राजस्थान के कुल क्षेत्रफल के 16% भाग में अरब सागर की ओर जाने वाली अपवाह प्रणाली पाई जाती है। इसके अंतर्गत माही, साबरमती, पश्चिमी बनास, लूनी और इनकी सहायक नदियाँ आती हैं। इस भाग में दो बड़ी प्रणालियों — माही और लूनी — को केंद्र में रखकर पूरा विवरण दिया गया है।
1. माही नदी
- उपनाम ➜ आदिवासियों की गंगा, वागड़ की गंगा, कांठल की गंगा, दक्षिणी राजस्थान की स्वर्णरिखा [परीक्षा: पशु परिचर S-5, 2024 — स्वर्ण रेखा/सुवर्णरिखा राजस्थान में नहीं बहती]
- उद्गम ➜ मेहद झील (मिंडा के निकट, धार जिला, मध्यप्रदेश), अमरोरू की पहाड़ियों से [परीक्षा: पशु परिचर S-3, 2024 — विंध्याचल पर्वत के मिण्डा स्थान से निकलने वाली: माही]
- कुल लम्बाई ➜ 576 किमी; राजस्थान में ➜ 171 किमी
- प्रवेश ➜ खांदू गाँव (बाँसवाड़ा) से
- प्रवाह वाले जिले ➜ बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, डूँगरपुर
- समापन ➜ खम्भात की खाड़ी (अरब सागर) में [परीक्षा: CET 10+2 S-4, 2024 — अरब सागर में गिरने वाली: माही]
विशेषताएँ
- माही नदी उल्टे ‘यू’ के आकार में बहती है
- यह राजस्थान की एकमात्र नदी है जिसका प्रवेश एवं निकास दोनों ही दक्षिण दिशा से होता है
- प्रवेश के बाद दक्षिण से उत्तर की ओर बहती हुई पुनः दक्षिण की ओर मुड़कर गुजरात (महीसागर जिले) में प्रवेश करती है
- यह नदी कर्क रेखा को दो बार काटती है
- इसके प्रवाह के मैदान को प्रतापगढ़ में कांठल का मैदान तथा बाँसवाड़ा में छप्पन का मैदान कहते हैं
- तीन राज्यों में बहती है — मध्यप्रदेश, राजस्थान व गुजरात
- माही बजाज सागर बाँध के बाद यह बाँसवाड़ा–प्रतापगढ़ की सीमा तथा बेणेश्वर संगम के बाद बाँसवाड़ा–डूँगरपुर की सीमा बनाती है
- बाँसवाड़ा जिला तीन तरफ से माही नदी से घिरा हुआ है
- किनारे के शहर ➜ पीपलखूंट (प्रतापगढ़), बेणेश्वर (डूँगरपुर), गलियाकोट (डूँगरपुर)
बेणेश्वर — त्रिवेणी संगम
- सोम, माही व जाखम नदियों का संगम बेणेश्वर (नवाटापरा गाँव, साबला तहसील, डूँगरपुर) नामक स्थान पर होता है
- बेणेश्वर धाम ➜ ‘आदिवासियों का कुंभ’ कहलाने वाले इस स्थान पर माघ पूर्णिमा को मेला भरता है। यह भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ खण्डित शिवलिंग की पूजा की जाती है। स्थापना — संत मावजी द्वारा; मंदिर का निर्माण — महारावल आसकरण द्वारा।
माही पर बने बाँध
- माही बजाज सागर बाँध ➜ बोरखेड़ा (बाँसवाड़ा); यह राजस्थान का सबसे लम्बा बाँध है, जो 3109 मीटर लम्बा है
- कागदी पिकअप बाँध ➜ कागदी गाँव (बाँसवाड़ा); इस बाँध से सिंचाई हेतु दो नहरें निकलती हैं
- कडाना बाँध ➜ रामपुर (महीसागर जिला, गुजरात); यह बाँध गुजरात में है, लेकिन बाँध के भराव क्षेत्र का कुछ हिस्सा डूँगरपुर (राजस्थान) में भी है
- माही परियोजना में हिस्सेदारी ➜ राजस्थान 45%, गुजरात 55%; यह परियोजना तीन चरणों में पूरी की गई
- माही बेसिन का विस्तार ➜ 6 जिलों में — उदयपुर व सलूम्बर (5455 वर्ग किमी), बाँसवाड़ा (4493 वर्ग किमी), प्रतापगढ़ (3328 वर्ग किमी), डूँगरपुर व चित्तौड़गढ़। जिलों के पुनर्गठन के बाद माही बेसिन का सर्वाधिक विस्तार बाँसवाड़ा में है।
- सहायक नदियाँ ➜ भादर, इरु (एरु/एराव), मोरेन, सोम, अनास, जाखम व चाप
2. माही की सहायक नदियाँ
- सोम नदी ➜ उद्गम बीछामेड़ा की पहाड़ियाँ (ऋषभदेव, उदयपुर); प्रवाह उदयपुर, सलूम्बर व डूँगरपुर; समापन बेणेश्वर (डूँगरपुर) में माही में। सोम नदी पहले उदयपुर–डूँगरपुर की सीमा, उसके बाद सलूम्बर–डूँगरपुर की सीमा बनाती है। सोम कागदर बाँध (उदयपुर), सोम कमला अम्बा बाँध (डूँगरपुर)। देव सोमनाथ मंदिर (डूँगरपुर) सोम नदी किनारे स्थित है, इसे ‘वागड़ का वैभव’ कहा जाता है। सहायक नदियाँ — जाखम, गोमती, सारणी व टीडी।
- जाखम नदी ➜ उद्गम भंवरमाता की पहाड़ी (छोटी सादड़ी, प्रतापगढ़); प्रवाह प्रतापगढ़, सलूम्बर व डूँगरपुर; समापन बेणेश्वर (डूँगरपुर) से थोड़ा पहले लोरावल बिलूड़ा गाँवों के पास सोम नदी में। जाखम नदी सीतामाता अभयारण्य से बहती है। जाखम बाँध — छोटी सादड़ी (प्रतापगढ़); यह 81 मीटर ऊँचा बाँध है और राजस्थान का सबसे ऊँचा बाँध है; आदिवासी उपयोजना के तहत बना। [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक ड्राफ्टमैन सिविल 2025 — माही नदी की बायें किनारे वाली सहायक: अनास]
- अनास नदी ➜ उद्गम आसकोट गाँव (मध्यप्रदेश); राजस्थान में प्रवेश मनेली गाँव (बाँसवाड़ा) से; समापन बैसराउ गाँव के पास (कडाना बाँध से पहले) माही में। अनास का प्रवाह केवल बाँसवाड़ा जिले में है। सहायक नदी — हरण/हिरण। [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक मेंटनेंस ट्रेड 2025 — अनास एवं चाप माही की सहायक नदियाँ हैं]
- मोरेन नदी ➜ उद्गम डूँगरपुर जिले से; समापन गलियाकोट से थोड़ा पहले माही नदी में दांये किनारे पर; केवल डूँगरपुर जिले में बहती है
- भादर नदी ➜ राजस्थान के कांगुआ गाँव (डूँगरपुर) में उद्गम के बाद कडाना बाँध (गुजरात) के बाद माही में मिल जाती है
- चाप नदी (इरु/एराव) ➜ उद्गम प्रतापगढ़ की पहाड़ियों से; समापन केसरिया गाँव (बाँसवाड़ा) में माही में
3. लूनी नदी
- उपनाम ➜ सागरमति / सरस्वती / लवणवती (प्राचीन नाम), साक्री (पुष्कर में), आधी मीठी आधी खारी नदी, मारवाड़ की गंगा, अन्तःसलिला (कालिदास ने)
- उद्गम ➜ नाग पहाड़, आनासागर (अजमेर); उद्गम के बाद आनासागर झील से गुजरती है [परीक्षा: पशु परिचर S-4, 2024 — लूनी का उद्गम अजमेर के नाग पहाड़ से]
- उद्गम स्थल पर यह नदी अजमेर में सागरमती कहलाती है; गोविन्दगढ़ (अजमेर) में ‘सरस्वती’ नामक धारा मिलने के बाद इसका नाम लूनी हो जाता है
- प्रवाह क्षेत्र ➜ 7 जिले क्रमशः — अजमेर, नागौर, ब्यावर, जोधपुर, बालोतरा, बाड़मेर व जालौर [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक सोलर टेक्नीशियन 2025 — लूनी बेसिन में जोधपुर, सिरोही व पाली तीनों सम्मिलित]
- समापन ➜ कच्छ का रन (अरब सागर) [परीक्षा: महिला पर्यवेक्षक 2024 — कथन (I) और (II) दोनों सही]
- कुल लम्बाई ➜ 495 किमी; राजस्थान में ➜ 330 किमी
- यह पश्चिमी राजस्थान की सबसे लम्बी नदी है तथा अरावली के पश्चिम में बहने वाली प्रमुख नदी है
- लूनी नदी के प्रवाह क्षेत्र को ‘गौडवाड़ प्रदेश’ कहते हैं
- जलग्रहण क्षेत्र ➜ 34,250 वर्ग किमी; यह राजस्थान की दूसरी सर्वाधिक जलग्रहण क्षेत्र वाली नदी है [परीक्षा: सहायक सांख्यिकी अधिकारी 2024 — यह राजस्थान के कुल अपवाह क्षेत्र के 5.6 प्रतिशत भाग पर प्रवाहित होती है]
विशेष तथ्य
- लूनी की सर्वाधिक सहायक नदियाँ पाली जिले से आती हैं
- तिलवाड़ा सभ्यता ➜ बालोतरा, लूनी नदी किनारे। लूनी किनारे तिलवाड़ा में मल्लीनाथ पशु मेला लगता है, जो राजस्थान का प्राचीनतम पशु मेला है।
- लूनी का जल बालोतरा के बाद खारा हो जाता है, इसीलिए इसे ‘आधी मीठी आधी खारी’ नदी कहा जाता है
- लूनी राजस्थान की एकमात्र खारी नदी है
- जालौर जिले में लूनी नदी के बाढ़ के पानी को रेल/नाड़ा कहते हैं
- सेवज ➜ लूनी के प्रवाह क्षेत्र में कहीं-कहीं अस्थाई झीलें बन जाती हैं; इन झीलों के दलदली भाग में बीज बिखेर कर की जाने वाली खेती सेवज कहलाती है
- बालोतरा में बाढ़ ➜ बालोतरा कस्बा लूनी नदी के पेटे से नीचे बसा है। जब अरावली में पुष्कर की पहाड़ियों में तेज़ वर्षा होती है, तब लूनी का जलस्तर बढ़ जाता है और पानी बालोतरा कस्बे में घुस जाता है।
- किनारे के शहर ➜ गोविन्दगढ़ (अजमेर), बिलाड़ा (जोधपुर), बालोतरा, समदड़ी व तिलवाड़ा (बालोतरा)
- प्रदूषण का कारण ➜ पाली, जसोल, बालोतरा आदि स्थानों के रंगाई-छपाई उद्योगों के कारण लूनी का जल प्रदूषित होता है
- नागौर में जोजड़ी व लूनी के बहाव क्षेत्र में खुदाई से 13वीं सदी की कच्ची चारणियाँ निकली हैं
- लूनी बेसिन का विस्तार ➜ 12 जिलों में — पाली (12375 वर्ग किमी), जालौर (8824 वर्ग किमी), बाड़मेर (6623 वर्ग किमी), बालोतरा, अजमेर, ब्यावर, जोधपुर, नागौर, डीडवाना-कुचामन, राजसमंद, सिरोही व उदयपुर
- नोट ➜ लूनी व बनास ऐसी नदियाँ हैं, जो अरावली पर्वतमाला को मध्य से काटती हैं
4. लूनी की सहायक नदियाँ
| सहायक नदी | मिलने का स्थान |
|---|---|
| जोजड़ी | खेजड़ली खुर्द गाँव (जोधपुर) |
| लीलड़ी | पाली जिले की उत्तरी सीमा पर |
| बांडी | लाखर थम्ब गाँव (पाली–जोधपुर सीमा) |
| सुकड़ी | समदड़ी (बालोतरा) |
| जवाई | हेमागूड़ा गाँव (जालौर) |
| सगाई / सागी | गांधव गाँव (बाड़मेर) |
| मीठड़ी | मंगला गाँव (बालोतरा) |
- जोजड़ी नदी ➜ उद्गम पुंदलु गाँव (नागौर); नागौर व जोधपुर में बहती है; कुल लम्बाई 83 किमी। यह लूनी की एकमात्र सहायक नदी है जो दांयी ओर से मिलती है और मुख्यतः अरावली की पहाड़ियों से नहीं निकलती। खेजड़ली खुर्द (जोधपुर) के पास लूनी में मिलती है। पीपाड़ सिटी (जोधपुर) जोजड़ी नदी किनारे स्थित है।
- लीलड़ी ➜ उद्गम जवाजा (ब्यावर) से; समापन पाली जिले की उत्तर सीमा पर लूनी में
- बांडी (पाली वाली) ➜ उद्गम फुलाद गाँव की पहाड़ियाँ (पाली); बहाव पाली; पाली–जोधपुर की सीमा पर लाखर थम्ब गाँव में लूनी में मिलती है। आउवा कस्बा व पाली नगर बांडी किनारे। हेमावास बाँध (पाली के पास) बांडी नदी पर; इसके नीचे इसमें खारी नाम की एक छोटी नदी मिलती है। यह राजस्थान की सबसे प्रदूषित नदी मानी जाती है, जिसका कारण पाली का रंगाई-छपाई उद्योग है। सहायक — गुहिया व खारी।
- सुकड़ी नदी ➜ उद्गम अरावली की पश्चिमी ढाल, देसूरी के निकट (पाली); कुल लम्बाई 110 किमी; प्रवाह पाली, जालौर, बालोतरा; समदड़ी (बालोतरा) से थोड़ा पहले लूनी में मिलती है। सहायक — मघाई नदी (रणकपुर जैन मंदिर इसी के किनारे है)। बांकली बाँध — बांकली गाँव (जालौर)। यह नदी रानी कस्बा (पाली) के पास से गुजरती है। नोट — कई पुस्तकों में जालौर दुर्ग को सुकड़ी नदी किनारे बताया गया है, जो सही नहीं है; असल में जालौर शहर के पास से जवाई नदी गुजरती है। सायला गाँव (जालौर) में जवाई में खारी मिलने के बाद स्थानीय लोग इसे ‘सुकड़ी तृतीय’ भी कहते हैं।
- मीठड़ी ➜ उद्गम पाली जिले की अरावली की पश्चिमी ढाल से; समापन मंगला गाँव (बालोतरा) में लूनी में। मीठड़ी किनारे स्थित शहर — बाली (पाली), फालना (पाली)।
- सगाई / सागी ➜ उद्गम जसवंतपुरा की पहाड़ियाँ (जालौर); समापन गांधव गाँव (बाड़मेर) में लूनी में
- खारी नदी ➜ शेरगाँव की पहाड़ियों (सिरोही) से निकलती है; सिरोही व जालौर में बहती है; सायला गाँव (जालौर) में जवाई नदी में मिल जाती है
- गुहिया नदी ➜ उद्गम खारियानीव व थरसानी गाँवों के पास (सोजत तहसील, पाली) से अरावली की पहाड़ियों से; पाली के फेकरिया गाँव के पास बांडी नदी में मिल जाती है; बहाव केवल पाली जिले में
जवाई नदी
- उद्गम ➜ गोरिया गाँव (बाली, पाली); समापन ➜ हेमागूड़ा गाँव (जालौर) के निकट लूनी में
- प्रवाह ➜ पाली, सिरोही, जालौर व बाड़मेर
- यह लूनी की सबसे बड़ी सहायक नदी है
- सुमेरपुर कस्बे व जालौर शहर के पास से निकलती है; सुमेरपुर (पाली) व शिवगंज (सिरोही) कस्बों के मध्य से बहती है। पल्लाई गाँव (जालौर) के पास इसमें एक सुकड़ी नाम की छोटी नदी भी मिलती है। आहोर कस्बा (जालौर) जवाई नदी किनारे।
- जवाई बाँध ➜ सुमेरपुर (पाली); ‘मारवाड़ का अमृत सरोवर’ कहलाने वाला यह बाँध पश्चिमी राजस्थान का सबसे बड़ा बाँध है। निर्माण 1946 में जोधपुर महाराजा उम्मेद सिंह ने प्रारम्भ करवाया; प्रारम्भ में इंजीनियर एडगर व फर्ग्यूसन थे। आज़ादी के बाद 1956 में अभियंता मोतीसिंह की देखरेख में इसका निर्माण पूर्ण हुआ।
- जवाई बाँध को जलापूर्ति के लिए सेई नदी पर सेई बाँध (उदयपुर) बनाकर नहर व जल सुरंग द्वारा इसमें पानी लाया जाता है। यह राजस्थान की पहली जल सुरंग है, जो 6.7 किमी लम्बी है। 1977 में इससे पहली बार जवाई बाँध में पानी डाला गया था।
5. साबरमती, वाकल, सेई व पश्चिमी बनास
- साबरमती ➜ उद्गम पदराना की पहाड़ियाँ (उदयपुर)। कुल लम्बाई 416 किमी, राजस्थान में 45 किमी; इसका प्रवाह केवल उदयपुर जिले में है। समापन — खम्भात की खाड़ी (अरब सागर)। अहमदाबाद व गाँधीनगर इसी नदी के किनारे स्थित हैं। सहायक नदियाँ — वाकल, सेई, हरनाव, हाथमती, वेतरक, मधुमती, मेश्वा, शेढ़ी, माझम, खारी, मोसर व मेणा। गुजरात में आने के बाद यह भारत की सर्वाधिक दूषित नदी हो जाती है। देवास सुरंग — उदयपुर की झीलों में साबरमती का पानी डालने के लिए बनाई गई; यह राज्य की सबसे लम्बी जल सुरंग (11.6 किमी) है।
- वाकल ➜ कोटा गाँव की पहाड़ियों (गोगुंदा, उदयपुर) से निकलती है; मऊ पीपली नामक स्थान से गुजरात में प्रवेश कर साबरमती में मिल जाती है। वाकल अपनी सहायक नदी ‘मानसी’ में मिलकर ‘मानसी वाकल बेसिन’ बनाती है। मानसी वाकल बाँध — गोराण (झाड़ोल, उदयपुर); इस बाँध का पानी उदयपुर शहर में लाने के लिए 4.6 किमी लम्बी जल सुरंग बनाई गई, जो अलसीगढ़ से उदरा घाटी तक है। इस परियोजना में राजस्थान सरकार व हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड का 70:30 हिस्सा है; परियोजना 2007 में पूर्ण हुई।
- सेई नदी ➜ उद्गम पादरना गाँव की पहाड़ियाँ (उदयपुर); यह नदी गुजरात में प्रवेश कर साबरमती में मिल जाती है। सेई बाँध (उदयपुर) से जवाई बाँध (पाली) को जलापूर्ति के लिए 6.7 किमी लम्बी जल सुरंग बनी है, जो राजस्थान की पहली जल सुरंग है; 1977 में पहली बार यहाँ से जवाई बाँध में पानी डाला गया।
- पश्चिमी बनास ➜ उद्गम सनवारा की पहाड़ियाँ (सिरोही); यह नदी बनासकांठा जिले से गुजरात में प्रवेश कर कच्छ के रन में लुप्त हो जाती है; कुल लम्बाई 260 किमी। गुजरात का डीसा शहर व राजस्थान का आबू रोड इसी के किनारे हैं। सहायक नदियाँ — सुकली, सिपू, बतरिया, सेवरन, सुकेत, बलराम, खारी। पश्चिमी बनास बाँध — सिरोही में इसी नदी पर।
- सुकली नदी ➜ उद्गम सिलदरी की पहाड़ियाँ (सिरोही); आगे चलकर गुजरात की सीमा पर पश्चिमी बनास में मिल जाती है। सुकली-सेलवाड़ा बाँध परियोजना (सिरोही) सुकली पर निर्मित है।
