Rajasthan · Geography Chapter 13 राजस्थान की मिट्टियाँ

राजस्थान की मिट्टियाँ प्रकार एवं विशेषताएँ – Rajasthan Geography Chapter 13

राजस्थान की मिट्टियों का परिचय और रंग-गठन के आधार पर सातों प्रकार, PYQ सहित।

9 min read Updated Notes in Hindi
In this chapter (9 sections)
  1. मूल अवधारणा
  2. रचना विधि के अनुसार दो प्रकार
  3. रेतीली मृदा (मरुस्थलीय मिट्टी)
  4. भूरी रेतीली मिट्टी
  5. काली मृदा / मध्यम काली / रेगुर मिट्टी
  6. लाल और काली मिट्टी
  7. लाल-लोमी मिट्टी (लेटेराइट)
  8. लाल-पीली मिट्टी
  9. कछारी / जलोढ़ / दोमट मिट्टी

मिट्टी राजस्थान की खेती, वनस्पति और यहाँ तक कि जनसंख्या के बँटवारे तक को तय करती है। पश्चिम में रेत, दक्षिण-पूर्व में काली मिट्टी और पूर्व में जलोढ़ — यही तीन धुरी पूरे अध्याय को थामे रखती हैं। इस भाग में मिट्टी की मूल अवधारणा और रंग-गठन के आधार पर बने सातों प्रकार क्रमवार दिए गए हैं। जहाँ-जहाँ पिछले वर्षों की परीक्षाओं में प्रश्न आया है, वहाँ परीक्षा का नाम साथ में लिखा गया है।

1. मूल अवधारणा

  • मिट्टियों का अध्ययन ➜ मृदा विज्ञान (Pedology)
  • शब्द व्युत्पत्ति ➜ लैटिन भाषा के ‘सोलम’ (Solum) से, जिसका अर्थ है फर्श
  • डॉ. बैनेट (अमेरिकी मृदा विशेषज्ञ) के अनुसार ➜ भू-पृष्ठ पर मिलने वाले असंगठित पदार्थों की वह ऊपरी परत, जो मूल चट्टानों अथवा वनस्पति के योग से बनती है, मृदा कहलाती है

महत्वपूर्ण तिथियाँ

  • अन्तर्राष्ट्रीय मृदा वर्ष ➜ संयुक्त राष्ट्र ने 2015 को घोषित किया
  • विश्व मृदा दिवस ➜ 5 दिसम्बर
  • 2024 की थीम ➜ मृदा की देखभाल: माप, निगरानी, प्रबंधन

निर्माण के 5 सक्रिय तत्व

  1. मूल चट्टान / मूल पदार्थ
  2. जलवायु
  3. वनस्पति
  4. समय
  5. धरातलीय ढाल एवं चट्टान की प्रकृति

2. रचना विधि के अनुसार दो प्रकार

  • स्थानीय मिट्टी ➜ जो सदैव अपने मूल स्थान पर रहती है और बहुत कम गति करती है। यह बेसाल्ट तत्व या विखण्डित चट्टानों से बनती है। राजस्थान के दक्षिणी व दक्षिणी-पूर्वी भाग की काली मिट्टी इसका उदाहरण है।
  • विस्थापित मिट्टी ➜ नदी एवं पवनों के प्रवाह से मूल स्थान से हटकर अन्य स्थानों पर पहुँच जाने वाली मिट्टी। राजस्थान के उत्तर एवं उत्तर-पश्चिमी भाग की रेतीली, बलुई मिट्टी इसका उदाहरण है। [परीक्षा: पशु परिचर S-3, 2024 — पवन द्वारा विस्थापित, उर्वरता कम व लवणता अधिक = मरुस्थलीय मृदा]

3. रेतीली मृदा (मरुस्थलीय मिट्टी)

  • विस्तार ➜ सम्पूर्ण पश्चिमी राजस्थान; रेत के टीलों से युक्त
  • यह वायु प्रवाह द्वारा जमा की गई है और हवाओं के साथ आज भी स्थानांतरित होती रहती है
  • इसमें पीली भूरी, बलुई-चीका मृदा की उपस्थिति रहती है
  • यह राज्य में सबसे अधिक भू-भाग पर पाई जाने वाली मिट्टी है
  • निर्माण प्रक्रिया ➜ उच्च तापमान, निम्न वर्षा एवं निम्न आर्द्रता वाले क्षेत्रों में ग्रेनाइट व बलुआ पत्थर के क्षरण से। अधिक तापान्तर व भौतिक अपक्षय इसके प्रमुख निर्माणक तत्व हैं।
  • गुण ➜ उपजाऊ तत्वों की मात्रा कम, लवणता अधिक, जल धारण (शोषण) क्षमता कम [परीक्षा: पशु परिचर S-2, 2024 — “यह पानी को अत्यधिक मात्रा में सोख और धारण कर सकती है” कथन गलत है]
  • 25 सेमी से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलती है; PH मान की अधिकता व जैविक पदार्थों की कमी
  • फसल ➜ बाजरा, मोठ, ग्वार आदि खरीफ; सिंचित क्षेत्रों में रबी भी

रेतीली मृदा के 4 वर्ग

वर्गविशेषताजिले
रेतीली बालू मृदाशुद्ध बालू प्रधानगंगानगर, बीकानेर, चूरू, जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, झुंझुनूं
लाल रेतीली मिट्टीजल सोखने की क्षमता अन्य रेतीली की अपेक्षा अधिक; पानी उपलब्ध हो तो कृषि के लिए उत्तमजोधपुर, नागौर, डीडवाना-कुचामन, पाली, जालौर, चूरू, झुंझुनूं [परीक्षा: पुरालेखपाल 2024 — उत्तर: जोधपुर, चुरू, झुंझुनूं]
पीली भूरी रेतीली मिट्टी3 से 4 फीट गहराई पर चूना मिश्रित परत, जिसे ‘स्टेपी मिट्टी’ कहते हैंनागौर व पाली
खारी मिट्टीलवणों की अधिकता; कृषि सम्भव नहीं, केवल मृदा अवरोधी घासें उगती हैंजैसलमेर, बाड़मेर, बालोतरा, बीकानेर, नागौर, डीडवाना-कुचामन की निम्न भूमियों व गर्तों में

4. भूरी रेतीली मिट्टी

  • अन्य नाम ➜ ग्रे-पेनेटेड / धूसर मरुस्थलीय / सिरोज्म मिट्टी
  • नाम क्यों ➜ रेत के छोटे-छोटे टीलों वाले भाग में पाई जाती है; रंग भूरा होता है
  • प्रसार ➜ बाड़मेर, बालोतरा, जालौर, जोधपुर, पाली, नागौर, डीडवाना-कुचामन, सिरोही, सीकर, झुंझुनूं — लगभग 36,000 वर्ग किमी क्षेत्र में
  • गुण ➜ फॉस्फेट तत्वों की अधिकता; पानी उपलब्ध होने पर अच्छी फसल
  • फसल ➜ ज्वार, बाजरा, मूंग, मोठ तथा बारानी कृषि
  • [परीक्षा: Junior Instructor (Electrician) 2024 — भूरी मृदाएँ टोंक, भीलवाड़ा, बूँदी व उदयपुर सभी में पाई जाती हैं]

नोट: पश्चिमी राजस्थान की मिट्टियाँ प्रायः बालूमय हैं, जिनमें 90–95% तक बालू कण पाए जाते हैं और केवल 5–7% तक मटियार।

5. काली मृदा / मध्यम काली / रेगुर मिट्टी

  • कमी ➜ फॉस्फेट, नाइट्रोजन व जैविक पदार्थों की कमी [परीक्षा: पशु परिचर S-4, 2024 — “इसमें पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन उपस्थित होता है” कथन गलत है]
  • अधिकता ➜ पोटाश व कैल्शियम
  • फसल ➜ कपास, धनिया, चावल, गन्ना, सोयाबीन व दालें [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक (सोलर टेक्नीशियन) 2025 — सोयाबीन की पैदावार के लिए काली मृदा सर्वोपयुक्त]
  • इसमें कच्छारी मृदा भी मिश्रित रूप से नदियों की घाटियों में मिलती है; कपास के लिए उपयुक्त होने से इसे कपास की काली मिट्टी (Black Cotton Soil) भी कहते हैं
  • स्वतः जुताई वाली मिट्टी ➜ गीली होने पर फूलती व चिपचिपी हो जाती है, सूखने पर सिकुड़कर चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं
  • यह चीका प्रधान दोमट है; कण बारीक, नमी धारण क्षमता अधिक; ज्वालामुखी निर्मित बैसाल्ट चट्टानों के अपरदन से बनी
  • प्रसार वाले जिले ➜ दक्षिणी पूर्वी भाग, विशेषकर हाड़ौती में — कोटा, बारां, बूँदी, झालावाड़ [परीक्षा: पशु परिचर S-5, 2024 — काली मृदा झालावाड़ में] [परीक्षा: CET 10+2 S-5, 2024 — कथन-I सत्य, कथन-II असत्य] [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक (सोलर) 2025 — “यह चुरू, झुंझुनूं एवं नागौर में पाई जाती है” असत्य कथन है]

6. लाल और काली मिट्टी

  • निर्माण ➜ मालवा के पठार की काली मिट्टी एवं दक्षिणी अरावली की लाल मिट्टी के मिश्रण से
  • कमी ➜ चूना, फास्फेट, नाइट्रोजन, कैल्शियम व कार्बनिक पदार्थ; उत्पादकता में विविधता
  • पर्याप्त ➜ पोटाश; चीका की अधिकता
  • फसल ➜ कपास, मक्का व गन्ना
  • जिले ➜ चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, पूर्वी उदयपुर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, राजसमंद, सलूम्बर

7. लाल-लोमी मिट्टी (लेटेराइट)

  • निर्माण ➜ स्फटकीय / रवेदार एवं कायांतरित चट्टानों से
  • कम मात्रा में ➜ चूना, पोटाश, लौह-ऑक्साइड, ह्यूमस और फास्फोरस [परीक्षा: पशु परिचर S-5, 2024 — “इसमें पर्याप्त मात्रा में फॉस्फोरस पाया जाता है” कथन सही नहीं है]
  • रंग ➜ लौह अंश की अधिकता के कारण लाल [परीक्षा: CET 10+2 S-2, 2024 — लोहे की उपस्थिति के कारण लाल दिखती है; दोनों कथन सत्य]
  • विशेषता ➜ स्थानीय मिट्टी; कण बारीक, लम्बे समय तक आर्द्रता बनाए रखते हैं, इसलिए कम वर्षा में भी अच्छी फसल
  • फसल ➜ मक्का, चावल व गन्ना
  • जिले ➜ डूँगरपुर, उदयपुर (मध्य व दक्षिणी भाग), दक्षिणी राजसमंद, सलूम्बर व बाँसवाड़ा [परीक्षा: रसायनज्ञ विज्ञान 2024 — उदयपुर, डूँगरपुर]

8. लाल-पीली मिट्टी

  • इसमें चीका व दोमट दोनों प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं
  • कार्बोनेट की कमी होती है, किन्तु नमी अधिक समय तक धारण करने की क्षमता होती है
  • लाल रंग लौह अंश की प्रधानता दर्शाता है; पीले रंग में जलवायु व स्थानीय दशाओं का प्रभाव स्पष्ट है
  • कमी ➜ चूना, नाइट्रोजन और जैविक कार्बनिक यौगिक; अधिकता ➜ लौह ऑक्साइड
  • निर्माण ➜ ग्रेनाइट, शिस्ट, नीस आदि चट्टानों के टूटने से [परीक्षा: पशु परिचर S-6, 2024 — यह मृदा शिस्ट, ग्रेनाइट तथा नीस चट्टानों के विखण्डन से बनी है]
  • फसल ➜ मूंगफली व कपास के लिए उपयुक्त [परीक्षा: CET Graduation S-3, 2024 — दोनों कथन सही हैं]
  • जिले ➜ सवाईमाधोपुर (पश्चिम भाग), भीलवाड़ा (पश्चिम भाग), सिरोही, अजमेर, राजसमंद व उदयपुर [परीक्षा: अनुसंधान अधिकारी 2024 — बनास नदी के जलग्रहण क्षेत्र में मिश्रित लाल एवं पीली मृदा का सर्वाधिक क्षेत्रफल]

9. कछारी / जलोढ़ / दोमट मिट्टी

  • विस्तार ➜ राजस्थान के पूर्वी मैदानी भागों की घाटियों और नदियों में [परीक्षा: पशु परिचर S-6, 2024 — राजस्थान का उत्तरी और पूर्वी भाग]
  • कमी ➜ चूना, फास्फोरिक अम्ल व ह्यूमस; विशेष रूप से नाइट्रोजन की कमी [परीक्षा: CET 10+2 S-3, 2024 — “इस मृदा में नाइट्रोजन की पर्याप्त मात्रा होती है” कथन गलत] [परीक्षा: Stenographer 2024 — कथन I सत्य, कथन II असत्य]
  • रंग ➜ कहीं लाल तो कहीं भूरा; उत्पादकता की दृष्टि से उत्तम (स्रोत — राजस्थान का भूगोल, हरिमोहन सक्सेना)
  • सामाजिक विज्ञान कक्षा-9 के अनुसार इसमें चूना, फास्फोरस, पोटाश व लौह अंश पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं [परीक्षा: CET 10+2 S-1, 2024 — दोनों कथन गलत]
  • जिले ➜ जयपुर, अलवर, खैरथल-तिजारा, कोटपूतली-बहरोड़, दौसा, टोंक, सवाईमाधोपुर, करौली, धौलपुर, भरतपुर व डीग [परीक्षा: पशु परिचर S-4, 2024 — गंगानगर, हनुमानगढ़, अलवर, भरतपुर, जयपुर व टोंक में जलोढ़ मृदा] [परीक्षा: JR Instructor (CLIT) 2024 — बीकानेर में प्रधानतः जलोढ़ नहीं]
  • फसल ➜ गेहूँ, सरसों, कपास व तम्बाकू के लिए बहुत उपयोगी [परीक्षा: पशु परिचर S-2, 2024] [परीक्षा: CET Graduation S-1, 2024 — कथन (I) सही, कथन (II) गलत]
  • भूरी कच्छारी मृदा ➜ अलवर, भरतपुर तथा हनुमानगढ़ व गंगानगर के घग्घर प्रदेश में; कृषि की दृष्टि से उत्तम
  • खादर और बांगर ➜ जलोढ़ मृदा के ही उदाहरण हैं [परीक्षा: Reet L-2, 2025]

दो शब्द याद रखें: जलोढ़ = जल द्वारा बहाकर लाई गई मिट्टी; वातोढ़ = वायु द्वारा जमा की गई मिट्टी।

अगले भाग में मिट्टियों का वैज्ञानिक वर्गीकरण — अमेरिकी 11-प्रकार प्रणाली पर आधारित राजस्थान के 5 उपभाग तथा कृषि विभाग का 14-प्रकार वर्गीकरण।

Useful for these exams

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *