तराईन के दोनों युद्धों को साथ रखकर पढ़ें तो पूरा मामला साफ़ हो जाता है: एक साल के अन्तर पर पहली बार पृथ्वीराज जीता और दूसरी बार गौरी। इस भाग में गौरी से संघर्ष, दोनों युद्ध, पृथ्वीराज का अन्त और मूल्यांकन दिया है। उसके बाद नाडौल के चौहान, रणथम्भौर के शुरुआती शासक और हम्मीर देव — उनके युद्ध, अलाउद्दीन से टक्कर, उपलब्धियाँ और ग्रंथ — क्रम से आते हैं।
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1. गौरी से संघर्ष
- 1178 ➜ मोहम्मद गौरी ग़ज़नी का सूबेदार बना। विस्तार के लिए उसने भारत में सबसे पहले गुजरात पर आक्रमण किया, पर आबू के युद्ध (1178) में भीमदेव द्वितीय से हार गया।
- फिर अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान होकर पंजाब में प्रवेश किया।
- 1186 से 1191 के बीच पृथ्वीराज ने गौरी को कई बार हराया (सब छोटी झड़पें)।
हम्मीर महाकाव्य का दावा है कि गौरी आठ बार हारा और नौवीं भिड़ंत में पृथ्वीराज पराजित हुआ। प्रबन्धकोष में 21 युद्धों का वर्णन है — 20 में गौरी हारा, 21वें में पृथ्वीराज। पृथ्वीराज रासो की गवाही भी यही है। प्रबन्ध चिन्तामणि में संख्या 22 बताई है।
2. तराईन का प्रथम युद्ध
- गौरी ने 1191 में तबर-ए-हिन्द (सरहिन्द / भटिण्डा) हथियाकर वहाँ का दुर्ग क़ाज़ी ज़ियाउद्दीन के सुपुर्द कर दिया।
- जवाबी हमले में पृथ्वीराज ने ज़ियाउद्दीन को क़ैद कर लिया और फिरौती के बदले उसे रिहा कर दिया।
- युद्ध में गौरी के प्रहार से दिल्ली के गवर्नर गोविन्द राय के दो दाँत टूटे; गोविन्द राय के जवाबी वार से गौरी बुरी तरह घायल हुआ और साथी उसे सुरक्षित ग़ज़नी ले गए।
3. तराईन का द्वितीय युद्ध
युद्ध की कड़ियाँ
- पहली हार के एक साल बाद गौरी लाहौर-मुल्तान के रास्ते लौटा (1192)
- दूत किवाम-उल-मुल्क — अधीनता और इस्लाम का प्रस्ताव (हसन निज़ामी)
- पृथ्वीराज का उत्तर: लौट जाओ, नहीं तो रणभूमि में भेंट
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- सीमित सेना लेकर पृथ्वीराज सामन्तसिंह (वागड़ शासक) व गोविन्दराय समेत तराईन / तरवाड़ी के मैदान आ डटा।
- वीरगति ➜ सेनापति खाण्डेराव, दिल्ली का सामन्त गोविन्दराज तंवर, पज्जवनराय कछवाहा का पुत्र बलभद्र, चामुण्डराय आदि।
| तराईन I | तराईन II | |
|---|---|---|
| वर्ष | 1191 | 1192 |
| जीत | पृथ्वीराज | मोहम्मद गौरी |
| गौरी का हाल | घायल होकर ग़ज़नी भागा | छल से अचानक हमला; सेना की कुशल चाल |
4. अंत व मूल्यांकन
| स्रोत | पृथ्वीराज का अंत |
|---|---|
| मिनहाज-उस-सिराज | पकड़कर तुरंत क़त्ल कर दिया |
| ताज-उल-मासिर | पकड़कर अजमेर ले गए; गौरी ने मुक्त कर अधीन सामन्त बनाया; षड्यंत्र की आशंका पर वध |
| विरुद्ध-विधि-विध्वंस | रणभूमि में वीरगति |
चन्दबरदाई का संकेत-दोहा (रासो-परम्परा) — “चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता पर सुल्तान है, मत चूके चौहान।” पृथ्वीराज चौहान तृतीय की छतरी ग़ज़नी (अफ़ग़ानिस्तान) में बताई जाती है।
याद रखें: हार का कारण माना जाता है मोहम्मद गौरी की कुशल युद्ध-नीति।
तराईन II का महत्त्व
- निर्णायक युद्ध ➜ इसी से भारत में टिकाऊ मुस्लिम सत्ता की नींव पड़ी और गौरी को यहाँ के मुस्लिम राज्य का संस्थापक माना गया।
- विजित क्षेत्र अपने ग़ुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को सौंपकर गौरी ग़ज़नी लौटा; दिल्ली सल्तनत की शुरुआत।
- इसी के साथ अजमेर के चौहानों की शक्ति ख़त्म हुई और अजमेर में मुस्लिम शासन की नींव पड़ी।
मूल्यांकन
- “अन्तिम हिन्दू सम्राट”, रायपिथौरा नाम से प्रसिद्ध; छह भाषाओं का ज्ञान; घोड़े का नाम नाट्य रम्भा।
- दिल्ली में पिथौरागढ़ क़िला बनवाया।
- शाकम्भरी के चौहान राजवंश का अंतिम शासक।
| दरबारी | रचना / पहचान |
|---|---|
| चन्दबरदाई (पृथ्वीभट्ट) | पृथ्वीराज रासो |
| जयानक | पृथ्वीराज विजय |
| वागीश्वर · जनार्दन · विश्वरूप · विद्यापति गौड़ · आशाधर | विद्वान कवि व साहित्यकार |
ट्रिक: दरबार के सात नाम — चन्दबरदाई · जयानक · वागीश्वर · जनार्दन · विश्वरूप · विद्यापति गौड़ · आशाधर।
5. नाडौल व रणथम्भौर
शाकम्भरी के बाद नाडौल पहला स्वतंत्र चौहान राज्य बना; पृथ्वीराज तृतीय के बाद उसके वंशजों ने रणथम्भौर में नया राज्य खड़ा किया, जो हम्मीर के साके पर समाप्त हुआ।
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 960 | लक्ष्मण | नाडौल शाखा की नींव |
| 1194 | गोविन्दराज | रणथम्भौर राज्य की स्थापना |
| इल्तुतमिश का समय | वीर नारायण | हमला विफल, फिर धोखे से ज़हर |
| रज़िया का समय | बागभट्ट | राज्य की रक्षा |
… शेष 4 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
- हम्मीर के जीते युद्ध ➜ 16
- वीरगति ➜ 17वें युद्ध में
- शासन ➜ 1282–1301
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
6. नाडौल के चौहान
| शासक | काल | मुख्य बातें |
|---|---|---|
| लक्ष्मण (लाखनसी) | 960 | वाक्पतिराज प्रथम का पुत्र; चावड़ा राजपूतों से स्वतंत्र होकर नाडौल (पाली) में राज्य; कुलदेवी आशापुरा माता का मंदिर; लाखणसी की बावड़ी; दुर्ग निर्माण |
| शोभित | 983–1024 | भीनमाल में मान परिहार को परास्त कर उस नगर पर क़ब्ज़ा |
| बलिराज | — | सुन्धा माता अभिलेख — मालवा के परमार मुंज को हराया |
- शाकम्भरी के बाद यह पहला चौहान राज्य था।
- करीब 1205 में नाडौल शाखा जालौर के चौहानों के क़ब्ज़े में चली गई।
नाडौल का क्रम
- लक्ष्मण 960
- शोभित (983–1024)
- बलिराज
7. रणथम्भौर के आरंभिक शासक
पृथ्वीराज तृतीय के अंत के उपरांत गौरी ने उसके बेटे गोविन्दराज को अजमेर सौंपा, किन्तु पृथ्वीराज के भाई हरिराज ने उसे वहाँ से खदेड़ दिया। तब कुतुबुद्दीन ऐबक ने उसे रणथम्भौर की जागीर-राज्य सौंपा।
| शासक | ब्योरा |
|---|---|
| गोविन्दराज | संस्थापक; करीब 1194 में रणथम्भौर में चौहान सत्ता जमाई |
| वीर नारायण | इल्तुतमिश का आक्रमण विफल किया; इल्तुतमिश ने उसे सन्धि के बहाने दिल्ली बुलाकर धोखे से ज़हर देकर मार डाला |
| बागभट्ट | रज़िया सुल्तान की सेना (सेनापति मलिक कुतुबुद्दीन व हसन गौरी) चढ़ आई; बागभट्ट ने रियासत सुरक्षित रखी |
8. हम्मीर देव चौहान
- जैत्रसिंह का तीसरा पुत्र; सबसे योग्य होने से पिता ने जीवनकाल में ही 1282 में राज्यारोहण करा दिया।
- दिग्विजय ➜ आबू, काठियावाड़, पुष्कर, चम्पा, धार जैसे राज्यों से अधीनता मनवाई; भीमरस के राजा अर्जुन पर जीत पाई; धार के भोज परमार को हराया; माण्डलगढ़ से कर वसूला; मेवाड़ के समरसिंह को परास्त किया।
- लौटकर कोटियजन यज्ञ कराया — राजपुरोहित विश्वरूप; गुरु राघवदेव।
जलालुद्दीन खिलजी से टक्कर
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1290 | झाईन पर आक्रमण | जलालुद्दीन ने झाईन दुर्ग (सवाई माधोपुर) जीता; चौहान सेनापति गुरुदास सैनी मारा गया |
| 1291–92 | रणथम्भौर पर दो हमले | लम्बे घेरे के बाद भी असफल; लौटते समय बोला कि ऐसे दस किलों का मोल उसके लिए मुसलमान के एक बाल जितना भी नहीं |
| घेरा उठने के बाद | झाईन फिर हम्मीर का | हम्मीर ने झाईन पर दोबारा अधिकार कर लिया |
याद रखें: रणथम्भौर पर आक्रमण करने वाला पहला खिलजी — जलालुद्दीन (1290–92); दूसरा और विजेता — अलाउद्दीन (1301)।
9. हम्मीर बनाम अलाउद्दीन
1296 में जलालुद्दीन की हत्या कर अलाउद्दीन दिल्ली का सुल्तान बना और हम्मीर से टकराव शुरू हुआ।
- कारण ➜ अलाउद्दीन की साम्राज्य-विस्तार नीति; रणथम्भौर का सामरिक महत्त्व; व्यापारिक मार्ग पर स्थिति; हम्मीर का अलाउद्दीन के भगोड़े सेनापतियों को शरण देना।
- गुजरात-अभियान से लौटती अलाउद्दीन की सेना के दो बाग़ी मंगोल नायक मीर मुहम्मद शाह और केहबू लूट समेत भागकर हम्मीर की पनाह में पहुँचे; हम्मीर ने मुहम्मद शाह को जगाना की जागीर दी।
घटनाक्रम
- हम्मीर ने बाग़ी लौटाने से इनकार किया
- 1299 — उलूग ख़ाँ, नुसरत ख़ाँ, अलप ख़ाँ की सेना; झाईन पर अधिकार
- हम्मीर के सेनापति भीमसिंह, धर्मसिंह जीते; लौटते समय हिन्दूवाट घाटी में अलप ख़ाँ के हमले में भीमसिंह मारा गया
- दूसरा आक्रमण ➜ नुसरत ख़ाँ (कड़ा-कारा का प्रान्तपति) और उलूग ख़ाँ (बयाना का प्रान्तपति); इस बार झाईन (छाण) ले लिया, पर रणथम्भौर नहीं; नुसरत ख़ाँ किले से आए गोले से मारा गया।
- फिर अलाउद्दीन स्वयं आया; लगभग एक साल का घेरा बेनतीजा रहा।
- अंत में छल ➜ हम्मीर के सेनापति रणमल और रतिपाल को लालच देकर मिला लिया; लंबे घेरे से किले में अन्न-गोला-बारूद कम था और इन दोनों ने अन्न में हड्डियाँ मिलाकर उसे अपवित्र कर दिया।
10. हम्मीर — उपलब्धियाँ व स्रोत
- रणथम्भौर का सबसे शक्तिशाली शासक; “16 युद्धों का विजेता”, 17वें युद्ध में अलाउद्दीन से लड़ते मारा गया।
- हठ और शरणागत-रक्षा के लिए प्रसिद्ध; दरबारी कवि बीजादित्य।
प्रसिद्ध दोहा — “सिंह सवन, सत्पुरुष वचन, कदली फलत इक बार, तिरिया-तेल, हम्मीर-हठ चढ़े न दूजी बार।”
| ग्रंथ | रचनाकार |
|---|---|
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचन्द्र सूरि |
| हम्मीर हठ | चन्द्रशेखर; दूसरी रचना — ग्वाल कवि |
| हम्मीरायण | भाण्डऊ व्यास |
ट्रिक: हम्मीर महाकाव्य = नयनचन्द्र सूरि; हम्मीर रासो = जोधराज (नीमराणा); सुर्जन चरित और हम्मीर हठ दोनों = चन्द्रशेखर (हम्मीर हठ ग्वाल कवि की भी)।
रिवीजन पॉइंटर्स
- पहला तराईन युद्ध 1191 में पृथ्वीराज ने जीता और गौरी घायल होकर ग़ज़नी लौटा; दूसरे युद्ध में 1192 में जीत गौरी की हुई।
- दूसरा तराईन युद्ध निर्णायक रहा — इससे दिल्ली सल्तनत की शुरुआत हुई और अजमेर के चौहानों की शक्ति ख़त्म हो गई।
- पृथ्वीराज तृतीय «अन्तिम हिन्दू सम्राट» कहलाए; उन्होंने दिल्ली में पिथौरागढ़ क़िला बनवाया और वे छह भाषाएँ जानते थे।
- दरबार के दो प्रमुख नाम — चन्दबरदाई (पृथ्वीराज रासो) और जयानक (पृथ्वीराज विजय)।
- नाडौल शाखा की नींव 960 में लक्ष्मण (लाखनसी) ने रखी; शाकम्भरी के बाद यह पहला स्वतंत्र चौहान राज्य था, कुलदेवी आशापुरा माता।
- रणथम्भौर राज्य की स्थापना लगभग 1194 में गोविन्दराज ने की; इल्तुतमिश ने वीर नारायण को सन्धि के बहाने बुलाकर धोखे से ज़हर दे दिया।
- हम्मीर देव ने 1282 से 1301 तक शासन किया — 16 युद्ध जीते और 17वें में अलाउद्दीन से लड़ते हुए मारे गए।
- रणथम्भौर पर हमला करने वाला पहला खिलजी जलालुद्दीन (1290–92) था, जबकि विजेता अलाउद्दीन रहा (1301)।
- दो बाग़ी मंगोल नायकों (मीर मुहम्मद शाह और केहबू) को शरण देना टकराव का एक कारण बना, और अंत में रणमल व रतिपाल की ग़द्दारी निर्णायक रही।
अगले भाग में जालौर के सोनगरा चौहान, कान्हड़देव और जालौर-सिवाणा के साके, सिरोही के देवड़ा चौहान तथा हाड़ौती के बूँदी और कोटा का क्रम आएगा।
पिछला भाग: चौहान राजवंश: शाकम्भरी व अजमेर के चौहान एवं पृथ्वीराज तृतीय (भाग 1)
अगला भाग: चौहान राजवंश: जालौर, सिवाणा व सिरोही एवं हाड़ौती — बूँदी व कोटा
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