राजस्थान की वन उपजें एवं प्रमुख घासें

राजस्थान की वन उपजें एवं प्रमुख घासें – Rajasthan Geography Chapter 20

वन केवल लकड़ी नहीं देते — गोंद, तेंदू पत्ता, शहद, लाख, औषधीय पौधे और घासें भी वन अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा हैं। परीक्षा में इसी हिस्से से ‘कौन-सी घास कहाँ’ और ‘किस पेड़ से क्या’ वाले प्रश्न बनते हैं। यहाँ प्रमुख वन उपजें और राजस्थान की घासें विस्तार से दी गई हैं।

1. प्रमुख वन उपजें

  • इमारती लकड़ी ➜ सागवान, सालर, रोहिड़ा, शीशम
  • जलाने की लकड़ी ➜ धोंकड़ा, खैर, बबूल, खेजड़ी

2. गौण वन उपजें

  • फोग ➜ रेगिस्तानी झाड़ी, जिसके फूलों से साग बनाया जाता है; लकड़ी ईंधन के रूप में
  • खींप ➜ मरुस्थलीय झाड़ीनुमा पौधा, जिस पर ‘खींपोली’ नामक फली लगती है
  • गोंद ➜ कुम्मट, खेजड़ी, ईजरायली बबूल, अंग्रेजी बबूल, अलगरोबा, मोपेन, सालर व ढाक से प्राप्त होता है
  • चौहटन (बाड़मेर) ➜ गोंद उत्पादन के लिए प्रसिद्ध; उत्पादन बाड़मेर, बालोतरा, पाली, जोधपुर, फलौदी, जालौर, नागौर व डीडवाना-कुचामन में सर्वाधिक
  • आंवल / झाबुई ➜ जोधपुर, पाली, सिरोही में मिलने वाली झाड़ी; छाल चमड़ा साफ करने (टेनिंग) में काम आती है
  • सहजन ➜ उष्ण व उपोष्ण कटिबंधीय पौधा; ‘मोरिंगा’ नाम से भी जाना जाता है; बंजर व कम उर्वर भूमि में भी उगाया जा सकता है, बीमारियों के इलाज में उपयोगी

3. तेंदू पत्ता

  • स्थानीय नाम ➜ टिमरू; वानस्पतिक नाम ➜ डाईपारस मेलेनोजाइलोन (Diospyros Melanoxylon)
  • तेंदू के वृक्षों से प्राप्त पत्तों से बीड़ी बनाने का कार्य किया जाता है [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक (ड्राफ्टमैन सिविल) 2025 — तेंदू]
  • बीड़ी निर्माण कारखाने ➜ जयपुर, अजमेर, कोटा, भीलवाड़ा, झालावाड़, पाली व टोंक
  • मयूर बीड़ी कारखाना (सरकारी) ➜ टोंक
  • तेंदू पत्ते का राष्ट्रीयकरण 1974 में किया गया; इसके बाद व्यापार केवल राज्य सरकार ही कर सकती है
  • उद्देश्य ➜ संग्रहण एजेंसियों को समाप्त कर व्यापार पर राज्य का नियंत्रण, श्रमिकों को ठेकेदारों के शोषण से मुक्ति, वैज्ञानिक रूप से कर्षण कार्य तथा राज्य के राजस्व में वृद्धि
  • तेंदू के वृक्ष ➜ झालावाड़, बारां, चित्तौड़, उदयपुर, सलूम्बर, डूँगरपुर, प्रतापगढ़, बाँसवाड़ा में; अल्प संख्या में सिरोही, भीलवाड़ा, पाली व धौलपुर में भी
  • सर्वाधिक तेंदू पत्ता उत्पादन ➜ बाँसवाड़ा [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक (मेंटनेंस ट्रेड) 2025 — तेंदू वृक्ष के लिये प्रमुख जिला: झालावाड़]

4. अन्य उपजें एवं वृक्ष

  • शहद व मोम ➜ अलवर, भरतपुर, सिरोही
  • बेर ➜ बेर के पेड़ पर लाख उत्पादन हेतु ‘लेसिफर लक्खा’ नामक कीड़ा पाला जाता है; राजस्थान में लाख उत्पादन अधिक नहीं है। पश्चिमी राजस्थान में ‘थाई एप्पल’ नामक बेर की किस्म भी उत्पादित होती है।
  • महुआ (मधुका लोंगोफोलिया)आदिवासियों का कल्पवृक्ष कहलाता है; डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, उदयपुर, सलूम्बर, चित्तौड़गढ़ व सिरोही में सर्वाधिक। इससे तेल व देशी शराब (मावड़ी/महुड़ी) बनती है। भीलों की टोटम प्रथा में भी उपयोग होता है।
  • आडू ➜ इसकी लकड़ी कठपुतली बनाने में काम आती है
  • माँगलियावास के कल्प वृक्ष ➜ अजमेर; यहाँ 1000 वर्ष पुराने कल्प वृक्ष के दो पेड़ हैं, जहाँ हरियाली अमावस्या को मेला भरता है
  • शहतूत ➜ इस पेड़ पर रेशम के कीड़े पाले जाते हैं
  • अर्जुन वृक्ष ➜ औषधीय पौधा; छाल आयुर्वेदिक दवाओं में। झालावाड़, उदयपुर, सलूम्बर, बाँसवाड़ा, कोटा में अर्जुन के पेड़ पर की जाने वाली कृत्रिम रेशम की खेती को ‘टसर पद्धति’ कहते हैं। टसर विकास कार्यक्रम उदयपुर, बाँसवाड़ा व कोटा में संचालित है।
  • अश्वगंधा ➜ औषधीय पौधा; रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। कोटा संभाग में सर्वाधिक खेती।
  • हूंची ग्याजी ➜ एक खरपतवार

5. राजस्थान की प्रमुख घासें

राजस्थान में सेवण, धामण, मुराल, खस, बूर, करड़, अंजन, भरूंट, चिम्बल, खाबल, गोखरू, मोथा, ऐंचा, भांखड़ी, डाब आदि घासें पाई जाती हैं।

सेवण

  • वानस्पतिक नाम ➜ लेसीयुरुस सिंडिकस (Lasiurus Sindicus)
  • यह राजस्थान की सबसे लम्बी घास है, जो लाठी सीरीज में सर्वाधिक पाई जाती है
  • यह पश्चिमी राजस्थान की स्वादिष्ट व पौष्टिक घास है; इसे शुष्क क्षेत्र के ‘चारों का राजा’ कहा जाता है [परीक्षा: पशु परिचर S-3, 2024 — कंटीले वनों की सबसे प्रमुख घास: सेवाण]
  • सर्वाधिक सेवण घास ➜ जैसलमेर में
  • काटकर सुखा ली जाने पर इसे स्थानीय भाषा में लीलोण कहते हैं
  • इसे गोडावण की शरण स्थली भी कहा जाता है, क्योंकि इसी में गोडावण पक्षी अंडे देता है

धामण

  • वानस्पतिक नाम ➜ Cenchrus Setigerus
  • पश्चिमी राजस्थान की सूखा सहनशील घास; दुधारू पशुओं के लिए तथा मधुमेह रोग में उपयोगी
  • धामण दुधारू पशुओं के लिए बहुत उपयोगी है, जबकि सेवण सभी पशुओं के लिए पौष्टिक है (स्रोत — भूगोल कक्षा-11) [परीक्षा: पशु परिचर S-2, 2024 — धामण झाड़ी का प्रकार नहीं है]

खस

  • सुगंधित घास; भरतपुर, डीग, सवाईमाधोपुर, करौली व टोंक में सर्वाधिक
  • इससे परदे, टाट व हाथ पंखे बनाए जाते हैं; इत्र व शरबत भी बनता है तथा जड़ों से तेल निकाला जाता है
  • कमरों को खुशबूदार एवं ठण्डा रखने के लिए खस घास का प्रयोग होता है

बूर

  • वानस्पतिक नाम ➜ Cymobopogon jwaraneusa
  • राजस्थान की सबसे सुगंधित घास; इससे खुशबूदार तेल प्राप्त होता है
  • क्षेत्र ➜ डूँगरगढ़, कोलायत, नोखा, देशनोक (बीकानेर) व सरदारशहर (चूरू)

भरूंट / भूरट

  • वानस्पतिक नाम ➜ Cenchrus Biflorus
  • कांटेदार घास; बीज पर सूखने के बाद छोटे-छोटे चुभने वाले काँटे होते हैं
  • कच्ची अवस्था में पशुओं की चराई के काम आती है; फसलों में मध्य खरपतवार के रूप में मिलती है
  • रेगिस्तानी क्षेत्रों में मृदा क्षरण रोकने में उपयोगी

अन्य घासें

  • मोथा घास ➜ घना पक्षी विहार, भरतपुर; पक्षियों द्वारा चाव से खाई जाती है
  • ऐंचा घास ➜ घना पक्षी विहार, भरतपुर; इसमें पक्षी उलझकर मर जाते हैं
  • गोखरू / भांखड़ी / कांटी ➜ पश्चिमी राजस्थान की कांटेदार घास, जिसे ऊँट चाव से खाते हैं
  • डाब ➜ चन्द्रग्रहण व सूर्यग्रहण के समय सूतक से बचने के लिए काम में ली जाती है
  • सुगनी ➜ पश्चिमी राजस्थान की घास, दवा निर्माण में उपयोगी
  • ओलेवरी / लेमन घास ➜ जोधपुर क्षेत्र की घास
  • कांग्रेस घास / गाजर घास ➜ 1960 के दशक में कांग्रेस शासनकाल में अमेरिका से मिले PL-108 किस्म के गेहूँ के साथ भारत आई। वानस्पतिक नाम ‘पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस’। यह खरपतवार पर्यावरण, फसलों और मानव स्वास्थ्य — तीनों के लिए खतरनाक है।
  • करड़ (Dicanthium Annulatum), अंजन (Cenchrus Ciliars), चिम्बल, खाबल, ग्रामणा (Panicum Antidotale), मूरट (Penicum Turgidum) ➜ शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों की पौष्टिक घासें [परीक्षा: पशु परिचर S-4, 2024 — पशु चारे के लिए प्रमुख घास: मूरट (पेनिकम टर्गीडम)] [परीक्षा: CET Graduation S-1, 2024 — सेवण, धमन और कराड घास के प्रकार हैं]
  • बुई, कुरी, खुश, टांटिया (इल्युसिन कॉम्प्रेसा), लुम्परा, बुरड़ा (सिम्बोपोगोन ज्वारानकुसा), गंठिया ➜ पश्चिमी राजस्थान की घासें (स्रोत — सूजस, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, राजस्थान)

6. वानस्पतिक नाम — रैपिड टेबल

वनस्पतिवानस्पतिक नाम
खेजड़ीप्रोसोपिस सिनेरेरिया
रोहिड़ाटिकोमेला अन्डुलेटा
धोंकड़ाएनोजिस पेंडूला / टर्मिनेलिया पेंडूला
इजरायली बबूलअकेशिया टोरटिलिस
देशी बबूलअकेशिया निलोटिका
तेन्दूडाईपारस मेलेनोजाइलोन
जालसिकल्पटेरा साल्वेडोरा
चिरमीएबोस प्रोकेटोरियस
कैरकेपेरिस डेसीडुआ
खैरअकेशिया कटेचु
बेरझिझिफस रोटंडीफोलिया
कूमटएकेशिया सेनेगल
बुईएरवा टोमेन्टोसा
आककेलोट्रोपिस प्रोसेरा
फोगकेलीगोनम पोलिगोनॉइड्स

7. पंचकूटा

कूमट, कैर, सांगरी, काचरी और गूंदा के फलों को कूटकर बनाई जाने वाली सब्ज़ी पंचकूटा कहलाती है। यह शीतला अष्टमी पर बनाई जाती है और मरुस्थलीय वन उपजों के उपयोग का सबसे अच्छा उदाहरण है।

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