सदन में बहस चाहे जितनी गरम हो, वह चलता नियमों से ही है, और यहाँ सबसे ज़रूरी फ़र्क़ यह है कि फ़ैसला अध्यक्ष का होता है जबकि लिखा-पढ़ी का काम सचिव का। इस भाग में राजस्थान विधानसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमों का परिचय और अध्यायों की सूची है। उसके बाद सत्र बुलाना, शपथ, अध्यक्ष-उपाध्यक्ष का चुनाव, बैठकें व अभिभाषण और प्रश्नकाल व शून्यकाल जैसे हिस्से क्रम से आते हैं।
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1. एक नज़र में
संविधान का अनुच्छेद 208 हर सदन को अपनी कार्यवाही के नियम खुद बनाने देता है। इसी आधार पर राजस्थान विधानसभा ने 1956 में अपने “प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियम” बनाए। सदन में सवाल कैसे पूछे जाएँ, प्रस्ताव कैसे आए, बजट कैसे पास हो, समितियाँ कैसे बनें — सब इन्हीं नियमों में तय है।
- नियम बने ➜ 1956
- कुल अध्याय ➜ 28
- अध्याय-1 ➜ संक्षिप्त नाम व परिभाषाएँ
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
- अध्याय-1 बताता है कि इन नियमों का नाम “राजस्थान विधानसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी नियम” होगा और इनमें आए शब्दों के अर्थ क्या हैं।
- इन नियमों में अध्यक्ष सबसे बड़ा निर्णायक है — प्रश्न ग्राह्य है या नहीं, कौन-सा प्रश्न तारांकित होगा, बैठक कब होगी, समिति का सभापति कौन बनेगा।
- कागज़ी काम का केंद्र सचिव है — सूचना लेना, कार्यसूची बनाना, सदस्यों को खबर देना, राजपत्र में छपवाना।
ट्रिक: दो किरदार याद रखें — फ़ैसला अध्यक्ष का, काग़ज़ सचिव का। परीक्षा में “सूचना किसे दी जाती है?” का उत्तर ज़्यादातर सचिव और “निर्णय कौन करता है?” का उत्तर अध्यक्ष होता है।
2. अध्यायों की सूची
| अध्याय | विषय |
|---|---|
| 1 | संक्षिप्त नाम तथा परिभाषाएँ |
| 2 | सदस्यों का आमंत्रण, बैठना, शपथ/प्रतिज्ञान, नामावली, सत्र व बैठकों की संख्या |
| 3 | अध्यक्ष-उपाध्यक्ष का निर्वाचन तथा सभापति-तालिका |
| 4 | सदन की बैठकें |
… शेष 21 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
ट्रिक: क्रम याद करने का सूत्र — बुलाना → चुनना → बैठना → अभिभाषण → कार्यसूची (2–6), फिर सवाल-चर्चा (7–9, 14–15), फिर क़ानून-प्रस्ताव (10–17), फिर पैसा (18), फिर सदस्य व समितियाँ (19–24)।
3. सदन का एक दिन
- बैठक सामान्य रूप से पूर्वाह्न 11 बजे शुरू होती है।
- पहला 1 घंटा — प्रश्नकाल: तारांकित और अल्पसूचना प्रश्नों के मौखिक उत्तर।
- 12 बजे — शून्यकाल: बिना पहले से सूचना दिए लोकहित का ज़रूरी मुद्दा।
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
4. सदन का संचालन
- सत्र बुलाने की तारीख़ ➜ राज्यपाल तय करता है
- अध्यक्ष के चुनाव की तारीख़ ➜ राज्यपाल
- उपाध्यक्ष के चुनाव की तारीख़ ➜ अध्यक्ष
5. आह्वान, सत्र और शपथ
सभा का आह्वान
- सत्र की तारीख़, समय और स्थान राज्यपाल तय करता है।
- यह सूचना हर सदस्य तक विधानसभा सचिव पहुँचाता है और राजपत्र में विज्ञप्ति भी छपवाता है।
- सत्र जल्दबाज़ी में (अल्प सूचना पर) बुलाना पड़े, तो सचिव किसी दूसरे तरीके से ख़बर देता है — वह तरीका अध्यक्ष बताता है।
सत्र और बैठकें
- अनुच्छेद 174 के अधीन रहते हुए नियमों में व्यवस्था है कि एक कैलेण्डर वर्ष में कम से कम 3 सत्र हों — बजट सत्र, वर्षाकालीन सत्र, शीतकालीन सत्र।
- पूरे वर्ष के सभी सत्र मिलाकर बैठकें 60 से कम नहीं होनी चाहिए।
- सदन में कौन कहाँ बैठेगा ➜ यह क्रम अध्यक्ष तय करता है।
शपथ या प्रतिज्ञान
सदस्य अनुच्छेद 188 के अनुसार राज्यपाल के सामने, या राज्यपाल जिसे इस काम के लिए नियुक्त करे उसके सामने, शपथ या प्रतिज्ञान करते हैं।
6. अध्यक्ष-उपाध्यक्ष का चुनाव
| पद | चुनाव की तिथि कौन तय करे | सदस्यों को सूचना कौन दे |
|---|---|---|
| अध्यक्ष | राज्यपाल | सचिव |
| उपाध्यक्ष | अध्यक्ष | सचिव |
- दोनों का चुनाव सदन ख़ुद करता है; केवल तारीख़ तय करने वाला अलग है।
- इसी अध्याय में सभापति-तालिका (Panel of Chairpersons) का प्रावधान है — अध्यक्ष-उपाध्यक्ष दोनों न हों तो इसी तालिका का सदस्य बैठक चलाता है।
ध्यान दें: परीक्षा का जाल: “अध्यक्ष का चुनाव उस तिथि को जो सदन तय करे” — ग़लत (तिथि राज्यपाल तय करता है)। “तिथि की सूचना राज्यपाल भेजेंगे” — ग़लत (सूचना सचिव भेजता है)।
7. बैठकें व अभिभाषण
सदन की बैठकें (अध्याय-4)
- बैठकें कब होंगी ➜ यह अध्यक्ष तय करता है।
- बैठक आमतौर पर पूर्वाह्न 11 बजे से शुरू होती है।
- सदन को स्थगित करना और बैठक बुलाना — दोनों अध्यक्ष के हाथ में।
राज्यपाल का अभिभाषण (अध्याय-5)
- अनुच्छेद 176 के तहत राज्यपाल सदन को संबोधित करता है (विशेष अभिभाषण)।
- अभिभाषण के लिए धन्यवाद प्रस्ताव वह सदस्य रखता है जिसे मुख्यमंत्री नामित करता है।
- धन्यवाद प्रस्ताव पर संशोधन भी आ सकते हैं — उसी रूप में जिसे अध्यक्ष ठीक माने।
8. कार्य-विन्यास व कार्यसूची
गैर सरकारी (Private) सदस्यों के विधेयकों के लिए अलग दिन तय होते हैं। उस दिन विधेयक इस प्राथमिकता से लिए जाते हैं:
- जिन्हें सदन में पेश (पुरःस्थापित) करने की अनुमति माँगी जा रही है।
- जिन्हें राज्यपाल ने अनुच्छेद 200 के तहत संदेश के साथ लौटाया है।
- जिन पर अगला प्रस्ताव है कि उन्हें पारित किया जाए।
- एक ही श्रेणी के विधेयकों में आपसी क्रम शलाका (ballot / लॉटरी) से तय होता है — अध्यक्ष के आदेश के अनुसार, जिस दिन और जिस ढंग से वह कहे।
- हर दिन की कार्यसूची (Agenda) सचिव तैयार करता है।
9. प्रश्न व चर्चाएँ
विधायिका सरकार को जवाबदेह रखती है — इसका सबसे सीधा तरीका है सवाल पूछना और ज़रूरी मुद्दों पर बहस छेड़ना। नियमों ने इसके लिए कई रास्ते रखे हैं, हर एक की अपनी शर्तें।
| औज़ार | अध्याय | मुख्य पहचान |
|---|---|---|
| प्रश्न (3 प्रकार) | 7 | तारांकित · अतारांकित · अल्पसूचना |
| शून्यकाल | — | 12 बजे, बिना सूचना |
| आधे घंटे की चर्चा | 8 | उत्तर में तथ्य स्पष्ट कराना; 3 दिन पहले सूचना |
10. प्रश्न के तीन प्रकार
| प्रकार | उत्तर कैसे | ख़ास बातें |
|---|---|---|
| तारांकित (Starred) | सदन में मौखिक | पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं; हर दिन न्यूनतम 12 प्रश्न लिए जाते हैं |
| अतारांकित (Unstarred) | लिखित, सदस्य को | सदन में इन पर चर्चा नहीं |
| अल्पसूचना (Short notice) | मौखिक, 14 दिन से कम समय में | केवल अत्यंत अविलम्बनीय लोक महत्त्व के विषय |
एक सत्र में एक सदस्य की सीमा (अध्यक्ष की अनुमति के बिना)
| प्रश्न | बजट सत्र (अनुदान माँगों पर चर्चा वाला) | अन्य सत्र |
|---|---|---|
| तारांकित | 40 | 10 |
| अतारांकित | 60 | 20 |
- किसी एक सदस्य के, किसी एक दिन, अधिकतम 2 तारांकित प्रश्न।
- कोई प्रश्न अविलम्बनीय लोक महत्त्व का है या नहीं — यह केवल अध्यक्ष तय करता है।
11. प्रश्नकाल के नियम
- आम तौर पर रोज़ की कार्यसूची का पहला 1 घंटा प्रश्न पूछने और जवाब देने के लिए होता है।
- राज्यपाल के अभिभाषण वाले दिन, वित्त मंत्री के बजट वाले दिन और शनिवार (यदि बैठक हो) को सामान्यतः प्रश्नकाल नहीं होता।
- तारांकित या अतारांकित प्रश्न पूछना हो तो 14 दिन की अग्रिम सूचना ज़रूरी है।
अध्यक्ष के अधिकार
- प्रश्न को स्वीकार या अस्वीकार करना — यह उसका विवेक है।
- प्रश्न ग्राह्य है या नहीं, इसका फ़ैसला।
- प्रश्न तारांकित रहेगा या अतारांकित — यह भी अध्यक्ष तय करता है।
प्रश्न अस्वीकार हो जाए तो सचिव सदस्य को इसकी जानकारी देता है और कारण भी बताता है।
12. शून्यकाल व अंतः सत्रकाल
शून्यकाल (Zero Hour)
- प्रश्नकाल ख़त्म होते ही शुरू होने वाला समय — घड़ी में 12 बजे, यानी दिन का “शून्य घंटा”।
- इस समय कोई सदस्य बिना पूर्व सूचना लोकहित का ऐसा ज़रूरी मुद्दा रख सकता है जिस पर फ़ौरन ध्यान देना हो।
अंतः सत्रकाल में प्रश्न
- दो सत्रों के बीच (जब सदन नहीं बैठ रहा) भी सदस्य लोक महत्त्व की जानकारी माँग सकता है।
- सीमा: हर सदस्य हफ़्ते में एक ही अतारांकित प्रश्न भेज सकता है।
- सरकार 30 दिन के भीतर उत्तर सीधे सदस्य को भेजती है और उसकी एक प्रति विधानसभा को।
13. रैपिड फायर तथ्य
- नियम बने ➜ 1956, कुल 28 अध्याय
- सत्र की तारीख़ तय करने वाला ➜ राज्यपाल
- अध्यक्ष के चुनाव की तारीख़ ➜ राज्यपाल; उपाध्यक्ष के चुनाव की तारीख़ ➜ अध्यक्ष
- सदस्यों तक सूचना पहुँचाने वाला ➜ सचिव
- एक कैलेण्डर वर्ष में ➜ कम से कम 3 सत्र और 60 से कम बैठकें नहीं
- बैठक कब होगी ➜ अध्यक्ष तय करता है; सामान्यतः पूर्वाह्न 11 बजे शुरू
- प्रश्नकाल ➜ पहला 1 घंटा; शून्यकाल ➜ 12 बजे, बिना पूर्व सूचना
- तारांकित प्रश्न ➜ मौखिक उत्तर और पूरक प्रश्न; अतारांकित ➜ लिखित उत्तर
- अल्पसूचना प्रश्न ➜ 14 दिन से कम समय में मौखिक उत्तर
अगले भाग में प्रश्न व चर्चाओं के बाक़ी औज़ार — आधे घंटे की चर्चा, स्थगन प्रस्ताव, ध्यानाकर्षण, अविश्वास-विश्वास प्रस्ताव और बजट से जुड़े नियम।
पिछला भाग: राज्य विधानमण्डल: राजस्थान विधानसभा
अगला भाग: राजस्थान विधानसभा की प्रक्रिया एवं नियम: विधेयक, संकल्प व प्रस्ताव
इन्हें भी पढ़ें: राज्य विधानमण्डल · संसद में राजस्थान
पूरी श्रृंखला: राजस्थान की राजव्यवस्था — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय
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