विधानमण्डल को समझने का सीधा तरीक़ा है तीन बातें देखना — सदन कब बैठता है, कौन-सा फ़ैसला किसके हाथ में है और पैसे पर आख़िरी बात किसकी चलती है। इस भाग में सत्र, सत्रावसान और विघटन का फ़र्क़, मतदान, गणपूर्ति और विशेषाधिकार आते हैं। फिर साधारण विधेयक, धन विधेयक, बजट (अनु. 202–204) और अन्य अनुदान हैं, और अंत में विधानपरिषद् का गठन, संरचना और रोचक तथ्य।
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1. सत्र व कार्यवाही
एक सत्र का जीवन
- राज्यपाल आहूत करे
- बैठकें
- अध्यक्ष स्थगित करे
2. सत्र, सत्रावसान, विघटन
- राज्यपाल समय-समय पर सदन का सत्र आहूत करता (बुलाता) है — अनु. 174(1)।
- पिछले सत्र की आख़िरी बैठक से अगले सत्र की पहली बैठक तक का फ़ासला 6 माह से ऊपर नहीं जा सकता — नतीजा: साल में कम से कम 2 सत्र।
- सत्र का सत्रावसान (Prorogue) भी राज्यपाल करता है — अनु. 174(2)(क)।
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
| शब्द | कौन करता है | क्या ख़त्म होता है |
|---|---|---|
| स्थगन | अध्यक्ष | केवल बैठक, सत्र चलता रहता है |
| सत्रावसान | राज्यपाल | पूरा सत्र |
| विघटन | राज्यपाल | पूरी विधानसभा |
- आमतौर पर साल में तीन सत्र — बजट सत्र (फ़रवरी–मई), मानसून सत्र (जुलाई–सितंबर), शीतकालीन सत्र (नवंबर–दिसंबर)।
- दो सत्रों के बीच के अंतर (अधिकतम 6 माह) को विश्रांतिकाल कहते हैं।
राज्यपाल के अभिभाषण
- राज्यपाल सदन को संबोधित कर सकता है और संदेश भेज सकता है — अनु. 175।
- राज्यपाल का विशेष अभिभाषण — अनु. 176।
3. मतदान व गणपूर्ति
- सदन में हर प्रश्न का फ़ैसला मौजूद रहकर वोट डालने वालों के बहुमत से होता है (पीठासीन को गिने बिना) — अनु. 189(1)।
- पीठासीन अधिकारी पहली बार में मत नहीं देता; मत बराबर हों तो निर्णायक मत देता है।
- सदन में कुछ सीटें ख़ाली हों तब भी सदन काम कर सकता है।
… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
राजस्थान का कोरम
- कुल सीटें 200
- 1/10 = 20
- 20 > 10
4. विशेषाधिकार व वेतन
अनु. 194 — शक्तियाँ और विशेषाधिकार
- हर विधानमण्डल में वाक्-स्वातंत्र्य (बोलने की आज़ादी) है।
- सदन में कही गई बात या दिए गए मत के लिए किसी सदस्य पर किसी न्यायालय में कार्यवाही नहीं होगी।
- बाक़ी शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ विधानमण्डल समय-समय पर क़ानून बनाकर तय करता है।
अनु. 195 — वेतन
विधानसभा और विधानपरिषद् के सदस्यों के वेतन-भत्ते राज्य विधानमण्डल क़ानून बनाकर तय करता है।
अनु. 177 — मंत्री और महाधिवक्ता
हर मंत्री और राज्य का महाधिवक्ता विधानसभा में (परिषद् हो तो उसमें भी) बोल सकता है और कार्यवाही में भाग ले सकता है, पर मत नहीं दे सकता।
ध्यान दें: महाधिवक्ता विधायक नहीं होता, फिर भी सदन में बोल सकता है — पर वोट नहीं।
5. नियम, भाषा, निर्बंधन
| अनुच्छेद | मुख्य बात |
|---|---|
| 208(1) | संविधान की सीमा में रहकर हर सदन अपने काम-काज के तरीक़े के नियम स्वयं तय करता है। |
| 208(3) | दो सदन वाले राज्य में सदनों के आपसी पत्राचार के नियम राज्यपाल बनाता है — पहले अध्यक्ष व सभापति से सलाह लेकर। |
| 209 | वित्तीय काम समय पर पूरा करने के लिए विधानमण्डल क़ानून बनाकर वित्तीय विषयों व विनियोग विधेयकों की प्रक्रिया नियंत्रित कर सकता है। |
| 210 | काम राज्य की राजभाषा(ओं), हिन्दी या अंग्रेज़ी में (भाग 17 के बावजूद, अनु. 348 के अधीन)। |
… शेष 3 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें
याद रखें: इन भाषाओं में बोल न पाने वाले सदस्य को अध्यक्ष/सभापति की अनुमति से मातृभाषा में बोलने की छूट है।
6. विधेयक व बजट
संसद की तरह राज्य विधानमण्डल का भी पहला उद्देश्य क़ानून बनाना है। हर क़ानून पहले विधेयक (Bill) के रूप में सदन में रखा जाता है और पारित होने के बाद राज्यपाल की अनुमति (अनु. 200) से अधिनियम बनता है।
7. साधारण विधेयक
अनु. 196 — शुरुआत और समाप्ति
- धन व वित्त विधेयकों (अनु. 198, 207) को छोड़कर कोई भी विधेयक परिषद् वाले राज्य में किसी भी सदन में शुरू हो सकता है — 196(1)।
- परिषद् वाले राज्य में विधेयक तभी पारित माना जाता है जब उस पर दोनों सदन सहमत हों (अनु. 197, 198 के अधीन) — 196(2)।
- सत्रावसान से लंबित विधेयक ख़त्म नहीं होता — 196(3)।
पहला दौर — 197(1)
- विधानसभा पास करे
- परिषद् ठुकराए / 3 माह चुप रहे / असहमत संशोधन
- विधानसभा दोबारा पास करे
दूसरा दौर — 197(2)
- परिषद् फिर ठुकराए / 1 माह चुप / असहमत संशोधन
- विधानसभा वाला रूप ही दोनों सदनों से पारित माना
ट्रिक: परिषद् साधारण विधेयक को ज़्यादा से ज़्यादा 3 + 1 = 4 माह रोक सकती है — अंत में विधानसभा की ही चलती है। अनु. 197 धन विधेयक पर लागू नहीं (197(3))।
8. धन विधेयक
अनु. 198 — विशेष प्रक्रिया
- धन विधेयक विधानपरिषद् में पेश नहीं हो सकता — 198(1)।
- विधानसभा से पास होकर यह परिषद् को सिफारिशों के लिए जाता है; परिषद् को इसे 14 दिन के भीतर सिफारिशों सहित लौटाना होता है — 198(2)।
- विधानसभा परिषद् की सिफारिशें माने तो उन सहित, न माने तो अपने पारित रूप में — दोनों हालात में विधेयक दोनों सदनों से पारित माना जाता है — 198(3), (4)।
अनु. 199 — धन विधेयक किसे कहें
जिस विधेयक में केवल नीचे लिखे सभी या कुछ विषयों से जुड़े प्रावधान हों, वह धन विधेयक है — 199(1):
- किसी कर को लगाना, हटाना, घटाना-माफ़ करना, बदलना या नियंत्रित करना।
- राज्य द्वारा उधार लेने या गारंटी देने का नियमन, या उससे जुड़ी वित्तीय ज़िम्मेदारियों के क़ानून में संशोधन।
- संचित निधि / आकस्मिकता निधि ➜ उसकी अभिरक्षा, उसमें पैसा डालना या निकालना।
- धन विधेयक की पहचान पर विवाद उठे तो विधानसभा अध्यक्ष की बात अंतिम — 199(3)।
- परिषद् को भेजते और राज्यपाल के सामने रखते समय हर धन विधेयक पर अध्यक्ष के हस्ताक्षर से यह प्रमाणपत्र लगता है कि यह धन विधेयक है — 199(4)।
9. विधानसभा बनाम परिषद्
| विषय | विधानसभा | विधानपरिषद् |
|---|---|---|
| धन विधेयक | केवल यहीं पेश; विधानसभा संशोधन कर सकती है | सिर्फ़ 14 दिन की देरी कर सकती है |
| साधारण विधेयक — पहले विधानसभा में पास | परिषद् ठुकरा दे तो विधेयक फिर विधानसभा में लौटता है | पहली बार 3 माह, दोबारा आने पर केवल 1 माह रोक सकती है |
| साधारण विधेयक — पहले परिषद् में पास | विधानसभा ठुकरा दे तो विधेयक वहीं ख़त्म | परिषद् से पास होकर विधानसभा जाता है — अंतिम शब्द विधानसभा का |
ट्रिक: एक पंक्ति में — परिषद् देर करा सकती है, रोक नहीं सकती; धन और बजट पर तो देर भी बस 14 दिन की।
10. बजट: 202–204
- हर वित्तीय वर्ष के लिए राज्य की अनुमानित (प्राक्कलित) आय और व्यय का विवरण राज्यपाल सदन के सामने रखवाता है — यही बजट है — अनु. 202(1)।
- विवरण में भारित व्यय और संचित निधि से होने वाला अन्य व्यय अलग-अलग दिखाया जाता है; राजस्व लेखे का ख़र्च अन्य ख़र्च से अलग किया जाता है — 202(2)।
संचित निधि पर भारित व्यय — 202(3)
- राज्यपाल की उपलब्धियाँ, भत्ते और उसके पद से जुड़ा अन्य ख़र्च।
- अध्यक्ष-उपाध्यक्ष और (परिषद् वाले राज्य में) सभापति-उपसभापति के वेतन-भत्ते।
- राज्य के ऋण-भार — ब्याज, निक्षेप निधि भार, मोचन भार और उधार/ऋण-सेवा/ऋण-मोचन से जुड़े ख़र्च।
अनु. 203 — मतदान
- भारित व्यय पर वोटिंग नहीं होती, सदन उस पर बस चर्चा कर सकता है — 203(1)।
- बाक़ी ख़र्च अनुदान की माँगों के रूप में आता है; विधानसभा उसे मान, ठुकरा या राशि घटाकर मान सकती है — 203(2)।
- कोई भी अनुदान माँग राज्यपाल की सिफारिश के बिना नहीं रखी जा सकती — 203(3)।
अनु. 204 — विनियोग विधेयक
- अनुदान पास होते ही संचित निधि से ज़रूरी पूरी राशि निकालने के लिए विनियोग विधेयक पेश होता है — 204(1)।
- अनु. 205, 206 को छोड़कर, संचित निधि से पैसा केवल विनियोग क़ानून के तहत ही निकल सकता है — 204(3)।
बजट का क्रम
- वार्षिक वित्तीय विवरण (202)
- अनुदान माँगों पर मतदान (203)
- विनियोग विधेयक (204)
11. अन्य अनुदान व वित्त विधेयक
| अनुदान | कब | अनुच्छेद |
|---|---|---|
| अनुपूरक / अतिरिक्त | मंज़ूर राशि साल के लिए कम पड़ जाए, या बजट में न सोची गई किसी नई सेवा का ख़र्च आ जाए | 205(1)(क) |
| अधिक अनुदान | किसी सेवा पर मंज़ूर राशि से ज़्यादा ख़र्च हो चुका हो | 205(1)(ख) |
| लेखानुदान | बजट प्रक्रिया (203, 204) पूरी होने तक साल के कुछ हिस्से के ख़र्च के लिए अग्रिम मंज़ूरी | 206(क) |
अनुपूरक/अधिक ख़र्च की स्थिति में राज्यपाल सदन के सामने दूसरा विवरण रखवाता है या विधानसभा में आधिक्य की माँग रखता है।
अनु. 207 — वित्त विधेयक
- अनु. 199(1)(क–च) के विषयों को छूने वाला कोई विधेयक या संशोधन तभी आ सकता है जब राज्यपाल सिफारिश करे; और ऐसा विधेयक परिषद् में शुरू नहीं हो सकता — 207(1)।
- छूट ➜ केवल कर घटाने या हटाने का संशोधन लाने के लिए सिफारिश ज़रूरी नहीं।
- केवल जुर्माना/आर्थिक दंड, लाइसेंस या सेवा-शुल्क, या स्थानीय निकाय के कर का प्रावधान होने से कोई विधेयक वित्त/धन विधेयक नहीं बन जाता — 207(2)।
12. गैर सरकारी विधेयक
- मंत्रिपरिषद् के अलावा विधानसभा का कोई भी सदस्य जो विधेयक रखे, उसे गैर सरकारी (निजी सदस्य) विधेयक कहते हैं।
- हर सत्र में एक सदस्य अधिकतम चार निजी विधेयक ही पुरःस्थापित कर सकता है।
- 1973 के बाद से राजस्थान में किसी निजी सदस्य का विधेयक क़ानून नहीं बन पाया।
- 13वीं, 14वीं और 15वीं विधानसभा में तो ऐसा कोई विधेयक आया ही नहीं।
13. विधानपरिषद्
केंद्र में जो जगह राज्यसभा की है, राज्य में वही जगह विधानपरिषद् की है — यह विधानमण्डल का उच्च सदन है। यह स्थायी सदन है और हर राज्य में होना ज़रूरी नहीं।
- अनुच्छेद ➜ 169, 171
- न्यूनतम सदस्य ➜ 40
- अधिकतम ➜ विधानसभा का 1/3
14. गठन या समाप्ति
परिषद् बनाना / हटाना — अनु. 169
- विधानसभा का संकल्प
- कुल सदस्यों का बहुमत + उपस्थित व मतदाताओं का 2/3
- संसद का क़ानून
- अनु. 168 में कुछ भी लिखा हो, संसद यह क़ानून बना सकती है — शर्त ऊपर वाला विशेष बहुमत वाला संकल्प — 169(1)।
- यह क़ानून संविधान बदलता ज़रूर है, फिर भी इसे अनु. 368 वाला संशोधन नहीं गिना जाता — 169(3)।
राजस्थान में परिषद्
- 18 अप्रैल 2012 को राजस्थान विधानसभा ने परिषद् बनाने का संकल्प पारित कर संसद को भेजा।
- संसद ने अब तक इस पर कोई क़ानून नहीं बनाया, इसलिए राजस्थान आज भी एकसदनीय है।
- परिषद् बनी तो इसमें अधिकतम 66 सदस्य हो सकेंगे (200 का एक-तिहाई)।
15. परिषद् की संरचना
- ऊपरी सीमा ➜ विधानसभा की सदस्य संख्या का 1/3; निचली सीमा — 40 सदस्य — 171(1)।
- जब तक संसद क़ानून से कुछ और तय न करे, बनावट खंड (3) के अनुसार — 171(2)।
| भाग | कौन चुनता है | खंड |
|---|---|---|
| 1/3 | नगरपालिकाओं, ज़िला बोर्डों व अन्य स्थानीय प्राधिकारियों के सदस्यों के निर्वाचक मण्डल | 171(3)(क) |
| 1/12 | राज्य में रहने वाले वे नागरिक जिन्हें किसी विश्वविद्यालय से स्नातक हुए कम से कम 3 वर्ष हो चुके | 171(3)(ख) |
| 1/12 | राज्य के माध्यमिक विद्यालयों व महाविद्यालयों में तीन या अधिक वर्षों से पढ़ा रहे अध्यापक | 171(3)(ग) |
- (क), (ख), (ग) के सदस्य संसद के क़ानून से तय प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से चुने जाते हैं; (घ) का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति से एकल संक्रमणीय मत द्वारा — 171(4)।
- मनोनयन के क्षेत्र ➜ साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन, समाज सेवा; व्यक्ति इनका जानकार या अनुभवी हो — 171(5)।
16. परिषद्: रोचक तथ्य
- सबसे बड़ी परिषद् उत्तर प्रदेश (100 सदस्य); दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र (78)।
- 7वें संविधान संशोधन, 1956 ने मध्य प्रदेश में भी परिषद् का प्रावधान किया, पर वह कभी गठित नहीं हुई।
- जनप्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 2003 ने परिषद् व राज्यसभा चुनावों में खुला मतदान शुरू किया (पहले गुप्त था) — विधायक पार्टी के अधिकृत एजेंट को अपना मतपत्र दिखा सकता है।
17. रैपिड फायर तथ्य
- दो सत्रों के बीच अधिकतम अंतर ➜ 6 माह, यानी साल में कम से कम 2 सत्र
- स्थगन ➜ अध्यक्ष (केवल बैठक); सत्रावसान ➜ राज्यपाल (पूरा सत्र); विघटन ➜ राज्यपाल (पूरी विधानसभा)
- राजस्थान का कोरम ➜ 200 सीटों का 1/10 = 20
- धन विधेयक ➜ केवल विधानसभा में पेश; परिषद् को 14 दिन में लौटाना होता है
- परिषद् साधारण विधेयक को कितना रोके ➜ 3 + 1 = 4 माह
- धन विधेयक है या नहीं ➜ अंतिम फ़ैसला विधानसभा अध्यक्ष का — 199(3)
- भारित व्यय ➜ संचित निधि से, इस पर वोटिंग नहीं होती
- परिषद् का आकार ➜ कम से कम 40 सदस्य, अधिकतम विधानसभा का 1/3
- राजस्थान में परिषद् ➜ 18 अप्रैल 2012 को संकल्प पारित, पर संसद का क़ानून नहीं बना; इसलिए एकसदनीय
अगले भाग में राजस्थान विधानसभा — सीटें, रिकॉर्ड, भवन, 16 विधानसभाओं का इतिहास और आज के पदाधिकारी।
पिछला भाग: राज्य विधानमण्डल: गठन व सदस्यता एवं पीठासीन अधिकारी
अगला भाग: राज्य विधानमण्डल: राजस्थान विधानसभा
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