राजस्थान में बसावट की कहानी ताँबे से शुरू होती है — खेतड़ी की खानों के पास गणेश्वर और बनास घाटी में आहड़ — और काँसे के दौर में घग्घर किनारे का कालीबंगा सबसे बड़ा नाम बन जाता है। इस भाग में गणेश्वर, आहड़, गिलूण्ड, पछमता, बालाथल, ओझियाना और जयपुर क्षेत्र के स्थल एक-एक करके आते हैं। फिर कालीबंगा का नगर-नियोजन, खेती, शवाधान, यज्ञ-वेदियाँ और रंगमहल जैसे दूसरे हड़प्पा स्थल हैं।
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1. ताम्रयुगीन सभ्यताएँ
पाषाण युग के अंत में मनुष्य ने सबसे पहले ताँबा पहचाना; आगे काँसा (मिश्र धातु) और सबसे बाद लोहा आया। राजस्थान के ताम्र-पाषाण स्थल दो धाराओं में बँटते हैं — सीकर–झुंझुनूं की खेतड़ी पट्टी (गणेश्वर) और उदयपुर–राजसमंद की बनास घाटी (आहड़ संस्कृति)।
2. धातु युग व बनास संस्कृति
| युग | राजस्थान के मुख्य स्थल |
|---|---|
| ताम्र-पाषाण / ताम्र | गणेश्वर, आहड़, गिलूण्ड, बालाथल, ओझियाना, पछमता, किराडोत |
| कांस्य | कालीबंगा, रंगमहल, पीलीबंगा, सोंथी, बरोर |
| लौह | रैढ़, जोधपुरा, सुनारी, नोह, ईसवाल, नालियासर |
आहड़ व बनास तथा इनकी सहायक नदियों के बेसिन में फैली बस्तियों का सामूहिक नाम आहड़ (बनास) संस्कृति है; एच.डी. सांकलिया ने इसे यह नाम दिया।
ध्यान दें: आहड़ और गणेश्वर मूलतः ताम्र-पाषाणकालीन हैं, पर दोनों के ऊपरी स्तर में लौह-युग के अवशेष भी मिलते हैं।
ट्रिक: काल-क्रम की सीढ़ी: बागोर → करणपुरा → कालीबंगा → आहड़ → नोह → बैराठ — बाएँ से दाएँ नया होता जाता है।
3. गणेश्वर (सीकर)
- नदी ➜ कांतली
- क्षेत्र ➜ नीमकाथाना (सीकर)
- खोज ➜ 1972 — रतनचन्द्र अग्रवाल
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
- डॉ. विजय कुमार ने इसे सबसे प्राचीन ताम्रयुगीन सभ्यता मानते हुए “भारतीय ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी” कहा।
- मकान पत्थर के थे, ईंट का प्रयोग नहीं; यही एकमात्र स्थल है जहाँ पत्थर के बाँध मिले।
- लगभग 2000 ताम्र वस्तुएँ दर्ज — तीर व भाले की नोकें, मछली-काँटे, फरसे, कुल्हाड़ियाँ, छल्ले, चूड़ियाँ, अँगूठियाँ, उस्तरे के फलक तथा मुद्रा-शीर्ष वाली पिनें।
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
याद रखें: ताँबा खेतड़ी की खानों से आता था और पूरी सिन्धु सभ्यता (हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा) को गणेश्वर से जाता था — इसी से पुरातत्त्व का पुष्कर नाम पड़ा।
ट्रिक: गणेश्वर = कांतली + 1972/1977 + अग्रवाल–विजय कुमार + पत्थर के घर।
4. आहड़ (उदयपुर)
- नदी ➜ आयड़ (आहड़)
- प्राचीन नाम ➜ ताम्रवती · ताँबावती · आघाटपुर · आघाट दुर्ग
- स्थानीय नाम ➜ धूलकोट (ऊँचा टीला)
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1953 | खोज व खुदाई | अक्षय कीर्ति व्यास। |
| 1956 | अगला दौर | रतनचन्द्र अग्रवाल। |
| 1961 | बड़ा उत्खनन | वी.एन. मिश्र व एच.डी. सांकलिया — सबसे अधिक खुदाई सांकलिया के निर्देशन में। |
घर और नगर-जीवन
- नींव में आसपास भरपूर मिलने वाला काला पत्थर (शिस्ट); दीवारें धूप में सुखाई ईंट व पत्थर की।
- अधिकतर मकान आयताकार व बड़े; छत पर बाँस बिछाकर मिट्टी का लेप (केलू); फ़र्श में चिकनी मिट्टी के साथ पीली मिट्टी।
- पानी की निकासी वैज्ञानिक ➜ चक्रकूप: 15–20 फुट के गड्ढे में घड़े एक के ऊपर एक रखकर शोषण-पात्र।
खान-पान, शिल्प, विश्वास
- लोग खेती करते और अन्न पकाकर खाते थे; पुरातत्त्वविद विष्णु मैत्रे के अनुसार यहाँ उच्च कोटि का चावल (देहरादूनी जैसा लम्बा) होता था।
- अनाज रखने के विशाल मृद्भांड (स्थानीय नाम गोरे और कोठे) ज़मीन में गड़े मिले; सबसे ज़्यादा लाल-काले मृद्भांड निकले।
- छपाई के ठप्पे (रंगाई-छपाई का उन्नत व्यवसाय), आटा पीसने की चक्की, कमर से नीचे लहँगा पहने नारी की खंडित मूर्ति, बिना हत्थे का जलपात्र।
धातु और व्यापार
| अवशेष | क्या दर्शाता है |
|---|---|
| ताँबा गलाने की भट्टी; मुद्रिका, चद्दरें, चूड़ियाँ, चाकू, कुल्हाड़ी, बर्तन | ताम्र-औज़ारों का बड़ा केन्द्र — आसपास ताँबे की खानें थीं |
| लोहे की कुल्हाड़ी, चाकू, अँगूठियाँ (ऊपरी स्तर) | बाद के चरण में लौह का प्रयोग |
| 6 यूनानी ताम्र-मुद्राएँ व 3 मोहरें; एक सिक्के पर त्रिशूल, पीछे की ओर अपोलो (तीर थामे, तरकश पीठ पर); यूनानी भाषा का लेख, काल दूसरी सदी ई.पू. | यूनानी जगत से सम्पर्क का संकेत |
निचला कालखंड (प्रथम) ताम्रयुगीन है; ऊपरी (द्वितीय) में ताँबे के साथ लोहे का भी उपयोग होने लगा। संभव है किसी आपदा से उजड़कर निवासी उत्तर-पूर्व व दक्षिण-पूर्व की ओर गए और गिलूण्ड व भगवानपुरा (राजसमंद) बसाए।
5. गिलूण्ड व पछमता
- गिलूण्ड ➜ राजसमंद — बनास नदी
- टीले ➜ दो (मोडिया मगरी)
- काल ➜ 1900–1700 ई.पू. (ताम्रयुग)
- बी.बी. (बृजवासी) लाल ने पहली खुदाई की; बाद में पूना के वी.एस. शिंदे और अमेरिका के पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के प्रो. ग्रेगरी पोशल के निर्देशन में बड़ा उत्खनन हुआ।
- विशाल भवनों के अवशेष।
- पाँच तरह के बर्तन: लाल, भूरे, सादे, काले चमकदार और काले चित्रित।
पछमता (राजसमंद)
- गिलूण्ड के निकट; आहड़–बनास संस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थल, हड़प्पा का समकालीन माना गया।
- अलंकृत जार, लेपिस लाजुली (नीला बहुमूल्य पत्थर), शंख, सीप की चूड़ियाँ, टेराकोटा मनके; साथ में कई बर्तन, दो भट्टियाँ और चूल्हे।
धौली मगरा (उदयपुर) भी इसी आहड़–बनास परिवार का स्थल है।
6. बालाथल (उदयपुर)
- नदी ➜ बेड़च
- स्थान ➜ वल्लभनगर तहसील, उदयपुर
- खोज ➜ 1962–63 — वी.एन. मिश्र
- मिट्टी का साँड, पत्थर के मनके, पकी मिट्टी की मूर्तियाँ, पशु-आकृतियाँ।
- ताम्र औज़ार: कुल्हाड़ी, चाकू, छैनी, उस्तरे, गंडासे व चूलदार बाणाग्र; हाथी और चन्द्रमा वाली ताम्र-मुद्राएँ; कर्णफूल व हार के लटकन।
- बर्तनों, ताँबे के औज़ारों और मकानों पर सिन्धु सभ्यता का प्रभाव — सिन्धुवासियों से सम्पर्क का अनुमान।
7. ओझियाना (ब्यावर)
- क्षेत्र ➜ बदनौर, ब्यावर
- उत्खनन ➜ 2000 — बी.आर. मीणा व आलोक त्रिपाठी
- सहायक ➜ बी.आर. सिंह, एस.सी. गुप्ता
- ताँबे की पतली चादर से बना छोटा-सा हेलीकॉप्टर — इस संस्कृति का विशेष पुरावशेष।
- बड़ी संख्या में टेराकोटा बैल (प्राकृतिक व शैलीगत) जिन पर सफ़ेद रंग का चित्रण; गाय की मूर्तियाँ भी।
- सफ़ेद चित्रित लाल-काले मृद्पात्र, ताँबे की चूड़ियाँ, शैल अँगूठी व पेंडेंट।
8. जयपुर क्षेत्र व अन्य ताम्र स्थल
| स्थल | ज़िला | क्या मिला |
|---|---|---|
| किराडोत | जयपुर | दो सेटों में 28-28, यानी कुल 56 ताम्र चूड़ियाँ; काँसे की नर्तकी की मूर्ति |
| चिथवाड़ी | जयपुर | ताम्रयुगीन स्थल |
| नन्दलालपुरा | जयपुर | 6 ताम्र कुल्हाड़ियाँ |
9. कांस्य युग — कालीबंगा
सूखी घग्घर (प्राचीन सरस्वती–दृषद्वती) की घाटी में कांस्ययुगीन बस्तियाँ मिली हैं। इनमें कालीबंगा सबसे महत्त्वपूर्ण है; कांसे के उपकरणों के कारण इसे कांस्य-युगीन कहा गया।
10. कालीबंगा — पहचान
- ज़िला ➜ हनुमानगढ़
- नदी ➜ घग्घर (दृषद्वती–सरस्वती)
- उपनाम ➜ दीनहीन बस्ती · निर्धन सभ्यता · नगरीय सभ्यता
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1917 | पहचान | इटालियन विद्वान एल.पी. तेस्सीतोरी ने बताया कि यह टीला प्रागैतिहासिक/पूर्व-मौर्य है — पहली प्रामाणिक जानकारी। |
| 1952 | खोज | अमलानन्द घोष ने इसे खोजा। |
| 1960 | उत्खनन | ASI की ओर से बी.बी. (ब्रजवासी) लाल व बी.के. (बालकृष्ण) थापर — 1960 से 1969 तक। |
| चरण | स्तर | काल |
|---|---|---|
| प्राक्-हड़प्पा (सोंथी जैसी संस्कृति) | छोटे टीले के सबसे निचले दो स्तर | लगभग 2450–2300 ई.पू. |
| हड़प्पाकालीन (परिपक्व) | दोनों टीलों के ऊपरी तीन स्तर | लगभग 2300–1750 ई.पू. |
कुल मिलाकर 5 स्तर खुले हैं। डॉ. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को सिन्धुघाटी सभ्यता की तीसरी राजधानी कहा (हड़प्पा, मोहनजोदड़ो के बाद)।
11. नगर-नियोजन
- दो टीले: पश्चिम का ऊँचा व छोटा टीला — दुर्गनुमा बस्ती; पूर्व का कम ऊँचा, बड़ा टीला — बिना दुर्ग का निचला नगर।
- दोनों बस्तियाँ अलग-अलग कच्ची ईंटों के दोहरे परकोटे से सुरक्षित थीं।
- सड़कें समकोण पर काटती थीं (जाल/ग्रिड योजना); मकानों के दरवाज़े मुख्य सड़क पर नहीं, पीछे की गलियों में खुलते थे।
- घर कच्ची ईंट के; छत में लकड़ी की कड़ियों पर मिट्टी की परत; फ़र्श पर अलंकृत ईंटें।
12. खेती, भोजन, शव-संस्कार
- बस्ती की दीवार के बाहर दक्षिण-पूर्व में आड़ी-तिरछी हल-रेखाओं वाला जुता खेत मिला; माना जाता है कि एक खेत में दो फ़सलें (गेहूँ व जौ) साथ बोई जाती थीं।
- संसार का सबसे पुराना जुता हुआ खेत कालीबंगा के प्राक्-हड़प्पा स्तर से मिला।
- ऊँट की हड्डियाँ मिलीं।
शवाधान — तीन तरीक़े (बस्ती के दक्षिण का कब्रिस्तान)
| विधि | कैसे |
|---|---|
| 1 | अंडाकार गड्ढे में, सिर उत्तर की ओर |
| 2 | टाँगें समेटकर दफ़न |
| 3 | शव के साथ बर्तन तथा स्वर्ण-मणि के दानों की माला |
एक युगल समाधि भी मिली। एक बालक की खोपड़ी में 6 छेद — मस्तिष्क-शोथ के इलाज (शल्य) का प्रमाण माना गया।
छोटी वस्तुएँ
- चाक पर बने लाल-गुलाबी मृद्भांड जिन पर काली-सफ़ेद रेखाएँ; टोंटीदार संकरे मुँह के घड़े, मटके, साधारण तश्तरियाँ।
- पकी मिट्टी के त्रिभुजाकार केक, खिलौना गाड़ी व पहिए, खंडित बैल, गेंद।
- अस्थि-सलाइयाँ, सिलबट्टे, गोमुख-नुमा प्याले और तौलने के पत्थर के बाट।
13. यज्ञ-वेदियाँ, मुहरें व लिपि
- हड़प्पा-स्तर में अग्नि-वेदियाँ दुर्ग और निचले नगर, दोनों से मिलीं; 7 हवन-कुण्डों की एक पंक्ति यज्ञ का प्रमाण है।
- हवन-कुण्ड की हड्डियों से बलि-प्रथा का संकेत; मन्दिर के अवशेष नहीं मिले; स्वास्तिक चिह्न मिलता है।
- ताँबे, सेलखड़ी व मिट्टी की मोहरें; बेलनाकार मोहरें भी।
14. रंगमहल व अन्य हड़प्पा स्थल
| स्थल | ज़िला | खोज / उत्खनन | अवशेष |
|---|---|---|---|
| रंगमहल | श्रीगंगानगर | 1952–54, डॉ. हन्ना रिड (स्वीडन, लुण्ड विश्वविद्यालय) | चावल मुख्य भोजन (साथ में भैंसा, सुअर, पक्षी, मछली); गांधार शैली की मूर्तियाँ, गुरु-शिष्य मूर्ति; गुप्तकालीन ब्राह्मी में “यशोदाकृति” वाली प्रतिमा; 105 ताम्र मुद्राएँ (कुछ कुषाणोत्तर, “मुरण्डा”) |
| पीलीबंगा | हनुमानगढ़ | कालीबंगा के निकट, घग्घर किनारे | सिन्धु घाटी के समकालीन अवशेष |
| सोंथी | हनुमानगढ़ (नोहर क्षेत्र) | 1953, अमलानन्द घोष | कालीबंगा जैसे साक्ष्य — “कालीबंगा प्रथम” |
15. रैपिड फायर तथ्य
- सबसे प्राचीन ताम्रयुगीन सभ्यता ➜ गणेश्वर (सीकर), कांतली नदी; खोज 1972, रतनचन्द्र अग्रवाल
- पत्थर के बाँध मिले जहाँ ➜ केवल गणेश्वर में; मकान भी पत्थर के थे
- आहड़ संस्कृति को यह नाम दिया ➜ एच.डी. सांकलिया ने; आहड़ का प्राचीन नाम ताम्रवती
- आहड़ की जल-निकासी ➜ चक्रकूप — 15–20 फुट के गड्ढे में घड़े एक के ऊपर एक
- बालाथल ➜ बेड़च नदी, वल्लभनगर (उदयपुर); खोज 1962–63, वी.एन. मिश्र
- ओझियाना (ब्यावर) ➜ ताँबे की पतली चादर से बना छोटा-सा हेलीकॉप्टर
- किराडोत (जयपुर) ➜ 56 ताम्र चूड़ियाँ और काँसे की नर्तकी की मूर्ति
- कालीबंगा ➜ हनुमानगढ़, घग्घर के किनारे; 1952 में अमलानन्द घोष ने खोजा, 1960 में बी.बी. लाल व बी.के. थापर ने खुदाई शुरू की
- संसार का सबसे पुराना जुता खेत ➜ कालीबंगा के प्राक्-हड़प्पा स्तर से
अगले भाग में लौह युग के स्थल और बाणगंगा किनारे का बैराठ (विराटनगर), फिर बौद्ध-शुंग स्थल और आर्य-संस्कृति के चिह्न।
पिछला भाग: प्राचीन सभ्यताएँ व पुरास्थल: पाषाण युग
अगला भाग: प्राचीन सभ्यताएँ व पुरास्थल: लौह युग एवं बैराठ (विराटनगर)
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