यह अध्याय का अंतिम भाग है — मरुस्थलीकरण की पूरी प्रक्रिया, भूमि से जुड़ी राजस्थानी शब्दावली, राज्य के भूमि सुधार कानून और संबंधित योजनाएँ। अंत में इस पूरे अध्याय से परीक्षाओं में आ चुके प्रश्नों की सूची भी दी गई है।
1. मरुस्थलीकरण — मूल अवधारणा
- मरुस्थल का अर्थ ➜ मृत-भूभाग; वह भू-भाग जिसमें सतही जल का अभाव हो और मिट्टी में जैविक तत्वों व नमी का अभाव पाया जाता हो
- मरुस्थलीकरण ➜ एक क्रमबद्ध परिघटना, जिसमें मानव द्वारा भूमि उपयोग पर दबाव के कारण परिवर्तन होने से पारितन्त्र का अवनयन होता है; उर्वर भूमि अनुर्वर मरुभूमि में बदल जाती है
- मेन (MANN) के अनुसार ➜ मरुस्थलीकरण जलवायवीय, मृदीय तथा जैविक कारकों की अन्तःक्रिया से उत्पन्न होता है
- वनों की अनियंत्रित कटाई व पशुधन की अधिकता से भूमि पर जैविक दबाव पड़ता है, जिससे मरुस्थलीकरण को बढ़ावा मिलता है
- वैज्ञानिकों के अनुमान में 20वीं शताब्दी के अंत तक सहारा मरुस्थल का विस्तार 20 प्रतिशत बढ़ गया; इसी प्रकार थार भी प्रतिवर्ष 13,000 एकड़ भूमि निगल जाता है
- काजरी (केन्द्रीय शुष्क अनुसंधान केन्द्र) के शोध के अनुसार ➜ रेगिस्तान का कुल क्षेत्रफल 2 लाख वर्ग किमी था, जो वर्तमान में 9 हजार वर्ग किमी और बढ़ गया है। विस्तार पूर्व व उत्तर दिशा में हो रहा है और राज्य का लगभग 67% भाग मरुस्थलीकरण की चपेट में है।
2. मरुस्थल का उद्भव व विस्तार
- भू-गर्भिक प्रमाण दर्शाते हैं कि पर्मो-कार्बोनिफेरस काल में पश्चिमी राजस्थान में विस्तृत समुद्र था
- जुरैसिक, क्रिटेशियस और इयोसीन भू-गर्भिक युगों में यह क्षेत्र समुद्र के नीचे था; धीरे-धीरे समुद्र खिसकने लगा
- प्लीस्टोसीन काल में यहाँ मनुष्यों का प्रादुर्भाव हुआ; ईसा पूर्व 4000 से 1000 वर्ष के मध्य पूर्ण मरुस्थलीय दशाओं का विकास हो गया
- यहाँ विद्यमान खारे पानी की झीलों को समुद्रों का अवशेष माना जाता है
- नाचना गाँव (जैसलमेर) ➜ रेगिस्तानी प्रसार के लिए जाना जाता है
- राष्ट्रीय कृषि आयोग ने राजस्थान के 12 जिलों को मरुस्थलीय माना; जिलों के पुनर्गठन के बाद 16 जिले मरुस्थलीय हैं
- सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र ➜ पश्चिमी राजस्थान — जैसलमेर, बाड़मेर, बालोतरा, फलोदी, जोधपुर व बीकानेर [परीक्षा: JR Instructor (ESR) 2024 — मरुस्थलीकरण से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र: पश्चिमी]
- सर्वाधिक विस्तार वाले दर्रे ➜ मिठड़ी, बर व सांभर
- मरुस्थल के विस्तार को रोकने के लिए जोधपुर में केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान केन्द्र ‘काजरी’ (CAZRI) की स्थापना की गई
मरुस्थल की विशेषताएँ
- तापमान प्रतिकूलता में अधिकता, वनस्पति का अभाव, पशु चारे की कमी, मृदा में उर्वरता की कमी, जीवों का अभाव, आवश्यकता से कम वर्षा, जलाऊ ईंधन का अभाव
3. मरुस्थलीकरण के प्रमुख कारण
- मानव जनित ➜ भूजल का अंधाधुंध दोहन; अनियंत्रित पशु चारण; वृक्षों की अंधाधुंध कटाई; ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन व नगरीकरण; भूमि उपयोग में परिवर्तन; जनसंख्या दबाव; संसाधनों का अत्यधिक दोहन; प्राकृतिक संसाधनों का कुप्रबन्धन
- भौतिक ➜ मूल कारण पश्चिमी राजस्थान में वर्षा का कम होना, जिससे बार-बार सूखा व अकाल पड़ता है; धूल भरी आँधियों का चलना; मृदा का अत्यधिक अपरदन; भूमि में नमी की कमी; जलवायु परिवर्तन (उच्च तापमान व न्यून वर्षा); वाष्पीकरण की तीव्रता; भूजल स्तर में गिरावट [परीक्षा: Junior Instructor (Workshop) 2024 — जलवायु, कम वनस्पति, जनसंख्या वृद्धि, अनियंत्रित पशुचारण व सूखा — सभी कारण सही]
4. रोकने के उपाय व पर्यावरणीय प्रभाव
- सिंचाई के साधनों का विकास; खेजड़ी, रोहिड़ा, कीकर, जोजोबा, फोग, बेर, नीम जैसे मरुभूमि-अनुकूल वृक्षों की खेती को बढ़ावा
- वायुरोधी वृक्षारोपण पट्टी लगाई जानी चाहिए; पशुओं की चराई नियंत्रित हो
- लकड़ी व कोयले पर निर्भरता कम कर ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत विकसित करना
- बालूका स्तूपों के स्थिरीकरण के उपाय; भूमिगत जल संसाधनों का समुचित उपयोग; शुष्क कृषि पद्धति को बढ़ावा; वनोन्मूलन पर नियंत्रण; बूँद-बूँद व फव्वारा सिंचाई; नागरिक चेतना
- कुछ स्थानों पर सूबबूल (लूसियाना ल्यूकोसेफला) का रोपण भी किया जा रहा है [परीक्षा: JR Instructor (ESR) 2024 — मरुस्थलीकरण रोकने में सहायक नहीं: रेतीली व क्षारीय बंजर भूमि का उपयोग न किया जाए]
- प्रभाव ➜ वनों का तीव्र विनाश; भूमिगत जलस्तर में अत्यधिक गिरावट; निरन्तर अकाल की संभावना; कृषि योग्य भूमि का कम होना; खाद्यान्न उत्पादन में कमी; चारागाहों में कमी; जलाऊ ईंधन में कमी; अरावली की वायु घाटियों से मरुस्थल का पूर्व में विस्तार
5. UNCCD एवं अंतर्राष्ट्रीय पक्ष
- UNCCD ➜ संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम कन्वेंशन; गठन 1994 में पेरिस में; इसमें 197 देश शामिल
- भारत ने 14 अक्टूबर 1994 को इस अभिसमय पर हस्ताक्षर किए
- 17 जून ➜ विश्व मरुस्थलीकरण रोकथाम दिवस (WDCD); 1995 से मनाया जाने लगा
- 2024 की थीम ➜ भूमि के लिए एकजुट: हमारी विरासत, हमारा भविष्य
- 2010-20 दशक ➜ मरुस्थलीकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र दशक के रूप में मनाया गया
- UNCCD COP-16 ➜ 16वाँ सत्र वर्ष 2024 में रियाद (सऊदी अरब) में, 2 से 13 दिसम्बर 2024 के मध्य। इसमें श्याम सुन्दर ज्याणी (बीकानेर) को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। विषय — हमारी भूमि, हमारा भविष्य।
- ईशा फाउंडेशन के साथ एमओयू ➜ उपजाऊ मिट्टी के मरुस्थलीकरण को रोककर और उलट कर मिट्टी बचाने की पहल के लिए कृषि विभाग राजस्थान ने समझौता किया। ऐसा समझौता करने वाला राजस्थान देश का दूसरा राज्य है (प्रथम — गुजरात)।
6. भूमि से सम्बन्धित शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बीड़ भूमि | नदी नालों के पास की भूमि |
| माल भूमि | काली उपजाऊ भूमि |
| हकत माल | जोती जाने वाली भूमि |
| पीवल भूमि | तालाबों और कुओं द्वारा सिंचित भूमि |
| तलाई भूमि | तालाब के पेटे की भूमि, जिसमें बिना सिंचाई फसल होती है |
| चाही भूमि | राजस्व की दृष्टि से कुएँ द्वारा सिंचित भूमि |
| मगरा भूमि | पहाड़ी क्षेत्र की भूमि |
| बारानी भूमि | असिंचित भूमि जो वर्षा पर निर्भर हो |
| बंजर/बंजड़ भूमि | बेकार भूमि जिसे कृषि योग्य नहीं बनाया जा सकता — ऊँचे पर्वत, पथरीली भूमि, दलदल |
| कृषि योग्य व्यर्थ भूमि | बेकार पड़ी वह भूमि जिसे कृषि योग्य बनाया जा सकता है |
| चारागाह/चरणोत | पशुओं के चरने या चारा उगाने के लिए छोड़ी सार्वजनिक भूमि |
| उद्यान भूमि | जिस पर फलदार वृक्ष उगाए जाते हैं |
| परती/पड़त भूमि | कृषि योग्य होते हुए भी जिस पर कृषि नहीं की जाती |
| वर्तमान परती भूमि | उपजाऊपन बढ़ाने के लिए एक या दो वर्ष खाली छोड़ी गई भूमि |
| पुरानी परती भूमि | 5 वर्षों तक कृषि न की गई भूमि |
| बनी/बणी | सरकार द्वारा ईंधन या पशु चराई के लिए छोड़ी गई भूमि |
| डहरी | प्राकृतिक रूप से बाढ़ के पानी से सिंचित भूमि |
| चिकनोट | कठोर व चिकनी उपजाऊ मिट्टी |
| मटियार | चिकनी मिट्टी, जिसमें कुछ बालू मिली होती है |
| वन भूमि | प्राकृतिक वनस्पति से ढका भू-भाग; राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य व आखेट निषिद्ध क्षेत्र इसी में |
| पणो | तालाब व खड्डों में पानी सूखने पर ऊपर जमी उपजाऊ मिट्टी की परत |
| रेह | मिट्टी के ऊपर सफेद लवणीय बालू जम जाना |
| अमीन | भू-राजस्व निर्धारण करने वाला कर्मचारी |
| आमिल | माल गुजारी या भू-राजस्व वसूल करने वाला |
| बीघा | ज़मीन का माप — 1 एकड़ के 5/8 भाग के बराबर या 20 बिस्वा |
| बिश्वेदार | भूस्वामी या जमींदार |
| मालगुजारी | रियासती काल में लिया जाने वाला भू-राजस्व या लगान |
| बिघोरी | प्रति बीघा लिया जाने वाला कर |
| चक | ज़मीन का एक भाग |
| गिरदावरी | वह नक्शा जो खेत की सीमा प्रदर्शित करता है व कृषि उपज का विवरण देता है |
| खसरा | खेत का रजिस्टर, जिसमें सभी आवश्यक सूचनाएँ होती हैं |
| खुदकाश्त | वह कृषि क्षेत्र जो स्वयं भू-स्वामी द्वारा काश्त किया जाता हो |
| चड़स | चमड़े की बाल्टी/डोल |
| लाव | सन का मोटा रस्सा, जिससे चड़स को कुएँ से खींचा जाता है |
7. प्रमुख भूमि सुधार कानून
- राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 ➜ 15 अक्टूबर 1955 को लागू; वर्ष 2020 से 15 अक्टूबर को ‘राजस्व दिवस’ मनाने की घोषणा (स्रोत — सुजस, अगस्त 2022)
- राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम ➜ कृषि भूमि का सुव्यवस्थित रिकॉर्ड रखने के उद्देश्य से 23 मई 1956 को पारित; इससे किसानों को अपनी भूमि पर हक मिला
- राजस्थान भूमि सुधार व जागीरदारी पुनर्ग्रहण अधिनियम 1952
- राजस्थान जागीरदारी व बिश्वेदारी उन्मूलन अधिनियम 1959
बंजर भूमि के आँकड़े
- क्षेत्रफल की दृष्टि से सर्वाधिक बंजर भूमि वाला जिला ➜ जैसलमेर
- प्रतिशत की दृष्टि से सर्वाधिक ➜ जैसलमेर (54.08%)
- प्रतिशत की दृष्टि से न्यूनतम ➜ हनुमानगढ़ (0.17%)
- सर्वाधिक परती भूमि वाला जिला ➜ जोधपुर (स्रोत — कृषि सांख्यिकी 2020-21)
8. प्रमुख योजनाएँ व बोर्ड
- समेकित बंजर भूमि विकास कार्यक्रम ➜ केंद्र सरकार ने 1989-90 में शुरुआत की; राजस्थान के 10 जिलों (जयपुर, सीकर, जोधपुर, टोंक, उदयपुर, अजमेर, भीलवाड़ा, झालावाड़, जैसलमेर व पाली) में 1992-93 में प्रारम्भ। इसे ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज विभाग के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है। उद्देश्य — पर्यावरण संतुलन बनाए रखना व वनों की कटाई पर रोक।
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना ➜ 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़ से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रारम्भ। केंद्र का 75% तथा राज्य का 25% हिस्सा। ध्येय वाक्य — स्वस्थ धरा, खेत हरा। खेतों से मिट्टी के नमूने लेकर विश्लेषण कर कार्ड जारी होता है, जिसका प्रति 2 वर्ष पर नवीनीकरण होता है। उद्देश्य — मिट्टी की गुणवत्ता जाँचना, पोषक तत्वों की जानकारी देना और कृषि उत्पादकता बढ़ाना।
- राजस्थान बंजर भूमि एवं चारागाह विकास बोर्ड ➜ 22 दिसम्बर 2016 को ‘राजस्थान बंजर भूमि विकास बोर्ड’ का नाम परिवर्तन कर यह किया गया [परीक्षा: महिला पर्यवेक्षक 2024 — पुनर्गठन वर्ष 2016]। 11 फरवरी 2022 को बोर्ड का पुनर्गठन हुआ। जिला, ब्लॉक एवं ग्राम पंचायत स्तर पर समितियों का गठन किया गया। राज्य के 8 जिलों — कोटा, बारां, बूँदी, झालावाड़, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर एवं बीकानेर — में ITI एवं RFES के समन्वय से त्रिस्तरीय समितियों के सदस्यों की क्षमता अभिवर्धन एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
- राजस्थान SDG स्थिति रिपोर्ट 2023 ➜ मरुस्थलीकरण से निपटने एवं निम्नीकृत भूमि व मिट्टी को बहाल करने का लक्ष्य 2030 तक निर्धारित [परीक्षा: पुरालेखपाल परीक्षा 2024]
9. प्रतियोगी परीक्षाओं में आए प्रमुख प्रश्न
- खादर और बांगर किस मृदा के उदाहरण हैं? ➜ जलोढ़ (Reet L-2, 2025)
- जयपुर, दौसा और अलवर में किस मृदा की प्रधानता है? ➜ अल्फीसोल्स (RAS Pre, 2025)
- पवन अपरदन नियंत्रण हेतु सर्वाधिक उपयुक्त विधि? ➜ सीढ़ीदार कृषि (कनिष्ठ अनुदेशक सोलर, 2025)
- सोयाबीन के लिए सर्वोपयुक्त मृदा? ➜ काली (कनिष्ठ अनुदेशक सोलर, 2025)
- ‘रेंगती मृत्यु’ शब्द किसके लिए? ➜ मृदा और उसकी उर्वरता का ह्रास (कनिष्ठ अनुदेशक मेंटनेंस, 2025)
- पश्चिमी राजस्थान में पाई जाने वाली मृदा? ➜ मरुस्थलीय (पशु परिचर S-6, 2024)
- मरुस्थलीय मृदा किस क्षेत्र में नहीं? ➜ कोटा (पशु परिचर S-5, 2024)
- काली मृदा कहाँ? ➜ झालावाड़ (पशु परिचर S-5, 2024)
- गंगानगर, हनुमानगढ़, अलवर, भरतपुर, जयपुर व टोंक में? ➜ जलोढ़ मृदा (पशु परिचर S-4, 2024)
- सूची सुमेलन ➜ लाल पीली–लौह अंश, मरुस्थली–जल धारण कम, काली–चीका प्रधान, जलोढ़–रेतीली दोमट (पशु परिचर S-3, 2024)
- भूरी मृदाएँ मुख्यतः कहाँ? ➜ उपर्युक्त सभी (Junior Instructor Electrician, 2024)
- किस जिले में प्रधानतः जलोढ़ नहीं? ➜ बीकानेर (JR Instructor CLIT, 2024)
- लवणीयता व क्षारीयता का समाधान? ➜ जिप्सम (Junior Instructor Workshop, 2024)
- लाल लोमी मिट्टी कहाँ? ➜ उदयपुर, डूँगरपुर (रसायनज्ञ विज्ञान, 2024)
- बनास जलग्रहण क्षेत्र में सर्वाधिक? ➜ मिश्रित लाल एवं पीली (अनुसंधान अधिकारी, 2024)
- जिप्सीफेरस मृदा के वृहत क्षेत्र? ➜ बीकानेर (अनुसंधान विज्ञान, 2024)
- लाल रेतीली मिट्टी किन जिलों में? ➜ जोधपुर, चुरू, झुंझुनूं (पुरालेखपाल, 2024)
- बंजर भूमि विकास बोर्ड का पुनर्गठन कब? ➜ 2016 (महिला पर्यवेक्षक, 2024)
