भर्ती कराने वाली संस्था और अधिकारों की निगरानी करने वाली संस्था — दोनों में एक बात साझा है: नियुक्ति करने वाला एक होता है और हटाने का अधिकार किसी और के पास। इसी फ़र्क़ को पकड़ लेने से इस विषय के अधिकतर प्रश्न सुलझ जाते हैं। इस भाग में राजस्थान लोक सेवा आयोग का इतिहास, नियुक्ति-कार्यकाल, निलंबन व हटाना, कार्य, सचिवालय और अध्यक्षों की सूची दी गई है। उसके बाद राज्य मानवाधिकार आयोग की बनावट, नियुक्ति, हटाने की प्रक्रिया, कार्य और शक्तियाँ आती हैं।
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1. राजस्थान लोक सेवा आयोग
- स्थापना ➜ 22 दिसम्बर 1949
- मुख्यालय ➜ घूघरा घाटी, अजमेर
- संविधान ➜ भाग 14 · अनु. 315–323
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
याद रखें: लोक सेवा आयोग से जुड़े संविधान के अनुच्छेद: 16, 234 और 315 से 323।
2. इतिहास व स्थापना
देश में लोक सेवा आयोग का विचार 1919 के भारत शासन अधिनियम से आया और 1926 में पहला आयोग बना। मेरिट से भर्ती की रखवाली करने के कारण इसे “वॉच डॉग” कहा जाता है।
- राजस्थान बनते समय की 22 रियासतों में से केवल 3 के पास अपना आयोग था — जोधपुर (1939), जयपुर (1940) और बीकानेर (1946)। सबसे पहला जोधपुर का था।
- विलय के बाद राजप्रमुख सवाई मानसिंह द्वितीय ने 16 अगस्त 1949 को आयोग बनाने का 28वाँ अध्यादेश निकाला; राजपत्र में यह 20 अगस्त 1949 को छपा।
- अध्यादेश के दिन से ही (16 अगस्त 1949) तीनों रियासती आयोग — बीकानेर, जयपुर, जोधपुर — ख़त्म माने गए।
… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें
| काल / क्रम | घटना | विवरण |
|---|---|---|
| 1926 | देश का पहला लोक सेवा आयोग | 1919 के अधिनियम के प्रावधान से |
| 1939 | जोधपुर लोक सेवा आयोग | राजस्थान क्षेत्र में पहला |
| 1940 | जयपुर लोक सेवा आयोग | |
| 1946 | बीकानेर लोक सेवा आयोग |
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3. नियुक्ति, कार्यकाल, त्यागपत्र
अनुच्छेद 315 — आयोग किसके लिए
- 315(1) ➜ हर राज्य का अपना एक लोक सेवा आयोग होगा।
- 315(2) ➜ दो या अधिक राज्यों के विधानमंडल प्रस्ताव पास करें तो संसद कानून बनाकर उनके लिए संयुक्त लोक सेवा आयोग बना सकती है।
अनुच्छेद 316 — कौन, कब तक
- 316(1) ➜ अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं।
- शर्त: कुल सदस्यों में से आधे लोग केंद्र या किसी राज्य की सरकार में 10 वर्ष या अधिक प्रशासनिक पद पर रह चुके हों।
- 316(1क) ➜ अध्यक्ष का पद खाली हो या वे काम न कर पा रहे हों तो राज्यपाल किसी सदस्य को कार्यवाहक अध्यक्ष बना देते हैं, जब तक अध्यक्ष लौट न आएँ। यह उपबंध 15वें संशोधन (1963) की धारा 11 से जुड़ा।
- 316(2) ➜ कार्यकाल 6 वर्ष; पर 62 वर्ष की उम्र पहले आ जाए तो वहीं पद छूट जाता है।
ध्यान दें: नियुक्ति और त्यागपत्र — दोनों राज्यपाल के पास; पर हटाने का अधिकार राज्यपाल के पास नहीं है।
4. निलंबन व हटाना
- 317(1) ➜ कदाचार के आधार पर हटाने का अधिकार केवल राष्ट्रपति को; पर पहले सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 145 की प्रक्रिया से जाँच करके रिपोर्ट देता है।
- 317(2) ➜ जाँच चलने तक राज्यपाल अध्यक्ष या सदस्य को निलंबित रख सकते हैं, जब तक राष्ट्रपति रिपोर्ट पर आदेश न दे दें।
317(3) — बिना जाँच हटाने के तीन आधार
- दिवालिया घोषित होना।
- पद के कर्तव्यों से बाहर कोई वेतन वाली नौकरी करना (लाभ का पद लेना)।
- तन या मन की दुर्बलता से पद के लायक न रहना — यह राय राष्ट्रपति की होगी।
5. कार्य, व्यय, प्रतिवेदन
अनु. 318 — सेवा-शर्तें
- आयोग में कितने सदस्य हों और उनकी सेवा-शर्तें क्या हों — यह राज्यपाल विनियम से तय करते हैं; इसलिए सदस्य-संख्या घटाना-बढ़ाना राज्यपाल के हाथ में है।
- आयोग के कर्मचारियों की संख्या व सेवा-शर्तों के नियम भी राज्यपाल विनियमों से बनाते हैं।
अनु. 319 — कार्यकाल के बाद
| कौन | आगे क्या बन सकता है | क्या नहीं |
|---|---|---|
| RPSC अध्यक्ष (319-ख) | UPSC का अध्यक्ष या सदस्य · दूसरे राज्य के आयोग का अध्यक्ष | केंद्र/राज्य सरकार की कोई और नौकरी |
| RPSC सदस्य (319-घ) | UPSC का अध्यक्ष या सदस्य · उसी या दूसरे राज्य आयोग का अध्यक्ष | केंद्र/राज्य सरकार की कोई और नौकरी |
अनु. 320 — आयोग क्या करता है
- 320(1) ➜ राज्य की सेवाओं में नियुक्ति के लिए परीक्षाएँ कराना।
- 320(3) ➜ सरकार इन बातों पर आयोग से परामर्श लेती है: (क) सिविल सेवाओं व पदों की भर्ती-पद्धति; (ख) नियुक्ति, पदोन्नति और एक सेवा से दूसरी में स्थानांतरण के सिद्धांत; (ग) सरकारी सेवक पर असर डालने वाले अनुशासन के मामले व उनकी याचिकाएँ; (ङ) पेंशन और क्षतिपूर्ति के दावे।
- राज्यपाल जो भी विषय भेजें, उस पर सलाह देना आयोग का कर्तव्य है।
- अनु. 321 ➜ विधानमंडल कानून बनाकर आयोग को अतिरिक्त काम दे सकता है।
- अनु. 322 ➜ अध्यक्ष-सदस्यों के वेतन, भत्ते, पेंशन समेत सारा खर्च राज्य की संचित निधि पर भारित। वेतन: अध्यक्ष 2,25,000 रु., सदस्य 2,15,000 रु.
- अनु. 323(2) ➜ आयोग हर वर्ष अपने काम की रिपोर्ट राज्यपाल को देता है; राज्यपाल उसे विधानमंडल में रखवाते हैं।
6. विनियम व सचिवालय
| विनियम / अधिनियम | वर्ष |
|---|---|
| RPSC (कार्यों की सीमा) विनियम | 1951 |
| RPSC नियम व विनियम | 1963 |
| RPSC (सेवा की शर्तें) विनियम | 1974 |
आयोग का सचिवालय
- मुख्यालय ➜ घूघरा घाटी, जयपुर रोड, अजमेर।
- सचिव की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं।
- 1969 से पहले सचिव RAS या न्यायिक सेवा से आता था; 1969 से यह पद IAS अधिकारी संभालते हैं।
7. महत्वपूर्ण व्यक्ति
- पहले अध्यक्ष ➜ एस.के. घोष (मुख्य न्यायाधीश)
- पहले स्थायी अध्यक्ष ➜ एस.सी. त्रिपाठी
- अध्यक्ष भी, सचिव भी ➜ एन.के. बैरवा
| पूर्व महिला सदस्य | पहचान |
|---|---|
| कांता कथूरिया | पूर्व विधायक · राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष · बाद में UPSC सदस्य |
| कमला बील | पहले राजस्थान सरकार में राज्य मंत्री |
| डॉ. प्रकाशवती शर्मा | बाद में UPSC सदस्य |
कार्यकाल पूरा होने से पहले पद छोड़ने वाले सदस्य: कांता कथूरिया, शिवपाल सिंह, दिव्या सिंह और श्याम सुन्दर शर्मा।
2024–25 में आयोग
- अध्यक्ष ➜ कैलाश चन्द मीणा (कार्यवाहक) · सचिव — रामनिवास मेहता।
- सदस्य ➜ डॉ. संगीता आर्य, डॉ. मंजू शर्मा, ले. कर्नल केसरी सिंह राठौड़, कैलाश चन्द मीणा, प्रो. अय्यूब खान; एक पद रिक्त।
- निलंबित सदस्य ➜ बाबूलाल कटारा।
8. अध्यक्षों की सूची
| क्र. | अध्यक्ष | कार्यकाल | विशेष |
|---|---|---|---|
| 1 | सर डॉ. एस.के. घोष (मुख्य न्यायाधीश) | 22.12.1949 – 25.01.1950 | पहले अध्यक्ष · सबसे छोटा कार्यकाल |
| 2 | एस.सी. त्रिपाठी | 28.07.1950 – 07.08.1951 | पहले स्थायी अध्यक्ष |
| 3 | डी.एस. तिवारी | 08.08.1951 – 20.01.1958 | सबसे लंबा कार्यकाल |
| 4 | एम.एम. वर्मा | 20.01.1958 – 03.12.1958 |
ट्रिक: तीन “सबसे”: पहले व सबसे छोटे — एस.के. घोष · पहले स्थायी — एस.सी. त्रिपाठी · सबसे लंबे — डी.एस. तिवारी (1951–58)। पहले कार्यवाहक — एल.एल. जोशी।
9. राज्य मानवाधिकार आयोग
- प्रकृति ➜ सांविधिक/वैधानिक · स्वायत्त
- कानून ➜ मानवाधिकार संरक्षण अधि. 1993 (अध्याय 5, धारा 21–29)
- गठन ➜ 18 जनवरी 1999
यह स्वायत्त और उच्चाधिकार-प्राप्त संस्था है। आयोग का मूल काम निगरानी है — मानवाधिकार टूटें तो जाँच करे और सरकार को सुझाव दे। वह सज़ा नहीं देता, सलाह देता है।
10. गठन व बनावट
- धारा 21(1) ➜ राज्य सरकार अपने राज्य के नाम से मानवाधिकार आयोग बना सकती है; राजस्थान में यह 18 जनवरी 1999 को बना और मार्च 2000 से काम करने लगा।
- धारा 21(2) ➜ शुरुआत (1999) में 1 अध्यक्ष + 4 सदस्य; 2006 के संशोधन अधिनियम के बाद 1 अध्यक्ष + 2 सदस्य।
- अध्यक्ष ➜ किसी हाईकोर्ट का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश; 2019 के संशोधन अधिनियम से हाईकोर्ट के अन्य न्यायाधीश भी पात्र।
- सदस्य 1 ➜ हाईकोर्ट का वर्तमान/सेवानिवृत्त न्यायाधीश, या 7 वर्ष अनुभव वाला वर्तमान/सेवानिवृत्त ज़िला न्यायाधीश।
11. नियुक्ति व कार्यकाल
धारा 22(1) — अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, पर एक चयन समिति की सिफ़ारिश पर।
- किसी वर्तमान हाईकोर्ट न्यायाधीश को अध्यक्ष/सदस्य बनाना हो तो पहले उसी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से सलाह ज़रूरी।
- धारा 24 ➜ पद पर 3 वर्ष, पर 70 की उम्र होते ही पद छूटता है (जो पहले आए)। 2019 के संशोधन से पहले अवधि 5 वर्ष थी, आयु-सीमा तब भी 70।
- 2019 के संशोधन के बाद पुनर्नियुक्ति संभव; पहले नहीं थी।
- पद छोड़ने के बाद केंद्र या राज्य सरकार में कोई नौकरी नहीं।
- धारा 25(1) ➜ अध्यक्ष का पद मृत्यु, त्यागपत्र या अन्य कारण से खाली हो तो राज्यपाल अधिसूचना से किसी सदस्य को नए अध्यक्ष तक कार्यवाहक अध्यक्ष बनाते हैं।
12. त्यागपत्र व हटाना
- धारा 23(1) ➜ त्यागपत्र राज्यपाल को संबोधित।
- धारा 23(1क) ➜ कदाचार या असमर्थता पर हटाना राष्ट्रपति के आदेश से, पर तभी जब सुप्रीम कोर्ट की जाँच इसे सिद्ध कर दे।
धारा 23(2) — राष्ट्रपति इन दशाओं में सीधे हटा सकते हैं
- सक्षम न्यायालय ने मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित किया हो।
- मानसिक या शारीरिक कारण से कर्तव्य निभाने में असमर्थ हो।
- दिवालिया घोषित हुआ हो।
13. कार्य व शक्तियाँ
कार्य
- उल्लंघन होने पर स्वतः संज्ञान लेकर जाँच; या पीड़ित अथवा उसकी ओर से किसी की याचिका पर — (1) उल्लंघन या उसे बढ़ावा देने की जाँच, (2) किसी लोकसेवक ने उल्लंघन रोकने में लापरवाही की हो तो उसकी जाँच।
- जाँच राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों तक। कार्यक्षेत्र में नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक — सभी अधिकार।
- मानवाधिकारों पर शोध और उनका प्रचार; इस क्षेत्र के गैर-सरकारी संगठनों को बढ़ावा।
- आयोग सलाहकारी है — उसकी सलाह बाध्यकारी नहीं, पर सरकार को एक माह में बताना होता है कि रिपोर्ट पर क्या किया।
शक्तियाँ — जाँच के समय सिविल न्यायालय जैसी
- गवाहों को बुलाना, उनसे पूछताछ, शपथ पर बयान।
- कोई दस्तावेज़ खोजना और पेश करवाना।
- शपथ-पत्रों पर साक्ष्य लेना।
- जिससे आयोग जानकारी माँगे, वह भारतीय दंड संहिता की धारा 176 व 177 के तहत देने को बाध्य।
- किसी जगह के निरीक्षण के लिए राजपत्रित अधिकारी भेज सकता है; उसे IPC धारा 100 वाली शक्ति मिलती है और वह दस्तावेज़ों की नकल ले सकता है।
- केंद्र या राज्य सरकार की सहमति से उनके अधिकारी/एजेंसी की सेवा ले सकता है।
14. रैपिड फायर तथ्य
- RPSC की स्थापना ➜ 22 दिसम्बर 1949
- मुख्यालय ➜ घूघरा घाटी, अजमेर
- संवैधानिक आधार ➜ भाग 14, अनु. 315–323
- RPSC का कार्यकाल ➜ 6 वर्ष या 62 वर्ष की आयु, जो पहले आए
- नियुक्ति बनाम हटाना ➜ नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, हटाने का अधिकार केवल राष्ट्रपति को
- रियासती आयोगों में सबसे पहला ➜ जोधपुर (1939)
- सबसे लंबा कार्यकाल (अध्यक्ष) ➜ डी.एस. तिवारी
- मानवाधिकार आयोग का गठन ➜ 18 जनवरी 1999
- मानवाधिकार आयोग का कार्यकाल ➜ 3 वर्ष या 70 वर्ष की आयु; 2019 के संशोधन से पहले 5 वर्ष
अगले भाग में राज्य मानवाधिकार आयोग का शेष हिस्सा और राज्य निर्वाचन आयोग, साथ में राज्य वित्त आयोग और राज्य महिला आयोग की बनावट, कार्य व अध्यक्षों की सूची।
पिछला भाग: राजस्थान उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालय
अगला भाग: प्रमुख आयोग: राज्य निर्वाचन आयोग एवं राज्य वित्त आयोग
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