राज्य विधानमण्डल: गठन व सदस्यता एवं पीठासीन अधिकारी – Rajasthan Polity Chapter 5

राज्य विधानमण्डल का गठन, विधानसभा की सदस्यता-शर्तें और अध्यक्ष-सभापति जैसे पीठासीन अधिकारी।

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In this chapter (14 sections)
  1. एक नज़र में
  2. अनुच्छेद तालिका
  3. विधानसभा की संरचना
  4. कार्यकाल
  5. अर्हता व शपथ
  6. स्थान रिक्त होना
  7. निरर्हता (अयोग्यता)
  8. पीठासीन अधिकारी
  9. अध्यक्ष: चुनाव व शक्तियाँ
  10. पद छोड़ना व हटाना
  11. अध्यक्ष की जगह कौन
  12. सभापति व वेतन
  13. प्रोटेम स्पीकर
  14. रिवीजन पॉइंटर्स

राज्य के लिए क़ानून कौन बनाता है — इसी सवाल से पूरा अध्याय खुलता है, और जवाब सिर्फ़ «विधायक» नहीं है, क्योंकि राज्यपाल भी विधानमण्डल का हिस्सा है। यह भाग अनुच्छेद 168 से 212 के ढाँचे से शुरू होकर विधानसभा की संरचना, कार्यकाल, अर्हता, स्थान रिक्त होने और निरर्हता तक जाता है। उसके बाद पीठासीन अधिकारियों — अध्यक्ष, सभापति और प्रोटेम स्पीकर — का चुनाव, शक्तियाँ और पद छोड़ने-हटाने की व्यवस्था दी गई है।

इस विषय का इंटरैक्टिव माइंड मैप — राज्य विधानमण्डल, 3 चॉक-बोर्ड चित्र, 3 नक्शे, 4 चार्ट, 28 फ्लैशकार्ड और 12 अभ्यास-प्रश्न के साथ। यहाँ हर खंड के चुने हुए बिंदु हैं; पूरी तालिकाएँ, शेष तथ्य और रटने की ट्रिक माइंड मैप में हैं।
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1. एक नज़र में

जिस तरह केंद्र में क़ानून संसद बनाती है, उसी तरह राज्य के लिए क़ानून बनाने का काम विधानमण्डल (State Legislature) करता है। इसे राज्य की विधायिका या व्यवस्थापिका भी कहते हैं। संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 168 से 212 तक इसी के नियम हैं।

  • दो सदन वाले राज्य में विधानमण्डल = राज्यपाल + विधानसभा + विधानपरिषद् — अनु. 168(1)(क)।
  • एक सदन वाले राज्य में विधानमण्डल = राज्यपाल + विधानसभा — अनु. 168(1)(ख)।
  • नाम भी संविधान ने तय किए हैं ➜ दो सदन हों तो विधानपरिषद् (उच्च सदन) व विधानसभा (निम्न सदन); एक ही सदन हो तो उसका नाम विधानसभा — अनु. 168(2)।

… शेष 2 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

ट्रिक: छह द्विसदनीय राज्य याद रखें — उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना। ट्रिक: “उबि-मक-आते“।

  • भाग ➜ 6
  • अनुच्छेद ➜ 168–212
  • राजस्थान ➜ एकसदनीय

… शेष 3 बिंदु — पूरी सूची माइंड मैप में देखें

2. अनुच्छेद तालिका

अनुच्छेदविषय
168राज्यों के विधानमण्डलों का गठन
169विधानपरिषदों का गठन या समापन
170विधानसभाओं की संरचना
171विधानपरिषदों की संरचना

… शेष 41 पंक्तियाँ — पूरी तालिका माइंड मैप में देखें

ट्रिक: क्रम याद रखने का ढाँचा: 168–173 बनावट और सदस्यता → 174–177 सत्र व राज्यपाल → 178–187 अधिकारी → 188–195 सदस्य → 196–201 विधेयक → 202–207 पैसा → 208–212 प्रक्रिया व भाषा।

3. विधानसभा की संरचना

  • विधानसभा के सदस्य राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा आते हैं — संख्या कम से कम 60 और अधिक से अधिक 500 — अनु. 170(1) (यह अनु. 333 के अधीन है)।
  • क्षेत्र ऐसे बाँटे जाते हैं कि हर क्षेत्र की जनसंख्या और उसे मिली सीटों का अनुपात पूरे राज्य में बराबर रहे — अनु. 170(2)।
  • हर जनगणना के बाद सीटों की कुल संख्या और क्षेत्रों का पुनः समायोजन होता है; प्राधिकारी और तरीक़ा संसद क़ानून से तय करती है — अनु. 170(3)।

आरक्षण और मनोनयन

  • अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए विधानसभा में सीटें आरक्षित — अनु. 332।
  • 104वें संविधान संशोधन, 2019 ने यह आरक्षण 2030 तक बढ़ा दिया।
  • पहले अनु. 333 के तहत राज्यपाल एक आँग्ल-भारतीय सदस्य मनोनीत कर सकता था; 104वें संशोधन (लागू 25 जनवरी 2020) ने लोकसभा व विधानसभाओं में यह मनोनयन ख़त्म कर दिया।

चुनाव कौन कराता है

  • विधानसभा चुनाव भारत निर्वाचन आयोग कराता है।
  • आम चुनाव की अधिसूचना राजपत्र में राज्यपाल छापता है, पर निर्वाचन आयोग की सिफारिश पर — आधार: धारा 15, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951।
  • न्यूनतम सदस्य ➜ 60
  • अधिकतम सदस्य ➜ 500
  • सीटों का आधार ➜ 1971 जनगणना

4. कार्यकाल

  • विधानसभा की सामान्य उम्र पहली बैठक (प्रथम अधिवेशन) से 5 वर्ष — अवधि पूरी होते ही वह अपने-आप विघटित हो जाती है — अनु. 172(1)।
  • मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल इसे पाँच साल से पहले भी भंग कर सकता है।
  • राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान संसद क़ानून बनाकर विधानसभा की उम्र बढ़ा सकती है — हर बार अधिकतम 1 वर्ष।

आपातकाल में विधानसभा की उम्र

  1. सामान्य: 5 वर्ष
  2. संसद: +1 वर्ष (एक बार में)
  3. आपातकाल ख़त्म

याद रखें: विधानसभा = “अस्थायी सदन” (भंग हो सकती है); विधानपरिषद् = “स्थायी सदन” (भंग नहीं होती, सदस्य बारी-बारी से बदलते हैं)।

5. अर्हता व शपथ

संविधान की शर्तें — अनु. 173

  1. व्यक्ति भारत का नागरिक हो।
  2. न्यूनतम उम्र: विधानसभा — 25 वर्ष, विधानपरिषद् — 30 वर्ष।
  3. संसद के बनाए क़ानून में लिखी अन्य योग्यताएँ भी हों।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की शर्तें

  • विधानसभा का उम्मीदवार उसी राज्य के किसी निर्वाचन क्षेत्र का मतदाता हो।
  • परिषद् में चुनाव लड़ने वाले में विधानसभा सदस्य बनने की योग्यता हो; राज्यपाल द्वारा मनोनीत होने वाला उसी राज्य का निवासी हो।
  • SC/ST आरक्षित सीट से लड़ने वाला स्वयं उसी जाति/जनजाति का हो।

शपथ — अनु. 188

सीट पर बैठने से पहले हर सदस्य राज्यपाल (या उसके नियुक्त व्यक्ति) के सामने तीसरी अनुसूची में दिए प्रारूप में शपथ या प्रतिज्ञान करता है और उस पर हस्ताक्षर करता है। बिना शपथ बैठने या मत देने पर दंड — अनु. 193।

सदनन्यूनतम आयुकार्यकाल
विधानसभा25 वर्ष5 वर्ष
विधानपरिषद्30 वर्ष6 वर्ष

6. स्थान रिक्त होना

  • दोहरी सदस्यता नहीं ➜ एक ही समय में कोई व्यक्ति राज्य की विधानसभा और परिषद्, दोनों में नहीं बैठ सकता; दोनों में जीत जाए तो राज्य के क़ानून के अनुसार एक सीट छोड़नी होगी — अनु. 190(1)।
  • दो या ज़्यादा राज्यों की विधायिकाओं में एक साथ सदस्यता भी वर्जित — अनु. 190(2)।
  • सदस्य पर अनु. 191 की कोई निरर्हता लागू हो जाए तो सीट रिक्त — अनु. 190(3)(क)।

ध्यान दें: 60 दिन की अनुपस्थिति पर सीट अपने-आप नहीं जाती — सदन घोषित कर सकता है (विवेक सदन का)।

7. निरर्हता (अयोग्यता)

अनु. 191(1) — पाँच आधार

  1. केंद्र या किसी राज्य सरकार के अधीन लाभ का पद रखता हो (मंत्री पद या विधानमण्डल द्वारा छूट दिया गया पद इसमें नहीं गिना जाता)।
  2. विकृतचित्त (मानसिक रूप से अस्वस्थ) हो और सक्षम न्यायालय ने ऐसा घोषित किया हो।
  3. अनुन्मोचित दिवालिया हो।

अनु. 191(2) — दल-बदल

10वीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी प्रावधान) के तहत अयोग्य हुआ व्यक्ति भी सदस्य नहीं रह सकता।

निरर्हता का प्रकारफ़ैसला कौन करेगाशर्त
अनु. 191(1) के आधारराज्यपाल — निर्णय अंतिम (अनु. 192(1))फ़ैसले से पहले निर्वाचन आयोग से राय माँगना और उसे मानना ज़रूरी (अनु. 192(2))
दल-बदल (10वीं अनुसूची)सदन का अध्यक्ष / सभापति — निर्णय अंतिममामला स्वयं अध्यक्ष/सभापति का हो तो सदन द्वारा चुना गया कोई सदस्य फ़ैसला करेगा

8. पीठासीन अधिकारी

सदनअधिकारीअनुच्छेद
विधानसभाअध्यक्ष (Speaker) व उपाध्यक्ष178–181
विधानपरिषद्सभापति (Chairman) व उपसभापति182–185
दोनोंवेतन-भत्ते186

चारों पदों के नियम लगभग एक जैसे हैं — जो बात अध्यक्ष के लिए सच है, वही सभापति के लिए भी। इसलिए पहले अध्यक्ष को अच्छी तरह समझें।

9. अध्यक्ष: चुनाव व शक्तियाँ

विधानसभा जितनी जल्दी हो सके, अपने ही दो सदस्यों को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुनती है; कोई पद ख़ाली होने पर किसी अन्य सदस्य को चुन लेती है — अनु. 178।

सदन के भीतर

  • बैठकों की अध्यक्षता करता है और कार्यवाही चलाता है।
  • सदन में शांति और अनुशासन बनाए रखता है।
  • कार्यवाही को स्थगित या निलंबित करता है; गणपूर्ति (कोरम) न हो तो बैठक रोक देता है।

विशेष शक्तियाँ

  • किसी विधेयक के धन विधेयक होने या न होने पर अंतिम मुहर अध्यक्ष की।
  • दल-बदल के आधार पर सदस्यों को अयोग्य घोषित करता है।
  • सदस्यों के विशेषाधिकारों की रक्षा करता है।

10. पद छोड़ना व हटाना

  • विधानसभा का सदस्य न रहे तो पद अपने-आप ख़ाली — अनु. 179(क)।
  • इस्तीफ़ा ➜ अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को, और उपाध्यक्ष अध्यक्ष को लिखकर देता है — अनु. 179(ख)।
  • हटाना ➜ सदन के उस समय के कुल सदस्यों के बहुमत से पास संकल्प द्वारा — अनु. 179(ग)।

जब हटाने का संकल्प विचाराधीन हो — अनु. 181

  • उस बैठक में वह उपस्थित रहकर भी पीठासीन नहीं होगा।
  • वह सदन में बोल सकता है और कार्यवाही में भाग ले सकता है।
  • वह पहली बार में मत दे सकता है, लेकिन बराबर मत होने पर निर्णायक मत नहीं दे सकता।

11. अध्यक्ष की जगह कौन

स्थितिकौन संभालेगा
अध्यक्ष का पद रिक्त — अनु. 180(1)उपाध्यक्ष → वह भी न हो तो राज्यपाल द्वारा नियुक्त विधानसभा सदस्य
बैठक से अध्यक्ष अनुपस्थित — अनु. 180(2)उपाध्यक्ष → प्रक्रिया नियमों से तय व्यक्ति → वह भी न हो तो सदन द्वारा चुना सदस्य

12. सभापति व वेतन

  • परिषद् अपने ही सदस्यों में से एक सभापति और एक उपसभापति चुनती है; पद ख़ाली होने पर नया चुनाव — अनु. 182।
  • परिषद् का सदस्य न रहने पर पद ख़ाली; सभापति उपसभापति को और उपसभापति सभापति को त्यागपत्र देता है; उस समय के कुल सदस्यों के बहुमत वाले संकल्प से हटाया जा सकता है, 14 दिन के नोटिस के बाद — अनु. 183।
  • सभापति का पद रिक्त → उपसभापति → वह भी न हो तो राज्यपाल द्वारा नियुक्त परिषद् सदस्य; केवल अनुपस्थिति में → उपसभापति → नियमों से तय व्यक्ति → परिषद् द्वारा चुना सदस्य — अनु. 184।

वेतन-भत्ते

  • अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति, उपसभापति के वेतन-भत्ते राज्य विधानमण्डल क़ानून बनाकर तय करता है — अनु. 186; इनका उल्लेख दूसरी अनुसूची में मिलता है।
  • ये वेतन भारित व्यय हैं — संचित निधि से मिलते हैं और इन पर वोट नहीं होता (अनु. 202(3))।

13. प्रोटेम स्पीकर

  • नियुक्ति राज्यपाल करता है और शपथ भी राज्यपाल ही दिलाता है।
  • प्रायः सदन का सबसे वरिष्ठ सदस्य बनाया जाता है — वह सत्ता पक्ष या विपक्ष, किसी भी ओर का हो सकता है।
  • मुख्य काम ➜ नए चुने विधायकों को शपथ दिलाना।
  • 16वीं विधानसभा ➜ कालीचरण सराफ
  • पहले प्रोटेम ➜ महाराव संग्राम सिंह
  • सबसे अधिक बार ➜ पूनमचंद बिश्नोई

रिवीजन पॉइंटर्स

  1. विधानमण्डल = राज्यपाल + विधानसभा (दो सदन हों तो विधानपरिषद् भी); राजस्थान एकसदनीय है।
  2. संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 168 से 212 तक विधानमण्डल के नियम हैं।
  3. विधानसभा में न्यूनतम 60 और अधिकतम 500 सदस्य हो सकते हैं — अनु. 170।
  4. विधानसभा की उम्र पहली बैठक से 5 वर्ष; राष्ट्रीय आपातकाल में संसद इसे हर बार अधिकतम 1 वर्ष बढ़ा सकती है।
  5. सदस्य बनने की न्यूनतम आयु विधानसभा के लिए 25 वर्ष और विधानपरिषद् के लिए 30 वर्ष — अनु. 173।
  6. कोई व्यक्ति एक साथ विधानसभा और परिषद् दोनों का सदस्य नहीं रह सकता — अनु. 190।
  7. अनु. 191(1) की निरर्हता पर फ़ैसला राज्यपाल का (निर्वाचन आयोग की राय के बाद), जबकि दल-बदल पर फ़ैसला अध्यक्ष/सभापति का।
  8. अध्यक्ष-उपाध्यक्ष के अनुच्छेद 178–181 हैं; उन्हें सदन के कुल सदस्यों के बहुमत वाले संकल्प से हटाया जाता है — अनु. 179।
  9. प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति राज्यपाल करता है और उसका मुख्य काम नए विधायकों को शपथ दिलाना है।

अगले भाग में सदन के सत्र और कार्यवाही के नियम, साधारण व धन विधेयक के पारित होने का तरीक़ा, बजट की प्रक्रिया और विधानपरिषद्।

पिछला भाग: मुख्यमंत्री एवं राज्य मंत्रिपरिषद्: वर्तमान मंत्रिपरिषद् एवं राजस्थान के मुख्यमंत्री

अगला भाग: राज्य विधानमण्डल: सत्र व कार्यवाही एवं विधेयक व बजट

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