राजस्थान की मिट्टी से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती अपरदन है — राज्य का लगभग दो तिहाई भाग इससे ग्रसित है। इस भाग में अपरदन के तीनों प्रकार, उनके आँकड़े, कारण, हानियाँ और उपाय हैं; साथ ही लवणीयता, सेम और भूमि अवनयन जैसी जुड़ी हुई समस्याएँ भी। परीक्षा में आ चुके बिंदुओं पर परीक्षा का नाम साथ में दिया गया है।
1. मृदा अपरदन — मूल बातें
- मिट्टी के अपरदन को ‘मिट्टी की रेंगती हुई मृत्यु’ व ‘कृषि का क्षय रोग’ कहा जाता है [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक (मेंटनेंस ट्रेड) 2025 — ‘रेंगती मृत्यु’ शब्द मृदा और उसकी उर्वरता के ह्रास को दर्शाने के लिए प्रयुक्त होता है]
- मृदा अपरदन को ‘कृषि का पहला शत्रु’ भी कहते हैं
- राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग दो तिहाई भाग (62.06%) मिट्टी अपरदन की समस्या से ग्रसित है
तीन प्रकार
- वायु अपरदन — राजस्थान में सर्वाधिक
- जल अपरदन
- वनस्पति क्षरण
एटलस और आँकड़े
- 17 जून 2021 को विश्व मरुस्थलीकरण रोकथाम दिवस पर ‘मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण एटलस’ का नवीन संस्करण जारी हुआ
- प्रकाशक ➜ अहमदाबाद स्थित स्पेस एप्लीकेशन सेंटर
- वर्ष 2018-19 में राजस्थान का 62.06% भाग (21.23 मिलियन हैक्टेयर) मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण से गुजर रहा था
- सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया ➜ पवन क्षरण (अपरदन)
| प्रक्रिया (2018-19) | प्रतिशत |
|---|---|
| पवन क्षरण (Wind Erosion) | 43.37% |
| वनस्पति क्षरण (Vegetation Degradation) | 7.64% |
| जल कटाव (Water Erosion) | 6.21% |
स्रोत — Desertification and Land Degradation Atlas, जून 2021
2. वायु अपरदन
- क्या ➜ पश्चिमी राजस्थान में वायु की गति तेज़ होने पर मिट्टी एक स्थान से उड़कर दूसरे स्थान पर जमा हो जाती है; इसे वायु अपरदन / क्षैतिज / परत अपरदन कहते हैं
- वनस्पति का अभाव इसे तीव्रता देता है; मरुस्थलीय क्षेत्र में रेत असंगठित होने से आसानी से स्थानान्तरित हो जाती है
- राजस्थान का 43.37% भाग वायु अपरदन से ग्रसित
- प्रभावित जिले ➜ बाड़मेर, बालोतरा, जोधपुर, फलौदी, जालौर, जैसलमेर, पाली, नागौर, डीडवाना-कुचामन, बीकानेर, चूरू, झुंझुनूं, सीकर तथा समीपवर्ती क्षेत्र
- सर्वाधिक वायु अपरदन वाला जिला ➜ जैसलमेर
- न्यूनतम ➜ धौलपुर
- सर्वाधिक वायु अपरदन वाला माह ➜ जून
- सर्वाधिक वायु अपरदन सूचकांक ➜ जैसलमेर (480 प्रतिशत)
- अति निम्न सूचकांक (1–14%) ➜ सीकर, सांभर, अजमेर व एरिनपुरा
- [परीक्षा: Assi. Pro. G.K. (संस्कृत विभाग) 2024 — एटलस के अनुसार 2003-05 से 2011-13 के बीच सर्वाधिक नकारात्मक परिवर्तन वायु अपरदन द्वारा मरुस्थलीकरण/भूमिक्षरण में देखा गया]
3. जल अपरदन
- क्या ➜ जल के बहाव के साथ मिट्टी का अपरदन
- राजस्थान की लगभग 4 लाख हैक्टेयर भूमि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित
- सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र ➜ चम्बल का प्रदेश, जहाँ चम्बल व उसकी सहायक नदियों ने हजारों हैक्टेयर कृषि भूमि को बीहड़ों में बदल दिया
- सम्पूर्ण हाड़ौती का पठार जल अपरदन से प्रभावित है
- सर्वाधिक जल अपरदन वाला जिला ➜ कोटा; संभाग ➜ कोटा संभाग
अवनालिका / लम्बवत अपरदन
- जल का तीव्र प्रवाह जब मिट्टी को एक स्थान से गहराई से काटकर (नालीनुमा कटाव) दूसरे स्थान पर बहा ले जाता है
- सर्वाधिक अवनालिका अपरदन वाली नदी ➜ चम्बल; जिला ➜ कोटा
- गहरे अपरदन से बनी आकृतियाँ बीहड़ या उत्खात स्थलाकृति कहलाती हैं
- राजस्थान में बीहड़ भूमि से प्रभावित कुल क्षेत्रफल ➜ 451700 हैक्टेयर
| नदी | जिले | हैक्टेयर |
|---|---|---|
| चंबल | कोटा, बूँदी, सवाई माधोपुर, भरतपुर | 1,30,000 |
| कालीसिंध | कोटा | 40,000 |
| पार्वती | कोटा | 40,000 |
| बनास | सवाई माधोपुर, टोंक, भीलवाड़ा | 40,000 |
| पाँचना | सवाई माधोपुर | 30,000 |
| बीहड़ प्रभावित जिला | हैक्टेयर |
|---|---|
| कोटा | 1,32,600 |
| सवाई माधोपुर | 1,30,000 |
| बूँदी | 86,000 |
| भरतपुर | 53,000 |
- बीहड़ से सर्वाधिक प्रभावित जिले ➜ कोटा, सवाईमाधोपुर, बूँदी, भरतपुर
- न्यूनतम प्रभावित ➜ बाँसवाड़ा
- चादरी अपरदन ➜ वर्षा के समय निर्जन पहाड़ियों की मिट्टी जल के साथ बह जाती है, जिससे भूमि की ऊपरी परत के उर्वरा तत्व हट जाते हैं; इसे आवरण अपरदन भी कहते हैं। सर्वाधिक ➜ सिरोही एवं राजसमंद
4. मृदा अपरदन के कारण
मानव जनित
- वनोन्मूलन ➜ पौधों की जड़ें मृदा को बाँधे रखकर अपरदन रोकती हैं और पत्तियाँ-टहनियाँ गिरकर ह्यूमस बढ़ाती हैं; वनों के विनाश से अपरदन तीव्र होता है [परीक्षा: पशु परिचर S-1, 2024 — वनोन्मूलन हानिकारक है क्योंकि यह मृदा-अपरदन बढ़ाता है]
- अत्यधिक पशु चारण ➜ चारागाहों में भेड़-बकरी अधिक होने से वनस्पति अंतिम बिन्दु तक चर ली जाती है
- झूमिंग कृषि ➜ पहाड़ी ढालों के वन काटकर कृषि योग्य बनाना; नग्न भूमि में तेज़ी से अपरदन
- अवैज्ञानिक ढंग से कृषि ➜ ढालू क्षेत्रों में समोच्च रेखाओं के समानान्तर जुताई न करना
- दोषयुक्त फसल चक्र, भूमि उपयोग में परिवर्तन, अत्यधिक सिंचाई
भौतिक कारण
- वर्षा पूर्व मरुस्थलीय तेज़ अंधड़ — रेगिस्तानी क्षेत्रों में प्रमुख कारण
- ग्रीष्मकाल में चलने वाली तेज़ आँधियाँ
- बाढ़ व भूस्खलन
- [परीक्षा: JR Instructor (ESR) 2024 — मृदा अपरदन का प्रत्यक्ष कारण नहीं है: वैश्विक तापमान वृद्धि]
5. हानियाँ एवं रोकथाम
- हानियाँ ➜ भूमि की उर्वरता व कृषि उत्पादकता में कमी; आकस्मिक बाढ़ें; नदियों के तल में बालू जमा होने से धारा में परिवर्तन; गड्ढों के बनने व किनारों के क्षरण से खेती योग्य भूमि कम होना; मरुस्थल का प्रसार; सूखा व बाढ़ का प्रकोप बढ़ना
- उपाय ➜ ढालों की कृषि योग्य भूमि पर खेती रोकना; पशु चराई नियंत्रित करना; शुष्क व अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में वृक्षों की मेखला बनाकर बालू के टीलों का प्रसार रोकना; वनों की अनियंत्रित कटाई रोककर पहाड़ी ढालों व नदियों के किनारे पौधारोपण; फसल चक्र अपनाना; खेतों में मेड़बंदी; छोटे एनीकट (चैकडेम); समोच्च जुताई (Contour Ploughing); झूमिंग कृषि पर रोक; चारागाहों का विकास [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक (सोलर टेक्नीशियन) 2025 — पवन अपरदन नियंत्रण हेतु सर्वाधिक उपयुक्त संरक्षण विधि: सीढ़ीदार कृषि]
6. लवणीयता व क्षारीयता
- सामान्य मृदा ➜ PH मान 7 से 7.5 के बीच; सूक्ष्म जीवों की क्रियाशीलता अधिक
- अम्लीय मिट्टी (Acidic) ➜ PH 7 से कम; अधिक वर्षा वाले स्थानों में; कच्चे जीवांश के सड़ने से कार्बन डाइ-ऑक्साइड पानी के साथ मिलकर कार्बोनिक अम्ल बनाती है। समाधान — चूने का प्रयोग, जिससे हाइड्रोजन आयन बाहर आ जाते हैं
- क्षारीय मिट्टी (Alkaline) ➜ PH 7 से अधिक; इसे लवणीय / क्षारीय / रेह / ऊसर / कल्लर / थूर / राँकड़ / नमकीन मिट्टी कहते हैं। इसमें सोडियम कार्बोनेट, सल्फेट, क्लोराइड, कैल्शियम व मैग्नीशियम पाए जाते हैं
- राजस्थान के पश्चिमी भाग में लवणीयता की समस्या सर्वाधिक है
- लगभग 7.2 लाख हैक्टेयर भूमि लवणीयता एवं क्षारीयता से प्रभावित — जोधपुर, पाली, भीलवाड़ा, नागौर, जयपुर, अजमेर, बीकानेर, भरतपुर, टोंक, सिरोही, अलवर, चित्तौड़गढ़
- समाधान ➜ जिप्सम व गोबर की खाद का प्रयोग; बरसीम, चावल, गन्ना जैसी लवणरोधी फसलें [परीक्षा: Junior Instructor (Workshop) 2024 — लवणीयता एवं क्षारीयता का समाधान: जिप्सम]
- जिप्सम ➜ प्राकृतिक खनिज; इसमें 16 से 19% कैल्शियम एवं 13 से 16% सल्फर होता है। केन्द्रीय प्रवृतित योजनाओं के अंतर्गत किसानों को जिप्सम पर 50% अनुदान देय है। तिलहनी, दलहनी एवं गेहूँ में 250 किलो प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग होता है।
7. सेम / जलाधिक्यता की समस्या
- कारण ➜ रेतीले मरुस्थल में ज़मीन के नीचे चूने पत्थर की विशाल चट्टानें हैं, जिससे नहरों व नदियों से रिसने वाला पानी अधिक गहराई तक नहीं जा पाता और दलदल बन जाता है
- शुष्क जलवायु में केशिका क्रिया (Capillary Action) नमक को ऊपर लाती है, जिससे पश्चिमी राजस्थान की मिट्टियाँ क्षारीय हो जाती हैं
- सर्वाधिक समस्या ➜ इंदिरा गाँधी नहर क्षेत्र व गंगनहर सिंचित क्षेत्रों में
- सर्वाधिक प्रभावित जिला ➜ हनुमानगढ़; द्वितीय ➜ गंगानगर
- सर्वाधिक प्रभावित गाँव ➜ बड़ोपल (हनुमानगढ़); साथ ही भगबानदास, देईदास, कनवानी, गन्धेली, दौलताबाली व जाखड़ाबाली
- हनुमानगढ़ के टिब्बी, रावतसर, पीलीबंगा व श्रीगंगानगर के सूरतगढ़ ब्लॉक में 22,851 हैक्टेयर भूमि सेम ग्रस्त है
समाधान
- सफेदा (यूकेलिप्टस इंडिका, ऑस्ट्रेलियन पादप) सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है
- बूँद-बूँद सिंचाई व स्प्रिंकलर पद्धति अपनाना; नहरों की लाईनिंग करना; कृषि जल के अनुचित प्रबन्धन को रोकना
- इंडो डच जल निकासी परियोजना ➜ नीदरलैंड के सहयोग से 2003 से हनुमानगढ़ जिले में; इसके तहत ‘यूकेलिप्टस’ के पेड़ लगाए जा रहे हैं
8. भूमि अवनयन व अन्य
- भूमि अवनयन ➜ उपजाऊ भूमि की गुणवत्ता, उपयोगिता एवं उत्पादकता में कमी आना; इसे भू-निम्नीकरण भी कहते हैं। यह प्राकृतिक व मानवीय दोनों कारणों से होता है।
- कारण ➜ मृदा अपरदन, मृदा में लवणता वृद्धि, अत्यधिक खनन, वनों की कटाई, मरुस्थलीकरण, अति पशुचारण, विकासात्मक कार्य, अधिक सिंचाई, नहरी जल का रिसाव, शहरी ठोस कचरा एवं औद्योगिक अपशिष्ट, रासायनिक खाद व कीटनाशकों का उपयोग
- खरपतवार ➜ मुख्य फसल के साथ उग जाने वाले अवांछित पौधे; इन्हें हटाना स्थानीय भाषा में ‘निनाण करना’ कहलाता है
- मुख्य पोषक तत्व ➜ जैविक कार्बन, फास्फोरस, पोटाश; द्वितीयक व सूक्ष्म ➜ सल्फर, जस्ता, लोहा, ताम्बा, मैंगनीज व बोरोन
- केन्द्रीय भू-संरक्षण बोर्ड का कार्यालय ➜ जयपुर व सीकर
- राजस्थान के सभी जिलों में कुल 113 मिट्टी परीक्षण प्रयोगशालाएँ — 101 स्थिर तथा 12 भ्रमणशील
- पहली मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला ➜ जोधपुर (1958), भारत सरकार की सहायता से; दूसरी ➜ जयपुर
अगले भाग में मरुस्थलीकरण, भूमि से सम्बन्धित शब्दावली, प्रमुख भूमि सुधार कानून एवं योजनाएँ।
