकड़ पाई और न कुम्भलगढ़ ले सकी।
  2. राज चिह्न धारण करके बलिदान देने वाले झाला बीदा थे, और घायल चेतक की छतरी बलीचा गाँव (राजसमंद) में बनी है।
  3. 3 अप्रैल 1578 को कुम्भलगढ़ का पतन हुआ — पहली बार किसी ने कुम्भलगढ़ जीता; प्रताप किला भाण सोनगरा को सौंपकर निकले थे।
  4. भामाशाह ने 25 लाख रुपये और 20,000 अशर्फ़ियाँ दीं, जिनसे 25,000 सैनिकों का 12 वर्ष तक ख़र्च चल सकता था।
  5. दिवेर में अमरसिंह के भाले ने सुल्तान ख़ाँ को घोड़े समेत भेद दिया; टॉड ने इसे «मेवाड़ का मैराथन» कहा।
  6. प्रताप के बाद के सालों का क्रम — 1578 पतन ➜ 1582 दिवेर ➜ 1585 चावण्ड ➜ 1597 मृत्यु।
  7. अमरसिंह प्रथम मुग़लों की अधीनता मानने वाला मेवाड़ का पहला शासक था; खुर्रम से संधि 1615 में हुई।
  8. 1631 में मेवाड़ से दो रियासतें अलग हुईं — प्रतापगढ़ और शाहपुरा; कारण जगतसिंह प्रथम की हरकतें थीं।

अगले भाग में संधि के बाद के महाराणा — औरंगज़ेब से टकराव, मराठों का दौर, अंग्रेज़ों से संधि और अन्तिम शासक भूपालसिंह तक।

पिछला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: उदयसिंह व प्रताप (भाग 1)

अगला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: अमरसिंह से भूपालसिंह (भाग 2)

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