राजस्थान में वनों के प्रकार खेजड़ी एवं रोहिड़ा

राजस्थान में वनों के प्रकार – Rajasthan Geography Chapter 19

राजस्थान में वनों का वर्गीकरण वनस्पति के आधार पर भी किया जाता है — यानी किस क्षेत्र में कौन-सा वृक्ष प्रधान है। यहाँ प्रमुख वन प्रकार, उनके जिले, उपयोगी वृक्ष और परीक्षा में आ चुके बिंदु दिए गए हैं। अंत में तीन विशेष वृक्षों — चंदन, खेजड़ी और रोहिड़ा — का अलग विवरण है।

1. जलवायु के आधार पर वर्गीकरण

धरातलीय स्वरूप, जलवायु व मिट्टियों की भिन्नता के कारण राजस्थान में भौगोलिक दृष्टि से तीन प्रकार के वन मिलते हैं (स्रोत — राजस्थान का भूगोल, हरिमोहन सक्सेना व सामाजिक विज्ञान कक्षा-9 RBSE):

  1. उष्ण कटिबंधीय कंटीले वन (Tropical Thorn Forest)
  2. उष्ण कटिबंधीय शुष्क पतझड़ वाले वन (Tropical Dry Deciduous Forest)
  3. उपोष्ण पर्वतीय वन (Sub-tropical Hilly Forest)

2. उष्ण कटिबंधीय कंटीले वन

  • विस्तार ➜ पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश के शुष्क व अर्द्धशुष्क भागों में — मुख्यतः जैसलमेर, जोधपुर, फलौदी, बाड़मेर, बालोतरा, पाली, बीकानेर, चूरू, नागौर, डीडवाना-कुचामन, सीकर, झुंझुनूं
  • इन्हें मरुद्भिद (जीरोफाईट) भी कहते हैं
  • पहचान ➜ वनस्पति की ऊँचाई कम, पत्तियाँ छोटी, छाल मोटी और जड़ें गहरी होती हैं, ताकि ये कम पानी में लम्बे समय तक जीवित रह सकें
  • इनमें सर्वाधिक वृक्ष खेजड़ी के पाए जाते हैं
  • मुख्य वृक्ष ➜ खेजड़ी, रोहिड़ा, बबूल, बेर
  • मुख्य झाड़ियाँ ➜ फोग, आकड़ा, कैर, लाना, नागफणी [परीक्षा: पशु परिचर S-2, 2024 — धामण झाड़ी का प्रकार नहीं है]
  • प्रमुख घासें ➜ सेवण व धामण [परीक्षा: पशु परिचर S-3, 2024 — कंटीले वनों की सबसे प्रमुख घास: सेवाण]
  • [परीक्षा: CET 10+2 S-3, 2024 — बबूल, खैर व खेजड़ी उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन में; ये वन जैसलमेर में] [परीक्षा: पशु परिचर S-5, 2024 — बाँस इन वनों में नहीं पाया जाता]

3. उष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती (पतझड़) वन

  • ये राजस्थान के सर्वाधिक क्षेत्रफल में विस्तृत वन हैं
  • विस्तार ➜ राज्य के मध्य, दक्षिण व दक्षिण-पूर्वी भागों में
  • वर्षा ➜ 50 से 100 सेमी
  • वृक्षों की विभिन्नता के कारण इन्हें आगे कई उप-प्रकारों में बाँटा गया है, जो नीचे क्रमवार दिए हैं

(i) शुष्क सागवान वन (Dry Teak Forest)

  • अन्य नाम ➜ मानसूनी वन / चौड़ी पत्ती वन; इनमें सागवान वृक्ष की अधिकता होती है
  • विस्तार ➜ राजस्थान के दक्षिणी भाग में — मुख्यतः बाँसवाड़ा, डूँगरपुर, दक्षिणी उदयपुर, सलूम्बर, दक्षिणी चित्तौड़गढ़, कोटा, बारां व झालावाड़ [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक (सोलर टेक्नीशियन) 2025 — करौली में शुष्क सागवान वन नहीं]
  • सर्वाधिक सागवान वन ➜ बाँसवाड़ा में
  • इन वनों में सागवान की मात्रा 50 से 75 प्रतिशत के मध्य मिलती है
  • सागवान की लकड़ी कृषि औज़ारों व इमारती कार्यों के लिए बहुत उपयोगी है; फर्नीचर बनाने के लिए इसे सबसे अच्छा माना जाता है
  • सागवान अधिक सर्दी/पाला सहन नहीं कर पाता, इसलिए इनका विस्तार दक्षिणी क्षेत्रों में अधिक है; सागवान सीतामाता अभयारण्य में दिखाई देते हैं
  • ये वन 250–450 मीटर की ऊँचाई वाले क्षेत्रों में मिलते हैं
  • वृक्ष ➜ सागवान, खैर, तेंदू, धावड़ा, गुरजन, गोदंल, सिरिस, हल्दू, सेमल, रीठा, बहेड़ा व इमली
  • [परीक्षा: CET Graduation S-3, 2024 — “इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा 150 से 200 सेन्टीमीटर तक होती है” कथन सही नहीं है]

(ii) सालर वन / साल वन (बोसवालिया सेराता)

  • सालर वृक्षों की अधिकता के कारण इन वनों को यह नाम मिला
  • स्थिति ➜ अरावली पहाड़ी की उच्च श्रेणियों की कटक ढालों में 450 मीटर से अधिक ऊँचाई पर
  • उपयोग ➜ पैकिंग सामग्री, माचिस व गोंद के निर्माण में
  • ये वन गोंद का अच्छा स्रोत हैं
  • जिले ➜ उदयपुर, सलूम्बर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, सिरोही, अलवर, खैरथल-तिजारा, कोटपूतली-बहरोड़, जयपुर, अजमेर, ब्यावर, पाली व सीकर [परीक्षा: वरिष्ठ अध्यापक GK 2024 — अलवर, चित्तौड़गढ़, उदयपुर] [परीक्षा: पशु परिचर S-5, 2024 — जैसलमेर में सालर वन नहीं पाए जाते]
  • प्रमुख वृक्ष ➜ सालर, धोक, कठीरा व धावड़
  • इनकी लकड़ियों का प्रयोग पैकिंग बॉक्स बनाने में किया जाता है [परीक्षा: पशु परिचर S-6, 2024]
  • [परीक्षा: CET 10+2 S-5, 2024 — “टीक विशेष रूप से सिर्फ सालर वनों में प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला वृक्ष है” यह कथन असत्य है]

(iii) बाँस के वन

  • बाँस को ‘आदिवासियों का हरा सोना’ कहा जाता है
  • उपयोग ➜ कागज, टोकरी, चारपाई, झोंपड़ी व फर्नीचर निर्माण
  • उत्पादन वाले जिले ➜ बाँसवाड़ा, उदयपुर, सलूम्बर, चित्तौड़गढ़, कोटा, सिरोही व बारां [परीक्षा: CET 10+2 S-2, 2024 — बाँस का जंगल बाँसवाड़ा में]
  • प्रमुख वृक्ष ➜ धाकड़ा, सागवान, धोकड़ा
  • यह विश्व की सर्वाधिक तेज़ बढ़ने वाली घास है; राजस्थान में बाँस क्षेत्र 1874 वर्ग किमी है
  • राजस्थान वन (संशोधन) अधिनियम 2018 की धारा 2 के अंतर्गत बाँस प्रजाति को वृक्ष की परिभाषा से बाहर कर दिया गया, जिससे गैर-वन भूमि पर किसानों द्वारा बाँस उत्पादन को प्रोत्साहन मिलेगा
  • ध्यान रहे ➜ बाँसवाड़ा का नाम बाँस की अधिकता के कारण ही पड़ा है
  • [परीक्षा: पशु परिचर S-5, 2024 — बाँस राजस्थान के उष्णकटिबंधीय कांटेदार वनों में नहीं पाया जाता]

राष्ट्रीय बाँस मिशन: 2006-07 में बाँस की खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रारम्भ। 2015-16 में इसका नाम बदलकर राष्ट्रीय कृषि वानिकी एवं बाँस मिशन (NABM) कर दिया गया। यह योजना 100% भारत सरकार के सहयोग से संचालित है। इसके तहत किसानों को बाँस की खेती पर 8000 रुपये प्रति हैक्टेयर अनुदान दिया जा रहा है। वर्तमान में यह राजस्थान के 12 जिलों — बाँसवाड़ा, डूँगरपुर, प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, उदयपुर, सिरोही, भीलवाड़ा, राजसमंद, करौली, सवाईमाधोपुर, बारां, झालावाड़ — में संचालित है।

(iv) धोकड़ा वन

  • ये वन राजस्थान के सबसे बड़े क्षेत्र में पाए जाते हैं
  • 240 से 760 मीटर की ऊँचाई के मध्य अधिक मिलते हैं
  • जिले ➜ कोटा, बूँदी, सवाईमाधोपुर, जयपुर, अलवर, खैरथल-तिजारा, कोटपूतली-बहरोड़, अजमेर, ब्यावर, उदयपुर, राजसमंद व चित्तौड़गढ़
  • इनमें ‘धोंक’ वृक्ष की अधिकता होती है, इसलिए इन्हें धोंकड़ा वन भी कहा जाता है
  • धोंक की लकड़ी जलाने और कोयला बनाने के काम आती है; इसकी लकड़ी से कृषिगत औज़ार भी बनते हैं
  • प्रमुख वृक्ष ➜ धोंक, अरून्ज, खैर, खिरनी, सालर, गोंदल, पलाश, झड़बेर व अडूसा

(v) ढाक / पलाश / खाखरा वन

  • लाल सुर्ख फूलों के कारण इसे ‘फ्लेम ऑफ द फॉरेस्ट’ या ‘जंगल की ज्वाला’ कहा जाता है
  • वानस्पतिक नाम ➜ ब्यूटिया मोनोस्पर्मा
  • ये वन उन क्षेत्रों में फैले हैं जहाँ धरातल कठोर व पथरीला है; पहाड़ियों के मध्य जल पठारी धरातल पर बहुतायत में मिलते हैं। कंकरीले मैदानी क्षेत्रों में, जहाँ मिट्टी अपेक्षाकृत कम है, वहाँ भी ये मिलते हैं। [परीक्षा: पशु परिचर S-3, 2024 — केवल कथन a और d सही]
  • जिले ➜ अलवर, अजमेर, ब्यावर, सिरोही, उदयपुर, सलूम्बर, पाली, राजसमंद व चित्तौड़गढ़ [परीक्षा: पशु परिचर S-4, 2024 — जैसलमेर में पलाश वन नहीं पाए जाते]
  • इसका उपयोग प्राकृतिक रंगों के निर्माण में होता है; लकड़ी जलाने व कोयला निर्माण में काम आती है
  • यह उष्णकटिबंधीय / शुष्क पर्णपाती वनों का उप-प्रकार है [परीक्षा: पशु परिचर S-6, 2024] [परीक्षा: पशु परिचर S-2, 2024 — “यह वन राजस्थान के केवल पठारी क्षेत्र में पाये जाते हैं” कथन सही नहीं]

(vi) खैर वन

  • वानस्पतिक नाम ➜ अकेशिया कटेचु
  • कथौड़ी जाति के लोग तने की छाल व टुकड़ों को उबालकर हांडी प्रणाली से कत्था तैयार करते हैं [परीक्षा: CET Graduation S-1, 2024 — कत्था खैर पेड़ की आंतरिक लकड़ी से प्राप्त होता है]
  • ये वन राजस्थान के दक्षिणी पठारी भाग में हैं — झालावाड़, कोटा, बारां, चित्तौड़गढ़ व सवाई माधोपुर
  • कत्था का मुख्य उत्पादन ➜ उदयपुर, सलूम्बर, चित्तौड़गढ़
  • प्रमुख वृक्ष ➜ खैर, बेर, धोकड़ा व अरून्ज

(vii) बबूल वन

  • जिले ➜ गंगानगर, बीकानेर, नागौर, जालौर, अलवर, भरतपुर
  • अधिक नमी वाले क्षेत्रों में इनकी सघनता बढ़ जाती है; जहाँ धरातल में नमी कम है वहाँ इन वृक्षों की मात्रा कम रहती है
  • प्रमुख वृक्ष ➜ बबूल, नीम, हिंगोटा, अरून्ज, कैर व झड़बेर
  • [परीक्षा: CET 10+2 S-3, 2024 — बबूल, खैर और खेजड़ी प्रजाति के वृक्ष उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन क्षेत्र में पाए जाते हैं] [परीक्षा: CET 10+2 S-3, 2024 — उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन जैसलमेर में]

(viii) मिश्रित पर्णपाती वन

  • ये राजस्थान के दक्षिणी एवं दक्षिणी पूर्वी भाग में पाए जाते हैं — सिरोही, उदयपुर, सलूम्बर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, कोटा, बारां में विस्तार अधिक
  • प्रमुख वृक्ष ➜ आँवला, शीशम, सालर, तेंदू, अमलताश, रोहन, करंज, गूलर, जामुन, अर्जुन आदि
  • इन वनों में किसी एक वृक्ष की प्रधानता नहीं है; इनमें सभी प्रकार के वन पाए जाते हैं

4. उपोष्ण पर्वतीय वन

  • ये राजस्थान के न्यूनतम क्षेत्र वाले वन हैं
  • केवल सिरोही जिले के आबू पर्वतीय क्षेत्र में विस्तृत हैं; इन्हें अर्द्ध उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन भी कहा जाता है [परीक्षा: पशु परिचर S-4, 2024 — केवल माउंट आबू क्षेत्र में] [परीक्षा: Stenographer 2024 — माउंट आबू में उष्णकटिबंधीय वन नहीं]
  • इनमें सदाबहार व अर्द्धसदाबहार वनस्पति होती है; वृक्षों की सघनता अधिक और साल भर हरियाली बनी रहती है
  • राजस्थान के कुल वन क्षेत्र के आधे प्रतिशत से भी कम भाग पर ये मिलते हैं
  • 1000 मीटर से 1350 मीटर की ऊँचाई पर स्थित
  • वृक्ष ➜ आम, बाँस, नीम, सागवान [परीक्षा: CET 10+2 S-2, 2024 — उप-उष्णकटिबंधीय पहाड़ी वन में आम व नीम] [परीक्षा: CET 10+2 S-1, 2024 — “यह वन केवल राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं” कथन असत्य है]

5. तीन विशेष वृक्ष

चंदन वन

  • हल्दीघाटी व नाथद्वारा (राजसमंद) में

खेजड़ी

  • वानस्पतिक नाम ➜ प्रोसोपिस सिनेरेरिया
  • उपनाम ➜ राजस्थान का गौरव; शमी वृक्ष (पौराणिक ग्रंथों में); सीमलो (राजस्थानी में); राजस्थान का कल्पवृक्ष / थार का कल्पवृक्ष [परीक्षा: Stenographer 2024 व पशु परिचर S-1, 2024 — थार मरुस्थल का कल्पवृक्ष: खेजड़ी]
  • सिन्धी में छोकड़ा, पंजाबी व हरियाणवी में जांटी कहा जाता है
  • सर्वाधिक खेजड़ी वाला क्षेत्र ➜ शेखावाटी
  • फूल ➜ मींझर; पत्तियाँ ➜ लूम/लूंग; हरा फल ➜ सांगरी; सूखा फल ➜ खोखा (ग्रीष्म ऋतु में)
  • सर्वाधिक नुकसान पहुँचाने वाला कीड़ा ➜ सेलोस्टूना; कवक ➜ गाइनोट्रूमा
  • खेजड़ी की पूजा दशहरे पर होती है; इसका पूजन शीतला माता के प्रतीक के रूप में भी किया जाता है
  • लोकदेवता गोगाजी, केसरिया कुंवर व झुंझार जी का थान खेजड़ी वृक्ष के नीचे होता है
  • यह परमार व तोमर वंश का आराध्य वृक्ष है
  • राज्य वृक्ष ➜ 31 अक्टूबर 1983 को घोषित [परीक्षा: महिला पर्यवेक्षक 2024 व CET 10+2 S-4, 2024]
  • राज्य के लगभग 65% भाग (2/3 भाग) पर खेजड़ी पाई जाती है
  • 5 जून 1988 को खेजड़ी वृक्ष पर 60 पैसे की डाक टिकट जारी हुई
  • थार शोभा ➜ केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर द्वारा विकसित खेजड़ी की काँटे रहित किस्म
  • ऑपरेशन खेजड़ा ➜ 1991 में खेजड़ी वृक्ष को बचाने हेतु चलाया गया अभियान

खेजड़ली आंदोलन

  • मारवाड़ के शासक अभयसिंह के शासनकाल में 28 अगस्त 1730 ई. (भाद्रपद शुक्ल दशमी) को अमृता देवी विश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने खेजड़ी वृक्षों से चिपककर जोधपुर के खेजड़ली गाँव में बलिदान दिया। उस समय हाकिम गिरधरदास भंडारी थे। [परीक्षा: पशु परिचर S-1, 2024 — खेजड़ली आंदोलन राजस्थान से संबंधित]
  • इसमें अमृता देवी, उनके पति रामो जी विश्नोई तथा तीन पुत्रियाँ (आसू, भागू व रत्नी) भी शहीद हुईं
  • खेजड़ी वृक्ष को चिपको आंदोलन की प्रेरणा माना जाता है; चिपको आंदोलन 1973 में सुन्दरलाल बहुगुणा ने उत्तराखंड में टिहरी बाँध को लेकर चलाया
  • रामासनी ➜ 1604 ई. में जोधपुर के रामासनी गाँव में दो विश्नोई महिलाओं करमा व गोरा ने खेजड़ी की रक्षार्थ बलिदान दिया
  • पोलास (मेड़ता, नागौर) ➜ 1700 ई. में बूंचोजी ने वृक्ष रक्षार्थ अपनी गर्दन कटवा दी
  • खेजड़ली वृक्ष मेला ➜ विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला, प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल दशमी को। 12 सितम्बर 1978 को पहली बार खेजड़ली दिवस मनाया गया
  • खेजड़ली शहीद स्मारक ➜ लोकार्पण 3 जून 2021
  • खेजड़ली शहीदी राष्ट्रीय पर्यावरण संस्थान ➜ जोधपुर की लूणी तहसील के गाँव खेजड़ली कलां में
  • खड़ाना (साका) ➜ विश्नोई सम्प्रदाय द्वारा वृक्षों को बचाने हेतु प्राणोत्सर्ग की परम्परा
  • काकापुरी (पेड़ वाले बाबा) ➜ भिवाड़ी (खैरथल-तिजारा) में पेड़ों को बचाने के प्रयासरत
  • संत राजाराम ➜ वृक्षारोपण का संदेश देने वाले संत
  • माटो ➜ बीकानेर के राज्यचिह्न में खेजड़ी वृक्ष दर्शाया गया है, जिसे माटो कहा जाता है
  • लोक संत जाम्भोजी ने वृक्ष व वन्यजीव रक्षा का संदेश दिया

रोहिड़ा

  • वानस्पतिक नाम ➜ टिकोमेला अन्डुलेटा
  • उपनाम ➜ रेगिस्तान/मरुस्थल का सागवान, मरुटीक, राजस्थान की मरुशोभा
  • राज्य पुष्प ➜ 31 अक्टूबर 1983 को घोषित [परीक्षा: Reet L-1, 2025 — राजस्थान का राज्य पुष्प रोहिड़ा] [परीक्षा: CET 10+2 S-2, 2024 — राज्य पुष्प और इमारती लकड़ी देने वाला वृक्ष भी: रोहिड़ा]
  • रोहिड़े के फूल जोधपुर में ‘मारवाड़ टीक’ के नाम से जाने जाते हैं; इसकी लकड़ी से फर्नीचर बनता है और यह पश्चिमी राजस्थान में सर्वाधिक पाया जाता है
  • ‘जरविल’ नामक रेगिस्तानी चूहे से रोहिड़ा वृक्ष को सर्वाधिक नुकसान पहुँच रहा है

6. प्रमुख वंश व उनके आराध्य वृक्ष

वंशआराध्य वृक्ष
परमार वंशखेजड़ी
तोमर वंशखेजड़ी
कछवाहा वंशवट
चौहान वंशपीपल
राठौड़ वंशनीम
यादव वंशकदम्ब
हाड़ा वंशअशोक / आसापाला

7. राजस्थान के राज्य प्रतीक

  • राज्य पशु ➜ चिंकारा व ऊँट
  • राज्य पक्षी ➜ गोडावण
  • राज्य वृक्ष ➜ खेजड़ी
  • राज्य पुष्प ➜ रोहिड़ा
  • रामसर स्थल ➜ 2 (केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान व सांभर झील)

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