अरावली के पूर्व में फैला यह भाग राजस्थान की खेती और उद्योग दोनों की रीढ़ है। यह चम्बल, बनास, बाणगंगा और उनकी सहायक नदियों की देन है और विस्तृत रूप से गंगा के मैदान का ही हिस्सा माना जाता है। यहाँ चारों बेसिनों को क्रमवार समझते हैं।
1. मैदान क्या होता है
सामान्यतः समतल भू-भाग को मैदान कहा जाता है। पृथ्वी के कुल स्थलीय भाग की सतह के लगभग आधे हिस्से पर मैदान मिलते हैं। ये नदियों द्वारा पोषित होते हैं और नदियों द्वारा बहाकर लाई गई मृदा के जमने से बनते हैं। इसी कारण ये बड़े उपजाऊ होते हैं और यहाँ कृषि अधिक होती है।
2. सामान्य परिचय
- निर्माण ➜ चम्बल, बनास, बाणगंगा एवं उनकी सहायक नदियों द्वारा
- दक्षिणी पूर्वी सीमा ➜ विंध्यन पठार द्वारा बनाई जाती है
- जिले ➜ अलवर, कोटपूतली-बहरोड़, खैरथल-तिजारा, डीग, भरतपुर, जयपुर, दौसा, टोंक, धौलपुर, करौली, सवाईमाधोपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, सलूम्बर, प्रतापगढ़, डूंगरपुर, बाँसवाड़ा
- क्षेत्रफल ➜ राज्य का 23%
- जनसंख्या ➜ राज्य की 39%
- मिट्टी ➜ जलोढ़ व दोमट (कांप/कछारी)
- जलवायु ➜ आर्द्र
- प्रमुख फसल ➜ गेहूँ, जौ, चना
- औसत वर्षा ➜ 50 से 80 सेमी
- सामान्य ढाल ➜ पूर्व की ओर
- औसत ऊँचाई ➜ 200 से 500 मीटर
- सिंचाई ➜ कुओं द्वारा अधिक
- प्रमुख नहरें ➜ भरतपुर नहर व गुड़गाँव नहर
3. प्रमुख विशेषताएँ
- यह प्रदेश अरावली पर्वतमाला के पूर्व में स्थित है
- यह राजस्थान का सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला भाग है
- यह सर्वाधिक कृषि विकास वाला भाग है
- यह सर्वाधिक उपजाऊ भौतिक भाग है, इसीलिए इसे ‘खाद्यान्न का कटोरा’ कहा जाता है
- यह सर्वाधिक औद्योगिक विकास वाला भाग है
- नोट ➜ इस मैदानी भाग में स्थित माही नदी को छोड़कर शेष सभी नदियाँ बंगाल की खाड़ी में जाती हैं
4. चार उपविभाग
- चम्बल बेसिन
- छप्पन बेसिन / माही बेसिन
- बनास बेसिन
- बाणगंगा बेसिन
5. चम्बल बेसिन
- क्या ➜ चम्बल नदी द्वारा निर्मित मैदानी भाग
- विस्तार ➜ कोटा, बूँदी, बारां, झालावाड़, सवाईमाधोपुर, करौली, धौलपुर
- स्थलाकृति ➜ चम्बल घाटी पहाड़ियों और पठारों से निर्मित
- कुल एरिया ➜ लगभग 4500 वर्ग किमी, जो बीहड़ों (Ravines) से प्रभावित
डांग / उत्खात स्थलाकृति (Bad land Topography)
- चम्बल नदी के आसपास स्थित ऊँची-नीची कृषि के अयोग्य भूमि को उत्खात स्थलाकृति कहते हैं
- स्थानीय भाषा में इसे ‘डांग’ कहते हैं
- सर्वाधिक डांग भूमि करौली में है; करौली को ‘डांग की रानी’ कहा जाता है
बीहड़ (Ravine)
- नदियों के प्रवाह से मिट्टी में अत्यधिक कटाव (अवनालिका अपरदन) होकर गहरी-गहरी घाटियाँ बन जाती हैं, जो बीहड़ कहलाती हैं
- ये चम्बल नदी के सहारे कोटा से धौलपुर तक विस्तृत हैं
- बीहड़ डाकुओं की शरणस्थली कहलाते हैं
- मुख्य बीहड़ प्रभावित जिले ➜ कोटा, सवाईमाधोपुर, बूँदी
चम्बल द्वारा निर्मित स्थलाकृतियाँ
- चम्बल अपने उद्गम स्थान से यमुना में मिलने तक अनेक स्थलाकृतियाँ बनाती है — गार्ज, नदी कगार, जल प्रपात, क्षिप्रिका, नीक पाइण्ट्स तथा बीहड़ भूमि
- क्षिप्रिका (Rapid) ➜ नदी के मार्ग का वह हिस्सा जहाँ ढाल किसी अवरोध के कारण सामान्य से अधिक हो जाता है और जलप्रवाह अत्यधिक तीव्र हो जाता है
- खादर ➜ चम्बल के प्रवाह क्षेत्र में 5 से 30 मीटर तक गहरे गड्ढे वाली भूमि को स्थानीय भाषा में खादर कहते हैं
- बेसिन ➜ स्थल का वह भू-भाग जहाँ नदी और उसकी सहायक नदियाँ बहती हैं
6. छप्पन बेसिन / माही बेसिन
- क्या ➜ माही नदी का प्रवाह क्षेत्र, जो मध्यप्रदेश से निकलकर इस क्षेत्र से गुजरती हुई खंभात की खाड़ी में गिरती है
- जिले ➜ बाँसवाड़ा, प्रतापगढ़, डूंगरपुर व दक्षिणी पूर्वी उदयपुर; पुनर्गठन के बाद सलूम्बर भी शामिल
- स्थिति ➜ राजस्थान के दक्षिणतम भाग में; क्षेत्र असमतल तथा सर्वत्र छोटी-छोटी पहाड़ियाँ
- स्थानीय नाम ➜ पहाड़ियों से युक्त तथा कटा-फटा होने के कारण इसे ‘वागड़’ कहा जाता है
- मिट्टी ➜ लाल मिट्टी का प्रसार अधिक
- ढाल ➜ पश्चिम की ओर; औसत ऊँचाई 200 से 400 मीटर
विशेष शब्द
- कांठल ➜ प्रतापगढ़ में माही का बहाव क्षेत्र; प्रतापगढ़ का प्राचीन नाम कांठल था, इसीलिए माही को ‘कांठल की गंगा’ कहते हैं
- छप्पन का मैदान ➜ बाँसवाड़ा से प्रतापगढ़ के मध्य भाग में 56 नदी-नालों एवं गाँवों का समूह
- वागड़ ➜ डूंगरपुर व बाँसवाड़ा में वागड़ी बोली (राजस्थानी + गुजराती) बोली जाती है; इसी बोली के कारण प्रदेश को बागड़/वागड़ कहा जाने लगा
वागड़ प्रदेश के अन्य नाम
| नाम | कारण |
|---|---|
| कुमारिका खंड / बांगुरी प्रदेश / नाग खंड | माही, सोम व जाखम के प्रवाह क्षेत्र को (स्कन्द पुराण में) |
| पुष्प क्षेत्र | पुष्प लताएँ व वन होने के कारण |
| व्याघ्रघाट | जंगली जीवों का प्रदेश होने के कारण |
| लाट प्रदेश | चालुक्य वंश के राजाओं के शासनकाल में |
| पातालदेश / गुप्त प्रदेश | ऋषि मुनियों द्वारा |
7. बनास बेसिन
- निर्माण ➜ बनास नदी व उसकी सहायक नदियों द्वारा
- ढाल ➜ पूर्व की ओर
- स्वरूप ➜ कहीं पूर्ण समतल तो कहीं कटा-फटा, किंतु सम्पूर्ण क्षेत्र में जलोढ़ मृदा का जमाव है जो कृषि के लिए उपयुक्त है
- सीमाएँ ➜ पश्चिम में 50 सेमी वर्षा रेखा, उत्तर में अलवर पहाड़ी, पूर्व में विंध्यन कगार
- औसत ऊँचाई ➜ 280 से 500 मीटर
दो भाग
- मालपुरा-करौली का मैदान ➜ बनास बेसिन का उत्तरी पूर्वी भाग; टोंक, सवाईमाधोपुर व करौली जिलों में विस्तृत। ए.एम. हेरॉन ने इसे ‘तृतीय पेनिप्लेन’ नाम दिया। यह मालपुरा (टोंक) व करौली के मध्य विस्तृत उपजाऊ मिट्टी का मैदान है, जो कांपीय मिट्टी, नीस व शिष्ट चट्टानों से निर्मित है। यहाँ के बलुई पत्थरों का विदेशों में भी निर्यात होता है। औसत ऊँचाई 280 से 400 मीटर; ढाल दक्षिण-पूर्व और पूर्व की ओर।
- मेवाड़ का मैदान ➜ बनास बेसिन का दक्षिणी भाग; मुख्यतः भीलवाड़ा व चित्तौड़गढ़ में विस्तृत
- खेराड़ ➜ भीलवाड़ा जिले का जहाजपुर क्षेत्र
- माल खेराड़ ➜ टोंक जिले का मालपुरा क्षेत्र
8. बाणगंगा बेसिन
- क्या ➜ बाणगंगा नदी के बहाव क्षेत्र का मैदान
- जिले ➜ जयपुर, दौसा, डीग, भरतपुर
- विशेष ➜ यहाँ सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी है; यह पूर्वी मैदानी प्रदेश का सर्वाधिक उपजाऊ उपभाग है
रिवीजन पॉइंटर्स
- खाद्यान्न का कटोरा ➜ पूर्वी मैदानी प्रदेश; डांग की रानी ➜ करौली।
- माही को छोड़कर इस भाग की सभी नदियाँ बंगाल की खाड़ी में जाती हैं।
- तृतीय पेनिप्लेन ➜ मालपुरा-करौली का मैदान (ए.एम. हेरॉन)।
- कांठल की गंगा ➜ माही नदी; छप्पन का मैदान = 56 नदी-नाले व गाँव।
- सर्वाधिक उपजाऊ उपभाग ➜ बाणगंगा बेसिन।
