मिट्टी राजस्थान की खेती, वनस्पति और यहाँ तक कि जनसंख्या के बँटवारे तक को तय करती है। पश्चिम में रेत, दक्षिण-पूर्व में काली मिट्टी और पूर्व में जलोढ़ — यही तीन धुरी पूरे अध्याय को थामे रखती हैं। इस भाग में मिट्टी की मूल अवधारणा और रंग-गठन के आधार पर बने सातों प्रकार क्रमवार दिए गए हैं। जहाँ-जहाँ पिछले वर्षों की परीक्षाओं में प्रश्न आया है, वहाँ परीक्षा का नाम साथ में लिखा गया है।
1. मूल अवधारणा
- मिट्टियों का अध्ययन ➜ मृदा विज्ञान (Pedology)
- शब्द व्युत्पत्ति ➜ लैटिन भाषा के ‘सोलम’ (Solum) से, जिसका अर्थ है फर्श
- डॉ. बैनेट (अमेरिकी मृदा विशेषज्ञ) के अनुसार ➜ भू-पृष्ठ पर मिलने वाले असंगठित पदार्थों की वह ऊपरी परत, जो मूल चट्टानों अथवा वनस्पति के योग से बनती है, मृदा कहलाती है
महत्वपूर्ण तिथियाँ
- अन्तर्राष्ट्रीय मृदा वर्ष ➜ संयुक्त राष्ट्र ने 2015 को घोषित किया
- विश्व मृदा दिवस ➜ 5 दिसम्बर
- 2024 की थीम ➜ मृदा की देखभाल: माप, निगरानी, प्रबंधन
निर्माण के 5 सक्रिय तत्व
- मूल चट्टान / मूल पदार्थ
- जलवायु
- वनस्पति
- समय
- धरातलीय ढाल एवं चट्टान की प्रकृति
2. रचना विधि के अनुसार दो प्रकार
- स्थानीय मिट्टी ➜ जो सदैव अपने मूल स्थान पर रहती है और बहुत कम गति करती है। यह बेसाल्ट तत्व या विखण्डित चट्टानों से बनती है। राजस्थान के दक्षिणी व दक्षिणी-पूर्वी भाग की काली मिट्टी इसका उदाहरण है।
- विस्थापित मिट्टी ➜ नदी एवं पवनों के प्रवाह से मूल स्थान से हटकर अन्य स्थानों पर पहुँच जाने वाली मिट्टी। राजस्थान के उत्तर एवं उत्तर-पश्चिमी भाग की रेतीली, बलुई मिट्टी इसका उदाहरण है। [परीक्षा: पशु परिचर S-3, 2024 — पवन द्वारा विस्थापित, उर्वरता कम व लवणता अधिक = मरुस्थलीय मृदा]
3. रेतीली मृदा (मरुस्थलीय मिट्टी)
- विस्तार ➜ सम्पूर्ण पश्चिमी राजस्थान; रेत के टीलों से युक्त
- यह वायु प्रवाह द्वारा जमा की गई है और हवाओं के साथ आज भी स्थानांतरित होती रहती है
- इसमें पीली भूरी, बलुई-चीका मृदा की उपस्थिति रहती है
- यह राज्य में सबसे अधिक भू-भाग पर पाई जाने वाली मिट्टी है
- निर्माण प्रक्रिया ➜ उच्च तापमान, निम्न वर्षा एवं निम्न आर्द्रता वाले क्षेत्रों में ग्रेनाइट व बलुआ पत्थर के क्षरण से। अधिक तापान्तर व भौतिक अपक्षय इसके प्रमुख निर्माणक तत्व हैं।
- गुण ➜ उपजाऊ तत्वों की मात्रा कम, लवणता अधिक, जल धारण (शोषण) क्षमता कम [परीक्षा: पशु परिचर S-2, 2024 — “यह पानी को अत्यधिक मात्रा में सोख और धारण कर सकती है” कथन गलत है]
- 25 सेमी से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलती है; PH मान की अधिकता व जैविक पदार्थों की कमी
- फसल ➜ बाजरा, मोठ, ग्वार आदि खरीफ; सिंचित क्षेत्रों में रबी भी
रेतीली मृदा के 4 वर्ग
| वर्ग | विशेषता | जिले |
|---|---|---|
| रेतीली बालू मृदा | शुद्ध बालू प्रधान | गंगानगर, बीकानेर, चूरू, जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर, झुंझुनूं |
| लाल रेतीली मिट्टी | जल सोखने की क्षमता अन्य रेतीली की अपेक्षा अधिक; पानी उपलब्ध हो तो कृषि के लिए उत्तम | जोधपुर, नागौर, डीडवाना-कुचामन, पाली, जालौर, चूरू, झुंझुनूं [परीक्षा: पुरालेखपाल 2024 — उत्तर: जोधपुर, चुरू, झुंझुनूं] |
| पीली भूरी रेतीली मिट्टी | 3 से 4 फीट गहराई पर चूना मिश्रित परत, जिसे ‘स्टेपी मिट्टी’ कहते हैं | नागौर व पाली |
| खारी मिट्टी | लवणों की अधिकता; कृषि सम्भव नहीं, केवल मृदा अवरोधी घासें उगती हैं | जैसलमेर, बाड़मेर, बालोतरा, बीकानेर, नागौर, डीडवाना-कुचामन की निम्न भूमियों व गर्तों में |
4. भूरी रेतीली मिट्टी
- अन्य नाम ➜ ग्रे-पेनेटेड / धूसर मरुस्थलीय / सिरोज्म मिट्टी
- नाम क्यों ➜ रेत के छोटे-छोटे टीलों वाले भाग में पाई जाती है; रंग भूरा होता है
- प्रसार ➜ बाड़मेर, बालोतरा, जालौर, जोधपुर, पाली, नागौर, डीडवाना-कुचामन, सिरोही, सीकर, झुंझुनूं — लगभग 36,000 वर्ग किमी क्षेत्र में
- गुण ➜ फॉस्फेट तत्वों की अधिकता; पानी उपलब्ध होने पर अच्छी फसल
- फसल ➜ ज्वार, बाजरा, मूंग, मोठ तथा बारानी कृषि
- [परीक्षा: Junior Instructor (Electrician) 2024 — भूरी मृदाएँ टोंक, भीलवाड़ा, बूँदी व उदयपुर सभी में पाई जाती हैं]
नोट: पश्चिमी राजस्थान की मिट्टियाँ प्रायः बालूमय हैं, जिनमें 90–95% तक बालू कण पाए जाते हैं और केवल 5–7% तक मटियार।
5. काली मृदा / मध्यम काली / रेगुर मिट्टी
- कमी ➜ फॉस्फेट, नाइट्रोजन व जैविक पदार्थों की कमी [परीक्षा: पशु परिचर S-4, 2024 — “इसमें पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन उपस्थित होता है” कथन गलत है]
- अधिकता ➜ पोटाश व कैल्शियम
- फसल ➜ कपास, धनिया, चावल, गन्ना, सोयाबीन व दालें [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक (सोलर टेक्नीशियन) 2025 — सोयाबीन की पैदावार के लिए काली मृदा सर्वोपयुक्त]
- इसमें कच्छारी मृदा भी मिश्रित रूप से नदियों की घाटियों में मिलती है; कपास के लिए उपयुक्त होने से इसे कपास की काली मिट्टी (Black Cotton Soil) भी कहते हैं
- स्वतः जुताई वाली मिट्टी ➜ गीली होने पर फूलती व चिपचिपी हो जाती है, सूखने पर सिकुड़कर चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं
- यह चीका प्रधान दोमट है; कण बारीक, नमी धारण क्षमता अधिक; ज्वालामुखी निर्मित बैसाल्ट चट्टानों के अपरदन से बनी
- प्रसार वाले जिले ➜ दक्षिणी पूर्वी भाग, विशेषकर हाड़ौती में — कोटा, बारां, बूँदी, झालावाड़ [परीक्षा: पशु परिचर S-5, 2024 — काली मृदा झालावाड़ में] [परीक्षा: CET 10+2 S-5, 2024 — कथन-I सत्य, कथन-II असत्य] [परीक्षा: कनिष्ठ अनुदेशक (सोलर) 2025 — “यह चुरू, झुंझुनूं एवं नागौर में पाई जाती है” असत्य कथन है]
6. लाल और काली मिट्टी
- निर्माण ➜ मालवा के पठार की काली मिट्टी एवं दक्षिणी अरावली की लाल मिट्टी के मिश्रण से
- कमी ➜ चूना, फास्फेट, नाइट्रोजन, कैल्शियम व कार्बनिक पदार्थ; उत्पादकता में विविधता
- पर्याप्त ➜ पोटाश; चीका की अधिकता
- फसल ➜ कपास, मक्का व गन्ना
- जिले ➜ चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, पूर्वी उदयपुर, डूँगरपुर, बाँसवाड़ा, राजसमंद, सलूम्बर
7. लाल-लोमी मिट्टी (लेटेराइट)
- निर्माण ➜ स्फटकीय / रवेदार एवं कायांतरित चट्टानों से
- कम मात्रा में ➜ चूना, पोटाश, लौह-ऑक्साइड, ह्यूमस और फास्फोरस [परीक्षा: पशु परिचर S-5, 2024 — “इसमें पर्याप्त मात्रा में फॉस्फोरस पाया जाता है” कथन सही नहीं है]
- रंग ➜ लौह अंश की अधिकता के कारण लाल [परीक्षा: CET 10+2 S-2, 2024 — लोहे की उपस्थिति के कारण लाल दिखती है; दोनों कथन सत्य]
- विशेषता ➜ स्थानीय मिट्टी; कण बारीक, लम्बे समय तक आर्द्रता बनाए रखते हैं, इसलिए कम वर्षा में भी अच्छी फसल
- फसल ➜ मक्का, चावल व गन्ना
- जिले ➜ डूँगरपुर, उदयपुर (मध्य व दक्षिणी भाग), दक्षिणी राजसमंद, सलूम्बर व बाँसवाड़ा [परीक्षा: रसायनज्ञ विज्ञान 2024 — उदयपुर, डूँगरपुर]
8. लाल-पीली मिट्टी
- इसमें चीका व दोमट दोनों प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं
- कार्बोनेट की कमी होती है, किन्तु नमी अधिक समय तक धारण करने की क्षमता होती है
- लाल रंग लौह अंश की प्रधानता दर्शाता है; पीले रंग में जलवायु व स्थानीय दशाओं का प्रभाव स्पष्ट है
- कमी ➜ चूना, नाइट्रोजन और जैविक कार्बनिक यौगिक; अधिकता ➜ लौह ऑक्साइड
- निर्माण ➜ ग्रेनाइट, शिस्ट, नीस आदि चट्टानों के टूटने से [परीक्षा: पशु परिचर S-6, 2024 — यह मृदा शिस्ट, ग्रेनाइट तथा नीस चट्टानों के विखण्डन से बनी है]
- फसल ➜ मूंगफली व कपास के लिए उपयुक्त [परीक्षा: CET Graduation S-3, 2024 — दोनों कथन सही हैं]
- जिले ➜ सवाईमाधोपुर (पश्चिम भाग), भीलवाड़ा (पश्चिम भाग), सिरोही, अजमेर, राजसमंद व उदयपुर [परीक्षा: अनुसंधान अधिकारी 2024 — बनास नदी के जलग्रहण क्षेत्र में मिश्रित लाल एवं पीली मृदा का सर्वाधिक क्षेत्रफल]
9. कछारी / जलोढ़ / दोमट मिट्टी
- विस्तार ➜ राजस्थान के पूर्वी मैदानी भागों की घाटियों और नदियों में [परीक्षा: पशु परिचर S-6, 2024 — राजस्थान का उत्तरी और पूर्वी भाग]
- कमी ➜ चूना, फास्फोरिक अम्ल व ह्यूमस; विशेष रूप से नाइट्रोजन की कमी [परीक्षा: CET 10+2 S-3, 2024 — “इस मृदा में नाइट्रोजन की पर्याप्त मात्रा होती है” कथन गलत] [परीक्षा: Stenographer 2024 — कथन I सत्य, कथन II असत्य]
- रंग ➜ कहीं लाल तो कहीं भूरा; उत्पादकता की दृष्टि से उत्तम (स्रोत — राजस्थान का भूगोल, हरिमोहन सक्सेना)
- सामाजिक विज्ञान कक्षा-9 के अनुसार इसमें चूना, फास्फोरस, पोटाश व लौह अंश पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं [परीक्षा: CET 10+2 S-1, 2024 — दोनों कथन गलत]
- जिले ➜ जयपुर, अलवर, खैरथल-तिजारा, कोटपूतली-बहरोड़, दौसा, टोंक, सवाईमाधोपुर, करौली, धौलपुर, भरतपुर व डीग [परीक्षा: पशु परिचर S-4, 2024 — गंगानगर, हनुमानगढ़, अलवर, भरतपुर, जयपुर व टोंक में जलोढ़ मृदा] [परीक्षा: JR Instructor (CLIT) 2024 — बीकानेर में प्रधानतः जलोढ़ नहीं]
- फसल ➜ गेहूँ, सरसों, कपास व तम्बाकू के लिए बहुत उपयोगी [परीक्षा: पशु परिचर S-2, 2024] [परीक्षा: CET Graduation S-1, 2024 — कथन (I) सही, कथन (II) गलत]
- भूरी कच्छारी मृदा ➜ अलवर, भरतपुर तथा हनुमानगढ़ व गंगानगर के घग्घर प्रदेश में; कृषि की दृष्टि से उत्तम
- खादर और बांगर ➜ जलोढ़ मृदा के ही उदाहरण हैं [परीक्षा: Reet L-2, 2025]
दो शब्द याद रखें: जलोढ़ = जल द्वारा बहाकर लाई गई मिट्टी; वातोढ़ = वायु द्वारा जमा की गई मिट्टी।
अगले भाग में मिट्टियों का वैज्ञानिक वर्गीकरण — अमेरिकी 11-प्रकार प्रणाली पर आधारित राजस्थान के 5 उपभाग तथा कृषि विभाग का 14-प्रकार वर्गीकरण।
