राज्यपाल: नियुक्ति, योग्यता व पद एवं विधायी शक्तियाँ – Rajasthan Polity Chapter 1

राज्यपाल की नियुक्ति, योग्यता, कार्यकाल, क़ानूनी संरक्षण और कार्यपालिका व विधायी शक्तियाँ।

10 min read Updated Notes in Hindi
In this chapter (21 sections)
  1. एक नज़र में
  2. राज्यपाल की भूमिका
  3. राजप्रमुख से राज्यपाल
  4. अनुच्छेद एक नज़र में
  5. राज्यपाल पर कथन
  6. नियुक्ति
  7. अर्हता व शर्तें
  8. कार्यकाल व हटाना
  9. शपथ
  10. वेतन, भत्ते व सुविधाएँ
  11. क़ानूनी संरक्षण
  12. कार्यपालिका शक्तियाँ
  13. राज्य की कार्यपालिका शक्ति
  14. राज्यपाल द्वारा नियुक्तियाँ
  15. कुलाधिपति व संस्थाओं के प्रमुख
  16. विधायी शक्तियाँ
  17. सदन से जुड़ी शक्तियाँ
  18. विधेयकों पर अनुमति
  19. आरक्षित विधेयक
  20. राज्यपाल बनाम राष्ट्रपति — विधेयक
  21. रिवीजन पॉइंटर्स

राज्यपाल को समझने की कुंजी उसकी दोहरी भूमिका है — राज्य का संवैधानिक मुखिया भी और केन्द्र का प्रतिनिधि भी। इसी वजह से उसकी शक्तियाँ राष्ट्रपति जैसी दिखती हैं, पर असली फ़ैसले मंत्रिपरिषद् लेती है। इस भाग में राज्यपाल की भूमिका, राजप्रमुख से बदलाव, नियुक्ति, अर्हता, कार्यकाल, शपथ, वेतन, क़ानूनी संरक्षण, कार्यपालिका शक्तियाँ और विधायी शक्तियों का पहला हिस्सा दिया गया है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राज्यपाल, 2 चॉक-बोर्ड चित्र, 1 नक्शे, 2 चार्ट, 25 फ्लैशकार्ड और 12 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
माइंड मैप खोलें ➜

1. एक नज़र में

  • पद ➜ राज्य का संवैधानिक प्रधान
  • नियुक्ति ➜ राष्ट्रपति (अनु. 155)
  • न्यूनतम आयु ➜ 35 वर्ष

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

2. राज्यपाल की भूमिका

संविधान ने राज्यों में भी वही संसदीय ढाँचा रखा जो केन्द्र में है। इसलिए राज्यपाल नाममात्र का कार्यपालक है — फ़ैसले असल में मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद् लेती है।

  • राज्यपाल अपने ज़्यादातर काम मंत्रिपरिषद् की सलाह पर ही करता है; अपवाद वे मामले हैं जहाँ संविधान उसे विवेक देता है।
  • राज्य प्रशासन का सबसे ऊँचा पद — राज्यपाल (गवर्नर)।
  • वह राज्य कार्यपालिका का औपचारिक/संवैधानिक मुखिया है और साथ ही केन्द्र सरकार का प्रतिनिधि भी।

याद रखें: दोहरी भूमिका — राज्य में संवैधानिक मुखिया + केन्द्र का प्रतिनिधि।

3. राजप्रमुख से राज्यपाल

काल / क्रमघटनाविवरण
30 मार्च 1949राजप्रमुखसवाई मानसिंह राजस्थान के राजप्रमुख बने।
1 नवम्बर 1956 तकबी श्रेणी राज्यराजस्थान “B” श्रेणी में था; उसका प्रधान राजप्रमुख कहलाता था।
19567वाँ संविधान संशोधनराज्य पुनर्गठन आयोग की सिफ़ारिश पर A, B, C, D श्रेणियाँ ख़त्म; राजप्रमुख की जगह राज्यपाल पद बना।

ध्यान दें: 7वें संशोधन (1956) की धारा 6 — एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल बन सकता है।

4. अनुच्छेद एक नज़र में

अनुच्छेदविषय
153हर राज्य का एक राज्यपाल
154राज्य की कार्यपालिका शक्ति
155राज्यपाल की नियुक्ति
156पदावधि

… शेष 20 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ट्रिक: भाग 6 का बँटवारा: कार्यपालिका 153–167, व्यवस्थापिका 168–213, न्यायपालिका 214–237।

5. राज्यपाल पर कथन

किसने कहाकथन का सार
सरोजिनी नायडु“सोने के पिंजरे में बंद चिड़िया”
विजयलक्ष्मी पंडित“वेतन का आकर्षण”
मार्ग्रेट आल्वाराज्य सरकारों के लिए Headache, और केन्द्र भी इन्हें ख़ास महत्त्व नहीं देता

… शेष 2 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ट्रिक: आलोचना वाले कथन (पिंजरा, वेतन, चाय-दावत) बनाम प्रशंसा वाला एक — के.एम. मुंशी का “प्रहरी”।

6. नियुक्ति

  • अनु. 153 ➜ हर राज्य के लिए एक राज्यपाल।
  • अनु. 155 ➜ राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा वाले अधिपत्र से राज्यपाल नियुक्त करता है।
  • राष्ट्रपति यह नियुक्ति केन्द्रीय मंत्रिपरिषद् की सलाह पर करता है।

7. अर्हता व शर्तें

अनु. 157 — दो अर्हताएँ

  1. भारतीय नागरिकता ➜ पर जन्मजात नागरिक होने की शर्त नहीं।
  2. 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो।

अनु. 158 — पद की शर्तें

  • 158(1) ➜ संसद या किसी भी राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं रह सकता; सदस्य हो तो पद सँभालते ही उसकी सीट ख़ाली मानी जाती है।
  • 158(2) ➜ कोई दूसरा लाभ का पद नहीं रखेगा।

8. कार्यकाल व हटाना

  • 156(1) ➜ पद पर टिके रहना राष्ट्रपति के प्रसाद (इच्छा) पर निर्भर।
  • 156(2) ➜ राष्ट्रपति को त्यागपत्र देकर पद छोड़ सकता है।
  • 156(3) ➜ सामान्य अवधि 5 वर्ष; अवधि पूरी होने पर भी उत्तराधिकारी के पद सँभालने तक बना रहता है।

9. शपथ

  • शपथ का विषय ➜ संविधान और विधि का संरक्षण, परिरक्षण व प्रतिरक्षण, कर्तव्य निभाना और जनता की भलाई।
  • शपथ किसके सामने ➜ मुख्य न्यायाधीश, उच्च न्यायालय; वे न हों तो वहीं के वरिष्ठतम न्यायाधीश।

10. वेतन, भत्ते व सुविधाएँ

  • 158(3) ➜ बिना किराए का सरकारी आवास; वेतन, भत्ते व विशेषाधिकार संसद तय करती है। जब तक संसद तय न करे, दूसरी अनुसूची वाले लागू।
  • 158(3क) ➜ दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल हो तो वेतन-भत्ते का ख़र्च वे राज्य राष्ट्रपति द्वारा तय अनुपात में बाँटते हैं।
  • 158(4) ➜ कार्यकाल के दौरान वेतन-भत्ते घटाए नहीं जा सकते।

11. क़ानूनी संरक्षण

खण्डसंरक्षण
361(1)पद की शक्तियों और कर्तव्यों के लिए किए किसी काम पर किसी अदालत के प्रति जवाबदेह नहीं
361(2)कार्यकाल में उसके विरुद्ध कोई आपराधिक (दांडिक) कार्यवाही न शुरू होगी, न चलती रहेगी
361(3)कार्यकाल में कोई अदालत उसकी गिरफ़्तारी या कारावास का आदेश नहीं दे सकती

361(4) की 3 शर्तें

  1. राज्यपाल को लिखित सूचना दी जाए।
  2. नोटिस और मुक़दमे के बीच न्यूनतम 2 माह का अंतर हो।
  3. सूचना में पक्षकार का नाम, पता, कार्यवाही की प्रकृति और माँगी गई राहत लिखी हो।

12. कार्यपालिका शक्तियाँ

राज्यपाल की शक्तियाँ लगभग राष्ट्रपति जैसी हैं — फ़र्क़ बस इतना कि उसके पास कूटनीतिक, सैनिक और आपातकालीन शक्तियाँ नहीं हैं।

13. राज्य की कार्यपालिका शक्ति

  • 154(1) ➜ राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित; वह इसे ख़ुद या अधीनस्थ अधिकारियों से चलाता है — यहाँ अधीनस्थ का मतलब मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद्।
  • 163 ➜ मंत्रिपरिषद्, जिसका काम राज्यपाल की मदद करना और सलाह देना है।
  • 163(2) ➜ विवेक से लिया राज्यपाल का फ़ैसला अंतिम; इस आधार पर चुनौती नहीं कि उसे विवेक से काम करना था या नहीं।

14. राज्यपाल द्वारा नियुक्तियाँ

पदआधार
मुख्यमंत्रीअनु. 164
मुख्यमंत्री की सलाह से मंत्रिपरिषद्अनु. 164
महाधिवक्ताअनु. 165
राज्य लोक सेवा आयोग — अध्यक्ष व सदस्यअनु. 316

न्यायपालिका और संकट से जुड़ी भूमिका

  • हाईकोर्ट जजों के चयन में राष्ट्रपति को परामर्श देता है (अनु. 217)।
  • उच्च न्यायालय से सलाह लेकर अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीश नियुक्त करता है।
  • संवैधानिक तंत्र विफल होने पर अनु. 356 में राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश करता है; उस अवधि में केन्द्र का प्रतिनिधि बनकर राज्य का प्रशासन देखता है।

15. कुलाधिपति व संस्थाओं के प्रमुख

  • राज्य सरकार से वित्त पाने वाले सभी राज्य विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति — और कुलपतियों की नियुक्ति भी करता है।
भूमिकासंस्था
अध्यक्षराज्य सैनिक बोर्ड, राजस्थान
अध्यक्षपश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र (उदयपुर)
अध्यक्षअरावली विकास बोर्ड, राजस्थान

16. विधायी शक्तियाँ

  • राज्य सूची के विषयों पर विधायी अधिकार पूरा; समवर्ती सूची पर तब तक, जब तक संसद के क़ानून से टकराव न हो।
  • सदन से पास विधेयक को क़ानून का दर्जा राज्यपाल की अनुमति मिलने पर ही मिलता है।

17. सदन से जुड़ी शक्तियाँ

अनुच्छेदराज्यपाल क्या करता है
168राज्यपाल विधानमंडल का अभिन्न अंग
171(3)(ङ)विधान परिषद् हो तो उसके कुल सदस्यों का 1/6 मनोनीत — कला, विज्ञान, साहित्य, सहकारिता आंदोलन, समाज सेवा से
174सदन का सत्र बुलाना, सत्रावसान और विधानसभा का विघटन
175(1)एक सदन या दोनों की संयुक्त बैठक में अभिभाषण
  • 180(2) ➜ बैठक में अध्यक्ष न हों तो उपाध्यक्ष; वे भी न हों तो प्रक्रिया-नियमों से तय व्यक्ति; वह भी न हो तो सदन द्वारा चुना सदस्य अध्यक्षता करता है।

18. विधेयकों पर अनुमति

  1. स्वीकृति दे दे।
  2. स्वीकृति रोक ले — आत्यंतिक वीटो।
  3. धन विधेयक न हो तो सुझावों के साथ पुनर्विचार के लिए लौटा दे; सदन संशोधन सहित या बिना संशोधन दोबारा पास करे तो स्वीकृति देनी ही पड़ती है — निलंबनकारी वीटो।

कौन-से विधेयक आरक्षित किए जा सकते हैं

  • राष्ट्रीय महत्त्व के विषय वाले।
  • उच्च न्यायालय की शक्ति घटाने वाले।
  • नीति निदेशक तत्त्वों के विरुद्ध।

19. आरक्षित विधेयक

आरक्षण का फ़ैसला राज्यपाल अपने विवेक से लेता है। एक बार आरक्षित हुआ तो आगे राज्यपाल का कोई दख़ल नहीं रहता — अनु. 201 में राष्ट्रपति विचार करता है।

राष्ट्रपति के विकल्प

  1. स्वीकृति दे।
  2. स्वीकृति रोक ले — विधेयक ख़त्म।
  3. राज्यपाल के ज़रिए पुनर्विचार के लिए लौटाए (धन विधेयक नहीं) — सदन को 6 माह के भीतर विचार कर दोबारा भेजना होता है।
  • संविधान में स्वीकृति की कोई समय-सीमा नहीं — इसलिए राष्ट्रपति विधेयक को अनिश्चित काल तक रोक सकता है; यही जेबी (पॉकेट) वीटो है।

20. राज्यपाल बनाम राष्ट्रपति — विधेयक

सामान्य विधेयक

विकल्पराज्यपाल (4)राष्ट्रपति (3)
स्वीकृति देनाहाँहाँ
स्वीकृति रोकनाहाँहाँ
पुनर्विचार हेतु लौटानाहाँ — दोबारा पास होने पर स्वीकृति अनिवार्य (स्थगन वीटो)हाँ — दोबारा पास होने पर स्वीकृति अनिवार्य (स्थगन वीटो)

राज्यपाल से आरक्षित होकर आए सामान्य विधेयक पर राष्ट्रपति के तीन विकल्प — स्वीकृति, रोक (विधेयक ख़त्म), या सदन को लौटाना (6 माह में पुनर्विचार); दोबारा आने पर भी वह बाध्य नहीं।

धन विधेयक

विकल्पराज्यपाल (3)राष्ट्रपति (2)
स्वीकृति देनाहाँहाँ
स्वीकृति रोकनाहाँहाँ
आरक्षित करनाहाँ — राष्ट्रपति के लिएलागू नहीं
  • धन विधेयक संसद में राष्ट्रपति की पूर्व-अनुमति से और विधानसभा में राज्यपाल की पूर्व-अनुमति से आता है — इसलिए दोनों में से कोई लौटा नहीं सकता।
  • राज्यपाल ने धन विधेयक आरक्षित किया तो राष्ट्रपति केवल स्वीकृति दे या रोके — सदन को लौटा नहीं सकता।

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. राज्यपाल की नियुक्ति अनु. 155 में राष्ट्रपति करता है; हर राज्य के लिए एक राज्यपाल का प्रावधान अनु. 153 में है।
  2. अनु. 157 की अर्हता — भारतीय नागरिक और 35 वर्ष की आयु; जन्मजात नागरिक होना ज़रूरी नहीं।
  3. सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष का है, पर पद राष्ट्रपति के प्रसाद पर टिका रहता है (अनु. 156)।
  4. सवाई मानसिंह 30 मार्च 1949 को राजप्रमुख बने; 1956 में 7वें संशोधन से राजप्रमुख की जगह राज्यपाल पद बना।
  5. अनु. 361 में कार्यकाल के दौरान आपराधिक कार्यवाही नहीं चल सकती; 361(4) में नोटिस और मुक़दमे के बीच कम से कम 2 माह का अंतर चाहिए।
  6. मुख्यमंत्री की नियुक्ति अनु. 164, महाधिवक्ता की अनु. 165 और राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष-सदस्यों की अनु. 316 के तहत होती है।
  7. विधेयक पर राज्यपाल स्वीकृति दे, रोके (आत्यंतिक वीटो) या पुनर्विचार के लिए लौटाए (निलंबनकारी वीटो)।
  8. आरक्षित विधेयक पर राष्ट्रपति अनु. 201 में निर्णय लेता है; स्वीकृति की समय-सीमा नहीं है, इसलिए जेबी (पॉकेट) वीटो संभव है।

अगले भाग में राज्यपाल की विधायी शक्तियों का शेष हिस्सा, वित्तीय, आपात व न्यायिक शक्तियाँ, विवेकीय शक्तियाँ, राज्यपाल पद पर बने आयोग और राजस्थान के राज्यपालों की सूची।

अगला भाग: राज्यपाल: वित्तीय, आपात व न्यायिक एवं विवेकीय शक्तियाँ व आयोग

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पूरी श्रृंखला: राजस्थान की राजव्यवस्था — सभी अध्याय · राजस्थान जी.के. नोट्स — सभी विषय

इस अध्याय की पूरी तैयारी चाहिए? ऊपर दिए नोट्स हर खंड का चुना हुआ हिस्सा हैं। पूरी तालिकाएँ, बाक़ी बिंदु, याद रखने की ट्रिक, नक्शे-चित्र और अभ्यास-प्रश्न राज्यपाल के माइंड मैप में हैं। राजस्थान जी.के. के सभी विषय एक ही पास में उपलब्ध हैं।
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