मेवाड़ का गुहिल राजवंश: बप्पा से रावल रतनसिंह (भाग 2) एवं हम्मीर से मोकल – Rajasthan History Chapter 15

रतनसिंह और चित्तौड़ का पहला साका, हम्मीर से मोकल तक के शासक तथा कुम्भा की गद्दी, युद्ध, किले व उपाधियाँ।

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In this chapter (10 sections)
  1. रतनसिंह व पहला साका
  2. हम्मीर से मोकल
  3. महाराणा हम्मीर (1326–64)
  4. क्षेत्रसिंह व लाखा
  5. महाराणा मोकल (1421–33)
  6. महाराणा कुम्भा (1433–68)
  7. गद्दी, रणमल व जोधा
  8. मालवा व गुजरात से संघर्ष
  9. किले व उपाधियाँ
  10. रैपिड फायर तथ्य

चित्तौड़ का पहला साका मेवाड़ के इतिहास का मोड़ है, क्योंकि यहीं रावल शाखा का अन्त होता है और आगे सिसोदिया राणाओं की कतार चलती है। इसी सीमा-रेखा को पकड़कर पूरा अध्याय पढ़ें। इस भाग में रतनसिंह व पहला साका, महाराणा हम्मीर, क्षेत्रसिंह व लाखा और मोकल दिए हैं, फिर कुम्भा की गद्दी, रणमल-जोधा प्रकरण, मालवा-गुजरात से संघर्ष, उनके किले और उपाधियाँ।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — मेवाड़ का गुहिल राजवंश, 14 चॉक-बोर्ड चित्र, 5 चार्ट, 25 फ्लैशकार्ड और 14 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. रतनसिंह व पहला साका

रावल रतनसिंह (1302–1303) गुहिलों की रावल शाखा का अन्तिम शासक था। गद्दी पर बैठते ही उसे अलाउद्दीन ख़िलजी के हमले का सामना करना पड़ा। असली कारण सुल्तान की साम्राज्य-विस्तार की चाह और चित्तौड़ दुर्ग का सामरिक महत्त्व था।

  • कुछ लोग हमले की वजह रानी पद्मिनी को पाना बताते हैं; पर यह कथा जायसी के पद्मावत (1540, शेरशाह सूरी का काल) से आई है, जबकि घटना 1302–03 की है — इसलिए यह कल्पना ही लगती है। ओझा और कवि सूर्यमल्ल मिश्रण जैसे इतिहासकार इसे ऐतिहासिक नहीं मानते, फिर भी अबुल फ़ज़ल, फ़रिश्ता, टॉड और नैणसी ने थोड़े हेर-फेर से इसे लिखा है।
  • जनवरी 1303 में अलाउद्दीन दिल्ली से चला; सुल्तान का डेरा गम्भीरी और बेड़च के बीच के मैदान में पड़ा; घेरा लगभग 8 माह चला।
  • घेरे के दौरान हुई झड़पों में सिसोदा के सरदार लक्ष्मण सिंह और उनके सातों पुत्र काम आए।
  • रानी पद्मिनी ने 1600 राजपूत स्त्रियों के साथ जौहर किया; गोरा (पद्मिनी के चाचा) और बादल (गोरा का भतीजा / पद्मिनी का भाई) की अगुवाई में राजपूतों ने केसरिया बाना पहन फाटक खोले और लड़ते हुए वीरगति पाई — यह चित्तौड़ का पहला साका था।

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काल / क्रमघटनाविवरण
1303पहला साका26 अगस्त को चित्तौड़ पर अलाउद्दीन का अधिकार; ख़िज़्र ख़ाँ शासक।
1313मालदेवख़िज़्र ख़ाँ ने सोनगरा चौहान मालदेव (मुछाला) को दुर्ग सौंपा।
1321मालदेव की मृत्युपुत्र बनवीर / जयसिंह राजा बना।

सिसोदिया शाखा

रणसिंह का पुत्र राहप सिसोदा गाँव में जा बसा। उसी की वंश-परम्परा में लक्ष्मणदेव (लक्ष्मण सिंह) सिसोदिया हुआ; उसके वंशज सिसोदिया / राणा कहलाए। लक्ष्मण के सबसे छोटे (सातवें) बेटे अरिसिंह से हम्मीर हुआ, जो सिसोदिया वंश का सूत्रधार बना।

सिसोदिया वंश की डोर

  1. रणसिंह
  2. राहप (सिसोदा)
  3. लक्ष्मणदेव

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ट्रिक: पहले साके के पात्र — रतनसिंह · पद्मिनी · गोरा-बादल · अलाउद्दीन · ख़िज़्र ख़ाँ (ख़िज़्राबाद) · अमीर ख़ुसरो।

2. हम्मीर से मोकल

याद रखें: सीमा-रेखा — हम्मीर से पहले के गुहिल शासक रावल; हम्मीर के बाद के राणा / सिसोदिया।

3. महाराणा हम्मीर (1326–64)

  • उपनाम ➜ मेवाड़ का उद्धारक और सिसोदिया साम्राज्य का संस्थापक।
  • विषम घाटी पंचानन ➜ कुम्भलगढ़ शिलालेख (1460) के चौथे पाषाण-खण्ड पर कठिन हमलों में हम्मीर की उपमा सिंह से दी गई है।
  • कुम्भा ने रसिक प्रिया टीका में हम्मीर को वीर राजा लिखा।

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

चित्तौड़ की वापसी

  1. 1303 — अलाउद्दीन; ख़िज़्र ख़ाँ
  2. 1313 — मालदेव (सोनगरा)
  3. 1321 — जयसिंह / बनवीर

4. क्षेत्रसिंह व लाखा

शासककाल (ई.)मुख्य बातें
क्षेत्रसिंह (खेता) — हम्मीर का पुत्र1364–1382अजमेर, मांडल, जहाजपुर राज्य में मिलाए; मालवा के दिलावर ख़ाँ ग़ौरी को हराया; बूँदी पर चढ़कर हाड़ाओं को दबाया; 1382 में बूँदी के लालसिंह हाड़ा से लड़ते वीरगति
लक्षसिंह (लाखा) — क्षेत्रसिंह का पुत्र1382–1421शासन में जावर की चाँदी की खान निकली — उसकी आय से किले-मंदिरों का जीर्णोद्धार; दरबार में संस्कृत विद्वान झोटिंग भट्ट, धनेश्वर भट्ट
  • लाखा ने दिल्ली सुल्तान ग़यासुद्दीन द्वितीय को बदनौर के पास हराया और हिन्दुओं से लिया जाने वाला तीर्थ-कर समाप्त करने का वचन लिया।
  • 1396 में गुजरात के ज़फ़र ख़ाँ का मांडलगढ़ पर हमला विफल किया।
  • बूँदी के बरसिंह हाड़ा को मेवाड़ की अधीनता मानने को विवश किया।

बुढ़ापे में लाखा ने मारवाड़ के राव चूण्डा की पुत्री और रणमल की बहन हंसाबाई से विवाह किया। ज्येष्ठ पुत्र कुँवर चूण्डा ने आजीवन कुँवारा रहने और गद्दी न लेने की प्रतिज्ञा ली, इसीलिए वह “मेवाड़ का भीष्म पितामह” कहलाया। हंसाबाई के पुत्र मोकल हुए। मृत्यु-शय्या पर लाखा ने चूण्डा को छोटे भाई मोकल का संरक्षक बनाया।

याद रखें: राणा लाखा का नियम — चूण्डा के वंशज (सलूम्बर के रावत) का चिह्न महाराणा की ओर से जारी पट्टों, सनदों और परवानों पर अंकित होगा।

5. महाराणा मोकल (1421–33)

  • लाखा के निधन पर केवल 12 वर्ष का मोकल राजा बना और बड़ा भाई चूण्डा शासन चलाता रहा।
  • हंसाबाई के संदेह से तंग आकर चूण्डा मालवा (मांडू) के सुल्तान होशंगशाह की शरण में चला गया और भाई राघवदेव को मेवाड़ की रक्षा के लिए छोड़ गया।
  • हंसाबाई ने भाई रणमल्ल राठौड़ को मारवाड़ से बुलाकर मोकल का संरक्षक बनवाया; रणमल ने ऊँचे पदों पर राठौड़ सरदार बैठा दिए — सिसोदिया सरदार नाराज़ हुए।
निर्माण / दरबारविवरण
मोकल जी का मंदिरचित्तौड़ दुर्ग का समिद्धेश्वर मंदिर — 1428 में जीर्णोद्धार, तभी से यह नाम
एकलिंग मंदिरजीर्णोद्धार और परकोटा
शिल्पीमना, फना, विसल

ट्रिक: मोकल का क्रम — 12 वर्ष में गद्दी → रणमल का दख़ल → 1428 रामपुरा → 1433 जीलवाड़ा में हत्या (चाचा-मेरा, महपा पँवार)।

6. महाराणा कुम्भा (1433–68)

काल / क्रमघटनाविवरण
1433राज्यारोहणमोकल की हत्या के बाद कुम्भा गद्दी पर।
1437सारंगपुरमहमूद ख़िलजी प्रथम पर विजय।
1438रणमल की हत्यासरदारों ने शराब में ज़हर देकर।
1440–48विजय स्तम्भचित्तौड़ में मालवा-विजय के उपलक्ष्य में।

7. गद्दी, रणमल व जोधा

जब मोकल मारा गया, कुम्भा भी पड़ाव में था और हत्यारों ने उस पर भी हमला किया, पर सरदार उसे सुरक्षित चित्तौड़ पहुँचा लाए। गद्दी पर बैठते ही उसके सामने दो समस्याएँ थीं — पिता के हत्यारों का दमन और रणमल्ल का बढ़ता असर घटाना।

रणमल प्रकरण

  1. कुम्भा ने रणमल्ल को सेना सहित बुलवाया; हत्यारे चाचा और मेरा मारे गए
  2. चाचा का पुत्र अक्का और महपा पँवार भागकर मालवा के महमूद ख़िलजी की शरण में
  3. ताऊ चूण्डा को मेवाड़ वापस बुलाया
  • अर्बली (आर्बली) का युद्ध ➜ जिस समय रणमल को मारा गया, जोधा मेवाड़ में ही मौजूद था और जान बचाकर मारवाड़ की तरफ़ भागा। कुम्भा की सेना ने पीछा कर उसे हराया और पाली, सोजत, मंडोर पर मेवाड़ का क़ब्ज़ा हो गया; जोधा को कावनी गाँव (बीकानेर) में छिपना पड़ा। उसने कई बार मंडोर लेने की कोशिश की, हर बार विफल रहा।
  • आंवल-बांवल की संधि (1453) ➜ हंसाबाई की मध्यस्थता से कुम्भा और जोधा के बीच; सीमा पेड़ों से बाँटी गई — आम/आंवल वाला इलाक़ा मेवाड़ को, बबूल वाला मारवाड़ को। यहीं से मंडोर जोधा के हिस्से में आ गया।
  • दुश्मनी ख़त्म करने के लिए जोधा की बेटी शृंगार देवी कुम्भा के पुत्र रायमल को ब्याही गई।

8. मालवा व गुजरात से संघर्ष

मेवाड़–मालवा संघर्ष

घटनावर्ष (ई.)क्या हुआ
सारंगपुर का युद्ध1437कुम्भा ने महमूद ख़िलजी प्रथम को हराया; सुल्तान को बंदी बनाकर चित्तौड़ लाया गया और लगभग 6 माह रखकर छोड़ा गया। टॉड ने इस रिहाई (और राज्य लौटाने) को राजनीतिक अदूरदर्शिता कहा
विजय स्तम्भ1440–48मालवा-विजय की याद में चित्तौड़ दुर्ग में
कुम्भलगढ़ पर हमला1443हार का बदला लेने महमूद आया; किले की तलहटी में बाण माता मंदिर के निकट मेवाड़ी सेना के नायक दीपसिंह साथियों समेत खेत रहे; आक्रमणकारियों ने मंदिर तोड़ा, पर किला न ले सके; लौटती सेना का महाराणा ने पीछा किया

मेवाड़–गुजरात संघर्ष

  • नागौर ➜ कुम्भा की मदद से फ़ीरोज़ ख़ाँ का पुत्र शम्स ख़ाँ शर्त पर नागौर का शासक बना; शर्तें न मानने पर कुम्भा ने चढ़ाई की। शम्स ख़ाँ ने गुजरात के कुतुबुद्दीन की मदद ली, फिर भी हारा।
  • चम्पानेर की संधि (1456) ➜ कुतुबुद्दीन (गुजरात) और महमूद ख़िलजी (मालवा) ने तय किया कि मेवाड़ जीतकर उसका आधा-आधा बाँटेंगे।
  • 1457 में दोनों ने अलग-अलग दिशाओं से हमला किया — कुतुबुद्दीन आबू लेकर आगे बढ़ा पर कुम्भलगढ़ के पास हारकर लौटा; महमूद मालवा से घुसा और बैराठगढ़ (बदनौर) के युद्ध में हारा। दोनों सेनाएँ लूट-खसोट करती लौट गईं।

विजय-क्षेत्र (रणकपुर शिलालेख)

  • कुम्भा ने सबसे पहले चित्तौड़ और कुम्भलगढ़ में सैन्य-शक्ति संगठित की।
  • आबू, बसन्तगढ़ और सिरोही राज्य का पूर्वी भाग राज्य में मिलाया।
  • गागरोन, बम्बावदा और मांडलगढ़ जीते; बूँदी के शासक को कर देने पर बाध्य किया।

9. किले व उपाधियाँ

किलाज़िला / स्थान
कुम्भलगढ़राजसमंद
बसन्ती दुर्ग (बसन्तपुर)सिरोही
अचलगढ़ (आर्बुद दुर्ग)सिरोही
बैराठ दुर्गबदनौर (ब्यावर)

ज़्यादातर किले कुम्भा ने पहले से बने किलों के खंडहरों पर खड़े किए, इसलिए उसे “भग्नावशेषों का उद्धारक” कहा जाता है।

कुम्भा की उपाधियाँ

उपाधिक्यों
राजगुरु · दानगुरुराजनीति का गुरु; दानी
हालगुरुगिरि-दुर्गों का स्वामी
शैलगुरुयुद्ध में निपुण
चापगुरुधनुर्विद्या का ज्ञाता
  • विद्याओं में भी कुम्भा आगे थे ➜ उन्हें वेद, मीमांसा, उपनिषद्, व्याकरण, राजनीति, साहित्य और संगीत का गहरा बोध था, और वे उत्तम वीणा-वादक थे।
  • उसकी रचनाओं का ब्योरा “राजस्थान के प्रमुख साहित्यकार” वाले विषय में है।

10. रैपिड फायर तथ्य

  • रावल शाखा का अन्तिम शासक ➜ रावल रतनसिंह (1302–1303)
  • पहला साका ➜ 1303 में अलाउद्दीन का चित्तौड़ पर अधिकार; गोरा-बादल का केसरिया और पद्मिनी का जौहर
  • सिसोदिया वंश के सूत्रधार ➜ हम्मीर (1326–64), जिन्हें मेवाड़ का उद्धारक कहा गया
  • मेवाड़ का भीष्म पितामह ➜ कुँवर चूण्डा, जिन्होंने गद्दी न लेने की प्रतिज्ञा ली
  • जावर की चाँदी की खान ➜ लक्षसिंह (लाखा) के शासन (1382–1421) में निकली
  • मोकल की हत्या ➜ 1433 में जीलवाड़ा में, चाचा-मेरा व महपा पँवार द्वारा
  • सारंगपुर का युद्ध ➜ 1437 में कुम्भा ने महमूद ख़िलजी प्रथम को हराया
  • विजय स्तम्भ ➜ 1440–48, मालवा-विजय की याद में चित्तौड़ में
  • आंवल-बांवल की संधि ➜ 1453 में, कुम्भा और जोधा के बीच हंसाबाई की मध्यस्थता से

अगले भाग में कुम्भा का दरबार, उदा व रायमल का दौर, राणा सांगा के युद्ध, खानवा और सांगा के बाद की अस्थिरता आएगी।

पिछला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: परिचय व उत्पत्ति एवं बप्पा से रावल रतनसिंह (भाग 1)

अगला भाग: मेवाड़ का गुहिल राजवंश: महाराणा कुम्भा (1433–68) (भाग 2) एवं राणा सांगा व खानवा

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