प्राचीन सभ्यताएँ व पुरास्थल: ताम्रयुगीन सभ्यताएँ एवं कांस्य युग — कालीबंगा – Rajasthan History Chapter 5

ताम्रयुगीन गणेश्वर और आहड़-बनास संस्कृति से लेकर काँस्य युग के कालीबंगा तक — नदी, खोजकर्ता और पहचान।

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In this chapter (15 sections)
  1. ताम्रयुगीन सभ्यताएँ
  2. धातु युग व बनास संस्कृति
  3. गणेश्वर (सीकर)
  4. आहड़ (उदयपुर)
  5. गिलूण्ड व पछमता
  6. बालाथल (उदयपुर)
  7. ओझियाना (ब्यावर)
  8. जयपुर क्षेत्र व अन्य ताम्र स्थल
  9. कांस्य युग — कालीबंगा
  10. कालीबंगा — पहचान
  11. नगर-नियोजन
  12. खेती, भोजन, शव-संस्कार
  13. यज्ञ-वेदियाँ, मुहरें व लिपि
  14. रंगमहल व अन्य हड़प्पा स्थल
  15. रैपिड फायर तथ्य

राजस्थान में बसावट की कहानी ताँबे से शुरू होती है — खेतड़ी की खानों के पास गणेश्वर और बनास घाटी में आहड़ — और काँसे के दौर में घग्घर किनारे का कालीबंगा सबसे बड़ा नाम बन जाता है। इस भाग में गणेश्वर, आहड़, गिलूण्ड, पछमता, बालाथल, ओझियाना और जयपुर क्षेत्र के स्थल एक-एक करके आते हैं। फिर कालीबंगा का नगर-नियोजन, खेती, शवाधान, यज्ञ-वेदियाँ और रंगमहल जैसे दूसरे हड़प्पा स्थल हैं।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — प्राचीन सभ्यताएँ व पुरास्थल, 8 चॉक-बोर्ड चित्र, 1 नक्शे, 3 चार्ट, 25 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. ताम्रयुगीन सभ्यताएँ

पाषाण युग के अंत में मनुष्य ने सबसे पहले ताँबा पहचाना; आगे काँसा (मिश्र धातु) और सबसे बाद लोहा आया। राजस्थान के ताम्र-पाषाण स्थल दो धाराओं में बँटते हैं — सीकर–झुंझुनूं की खेतड़ी पट्टी (गणेश्वर) और उदयपुर–राजसमंद की बनास घाटी (आहड़ संस्कृति)।

2. धातु युग व बनास संस्कृति

युगराजस्थान के मुख्य स्थल
ताम्र-पाषाण / ताम्रगणेश्वर, आहड़, गिलूण्ड, बालाथल, ओझियाना, पछमता, किराडोत
कांस्यकालीबंगा, रंगमहल, पीलीबंगा, सोंथी, बरोर
लौहरैढ़, जोधपुरा, सुनारी, नोह, ईसवाल, नालियासर

आहड़ व बनास तथा इनकी सहायक नदियों के बेसिन में फैली बस्तियों का सामूहिक नाम आहड़ (बनास) संस्कृति है; एच.डी. सांकलिया ने इसे यह नाम दिया।

ध्यान दें: आहड़ और गणेश्वर मूलतः ताम्र-पाषाणकालीन हैं, पर दोनों के ऊपरी स्तर में लौह-युग के अवशेष भी मिलते हैं।

ट्रिक: काल-क्रम की सीढ़ी: बागोर → करणपुरा → कालीबंगा → आहड़ → नोह → बैराठ — बाएँ से दाएँ नया होता जाता है।

3. गणेश्वर (सीकर)

  • नदी ➜ कांतली
  • क्षेत्र ➜ नीमकाथाना (सीकर)
  • खोज ➜ 1972 — रतनचन्द्र अग्रवाल

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

  • डॉ. विजय कुमार ने इसे सबसे प्राचीन ताम्रयुगीन सभ्यता मानते हुए “भारतीय ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी” कहा।
  • मकान पत्थर के थे, ईंट का प्रयोग नहीं; यही एकमात्र स्थल है जहाँ पत्थर के बाँध मिले।
  • लगभग 2000 ताम्र वस्तुएँ दर्ज — तीर व भाले की नोकें, मछली-काँटे, फरसे, कुल्हाड़ियाँ, छल्ले, चूड़ियाँ, अँगूठियाँ, उस्तरे के फलक तथा मुद्रा-शीर्ष वाली पिनें।

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

याद रखें: ताँबा खेतड़ी की खानों से आता था और पूरी सिन्धु सभ्यता (हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा) को गणेश्वर से जाता था — इसी से पुरातत्त्व का पुष्कर नाम पड़ा।

ट्रिक: गणेश्वर = कांतली + 1972/1977 + अग्रवाल–विजय कुमार + पत्थर के घर।

4. आहड़ (उदयपुर)

  • नदी ➜ आयड़ (आहड़)
  • प्राचीन नाम ➜ ताम्रवती · ताँबावती · आघाटपुर · आघाट दुर्ग
  • स्थानीय नाम ➜ धूलकोट (ऊँचा टीला)

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

काल / क्रमघटनाविवरण
1953खोज व खुदाईअक्षय कीर्ति व्यास।
1956अगला दौररतनचन्द्र अग्रवाल।
1961बड़ा उत्खननवी.एन. मिश्र व एच.डी. सांकलिया — सबसे अधिक खुदाई सांकलिया के निर्देशन में।

घर और नगर-जीवन

  • नींव में आसपास भरपूर मिलने वाला काला पत्थर (शिस्ट); दीवारें धूप में सुखाई ईंट व पत्थर की।
  • अधिकतर मकान आयताकार व बड़े; छत पर बाँस बिछाकर मिट्टी का लेप (केलू); फ़र्श में चिकनी मिट्टी के साथ पीली मिट्टी।
  • पानी की निकासी वैज्ञानिक ➜ चक्रकूप: 15–20 फुट के गड्ढे में घड़े एक के ऊपर एक रखकर शोषण-पात्र।

खान-पान, शिल्प, विश्वास

  • लोग खेती करते और अन्न पकाकर खाते थे; पुरातत्त्वविद विष्णु मैत्रे के अनुसार यहाँ उच्च कोटि का चावल (देहरादूनी जैसा लम्बा) होता था।
  • अनाज रखने के विशाल मृद्भांड (स्थानीय नाम गोरे और कोठे) ज़मीन में गड़े मिले; सबसे ज़्यादा लाल-काले मृद्भांड निकले।
  • छपाई के ठप्पे (रंगाई-छपाई का उन्नत व्यवसाय), आटा पीसने की चक्की, कमर से नीचे लहँगा पहने नारी की खंडित मूर्ति, बिना हत्थे का जलपात्र।

धातु और व्यापार

अवशेषक्या दर्शाता है
ताँबा गलाने की भट्टी; मुद्रिका, चद्दरें, चूड़ियाँ, चाकू, कुल्हाड़ी, बर्तनताम्र-औज़ारों का बड़ा केन्द्र — आसपास ताँबे की खानें थीं
लोहे की कुल्हाड़ी, चाकू, अँगूठियाँ (ऊपरी स्तर)बाद के चरण में लौह का प्रयोग
6 यूनानी ताम्र-मुद्राएँ व 3 मोहरें; एक सिक्के पर त्रिशूल, पीछे की ओर अपोलो (तीर थामे, तरकश पीठ पर); यूनानी भाषा का लेख, काल दूसरी सदी ई.पू.यूनानी जगत से सम्पर्क का संकेत

निचला कालखंड (प्रथम) ताम्रयुगीन है; ऊपरी (द्वितीय) में ताँबे के साथ लोहे का भी उपयोग होने लगा। संभव है किसी आपदा से उजड़कर निवासी उत्तर-पूर्व व दक्षिण-पूर्व की ओर गए और गिलूण्ड व भगवानपुरा (राजसमंद) बसाए।

5. गिलूण्ड व पछमता

  • गिलूण्ड ➜ राजसमंद — बनास नदी
  • टीले ➜ दो (मोडिया मगरी)
  • काल ➜ 1900–1700 ई.पू. (ताम्रयुग)
  • बी.बी. (बृजवासी) लाल ने पहली खुदाई की; बाद में पूना के वी.एस. शिंदे और अमेरिका के पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के प्रो. ग्रेगरी पोशल के निर्देशन में बड़ा उत्खनन हुआ।
  • विशाल भवनों के अवशेष।
  • पाँच तरह के बर्तन: लाल, भूरे, सादे, काले चमकदार और काले चित्रित।

पछमता (राजसमंद)

  • गिलूण्ड के निकट; आहड़–बनास संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थल, हड़प्पा का समकालीन माना गया।
  • अलंकृत जार, लेपिस लाजुली (नीला बहुमूल्य पत्थर), शंख, सीप की चूड़ियाँ, टेराकोटा मनके; साथ में कई बर्तन, दो भट्टियाँ और चूल्हे।

धौली मगरा (उदयपुर) भी इसी आहड़–बनास परिवार का स्थल है।

6. बालाथल (उदयपुर)

  • नदी ➜ बेड़च
  • स्थान ➜ वल्लभनगर तहसील, उदयपुर
  • खोज ➜ 1962–63 — वी.एन. मिश्र
  • मिट्टी का साँड, पत्थर के मनके, पकी मिट्टी की मूर्तियाँ, पशु-आकृतियाँ।
  • ताम्र औज़ार: कुल्हाड़ी, चाकू, छैनी, उस्तरे, गंडासे व चूलदार बाणाग्र; हाथी और चन्द्रमा वाली ताम्र-मुद्राएँ; कर्णफूल व हार के लटकन।
  • बर्तनों, ताँबे के औज़ारों और मकानों पर सिन्धु सभ्यता का प्रभाव — सिन्धुवासियों से सम्पर्क का अनुमान।

7. ओझियाना (ब्यावर)

  • क्षेत्र ➜ बदनौर, ब्यावर
  • उत्खनन ➜ 2000 — बी.आर. मीणा व आलोक त्रिपाठी
  • सहायक ➜ बी.आर. सिंह, एस.सी. गुप्ता
  • ताँबे की पतली चादर से बना छोटा-सा हेलीकॉप्टर — इस संस्कृति का विशेष पुरावशेष।
  • बड़ी संख्या में टेराकोटा बैल (प्राकृतिक व शैलीगत) जिन पर सफ़ेद रंग का चित्रण; गाय की मूर्तियाँ भी।
  • सफ़ेद चित्रित लाल-काले मृद्पात्र, ताँबे की चूड़ियाँ, शैल अँगूठी व पेंडेंट।

8. जयपुर क्षेत्र व अन्य ताम्र स्थल

स्थलज़िलाक्या मिला
किराडोतजयपुरदो सेटों में 28-28, यानी कुल 56 ताम्र चूड़ियाँ; काँसे की नर्तकी की मूर्ति
चिथवाड़ीजयपुरताम्रयुगीन स्थल
नन्दलालपुराजयपुर6 ताम्र कुल्हाड़ियाँ

9. कांस्य युग — कालीबंगा

सूखी घग्घर (प्राचीन सरस्वती–दृषद्वती) की घाटी में कांस्ययुगीन बस्तियाँ मिली हैं। इनमें कालीबंगा सबसे महत्त्वपूर्ण है; कांसे के उपकरणों के कारण इसे कांस्य-युगीन कहा गया।

10. कालीबंगा — पहचान

  • ज़िला ➜ हनुमानगढ़
  • नदी ➜ घग्घर (दृषद्वती–सरस्वती)
  • उपनाम ➜ दीनहीन बस्ती · निर्धन सभ्यता · नगरीय सभ्यता
काल / क्रमघटनाविवरण
1917पहचानइटालियन विद्वान एल.पी. तेस्सीतोरी ने बताया कि यह टीला प्रागैतिहासिक/पूर्व-मौर्य है — पहली प्रामाणिक जानकारी।
1952खोजअमलानन्द घोष ने इसे खोजा।
1960उत्खननASI की ओर से बी.बी. (ब्रजवासी) लाल व बी.के. (बालकृष्ण) थापर — 1960 से 1969 तक।
चरणस्तरकाल
प्राक्-हड़प्पा (सोंथी जैसी संस्कृति)छोटे टीले के सबसे निचले दो स्तरलगभग 2450–2300 ई.पू.
हड़प्पाकालीन (परिपक्व)दोनों टीलों के ऊपरी तीन स्तरलगभग 2300–1750 ई.पू.

कुल मिलाकर 5 स्तर खुले हैं। डॉ. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को सिन्धुघाटी सभ्यता की तीसरी राजधानी कहा (हड़प्पा, मोहनजोदड़ो के बाद)।

11. नगर-नियोजन

  • दो टीले: पश्चिम का ऊँचा व छोटा टीला — दुर्गनुमा बस्ती; पूर्व का कम ऊँचा, बड़ा टीला — बिना दुर्ग का निचला नगर।
  • दोनों बस्तियाँ अलग-अलग कच्ची ईंटों के दोहरे परकोटे से सुरक्षित थीं।
  • सड़कें समकोण पर काटती थीं (जाल/ग्रिड योजना); मकानों के दरवाज़े मुख्य सड़क पर नहीं, पीछे की गलियों में खुलते थे।
  • घर कच्ची ईंट के; छत में लकड़ी की कड़ियों पर मिट्टी की परत; फ़र्श पर अलंकृत ईंटें।

12. खेती, भोजन, शव-संस्कार

  • बस्ती की दीवार के बाहर दक्षिण-पूर्व में आड़ी-तिरछी हल-रेखाओं वाला जुता खेत मिला; माना जाता है कि एक खेत में दो फ़सलें (गेहूँ व जौ) साथ बोई जाती थीं।
  • संसार का सबसे पुराना जुता हुआ खेत कालीबंगा के प्राक्-हड़प्पा स्तर से मिला।
  • ऊँट की हड्डियाँ मिलीं।

शवाधान — तीन तरीक़े (बस्ती के दक्षिण का कब्रिस्तान)

विधिकैसे
1अंडाकार गड्ढे में, सिर उत्तर की ओर
2टाँगें समेटकर दफ़न
3शव के साथ बर्तन तथा स्वर्ण-मणि के दानों की माला

एक युगल समाधि भी मिली। एक बालक की खोपड़ी में 6 छेद — मस्तिष्क-शोथ के इलाज (शल्य) का प्रमाण माना गया।

छोटी वस्तुएँ

  • चाक पर बने लाल-गुलाबी मृद्भांड जिन पर काली-सफ़ेद रेखाएँ; टोंटीदार संकरे मुँह के घड़े, मटके, साधारण तश्तरियाँ।
  • पकी मिट्टी के त्रिभुजाकार केक, खिलौना गाड़ी व पहिए, खंडित बैल, गेंद।
  • अस्थि-सलाइयाँ, सिलबट्टे, गोमुख-नुमा प्याले और तौलने के पत्थर के बाट।

13. यज्ञ-वेदियाँ, मुहरें व लिपि

  • हड़प्पा-स्तर में अग्नि-वेदियाँ दुर्ग और निचले नगर, दोनों से मिलीं; 7 हवन-कुण्डों की एक पंक्ति यज्ञ का प्रमाण है।
  • हवन-कुण्ड की हड्डियों से बलि-प्रथा का संकेत; मन्दिर के अवशेष नहीं मिले; स्वास्तिक चिह्न मिलता है।
  • ताँबे, सेलखड़ी व मिट्टी की मोहरें; बेलनाकार मोहरें भी।

14. रंगमहल व अन्य हड़प्पा स्थल

स्थलज़िलाखोज / उत्खननअवशेष
रंगमहलश्रीगंगानगर1952–54, डॉ. हन्ना रिड (स्वीडन, लुण्ड विश्वविद्यालय)चावल मुख्य भोजन (साथ में भैंसा, सुअर, पक्षी, मछली); गांधार शैली की मूर्तियाँ, गुरु-शिष्य मूर्ति; गुप्तकालीन ब्राह्मी में “यशोदाकृति” वाली प्रतिमा; 105 ताम्र मुद्राएँ (कुछ कुषाणोत्तर, “मुरण्डा”)
पीलीबंगाहनुमानगढ़कालीबंगा के निकट, घग्घर किनारेसिन्धु घाटी के समकालीन अवशेष
सोंथीहनुमानगढ़ (नोहर क्षेत्र)1953, अमलानन्द घोषकालीबंगा जैसे साक्ष्य — “कालीबंगा प्रथम”

15. रैपिड फायर तथ्य

  • सबसे प्राचीन ताम्रयुगीन सभ्यता ➜ गणेश्वर (सीकर), कांतली नदी; खोज 1972, रतनचन्द्र अग्रवाल
  • पत्थर के बाँध मिले जहाँ ➜ केवल गणेश्वर में; मकान भी पत्थर के थे
  • आहड़ संस्कृति को यह नाम दिया ➜ एच.डी. सांकलिया ने; आहड़ का प्राचीन नाम ताम्रवती
  • आहड़ की जल-निकासी ➜ चक्रकूप — 15–20 फुट के गड्ढे में घड़े एक के ऊपर एक
  • बालाथल ➜ बेड़च नदी, वल्लभनगर (उदयपुर); खोज 1962–63, वी.एन. मिश्र
  • ओझियाना (ब्यावर) ➜ ताँबे की पतली चादर से बना छोटा-सा हेलीकॉप्टर
  • किराडोत (जयपुर) ➜ 56 ताम्र चूड़ियाँ और काँसे की नर्तकी की मूर्ति
  • कालीबंगा ➜ हनुमानगढ़, घग्घर के किनारे; 1952 में अमलानन्द घोष ने खोजा, 1960 में बी.बी. लाल व बी.के. थापर ने खुदाई शुरू की
  • संसार का सबसे पुराना जुता खेत ➜ कालीबंगा के प्राक्-हड़प्पा स्तर से

अगले भाग में लौह युग के स्थल और बाणगंगा किनारे का बैराठ (विराटनगर), फिर बौद्ध-शुंग स्थल और आर्य-संस्कृति के चिह्न।

पिछला भाग: प्राचीन सभ्यताएँ व पुरास्थल: पाषाण युग

अगला भाग: प्राचीन सभ्यताएँ व पुरास्थल: लौह युग एवं बैराठ (विराटनगर)

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